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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 458 में से

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पृष्ठ 54

२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
मातर्भारति सन्निधेहि हृदि मे येनेयमाप्तस्तुते-
र्निर्मातुं विवृति प्रसिद्धयति जवादारम्भसम्भावना ।
यद्वा विस्मृतमोष्ठयोः स्फुरति यत् सारस्वतः शाश्वतो
मन्त्रः श्रीउदयप्रभेतरचनारम्यो ममाहर्निशम् ॥ ४ ॥
अवतरणिका
इह हि विषमदुःषमारजनितिमिरतिरस्कारभास्करानुकारिणा वसुधातलावतीर्णसुधा-
सारिणीदेशनावितानपरमार्हीकृतश्रीकुमारपालक्ष्मापालप्रवर्तिताभयदानाभिधानजीवातुसं-
जीवितनानाजीवप्रदत्तार्शीर्वादमाहात्म्यकल्पावधिस्थायिविशदयशःशरीरेण निरवद्यचातुर्विद्य-
निर्माणैकब्रह्मणा श्रीहेमचन्द्रसूरिणा जगतप्रसिद्धश्री सिद्धसेनदिवाकरविरचितद्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिका-
नुसारि श्रीवर्धमानजिनस्तुतिरूपमयोगव्यवच्छेद'दान्ययोगव्यवच्छेद'दाभिधानं द्वात्रिंशिकाद्वितयं
विद्वज्जनमनस्तत्त्वावबोधनिबन्धनं विदधे । तत्र च प्रथमद्वात्रिंशिकायाः सुखोन्नेयत्वाद्
तद्व्याख्यानमुपेक्ष्य द्वितीयस्यास्तस्या निःशेषदुर्वादिपरिषदधिक्षेपदक्षायाः कतिपयपदार्थविव-
रणकरणेन स्वस्मृतिबीजप्रबोधविधिर्विधीयते । तस्याश्चेदमदिकाव्यम्—
हे सरस्वती माता ! तुम मेरे हृदयमें निवास करो, जिससे मैं आप्तस्तुति (द्वात्रिंशिका) की
व्याख्या (स्याद्वादमंजरी) शीघ्र ही प्रारम्भ कर सकूँ । अथवा नहीं; मैं भूल गया, क्योंकि 'श्रीउदयप्रभ'—
रचनासे मनोहर शाश्वत सरस्वतीका मन्त्र तो दिन-रात मेरे होठोंमें स्फुरित हो ही रहा है । ( उदयप्रभ
टीकाकारके गुरुका नाम है । यहां टीकाकार गुरुभक्तिके वश होकर कहते हैं कि गुरुस्मरणके प्रभावसे सरस्वती
माता स्वयं मेरे हृदयमें विराजमान हैं, अतएव सरस्वती मातासे प्रार्थना करनेको आवश्यकता ही नहीं
रहती