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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 458 में से

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पृष्ठ 59

अन्य. यो. व्य. श्लोक १ ] स्याद्वादमञ्जरी ७
षितरागादिदोष इति । अबाध्यसिद्धान्तता च श्रुतकेवल्य¹दिष्वपि दृश्यतेऽतस्तदपोहायाप्त-
मुख्यमिति विशेषणम् । आप्तिर्हि रागद्वेषमोहानामैकान्तिक आत्यन्तिकश्च² क्षयः, सा येषामस्ति
ते खल्वाप्ताः । अभ्रादित्वाद्³मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः । तेषु मध्ये मुखमिव सर्वाङ्गानां प्रधान-
त्वेन मुख्यम् । “शाखादेर्यः⁴” इति तुल्ये यः । अमर्त्यपूज्यता च तथाविधगुरुपदेशपरिचर्या-
पर्याप्तविद्याचरणसम्पन्नानां सामान्यमुनीनामपि न दुर्घटा । अतस्तन्निराकरणाय स्वयम्भुवमिति
विशेषणम् । स्वयम्-आत्मनैव, परोपदेशनिरपेक्षतयाऽवगततत्त्वो भवतीति स्वयम्भूः-स्वयं
संबुद्धः, तम् । एवंविधं चरमजिनेन्द्रं स्तोतुं-स्तुतिविषयीकर्तुम् अहं यतिष्ये-यत्नं करिष्यामि ।
अत्र चाचार्यो भविष्यत्कालप्रयोगेण योगिनामप्यशक्यमनुष्ठानं भगवद्गुणस्तवनं मन्यमानः
श्रद्धामेव स्तुतिकरणेऽसाधारणं कारणं ज्ञापयन् यत्नकरणमेव मदधीनं पुनर्यथाऽवस्थितभग-
वद्गुणस्तवनसिद्धिरिति सूचितवान् । अहमिति च गतार्थत्वेऽपि परोपदेशान्यानुवृत्त्यादि-
निरपेक्षतया निजश्रद्धयैव स्तुतिप्रारम्भ इति ज्ञापनार्थम् ॥
अथवा । श्रीवर्धमानादिविशेषणचतुष्टयमनन्तविज्ञानादिपदचतुष्टयेन सह हेतुहेतु-
मद्भावेन व्याख्यायते । यत एव श्रीवर्धमानम्, अत एवानन्तविज्ञानम् । श्रिया-कृत्स्नकर्म-
दोषोंको जीतकर उन्हें जड़मूलसे नष्ट कर दिया है, उसे जिन कहते हैं । 'अबाध्यसिद्धान्त' श्रुतकेवली आदिमें
भी पाया जाता है, उसका निराकरण करनेके लिए 'आप्तमुख्य' विशेषण दिया गया है । जिसके राग, द्वेष
और मोहका सर्वथा क्षय हो गया है, उसे आप्त कहते हैं । [ यहाँ अभ्रादिगणमें मत्वर्थमें 'अच्' प्रत्यय हुआ
है; ( 'अभ्रादिभ्यः' हेमशब्दानुशासन ७।२।४६ ) । जिस प्रकार सम्पूर्ण अंगोंमें मुख प्रधान है, इसी तरह
जिनेन्द्रभगवान् आप्तोंमें प्रधान हैं, इसलिए उन्हें आप्तमुख्य कहा गया है । यहाँ 'शाखादेर्यः' ( हेमशब्दानु-
शासन ७।१।११४ ) सूत्रसे तुल्य अर्थमें 'य' प्रत्यय हुआ है ] । सद्गुरुओंके उपदेश और सेवासे पर्याप्त
ज्ञान और चारित्रको प्राप्त करनेवाले सामान्य मुनि भी देवों द्वारा पूजे जाते हैं, इसलिए उनका निराकरण
करनेके लिए 'स्वयम्भू' विशेषण दिया गया है । जिसने दूसरेके उपदेशके बिना स्वयं ही तत्त्वोंको जान लिया
है, वह स्वयम्भू कहलाता है-जो स्वयं सम्बुद्ध हो । इन पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त अन्तिम जिनेन्द्र ( वर्धमान-
स्वामी ) की स्तुति करनेका मैं ( हेमचन्द्र ) प्रयत्न करूँगा । भगवान्के गुणोंका स्तवन योगियों द्वारा भी
अशक्य है, और असाधारण श्रद्धाके वश ही उन गुणोंकी स्तुति की जाती है, यह सूचित करनेके लिए
आचार्यने 'यतिष्ये' भविष्यकालका प्रयोग किया है । अर्थात् प्रयत्न करना ही मेरे अधीन है, यथावस्थित
भगवान्के गुणोंके स्तवनकी सिद्धि नहीं, यही इससे सूचित होता है । यद्यपि 'यतिष्ये' कहनेसे 'अहं' का
स्वयं बोध हो जाता है, फिर भी दूसरोंके उपदेशके बिना; बिना किसीकी आज्ञाके, केवल अपनी ही भक्तिसे
मैं इस स्तवनको आरम्भ करता हूँ, यह बतानेके लिए 'अहं' पद दिया गया है ।
अथवा-(१) श्रीवर्धमानं, (२) जिनं, (३) आप्तमुख्यं, (४) स्वयम्भुवं-ये चारों विशेषण क्रमशः
(१) अनन्तविज्ञानं, (२) अतीतदोषं, (३) अबाध्यसिद्धान्तं, (४) अमर्त्यपूज्यंके साथ कारण और कार्यरूपसे
प्रतिपादित किये जा सकते हैं । भगवान् सम्पूर्ण कर्मोंके नाशसे उत्पन्न होनेवाली अनन्तचतुष्टय लक्ष्मीसे
१. श्रुतेन केवलिनः श्रुतकेवलिनः, चतुर्दशपूर्वधरत्वात् ।
अथ प्रभवः प्रभुः । शय्यम्भवो यशोभद्रः सम्भूतविजयस्ततः ॥३३॥
भद्रबाहुः स्थूलभद्रः श्रुतकेवलिनो हि षट् ॥३४॥
इति अभिधानचिन्तामणौ प्रथमकाण्डे ।
२. निःशेषीकृतेऽपि पुनरुद्भवमाशङ्क्यात्यन्तिकः, अभूयःसम्भवदोषविनाशः ।
३. 'अभ्रादिभ्यः' हैमसूत्रम् ७।२।४६ ।
४. हैमसूत्रम् ७।१।११४ ।