स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २
हे नाथ ! अयं-मल्लक्षणो जनः; तव गुणान्तरेभ्यो-यथार्थवादव्यतिरिक्तेभ्योऽनन्य-
साधारणशरीरलक्षणादिभ्यः, स्पृह्यालुरेव - श्रद्धालु रेव । किमर्थम् ? स्तवाय- स्तुतिकरणाय ।
इयं "तादर्थ्ये चतुर्थी"१। पूर्वत्र तु “स्पृहेर्य्याप्यं वा”२ इतिलक्षणा चतुर्थी । तव गुणान्तराण्यपि
स्तोतुं स्पृहावानयं३ जन इति भावः । ननु यदि गुणान्तरस्तुतावपि स्पृहयालुता तत्किं४ तान्यपि
स्तोष्यति स उत नेत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह-किन्त्विति - अभ्युपगमपूर्वक विशेषद्योतने निपातः ।
एकम् - एकमेव । यथार्थवादं - यथावस्थितवस्तुतत्त्वप्रख्यापनाख्यं त्वदीयं गुणम्, अयं
जनो विगाहतां - स्तुतिक्रियया समन्ताद्व्याप्नोतु । तस्मिन्नेकस्मिन्नपि हि गुणे वर्णिते तन्त्रान्त-
रोयदैवतेभ्यो वैशिष्ट्यख्यापनद्वारेण वस्तुतः सर्वगुणस्तवनसिद्धेः ।
अथ प्रस्तुतगुणस्तुतिः सम्यक् परीक्षणाक्षमाणां दिव्यदृशामे५वौचितीं६मञ्चति, नार्वाग्दृशां७
भवादृशामित्याशङ्कां विशेषणद्वारेण निराकरोति । यतोऽयं जनः परीक्षाविधिदुविदग्धः -
अधिकृतगुणविशेषपरीक्षणविधौ दुर्विदग्धः - पण्डितंमन्य इति यावत् । अयमाशयः । यद्यपि
जगद्गुरोर्यथार्थवादित्वगुणपरीक्षा मादृशां मतेरगोचरः, तथापि भक्तिश्रद्धातिशयात् तस्यामह-
मात्मानं विदग्धमिव मन्य इति । विशुद्धश्रद्धाभक्तिव्यक्तिमात्रस्वरूपत्वात् स्तुतेः ॥ इति
वृत्तार्थः ॥२॥
व्याख्यार्थ - हे नाथ ! मैं (हेमचन्द्र ) आपके यथार्थवादके अतिरिक्त दूसरोंमें न पाये जानेवाले
शरीरलक्षण आदि अन्य गुणोंके प्रति भी श्रद्धा रखता हूँ । [ 'स्तवाय' यहाँ 'तादर्थ्ये चतुर्थी' (२।२।५४)
सूत्रसे तादर्थ्यमें चतुर्थी, तथा 'गुणान्तरेभ्यः' पदमें 'स्पृहेर्य्याप्यं वा' (२।२।२६) सूत्रसे स्पृह् धातुके कर्ममें
विकल्पसे चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग हुआ है ] । तात्पर्य यह कि आपके अन्य गुणोंका स्तवन करनेकी भी मेरी
इच्छा है । शंका - यदि अन्य गुणोंके स्तवन करने में भी आपकी श्रद्धा है तो उनकी उपेक्षा क्यों करते हैं ?
समाधान - इसका उत्तर श्लोकके उत्तरार्धमें दिया गया है । 'किन्तु' शब्दका यहाँ स्वीकृतिपूर्वक विशेष
अर्थ में निपात हुआ है । यथार्थवाद नामक एक ही गुणके वर्णनसे अन्यमतों द्वारा मान्य देवताओंसे भगवान्की
विशिष्टता सिद्ध होती है इसलिए इस एक गुणके स्तवनसे भगवान्के सम्पूर्ण गुणोंका स्तवन हो जाता है ।
शंका - उत्तम रीतिसे परीक्षा करने में समर्थ दिव्य, नेत्रवाले मुनीश्वर ही भगवान्के गुणोंकी स्तुति
कर सकते हैं, आप जैसे छद्मस्थोंमें स्तुति करनेकी योग्यता नहीं है । समाधान - प्रस्तुत गुणोंकी परीक्षामें
अपनेको पण्डित मानकर मैं ( हेमचन्द्र ) स्तुति आरम्भ करता हूँ । तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान्के
यथार्थवादित्व गुणकी परीक्षा करना मेरी बुद्धिके बाहर है, फिर भी भक्ति और श्रद्धाके वश मैं उस
परीक्षामें अपनेको पण्डित समझता हूँ । क्योंकि विशुद्ध श्रद्धा और भक्ति प्रकट करना ही स्तुति है ।। यह
श्लोकका अर्थ है ॥२॥
भावार्थ-यद्यपि भगवान् अनन्त गुणोंसे भूषित हैं, परन्तु अन्य मतों द्वारा मान्य आप्तोंसे भगवानकी
असाधारणता दिखानेके लिये भगवान्के यथार्थवाद गुणका स्तवन करना ही पर्याप्त है। अतएव हेमचन्द्रा-
चार्य दूसरे गुणोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए भी यहाँपर भगवानके यथार्थवाद गुणकी ही स्तुति करते हैं ।
१. हैमसूत्रम् २।२।५४ । २. हैमसूत्रम् २।२।२६ । ३. 'स्पृहावानेवायम्' पाठान्तरम् । ४. 'तत्किमर्थं
तत्रोपेक्षा इत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह' पाठान्तरम् । ५. अतीन्द्रियज्ञानिनां । ६. योग्यतां ।
७. छद्मस्थानां ।