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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 458 में से

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पृष्ठ 66

१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ४
च धर्मा धर्मिणः सकाशादत्यन्तं व्यतिरिक्ताः । एकान्तभेदे विशेषणविशेष्यभावानुपपत्तेः,
करभरासभयोरिव धर्मधर्मिव्यपदेशाभावप्रसङ्गाच्च । धर्माणामपि च पृथक्पदार्थान्तरत्वकल्पने
एकस्मिन्नेव वस्तुनि पदार्थानन्त्यप्रसङ्गः । अनन्तधर्मकत्वाद् वस्तुनः ॥
तदेवं सामान्यविशेषयोः स्वतत्त्वं यथावदनवबुध्यमाना अकुशलाः अतत्त्वाभिनिविष्ट-
दृष्टयः¹ तीर्थान्तरीयाः स्खलन्ति—न्यायमार्गाद् भ्रश्यन्ति निरुत्तरीभवन्तीत्यर्थः । स्खलनेन
चात्र प्रामाणिकजनोपहसनीयता ध्वन्यते । किं कुर्वाणाः, द्वयम्—अनुवृत्तिव्यावृत्तिलक्षणं
प्रत्ययद्वयं वदन्तः । कस्मादेतत्प्रत्ययद्वयं वदन्तः ? इत्याह । परात्मतत्त्वात्—परौ पदार्थेभ्यो
व्यतिरिक्तवादन्यौ परस्परनिरपेक्षौ च यौ सामान्यविशेषौ तयोर्यादात्मतत्त्वं स्वरूपम् अनुवृत्ति-
व्यावृत्तिलक्षणं, तस्मात् तदाश्रित्येत्यर्थः । "गम्यपयः कर्माऽधारे २" इत्यनेन पञ्चमी । कथंभूतात्
परात्मतत्त्वाद् ? इत्याह । अतथात्मतत्त्वात् मा भूत् परात्मतत्त्वस्य सत्यरूपतेति विशेषण-
मिदम् । यथा येनैकान्तभेदलक्षणेन प्रकारेण परैः प्रकल्पितं, न तथा तेन प्रकारेणात्मतत्त्वं
स्वरूपं यस्य तत् तथा । तस्मात् यतः पदार्थेष्वविष्वग्भावेन³ सामान्यविशेषौ वर्तेते । तैश्च तौ
तेभ्यः परत्वेन कल्पितौ । परत्वं चान्यत्वं तच्चैकान्तभेदाविनाभावि ॥
किञ्च, पदार्थेभ्यः सामान्यविशेषयोरेकान्तभिन्नत्वे स्वीक्रियमाणे एकवस्तुविषय-
मनुवृत्तिव्यावृत्तिरूपं प्रत्ययद्वयं नोपपद्येत । एकान्ताभेदे चान्यतरस्यासत्त्वप्रसङ्गः । सामान्य-
विशेषव्यवहाराभावश्च स्यात् । सामान्यविशेषोभयात्मकत्वेनैव वस्तुनः प्रमाणेन प्रतीतेः ।
धर्मात्मक होती है । (भाव यह है कि वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इन
छह पदार्थोंको स्वीकार करते हैं । इन छह पदार्थोंमें सामान्य और विशेष नामक पदार्थ द्रव्य, गुण, कर्म
आदिसे भिन्न माने गये हैं । दूसरे शब्दोंमें, वैशेषिक मतके अनुसार, पदार्थोंमें 'सामान्य-विशेष' का ज्ञान
पदार्थोंका गुण (धर्म) नहीं है, बल्कि यह ज्ञान सामान्य और विशेष नामके भिन्न पदार्थोंसे होता है । उदा-
हरणके लिए, घटत्व घटका गुण नहीं है, यह घटमें समवाय-सम्बन्धसे रहता है । इसी प्रकार नील-पीत आदि
भी घटके गुण नहीं हैं, वे भी घटमें समवाय-सम्बन्धसे रहते हैं । जैनदर्शन अनेकान्तात्मक (सामान्यविशेषात्मक)
है, इसलिए वह वैशेषिकोंके इस सिद्धान्तका खण्डन करता है । जैनदर्शनके अनुसार, पदार्थोंमें स्वभावसे ही
सामान्य-विशेषकी प्रतीति होती है । क्योंकि सामान्य-विशेष पदार्थोंके ही गुण हैं, कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं ।
धर्मीसे धर्म भिन्न नहीं हो सकता, अतएव सामान्य-विशेषको भिन्न पदार्थ स्वीकार करना अयुक्तियुक्त है । ) ।
इस प्रकार सामान्य-विशेषके स्वरूपको ठीक-ठीक न समझकर कदाग्रही तैर्थिक लोग न्यायमार्गसे
भ्रष्ट हो जाते हैं—निरुत्तर होनेके कारण प्रामाणिक मनुष्योंके हास्यास्पद होते हैं । कारण कि ये लोग
सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे भिन्न और परस्पर निरपेक्ष स्वीकार करते हैं । परन्तु यह मान्यता सत्य नहीं
है । क्योंकि सामान्य-विशेष पदार्थोंमें अभिन्न रूपसे रहते हैं, और वैशेषिकोंने सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे
एकान्त-भिन्न माना है । परन्तु जैनसिद्धान्तके अनुसार सामान्य-विशेष पदार्थोंके स्वभाव हैं, क्योंकि गुण-
गुणीका एकान्त भेद नहीं बन सकता । जैनदर्शनमें सामान्य-विशेष पदार्थोंसे कथंचित् अभिन्न स्वीकार किये
गये हैं ।
तथा सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न माननेपर एक वस्तुमें सामान्य और विशेष सम्बन्ध
नहीं बन सकते । क्योंकि पदार्थोंके सामान्य-विशेषसे एकान्त-भिन्न होनेके कारण पदार्थ और सामान्य-
विशेषका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता । यदि सामान्य-विशेषको पदार्थोंसे सर्वथा अभिन्न मानें, तो पदार्थ और
सामान्य-विशेषके एकरूप हो जानेसे दोनोंमेंसे एकका अभाव हो जायेगा । तथा, इस तरह सामान्य-विशेषका
१. कुत्सिताग्रहवन्तः । २. हैमसूत्रम् । २।२।७४ । ३. अपृथग्भावेन ।