स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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समझे बिना किसो संगीतका स्वर रुच जाय वैसे । मात्र ऐसी कर्णप्रिय क्रीड़ामेंसे मोक्षका अनुसरण करनेवाले
आचरण तक आनेमें तो बहुत समय निकल जाय । अंतरंग वैराग्यके बिना मोक्षकी लगन नहीं होती ।
वैराग्यका तीव्र भाव कविमें था ।
...."व्यवहारकुशलता और धर्मपरायणताका जितना उत्तम मेल मैंने कविमें देखा उतना किसी
अन्यमें नहीं देखा ।"
गृहस्थाश्रम
सं० १९४४ माघ सुदी १२ को १९ वर्षकी आयुमें उनका पाणिग्रहणसंस्कार, गांधीजीके परममित्र
स्व० रेवाशंकर जगजीवनदास महेताके बड़े भाई पोपटलालकी पुत्री झवकबाईके साथ हुआ था । इसमें
दूसरोंकी 'इच्छा' और 'अत्यन्त आग्रह' ही कारणरूप प्रतीत होते हैं$^१$ । पूर्वोपार्जित कर्मोंका भोग समझकर
ही उन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश किया, परन्तु इससे भी दिन-पर-दिन उनकी उदासीनता और वैराग्यका बल
बढ़ता ही गया । आत्मकल्याणके इच्छुक तत्त्वज्ञानी पुरुषके लिए विषम परिस्थितियाँ भी अनुकूल बन जाती
हैं, अर्थात् विषमतामें उनका पुरुषार्थ और भी अधिक निखर उठता है । ऐसे ही महात्मा पुरुष दूसरोंके लिये
भी मार्गप्रकाशक-दीपकका कार्य करते हैं ।
श्रीमद्जी गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अत्यन्त उदासीन थे । उनकी दशा, छहढालाकार पं० दौलत-
रामजी के शब्दोंमें 'गेही पै, गृहमें न रचै ज्यों जलतें भिन्न कमल हैं'--जैसी निर्लेप थी । उनकी इस
अवस्थामें भी यही मान्यता रही कि "कुटुम्बरूपी काजलकी कोठड़ीमें निवास करनेसे संसार बढ़ता है ।
उसका कितना भी सुधार करो तो भी एकान्तवाससे जितना संसारका क्षय हो सकता है उसका शतांश भी
उस काजलकी कोठड़ीमें रहनेसे नहीं हो सकता, क्योंकि वह कपायका निमित्त है और अनादिकालसे मोहके
रहनेका पर्वत है$^२$।" फिर भी इस प्रतिकूलतामें वे अपने परिणामोंकी पूरी संभाल रखकर चले । यहाँ उनके
अन्तरके भाव एक मुमुक्षुको लिखे गये पत्रमें इसप्रकार व्यक्त हुए हैं--'संसार स्पष्ट प्रीतिसे करनेकी इच्छा
होती हो तो उस पुरुषने ज्ञानीके वचन सुने नहीं अथवा ज्ञानीके दर्शन भी उसने किये नहीं ऐसा तीर्थंकर
कहते हैं ।' 'ज्ञानी पुरुषके वचन सुननेके बाद स्त्रीका सजीवन शरीर अजीवनरूप भास्यमान हुए बिना रहे
नहीं$^३$।' इससे स्पष्ट प्रगट होता है कि वे अत्यन्त वैरागी महापुरुष थे ।
सफल व्यापारी
व्यापारिक झंझट और धर्मसाधनाका मेल प्रायः कम बैठता है, परन्तु आपका धर्म-आत्मचिन्तन तो
साथमें ही चलता था । वे कहते थे कि धर्मका पालन कुछ एकादशीके दिन ही, पर्यूषणमें ही अथवा मंदिरोंमें
ही हो और दुकान या दरबारमें न हो ऐसा कोई नियम नहीं, बल्कि ऐसा कहना धर्मतत्त्वको न पहचाननेके
तुल्य है । श्रीमद्जीके पास दुकान पर कोई न कोई धार्मिक पुस्तक और दैनंदिनी (डायरी) अवश्य होती
थी । व्यापारकी बात पूरी होते ही फौरन धार्मिक पुस्तक खुलती या फिर उनकी वह डायरी कि जिसमें कुछ
न कुछ मनके विचार वे लिखते ही रहते थे । उनके लेखोंका जो संग्रह प्रकाशित हुआ है उसका अधिकांश
भाग उनकी नोंधपोथीमेंसे लिया गया है ।
श्रीमद्जी सर्वाधिक विश्वासपात्र व्यापारीके रूपमें प्रसिद्ध थे । वे अपने प्रत्येक व्यवहारमें सम्पूर्ण
प्रामाणिक थे । इतना बड़ा व्यापारिक काम करते हुये भी उसमें उनकी आसक्ति नहीं थी । वे बहुत ही
१. देखिये--'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० ३०
२. 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० १०३,
३. 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० ४५४
प्रथम भाग: अन्य दार्शनिक मतों (सांख्य, नैयायिक, वैशेषिक) की परीक्षा
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संतोषी थे। रहन-सहन पहरवेश सादा रखते थे। धनको तो वे 'उच्च प्रकारके कंकर'१ मात्र समझते थे।
एक आरब व्यापारी अपने छोटे भाईके साथ बम्बईमें मोतियोंकी आढ़तका काम करता था। एक दिन
छोटे भाईने सोचा कि मैं भी अपने बड़े भाईकी तरह मोतीका व्यापार करूँ। वह परदेशसे आया हुआ माल
लेकर बाजारमें गया। वहाँ जाने पर एक दलाल उसे श्रीमद्जीकी दुकानपर लेकर पहुँचा। श्रीमद्जीने
माल अच्छी तरह परखकर देखा और उसके कहे अनुसार रकम चुकाकर ज्योंका त्यों माल एक ओर उठाकर
रख दिया। उधर घर पहुँचकर बड़े भाईके आनेपर छोटे भाईने व्यापारकी बात कह सुनाई। अब जिस
व्यापारीका वह माल था उसका पत्र इस आरब व्यापारीके पास उसी दिन आया था कि अमुक भावसे नीचे
माल मत बेचना। जो भाव उसने लिखा था वह चालू बाजार-भावसे बहुत ही ऊँचा था। अब यह व्यापारो
तो घबरा गया क्योंकि इसे इस सौदेमें बहुत अधिक नुकसान् था। वह क्रोधमें आकर बोल उठा—'अरे !
तूने यह क्या किया ? मुझे तो दिवाला ही निकालना पड़ेगा !'
आरब-व्यापारी हाँफता हुआ श्रीमद्जीके पास दौड़ा हुआ आया और उस व्यापारीका पत्र पढ़वाकर
कहा—'साहब, मुझ पर दया करो, वरना मैं गरीब आदमी बरबाद हो जाऊँगा।' श्रीमद्जीने एक ओर
ज्यों का त्यों बंधा हुआ माल दिखाकर कहा—'भाई, तुम्हारा माल यह रक्खा है। तुम खुशीसे ले जाओ।'
यों कहकर उस व्यापारीका माल उसे दे दिया और अपने पैसे ले लिये। मानो कोई सौदा किया ही नहीं था,
ऐसा सोचकर हजारोंके लाभकी भी कोई परवाह नहीं की। आरब-व्यापारी उनका उपकार मानता हुआ
अपने घर चला गया। यह आरब व्यापारी श्रीमद्को खुदाके पैगम्बरके समान मानने लगा।
व्यापारिक नियमानुसार सौदा निश्चित हो चुकने पर वह व्यापारी माल वापिस लेनेका अधिकारी
नहीं था, परन्तु श्रीमद्जीका हृदय यह नहीं चाहता था कि किसीको उनके द्वारा हानि हो। सचमुच महा-
त्माओंका जीवन उनकी कृतिमें व्यक्त होता ही है।
इसीप्रकारका एक दूसरा प्रसंग उनके करुणामय और निस्पृही जीवनका ज्वलंत उदाहरण है :
एक बार एक व्यापारीके साथ श्रीमद्जीने हीरोंका सौदा किया। इसमें ऐसा तय हुआ कि अमुक
समयमें निश्चित किये हुये भावसे वह व्यापारी श्रीमद्को अमुक हीरे दे। इस विषयकी चिट्ठी भी व्यापारीने
लिख दी थी। परन्तु हुआ ऐसा कि मुद्दतके समय उन हीरोंकी कीमत बहुत अधिक बढ़ गई। यदि व्यापारी
चिट्ठीके अनुसार श्रीमद्को हीरे दे, तो उस वेचारेको बड़ा भारी नुकसान सहन करना पड़े; अपनी सभी
सम्पत्ति बेच देनी पड़े ! अब क्या हो ?
इधर जिस समय श्रीमद्जीको हीरोंका बाजार-भाव मालूम हुआ, उस समय वे शीघ्र ही उस व्यापारी-
की दुकानपर जा पहुँचे। श्रीमद्जीको अपनी दुकानपर आये देखकर व्यापारी घबराहटमें पड़ गया। वह
गिड़गिड़ाते हुए बोला—'रायचंदभाई, हम लोगोंके बीच हुए सीदेके सम्बन्धमें मैं खूब ही चिन्तामें पड़ गया
हूँ। मेरा जो कुछ होना हो, वह भले हो, परन्तु आप विश्वास रखना कि मैं आपको आजके बाजार-भावसे
सौदा चुका दूँगा। आप जरा भी चिन्ता न करें।'
यह सुनकर राजचन्द्रजी करुणाभरी आवाजमें बोले : "वाह ! भाई, वाह ! मैं चिन्ता क्यों न करूं ?
तुमको सौदेकी चिन्ता होती हो तो मुझे चिन्ता क्यों न होनी चाहिये ? परन्तु हम दोनोंकी चिन्ताका मूल
कारण यह चिट्ठी ही है न ? यदि इसको ही फाड़कर फेंक दें तो हम दोनोंकी चिन्ता मिट जायगी।"
यों कहकर श्रीमद् राजचन्द्रने सहजभावसे वह दस्तावेज फाड़ डाला। तत्पश्चात् श्रीमद्जी बोले :
"भाई, इस चिट्ठीके कारण तुम्हारे हाथपाँव बंधे हुए थे। बाजारभाव बढ़ जानेसे तुमसे मेरे साठ सत्तर हजार
१. 'ऊँची जातना कांकरा'
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रुपये लेना निकलते हैं, परन्तु मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ । इतने अधिक रुपये मैं तुमसे लूँ तो तुम्हारी
क्या दशा हो ? परन्तु राजचन्द्र दूध पी सकता है, खून नहीं !"
वह व्यापारी कृतज्ञ-भावसे श्रीमद्की ओर स्तब्ध होकर देखता ही रहा ।
भविष्यवक्ता, निमित्तज्ञानी
श्रीमद्जीका ज्योतिष-सम्बन्धी ज्ञान भी प्रखर था । वे जन्मकुंडली, वर्षफल एवं अन्य चिह्न देखकर
भविष्यकी सूचना कर देते थे । श्रीजूठाभाई ( एक मुमुक्षु ) के मरणके बारेमें उन्होंने २। मास पूर्व स्पष्ट बता
दिया था ¹। एक बार सं० १९५५ की चैत्र वदी ८ को मोरवीमें दोपहरके ४ बजे पूर्वदिशाके आकाशमें
काले बादल देखे और उन्हें दुष्काल पड़नेका निमित्त जानकर उन्होंने कहा कि 'ऋतुको सन्निपात हुआ है।'
इस वर्ष १९५५ का चौमासा कोरा रहा—वर्षा नहीं हुई और १९५६ में भयंकर दुष्काल पड़ा । वे दूसरेके
मनकी बातको भी सरलतासे जान लेते थे । यह सब उनकी निर्मल आत्मशक्तिका प्रभाव था ।
कवि-लेखक
श्रीमद्जीमें, अपने विचारोंकी अभिव्यक्ति पद्यरूपमें करनेकी सहज क्षमता थी । उन्होंने सामाजिक
रचनाओंमें-'स्त्रीनीतिबोधक', 'सद्बोधशतक' 'आर्य प्रजानी पडती' 'हुन्नरकला वधारवा विषे' 'सद्गुण,
सुनीति, सत्य विषे' आदि अनेक रचनाएं केवल ८ वर्षकी वयमें लिखी थीं, जिनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ
है । ९ वर्षकी आयुमें उन्होंने रामायण और महाभारतकी भी पद्य-रचना की थी जो प्राप्त नहीं हो सकी ।
इसके अतिरिक्त जो उनका मूल विषय आत्मज्ञान था उसमें उनकी अनेक रचनाएं हैं । प्रमुखरूपसे 'आत्म-
सिद्धि' ( १४२ दोहे ) 'अमूल्य तत्त्वविचार' 'भक्तिना वीस दोहरा' 'ज्ञानमीमांसा' 'परमपदप्राप्तिनी भावना'
( अपूर्व अवसर ) 'मूळमार्ग रहस्य' 'जिनवाणीनी स्तुति' 'वारह भावना' और 'तृष्णानी विचित्रता' हैं ।
अन्य भी बहुत-सी रचनाएं हैं, जो भिन्न-भिन्न वर्षोंमें लिखी हैं ।
'आत्मसिद्धि'-शास्त्रकी रचना तो आपने मात्र डेढ़ घंटेमें, श्री सौभाग्यभाई, डूंगरभाई आदि मुमु-
क्षुओंके हितार्थ नडियादमें आश्विन वदी १ ( गुजराती ) गुरुवार सं० १९५२ को २९वें वर्षमें लिखी थी ।
यह एक, निस्संदेह धर्ममार्गकी प्राप्तिमें प्रकाशरूप अद्भुत रचना है । अंग्रेजीमें भी इसके गद्य-पद्यात्मक अनुवाद
प्रगट हो चुके हैं ² ।
गद्य-लेखनमें श्रीमद्जीने 'पुष्पमाला' 'भावनावोध' और 'मोक्षमाला'की रचना की । यह सभी सामग्री
पठनीय-विचारणीय है । 'मोक्षमाला' उनकी अत्यन्त प्रसिद्ध रचना है, जिसे उन्होंने केवल १६ वर्ष ५ मासकी
आयुमें मात्र ३ दिनमें लिखी थी । इसमें १०८ पाठ हैं । कथनका प्रकार विशाल और तत्त्वपूर्ण है ।
उनकी अर्थ करनेकी शक्ति भी बड़ी गहन थी । भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यके 'पंचास्तिकाय'-ग्रन्थकी मूल
गाथाओंका उन्होंने अविकल गुजराती अनुवाद किया है ³ ।
सहिष्णुता
विरोधमें भी सहनशील होना महापुरुषोंका स्वाभाविक गुण है । यह बात यहाँ घटित होती है । जैन
समाजके कुछ लोगोंने उनका प्रवल विरोध किया, निन्दा की, फिर भी वे अटल शांत और मौन रहे । उन्होंने
एक वार कहा था : 'दुनिया तो सदा ऐसी ही है । ज्ञानियोंको, जीवित हों तब कोई पहचानता नहीं, वह यहाँ
१. देखिये-दैनिक नोंधसे लिया गया कथन, पत्र क्र० ११६, ११७ ('श्रीमद्राजचन्द्र' गुजराती)
२. 'आत्मसिद्धि' के अंग्रेजी अनुवादमें Atmasiddhi, Self Realization, और Self Fulfilment
प्रगट हुए हैं । संस्कृत-छाया भी छपी है ।
३. देखिये-'श्रीमद्राजचन्द्र' गुज० पत्रांक ७६६ । उनकी सभी प्रमुख-सामग्रीका संकलन 'श्रीमद्राजचन्द्र'-
ग्रन्थमें किया गया है ।
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तक कि ज्ञानीके सिर पर लाठियोंकी मार पड़े वह भी कम; और ज्ञानीके मरनेके बाद उसके नामके पत्थरको
भी पूजे !'
एकान्तचर्या
मोहमयी ( बम्बई ) नगरीमें व्यापारिक काम करते हुए भी श्रीमद्जी ज्ञानाराधना तो करते ही रहते
थे । यह उनका प्रमुख और अनिवार्य कार्य था । उद्योग-रत जीवनमें शांत और स्वस्थ चित्तसे चुपचाप आत्म-
साधना करना उनके लिये सहज हो चला था; फिर भी बीच-बीचमें विशेष अवकाश लेकर वे एकान्त स्थान,
जंगल या पर्वतोंमें पहुँच जाते थे । वे किसी भी स्थानपर बहुत गुप्तरूपसे जाते थे । वे नहीं चाहते थे कि
किसीके परिचयमें आया जाय, फिर भी उनकी सुगन्धी छिप नहीं पाती थी । अनेक जिज्ञासु-भ्रमर उनका
उपदेश, धर्मवचन सुननेकी इच्छासे पीछे-पीछे कहीं भी पहुँच ही जाते थे और सत्समागमका लाभ प्राप्त कर
लेते थे । गुजरातके चरोतर, ईडर आदि प्रदेशमें तथा सौराष्ट्र क्षेत्रके अनेक शान्तस्थानोंमें उनका गमन हुआ ।
आपके समागमका विशेष लाभ जिन्हें मिला उनमें मुनिश्री लल्लुजी ( श्रीमद्लघुराजस्वामी ), मुनिश्री देव-
करणजी तथा सायलाके श्री सौभाग्यभाई, अम्बालालभाई ( खंभात ), जूठाभाई ( अमदावाद ) एवं डूंगरभाई
मुख्य थे ।
एक बार श्रीमद्जी सं० १९५५ में जब कुछ दिन ईडरमें रहे तब उन्होंने डॉ० प्राणजीवनदास महेता
( जो उस समय ईडर स्टेटके चीफ मेडिकल ऑफिसर थे और सम्बन्धकी दृष्टिसे उनके श्वसुरके भाई होते थे )
से कह दिया था कि उनके आनेकी किसीको खबर न हो । उस समय वे नगरमें केवल भोजन लेने जितने
समयके लिए ही रुकते, शेष समय ईडरके पहाड़ और जंगलोंमें बिताते ।
मुनिश्री लल्लुजी, श्रीमोहनलालजी तथा श्री नरसीरखको उनके वहाँ पहुँचनेके समाचार मिल गये ।
वे शीघ्रतासे ईडर पहुँचे । श्रीमद्जीको उनके आगमनका समाचार मिला । उन्होंने कहलवा दिया कि मुनिश्री
बाहरसे बाहर जंगलमें पहुँचें—यहाँ न आवें । साधुगण जंगलमें चले गये । बादमें श्रीमद्जी भी वहाँ पहुँचे ।
उन्होंने मुनिश्री लल्लुजीसे एकांतमें अचानक ईडर आनेका कारण पूछा । मुनिश्रीने उत्तर में कहा कि 'हम लोग
अमदावाद या खंभात जानेवाले थे, यहाँ निवृत्ति क्षेत्रमें आपके समागममें विशेष लाभकी इच्छासे इस ओर
चले आये । मुनि देवकरणजी भी पीछे आते हैं ।' इस पर श्रीमद्जीने कहा—'आप लोग कल यहाँसे विहार
कर जावें, देवकरणजीको भी हम समाचार भिजवा देते हैं वे भी अन्यत्र विहार कर जावेंगे । हम यहाँ गुप्त-
रूपसे रहते हैं—किसीके परिचयमें आनेकी इच्छा नहीं है ।'
श्री लल्लुजी मुनिने नम्र-निवेदन किया—'आपकी आज्ञानुसार हम चले जावेंगे परन्तु मोहनलालजी
और नरसीरख मुनियोंको आपके दर्शन नहीं हुये हैं, आप आज्ञा करें तो एक दिन रुककर चले जावें ।'
श्रीमद्जीने इसकी स्वीकृति दी । दूसरे दिन मुनियोंने देखा कि जंगलमें आम्रवृक्षके नीचे श्रीमद्जी प्राकृतभाषाकी
*गाथाओंका तन्मय होकर उच्चारण कर रहे हैं । उनके पहुँचनेपर भी आधा घण्टे तक वे गाथायें बोलते ही
रहे और ध्यानस्थ हो गए । यह वातावरण देखकर मुनिगण आत्मविभोर हो उठे । थोड़ी देर बाद श्रीमद्जी
- १. मा मुज्झह मा रज्जह मा दुस्सह इट्ठणिट्ठअत्थेसु ।
थिरमिच्छह जइ चित्तं विचित्तझाणप्पसिद्धीए ॥४८॥
२. जं किंचि वि चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा साहू ।
लद्धूण एयत्तं तदाहु तं णिच्चयं ज्झाणं ॥ ५५ ॥
३. मा चिट्ठह मा जंपह मा चिंतह किं वि जेण होइ थिरो ।
अप्पा अप्पम्मि रओ इणमेव परं हवे ज्झाणं ॥ ५६ ॥
( द्रव्यसंग्रह )
—श्रीमद्जीने यह 'बृहद्द्रव्यसंग्रह'-ग्रन्थ ईडरके दि० जैन शास्त्र भण्डारमेंसे स्वयं निकलवाया था ।
[ ९ ]
ध्यानसे उठे और 'विचारना' इतना कहकर चलते बने । मुनियोंने विचारा कि लघुशंकादि-निवृत्तिके लिए
जाते होंगे परन्तु वे तो निस्पृहरूपसे चले ही गये । थोड़ी देर इधर-उधर ढूंढ़कर मुनिगण उपाश्रयमें आ गये ।
उसी दिन शामको मुनि देवकरणजी भी वहाँ पहुँच गये । सभीको श्रीमद्जीने पहाड़के ऊपर स्थित
दिगम्बर, श्वेताम्बर मन्दिरोंके दर्शन करनेकी आज्ञा दी । वीतराग-जिनप्रतिमाके दर्शनोंसे मुनियोंको परम
उल्लास जाग्रत हुआ । इसके पश्चात् तीन दिन और भी श्रीमद्जीके सत्समागमका लाभ उन्होंने उठाया ।
जिसमें श्रीमद्जीने उन्हें 'द्रव्यसंग्रह' और 'आत्मानुशासन'-ग्रन्थ पूरे पढ़कर स्वाध्यायके रूपमें सुनाये एवं अन्य
भी कल्याणकारी बोध दिया ।
अत्यन्त जाग्रत आत्मा ही परमात्मा बनता है, परम वीतराग-दशाको प्राप्त होता है । इन्हीं अन्तर-
भावोंके साथ आत्मस्वरूपकी ओर लक्ष कराते हुए एक बार श्रीमद्जीने अहमदाबादमें मुनिश्री लल्लुजी (पू०
लघुराजस्वामी ) तथा श्रीदेवकरणजीको कहा था कि 'हममें और वीतरागमें भेद गिनना नहीं' 'हममें और
श्री महावीर भगवानमें कुछ भी अन्तर नहीं, केवल इस कुर्तेका फेर है ।'
मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर
उनका कहना था कि मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर रहने पर ही जीवनमें रागद्वेषसे रहित हुआ जा
सकता है । मतोंके आग्रहसे निजस्वभावरूप आत्मधर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती । किसी भी जाति या वेषके
साथ भी धर्मका सम्बन्ध नहीं :
“जाति वेषनो भेद नहि, कह्यो मार्ग जो होय ।
साधे ते मुक्ति लहे, एमां भेद न कोय ॥”
( आत्मसिद्धि १०७ )
—जो मोक्षका मार्ग कहा गया है वह हो तो किसी भी जाति या वेषसे मोक्ष होवे, इसमें कुछ भेद
नहीं है । जो साधना करे वह मुक्तिपद पावे ।
आपने लिखा है—“मूलतत्त्वमें कहीं भी भेद नहीं है । मात्र दृष्टिका भेद है ऐसा मानकर आशय
समझकर पवित्र धर्ममें प्रवृत्ति करना ।” ( पुष्पमाला १४ पृ० ४ )
“तू चाहे जिस धर्मको मानता हो इसका मुझे पक्षपात नहीं, मात्र कहनेका तात्पर्य यहो कि जिस
मार्गसे संसारमलका नाश हो उस भक्ति, उस धर्म और उस सदाचारकातू सेवन कर¹ ।” (पु०मा० १५ पृ०४)
“दुनिया मतभेदके बंधनसे तत्त्व नहीं पा सकी !” ( पत्र क्र० २७ )
उन्होंने प्रीतम, अखा, छोटम, कबीर, सुन्दरदास, सहजानन्द, मुक्तानन्द, नरसिंह महेता आदि सन्तोंकी
वाणीको जहाँ-तहाँ आदर दिया है और उन्हें मार्गानुसारी जीव (तत्त्वप्राप्तिके योग्य आत्मा ) कहा है । इसलिए
एक जगह उन्होंने अत्यन्त मध्यस्थतापूर्वक आध्यात्मिक-दृष्टि प्रगट की है कि 'मैं किसी गच्छमें नहीं, परन्तु
आत्मामें हूँ ।'
एक पत्रमें आपने दर्शाया है—“जब हम जैनशास्त्रोंको पढ़नेके लिए कहें तब जैनी होनेके लिए नहीं
कहते; जब वेदान्तशास्त्र पढ़नेके लिए कहें तो वेदान्ती होनेके लिए नहीं कहते । इसीप्रकार अन्य शास्त्रोंको वांचनेके
लिए कहें तब अन्य होनेके लिए नहीं कहते । जो कहते हैं वह केवल तुम सब लोगोंको उपदेश-ग्रहणके लिए
ही कहते हैं । जैन और वेदान्ती आदिके भेदका त्याग करो । आत्मा वैसा नहीं है² ।”
१. देखिए इसीप्रकारके विचार—
पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु ।
युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥ ( हरिभद्रसूरि )
२. श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुज० ) पत्र क्र० ३५८
[ १० ]
फिर भी अनुभवपूर्वक उन्होंने निर्ग्रन्थशासनकी उत्कृष्टताको स्वीकार किया है¹। अहो ! सर्वोत्कृष्ट
शांतरासमय सन्मार्ग, अहो ! उस सर्वोत्कृष्ट शांतरसप्रधान मार्गके मूल सर्वज्ञदेव, अहो ! उस सर्वोत्कृष्ट शांत-
रसकी सुप्रतीति करानेवाले परमकृपालु सद्गुरुदेव — इस विश्वमें सर्वकाल तुम जयवंत वर्तो, जयववंत वर्तो² ।'
दिनोंदिन और क्षण-क्षण उनकी वैराग्यवृत्ति वर्धमान हो चली। चैतन्यपुंज निखर उठा। वीतराग-
मार्गकी अविरल उपासना उनका ध्येय बन गई। वे बढ़ते गये और सहजभावसे कहते गये—"जहाँ-तहाँ से
रागद्वेषसे रहित होना ही मेरा धर्म है³ ।"
निर्मल सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें उनके उद्गार इस प्रकार निकले हैं—
ओगणीससें ने सुडतालीसे,
समकित शुद्ध प्रकाश्युं रे,
श्रुत अनुभव बघती दशा,
निज स्वरूप अवभास्युं रे।
धन्य रे दिवस आ अहो !
( हा. नों. ११६३ क्र० ३२ )
सोल्लास उपकार-प्रगटना
"हे सर्वोत्कृष्ट सुखके हेतुभूत सम्यग्दर्शन ! तुझे अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार हो । इस अनादि अनन्त
संसारमें अनन्त अनन्त जीव तेरे आश्रय विना अनन्त अनन्त दुःख अनुभवते हैं । तेरे परमानुग्रहसे स्वस्वरूपमें
रुचि हुई । परमवीतराग स्वभावके प्रति परम निश्चय आया । कृतकृत्य होनेका मार्ग ग्रहण हुआ ।
हे जिन वीतराग ! तुम्हें अत्यन्त भक्तिसे नमस्कार करता हूँ । तुमने इस पामर पर अनंत अनंत
उपकार किया है।
हे कुन्दकुन्दादि आचार्यों ! तुम्हारे वचन भी स्वरूपानुसंधानमें इस पामरको परम उपकारभूत हुए हैं।
इसके लिए मैं तुम्हें अतिशय भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।
हे श्री सोभाग ! तेरे सत्समागमके अनुग्रहसे आत्मदशाका स्मरण हुआ । अतः तुझे नमस्कार करता
हूँ।" ( हा. नों. २/४५ क्र० २० )
परमनिवृत्तिरूप कामना / चिंतना—
उनका अन्तरङ्ग, गृहस्थावास-व्यापारादि कार्यसे छूटकर सर्वसंगपरित्याग कर निर्ग्रन्थदशाके लिए
छटपटाने लगा । उनका यह अन्तर-आशय उनकी 'हाथनोंध' परसे स्पष्ट प्रगट होता है:—
"हे जीव ! असारभूत लगनेवाले ऐसे इस व्यवसायसे अब निवृत्त हो, निवृत्त ! उस व्यवसायके
करनेमें चाहे जितना बलवान प्रारब्धोदय दीखता हो तो भी उससे निवृत्त हो, निवृत्त ! जो कि श्रीसर्वज्ञने
कहा है कि चौदहवें गुणस्थानवर्ती जीव भी प्रारब्ध भोगे विना मुक्त नहीं हो सकता, फिर भी तू उस उदयके
आश्रयरूप होनेसे अपना दोष जानकर उसका अत्यन्त तीव्ररूपमें विचारकर उससे निवृत्त हो, निवृत्त ! ( हा०
नो० १।१०१ क्र० ४४ )
"हे जीव ! अब तू संग-निवृत्तिरूप कालकी प्रतिज्ञा कर, प्रतिज्ञा कर ! केवलसंगनिवृत्तिरूप प्रतिज्ञाका विशेष
अवकाश दिखाई न दे तो अंशसंगनिवृत्तिरूप इस व्यवसायका त्याग कर ! जिस ज्ञानदशामें त्यागात्याग कुछ
१. 'श्रीमद्राजचन्द्र' शिक्षापाठ ९५ ( तत्त्वावबोध १४ ) तथा पत्र क्र० ५९६
२. हाथनोंध ५/५२ क्रम २३ 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुज० )
३. पत्र क्र० ३७ 'श्रीमद्राजचन्द्र'
[ ११ ]
सम्भावित नहीं उस ज्ञानदशाकी सिद्धि है जिसमें ऐसा तू, सर्वसंगत्याग दशा अल्पकाल भी भोगेगा तो सम्पूर्ण
जगत प्रसंगमें वर्तते हुए भी तुझे बाधा नहीं होगी, ऐसा होते हुए भी सर्वज्ञने निवृत्तिको ही प्रशस्त कहा है;
कारण कि ऋषभादि सर्व परमपुरुषोंने अन्तमें ऐसा ही किया है।" (हा. नों. १ । १०२ क्र० ४५ )
“राग, द्वेष और अज्ञानका आत्यंतिक अभाव करके जो सहज शुद्ध आत्मस्वरूपमें स्थित हुए वही
स्वरूप हमारे स्मरण, ध्यान और प्राप्त करने योग्य स्थान है।" (हा. नों. २ । ३ क्र० १ )
"सर्व परभाव और विभावसे व्यावृत, निज स्वभावके भान सहित, अवधूतवत् विदेहीवत् जिनकल्पीवत्
विचरते पुरुष भगवानके स्वरूपका ध्यान करते हैं।" (हा. नों. ३।३७ क्र० १४ )
"मैं एक हूँ, असंग हूँ, सर्व परभावसे मुक्त हूँ, असंख्यप्रदेशात्मक निजअवगाहनाप्रमाण हूँ। अजन्म,
अजर, अमर, शाश्वत हूँ। स्वपर्यायपरिणामी समयात्मक हूँ। शुद्ध चैतन्यमात्र निर्विकल्प दृष्टा हूँ। (हा.
नों. ३ । २६ क्र० ११ )
"मैं परमशुद्ध, अखंड चिद्धातु हूँ, अचिद्धातुके संयोगरसका यह आभास तो देखो ! आश्चर्यवत्,
आश्चर्यरूप, घटना है। कुछ भी अन्य विकल्पका अवकाश नहीं, स्थिति भी ऐसी ही है।" (हा. नों.
२ । ३७ क्र० १७ )
इसप्रकार अपनी आत्मदशाको संभालकर वे बढ़ते रहे। आपने सं० १९५६ में व्यवहार सम्बन्धी
सर्व उपाधिसे निवृत्ति लेकर सर्वसंगपरित्यागरूप दीक्षा धारण करनेकी अपनी माताजीसे आज्ञा भी ले ली
थी। परन्तु उनका शारीरिक स्वास्थ्य दिन-पर-दिन विगड़ता गया। उदय बलवान है। शरीरको रोगने
आ घेरा। अनेक उपचार करनेपर भी स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ। इसी विवशता में उनके हृदयकी गंभीरता
बोल उठी : "अत्यन्त त्वरासे प्रवास पूरा करना था, वहाँ बीचमें सेहराका मरुस्थल आ गया। सिर पर बहुत
बोझ था उसे आत्मवीर्यसे जिसप्रकार अल्पकालमें सहन कर लिया जाय उस प्रकार प्रयत्न करते हुए, पैरोंने
निकाचित उदयरूप थकान ग्रहण की। जो स्वरूप है वह अन्यथा नहीं होता यही अद्भुत आश्चर्य है।
अब्याबाध स्थिरता है१।"
अन्त समय
स्थिति और भी गिरती गई। शरीरका वजन १३२ पौंडसे घटकर मात्र ४३ पौंड रह गया। शायद
उनका अधिक जीवन कालको पसन्द नहीं था। देहत्यागके पहले दिन शामको आपने अपने छोटेभाई मन-
सुखराम आदिसे कहा- "तुम निश्चित रहना, यह आत्मा शाश्वत है। अवश्य विशेष उत्तम गतिको प्राप्त
होगा, तुम शान्ति और समाधिरूपसे प्रवर्तना। जो रत्नमय ज्ञानवाणी इस देहके द्वारा कही जा सकती थी,
वह कहनेका समय नहीं। तुम पुरुषार्थ करना।" रात्रिको २।। बजे वे फिर बोले - 'निश्चित रहना, भाईका
समाधिमरण हैं। और अवसानके दिन प्रातः पौने नौ बजे कहा : 'मनसुख, दुखी न होना, मैं अपने आत्म-
स्वरूपमें लीन होता हूँ।' और अन्तमें उस दिन सं० १९५७ चैत्र वदी ५ (गुज०) मंगलवारको दोपहरके
दो बजे राजकोटमें उनका आत्मा इस नश्वर देहको छोड़कर चला गया। भारतभूमि एक अनुपम तत्त्वज्ञानी-
सन्तको खो बैठी।
उनके देहावसानके समाचार सुनकर मुमुक्षुओंके चित्त उदास हो गये। वसंत मुरझा गया। निस्संदेह
श्रीमद्जी विश्वकी एक महान विभूति थे। उनका वीतरागमार्ग-प्रकाशक अनुपम वचनामृत आज भी जीवनको
अमरत्व प्रदान करनेके लिए विद्यमान है। धर्मजिज्ञासु बन्धु उनके वचनोंका लाभ उठावें।
श्री लघुराजस्वामी ( प्रभुश्री) ने उनके प्रति अपना हृदयोद्गार इन शब्दोंमें प्रगट किया है :
“अपरमार्थमें परमार्थके दृढ़ आग्रहरूप अनेक सूक्ष्म भूलभुलैयाँके प्रसंग दिखाकर इस दासके दोष दूर करनेमें
१. 'श्रीमद् राजचन्द्र' (गुज०) पत्र क्र० १५१।
[ १२ ]
इन आप्त पुरुषका परम सत्संग तथा उत्तम बोध प्रबल उपकारक बने हैं।" "संजीवनी औषध समान मृतको
जीवित करे ऐसे उनके प्रबल पुरुषार्थ जागृत करनेवाले वचनोंका माहात्म्य विशेष विशेष भास्यमान होनेके
साथ ठेठ मोक्षमें ले जाय ऐसी सम्यक् समझ ( दर्शन ) उस पुरुष और उसके बोधकी प्रतीतिसे प्राप्त होती
है; वे इस दुषम कलिकालमें आश्चर्यकारी अवलंबन हैं।" "परम माहात्म्यवंत सद्गुरु श्रीमद् राजचन्द्रदेवके
वचनोंमें तल्लीनता, श्रद्धा जिसे प्राप्त हुई है, या होगी उसका महद् भाग्य है। वह भव्य जीव अल्पकालमें
मोक्ष पाने योग्य है।" १
उनकी स्मृतिमें शास्त्रमालाकी स्थापना
सं० १९५६ में २सत्श्रुतके प्रचार हेतु बम्बईमें श्रीमद्जीने परमश्रुतप्रभावकमण्डलकी स्थापना की थी।
उसीके तत्त्वावधानमें उनकी स्मृतिस्वरूप श्रीरायचन्द्र जैन शास्त्रमालाकी स्थापना हुई। जिसकी ओरसे अब
तक समयसार, प्रवचनसार, गोम्मटसार, स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा, परमात्मप्रकाश और योगसार, पुरुषार्थ-
सिद्धयुपाय, इष्टोपदेश, प्रद्युम्नरतिप्रकरण, न्यायावतार, स्याद्वादमंजरी, अष्टप्राभृत, सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र,
ज्ञानार्णव, वृहद्द्रव्यसंग्रह, पंचास्तिकाय, लब्धिसार-क्षपणासार, द्रव्यानुयोगतर्कणा, सप्तभंगीतरंगिणी, उपदेश-
छाया और आत्मसिद्धि, भावना-बोध, श्रीमद्राजचन्द्र आदि ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमानमें संस्थाके
प्रकाशनका सब काम अगाससे ही होता है। विक्रयकेन्द्र बम्बईमें भी पूर्वस्थानपर ही है। श्रीमद्राजचन्द्र
आश्रम, अगाससे गुजराती भाषामें अन्य भी उपयोगी ग्रन्थ छपे हैं।
वर्तमानमें निम्नलिखित स्थानोंपर श्रीमद्राजचन्द्र आश्रम व मन्दिर आदि संस्थाएँ स्थापित हैं, जहाँ
पर मुमुक्षु-बन्धु मिलकर आत्मकल्याणार्थ वीतराग-तत्त्वज्ञानका लाभ उठाते हैं। वे स्थान हैं—अगास, ववा-
णिया, राजकोट, वड़वा, खंभात, काविठा, सीमरडा, भादरण, नार, सुणाव, नरोड़ा, सडोदरा, धामण,
अहमदाबाद, ईडर, सुरेन्द्रनगर, वसो, वटामण, उत्तरसंडा, बोरसद, आहोर (राज०), हम्पी (दक्षिण भारत),
इन्दौर (म० प्र०) ; बम्बई-घोटकोपर, देवलाली तथा मोम्बासा (आफ्रिका)।
अन्तमें, वीतराग-विज्ञानके निधान तीर्थंकरादि महापुरुषों द्वारा उपदिष्ट सर्वोपरि-आत्मधर्मका अविरल
प्रवाह जन-जनके अन्तरमें प्रवाहित हो, यही भावना है।
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम }
स्टे० अगास, पो० बोरीया } —बाबूलाल सिद्धसेन जैन
वाया : आणंद ( गुजरात ) }
१. 'श्रीमद्गुरुप्रसाद' पृ० २, ३
२. श्रीमद्जीद्वारा निर्देशित सत्श्रुतरूप ग्रन्थोंकी सूचीके लिये देखिए 'श्रीमद्राजचन्द्र'-ग्रन्थ (गुज०)
उपदेशनोंध क्र० १५।
नमः सर्वज्ञाय
श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्रीमल्लिषेणसूरिप्रणीता
स्याद्वादमञ्जरी
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिता
अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकास्तवनटीका
हिन्दीभाषानुवादसहिता ।
टीकाकारस्य मंगलाचरणम्
यस्य ज्ञानमनन्तवस्तुविषयं यः पूज्यते दैवतै-
र्नित्यं यस्य वचो न दुर्नयकृतैः कोलाहलैर्लुप्यते ।
रागद्वेषमुखद्विषां च परिषत् क्षिप्ता क्षणाद्येन सा
स श्रीवीरविभुर्विधूतकलूषां बुद्धिं विधत्तां मम ॥ १ ॥
निस्सीमप्रतिमैकजीवितधरौ निःशेषभूमिस्पृशां
पुण्यौघेन सरस्वतीसुरगुरू स्वाङ्गैकरूपौ दधत् ।
यः स्याद्वादमसाधयन् निजवपुर्दृष्टान्ततः सोऽस्तु मे
सद्बुद्ध्यम्बुनिधिप्रबोधविधये श्रीहेमचन्द्रः प्रभुः ॥ २ ॥
ये हेमचन्द्रं मुनिमेतदुक्तग्रन्थार्थसेवामिषतः श्रयन्ते ।
संप्राप्य ते गौरवमुज्ज्वलानां पदं कलानामुचितं भवन्ति ॥ ३ ॥
टीकाकारका मंगलाचरण
अर्थ—जो अनन्त वस्तुओंको जानते हैं, देवों द्वारा पूजे जाते हैं, जिनके वचन दुर्नयके कोलाहलसे
लुप्त नहीं होते, तथा जिन्होंने रागद्वेष-प्रधान शत्रुओंकी सभाको क्षण-भरमें परास्त कर दिया है, ऐसे वीरप्रभु
मेरी बुद्धि निर्मल करें ॥ १ ॥
समस्त मध्यलोकवर्ती प्राणियोंके पुण्य-प्रतापसे, असीम प्रतिभारूप प्राणोंके धारक, सरस्वती और
बृहस्पतिको अपने शरीररूपमें धारण करते हुए, जिन्होंने अपने शरीरके दृष्टान्तसे ही स्याद्वादके सिद्धान्तको
सिद्ध कर दिखाया है,–जिन्होंने एक ही शरीरमें परस्पर भिन्न सरस्वती और सुरगुरुके धारण करनेसे,
एक ही पदार्थको परस्पर भिन्न अनेक धर्मोंका धारक सूचित किया है—ऐसे हेमचन्द्रप्रभु मेरे सद्बुद्धिरूपी
समुद्रको अभिवृद्धि करें ॥ २ ॥
जो लोग इस ग्रन्थके अध्ययनके बहाने हेमचन्द्रमुनिका आश्रय लेते हैं, वे उज्ज्वल कलाओंके गौरव-
को प्राप्त करने योग्य पदको प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥
२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
मातर्भारति सन्निधेहि हृदि मे येनेयमाप्तस्तुते-
र्निर्मातुं विवृति प्रसिद्धयति जवादारम्भसम्भावना ।
यद्वा विस्मृतमोष्ठयोः स्फुरति यत् सारस्वतः शाश्वतो
मन्त्रः श्रीउदयप्रभेतरचनारम्यो ममाहर्निशम् ॥ ४ ॥
अवतरणिका
इह हि विषमदुःषमारजनितिमिरतिरस्कारभास्करानुकारिणा वसुधातलावतीर्णसुधा-
सारिणीदेशनावितानपरमार्हीकृतश्रीकुमारपालक्ष्मापालप्रवर्तिताभयदानाभिधानजीवातुसं-
जीवितनानाजीवप्रदत्तार्शीर्वादमाहात्म्यकल्पावधिस्थायिविशदयशःशरीरेण निरवद्यचातुर्विद्य-
निर्माणैकब्रह्मणा श्रीहेमचन्द्रसूरिणा जगतप्रसिद्धश्री सिद्धसेनदिवाकरविरचितद्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिका-
नुसारि श्रीवर्धमानजिनस्तुतिरूपमयोगव्यवच्छेद'दान्ययोगव्यवच्छेद'दाभिधानं द्वात्रिंशिकाद्वितयं
विद्वज्जनमनस्तत्त्वावबोधनिबन्धनं विदधे । तत्र च प्रथमद्वात्रिंशिकायाः सुखोन्नेयत्वाद्
तद्व्याख्यानमुपेक्ष्य द्वितीयस्यास्तस्या निःशेषदुर्वादिपरिषदधिक्षेपदक्षायाः कतिपयपदार्थविव-
रणकरणेन स्वस्मृतिबीजप्रबोधविधिर्विधीयते । तस्याश्चेदमदिकाव्यम्—
हे सरस्वती माता ! तुम मेरे हृदयमें निवास करो, जिससे मैं आप्तस्तुति (द्वात्रिंशिका) की
व्याख्या (स्याद्वादमंजरी) शीघ्र ही प्रारम्भ कर सकूँ । अथवा नहीं; मैं भूल गया, क्योंकि 'श्रीउदयप्रभ'—
रचनासे मनोहर शाश्वत सरस्वतीका मन्त्र तो दिन-रात मेरे होठोंमें स्फुरित हो ही रहा है । ( उदयप्रभ
टीकाकारके गुरुका नाम है । यहां टीकाकार गुरुभक्तिके वश होकर कहते हैं कि गुरुस्मरणके प्रभावसे सरस्वती
माता स्वयं मेरे हृदयमें विराजमान हैं, अतएव सरस्वती मातासे प्रार्थना करनेको आवश्यकता ही नहीं
रहती
अनन्तविज्ञानमतीतदोषमबाध्यसिद्धान्तममर्त्यपूज्यम् ।
श्रीवर्धमानं जिनमाप्तमुख्यं स्वयम्भुवं स्तोतुमहं यतिष्ये ॥ १ ॥
श्रीवर्धमानं जिनमहं स्तोतुं यतिष्य इति क्रियासम्बन्धः । किंविशिष्टम् ? अनन्तम्—
अप्रतिपाति, वि--विशिष्टं सर्वद्रव्यपर्यायविषयत्वेनोत्कृष्टं, ज्ञानं-केवलाख्यं विज्ञानम्, ततोऽनन्तं
विज्ञानं यस्य सोऽनन्तविज्ञानस्तम् । तथा अतीताः—निःसत्ताकीभूतत्वेनातिक्रान्ताः, दोषाः—
रागादयो यस्मात् स तथा तम् । तथा अबाध्यः—परैर्बाधितुमशक्यः, सिद्धान्तः—स्याद्वादश्रुत-
लक्षणो यस्य स तथा तम् । तथा अमर्त्याः—देवाः, तेषामपि पूज्यम्—आराध्यम् ॥
अत्र च श्रीवर्धमानस्वामिनो विशेषणद्वारेण चत्वारो मूलातिशयाः प्रतिपादिताः । तत्रा-
नन्तविज्ञानमित्यनेन भगवतः केवलज्ञानलक्षणविशिष्टज्ञानानन्त्यप्रतिपादनाद् ज्ञानातिशयः ।
अतीतदोषमित्यनेनाष्टादशदोषसंख्याभिधानाद् अपायापगमातिशयः । अबाध्यसिद्धान्तमित्य-
नेन कुतीर्थिकोपन्यस्तकुहेतुसमूहाशक्यबाध्यस्याद्वादरूपसिद्धान्तप्रणयनभणनाद् वचनातिशयः ।
अमर्त्यपूज्यमित्यनेनाकृत्रिमभक्तिभरनिर्भरसुरासुरनिकायनायकनिर्मितमहाप्रातिहार्यसपर्यापरि-
ज्ञानात् पूजातिशयः ॥
अत्राह परः । अनन्तविज्ञानमित्येतावदेवास्तु, नातीतदोषमिति । गतार्थत्वात् । दोषा-
त्ययं विनाऽनन्तविज्ञानत्वस्यानुपपत्तेः ॥ अत्रोच्यते । कुनयमतानुसारिपरिकल्पिताप्तव्यवच्छे-
दार्थमिदम् । तथा चाहुराजीविकनयानुसारिणः—
श्लोकार्थ—अनन्तज्ञानके धारक, दोषोंसे रहित, अबाध्य सिद्धान्तसे युक्त, देवों द्वारा पूजनीय, यथार्थ
वक्ताओं (आप्तों)में प्रधान, और स्वयम्भू, ऐसे श्रीवर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति करनेके लिए मैं प्रयत्न करूँगा ।
व्याख्यार्थ—मैं वर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति करनेका प्रयत्न करूँगा । वर्धमान जिनेन्द्र अनन्त
केवलज्ञानके धारक, रागद्वेष आदि अठारह दोषोंसे रहित, प्रतिवादियों द्वारा अखण्डनीय ऐसे स्याद्वादरूप
सिद्धान्तसे युक्त तथा देवोंसे पूजनीय हैं ।
यहाँ उपर्युक्त चार विशेषणोंसे वर्धमानस्वामीके चार मूल अतिशयोंका प्रतिपादन किया गया है ।
'अनन्तज्ञान' से विशिष्टज्ञान—केवलज्ञानकी अनन्ततारूप ज्ञानातिशय, 'अतीतदोष' से अठारह दोषोंके क्षयरूप
अपायापगम अतिशय, 'अबाध्यसिद्धान्त' से कुतीर्थिकोंके कुहेतुओं-द्वारा अखण्डनीय स्याद्वाद सिद्धान्तकी प्ररूपणा-
रूप वचनातिशय, तथा 'अमर्त्यपूज्य' विशेषणसे सहजभक्तिभावसे परिपूरित देवों और असुरोंके नायक इन्द्र
द्वारा की हुई महाप्रातिहार्य पूजारूप पूजातिशयका सूचन किया गया है ।
उपर्युक्त चार विशेषणोंकी सार्थकता
(क) शंका—वर्धमानस्वामीको 'अनन्तविज्ञान' विशेषण देना ही पर्याप्त है, 'अतीतदोष' विशेषणकी
आवश्यकता नहीं। कारण कि बिना दोषोंके नाश हुए अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती ? समाधान—
कुवादियों द्वारा कल्पित आप्तके निराकरण करनेके लिये 'अतीतदोष' विशेषण दिया गया है। आजीविक-
मतके अनुयायी कहते हैं—
१. पण्डा तत्त्वानुगा मोक्षे ज्ञानं विज्ञानमन्यतः । शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा ॥
—इत्यभिधानचिन्तामणौ द्वितीयकाण्डे २२४ श्लोकः ।
२. अन्तराया दानलाभवीर्यभोगोपभोगगाः । हासो रत्यरती भीतिर्जुगुप्सा शोक एव च ॥७२॥
कामो मिथ्यात्वमज्ञानं निद्रा चाविरतिस्तथा । रागो द्वेषश्च नो दोषास्तेषामष्टादशाप्यमी ॥७३॥
—अभिधानचिन्तामणौ प्रथमकाण्डे श्लोकौ ।
३. कंकिल्लि कुसुमवुट्ठि देवज्झुणि चामरासणाइं च । भावलयभेरिछत्तं जयन्ति जिणपाडिहेराई ॥१॥
प्रवचनसारोद्धारे द्वार ३९ (गाथा ४४०) ।
छाया—१ अशोकवृक्षः, २ कुसुमवृष्टिः, ३ दिव्यध्वनिः, ४ चामरे, ५ आसनानि च, ६ भामण्डलं,
७ भेरी, ८ छत्रम् ।
४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
“ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् ।
गत्वाऽगच्छन्ति भूयोऽपि भवं तीर्थनिकारतः ॥”
इति । तन्नूनं न तेऽतीतदोषाः । कथमन्यथा तेषां तीर्थनिकारदर्शनेऽपि भवावतारः ॥
आह । यद्येवमतीतदोषमित्येवास्तु, अनन्तविज्ञानमित्यतिरिच्यते । दोषात्ययेऽवश्यंभा-
वित्त्वादनन्तविज्ञानत्वस्य । न । कैश्चिद्दोषाभावेऽपि तदनभ्युपगमात् । तथा च वैशेषिकवचनम्—
“सर्वं पश्यतु वा मा वा तत्त्वमिष्टं तु पश्यतु ।
कीटसङ्ख्यापरिज्ञानं तस्य नः क्वोपयुज्यते ॥”
तथा— “तस्मादनुष्ठानगतं ज्ञानमस्य विचार्यताम् ।
प्रमाणं दूरदर्शी चेदेते गृध्रानुपास्महे ॥”
तन्मतव्यपोहार्थमनन्तविज्ञानमित्युदुष्टमेव । विज्ञानानन्त्यं विना एकस्याप्यर्थस्य
यथावत् परिज्ञानाभावात् । तथा चार्षम्—
“ जे एगं जाणइ, से सव्वं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ॥१ ”
"धर्मतीर्थके प्रवर्त्तक ज्ञानी मोक्ष प्राप्त करते हैं, तथा अपने तीर्थका तिरस्कार होते देखकर वे फिर
संसारमें चले आते हैं।"
निश्चय ही ये ज्ञानी दोषोंसे रहित नहीं हैं । अन्यथा अपने तीर्थका तिरस्कार देख उन्हें संसारमें
फिरसे आनेकी आवश्यकता न होती । आजीविकमतका निराकरण करनेके लिए यहाँ 'अतीतदोष' विशेषण—
दिया गया है ।
(ख) शंका—यदि ऐसा ही है, तो केवल 'अतीतदोष' विशेषण ही दिया जाय, 'अनन्तविज्ञान' की
क्या आवश्यकता है ? कारण कि दोषोंके नष्ट होनेपर अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति अवश्यंभावी है । समाधान—
कितने ही वादी दोषोंके नाश होनेपर भी अनन्तविज्ञानकी प्राप्ति नहीं स्वीकार करते, अतएव 'अनन्तविज्ञान'
विशेषण दिया गया है ।
वैशेषिकोंने कहा है—
“ईश्वर सब पदार्थोंको जाने अथवा न जाने, वह इष्ट पदार्थोंको जाने, इतना ही बस है । यदि
ईश्वर कीड़ोंकी संख्या गिनने बैठे तो वह हमारे किस कामका ?”
तथा—“अतएव ईश्वरके उपयोगी ज्ञानकी ही प्रधानता है । क्योंकि यदि दूर तक देखनेवालेको ही
प्रमाण माना जाय, तो फिर हमें गीध पक्षियोंकी पूजा करनी चाहिये ।”
तात्पर्य यह है, कि वैशेषिक लोग ईश्वरको अतीतदोष स्वीकार करके भी उसे सकल पदार्थोंका ज्ञाता
नहीं मानते । इसलिए इस मतका निराकरण करनेके लिए ग्रन्थकारने अनन्तविज्ञान विशेषण दिया है, और
यह विशेषण सार्थक ही है, क्योंकि अनन्तज्ञानके बिना किसी वस्तुका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता ।
आगमका वचन है—
१ आचारांगसूत्रे प्रथमश्रुतस्कंधे तृतीयाध्ययने चतुर्थोद्देशे सूत्रम् १२२ ।
छाया—य एकं जानाति स सर्वं जानाति । यः सर्वं जानाति स एकं जानाति ॥
तुलनीय—जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तिक्कालिगे तिहुवणत्थे ।
णातुं तस्स ण सक्कं सप्पज्जयं दव्वमेगं वा ॥
दव्वं अणंतपज्जयमेगमणंताणि दव्वजादीणि । ण विजाणदि जदि जुगवं किध सो सव्वाणि जाणादि ॥
( प्रवचनसार अ. १ गा. ४८,४९ )
छाया—यो न विजानाति युगपदर्थान् त्रैकालिकान् त्रिभुवनस्थान् ।
ज्ञातुं तस्य न शक्यं सपर्ययं द्रव्यमेकं वा ॥
द्रव्यमनन्तपर्यायमेकमनन्तानि द्रव्यजातीनि । न विजानाति यदि युगपत् कथं स सर्वाणि जानाति ॥
अन्य. यो. व्य. श्लोक १ ] स्याद्वादमञ्जरी ५
तथा- "एको भावः सर्वथा येन दृष्टः सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टा एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥"
ननु तर्ह्यबाध्यसिद्धान्तमित्यपार्थकम् । यथोक्तगुणयुक्तस्यान्यभिचारिवचनत्वेन तदुक्त-
सिद्धान्तस्य बाधाऽयोगात् । न । अभिप्रायाऽपरिज्ञानात् । निर्दोषपुरुषप्रणीत एवाबाध्यः
सिद्धान्तः । नापरेऽपौरुषेयाद्याः असम्भवादिदोषाऽग्रातत्वात् , इति ज्ञापनार्थम् । आत्ममात्र-
तारकमूकान्तकृतकेवल्यद्विरूपमुण्डकेवलिनो² यथोक्तसिद्धान्तप्रणयनाऽसमर्थस्य व्यवच्छेदार्थं
वा विशेषणमेतत् ॥
"जो एकको जानता है, वह सबको जानता है, और जो सबको जानता है, वह एकको जानता है ।"
तथा—"जिसने एक पदार्थको सब प्रकारसे देखा है, उसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे देख लिया
है । तथा जिसने सब पदार्थोंको सब प्रकारसे जान लिया है, उसने एक पदार्थको सब प्रकारसे जान लिया है।"
(कहनेका भाव यह है कि जबतक हम एक पदार्थका पूर्ण रीतिसे ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते, उस
समय तक हमें सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव 'एक' और 'अनेक' सापेक्ष हैं; अर्थात् 'एक'
का ज्ञान प्राप्त करना, 'अनेक' को जानना है । इसलिए अतीतदोष विशेषणके समान अनन्तविज्ञान विशेषण भी
उतना ही आवश्यक है । इसीलिए वैशेषिक मतका निराकरण करनेके लिए अतीतदोषके साथ अनन्तविज्ञान
विशेषण दिया गया है ।)
(ग) शंका—'अबाध्यसिद्धान्त' विशेषण देना व्यर्थ है । कारण कि जो पुरुष 'अनन्तविज्ञान' और
'अतीतदोष' है, उसके वचनोंमें कोई दोष नहीं होता, इसलिए उसका सिद्धान्त अबाध्य होगा ही । समाधान—
अबाध्यसिद्धान्त विशेषणका अभिप्राय है, कि निर्दोष पुरुष द्वारा निर्मित सिद्धान्त ही अबाध्य हैं; असम्भव
आदि दोष युक्त होनेसे अपौरुषेय आदि-पुरुषके बिना निर्मित वेद आदि सिद्धान्त-दोषरहित नहीं हैं ।
अथवा, सिद्धान्तोंके रचनेमें असमर्थ, स्वयं अपना ही उद्धार करनेवाले मूक तथा अन्तकृत मुण्डकेवलियोंके
(देखिए परिशिष्ट [क] ) निराकरण करनेके लिए अबाध्यसिद्धान्त विशेषण दिया गया है । अबाध्य-
सिद्धान्त विशेषणकी सार्थकता यहाँ दो प्रकारसे बतायी गयी है : (अ) निर्दोष पुरुष द्वारा निर्मित सिद्धान्त ही
बाधारहित हो सकता है, पुरुष बिना निर्मित (अपौरुषेय) वेद अबाधित नहीं हो सकता । क्योंकि तालु आदिसे
उत्पन्न वर्णोंके समूहको वेद कहते हैं, तथा तालु आदि स्थान मनुष्यजन्य हैं, अतएव वेदोंका अपौरुषेय मानना
असम्भव दोषसे दूषित है । (आ) मुण्डकेवलियोंका निराकरण उक्त विशेषणकी दूसरी सार्थकता है । बाह्य अति-
शयोंसे रहित, संसारसे वैराग्यभावको प्राप्त होकर जो केवल अपनी ही आत्माके उद्धारका प्रयत्न करते हैं, वे मुण्ड-
केवली कहे जाते हैं । ये केवली अन्तःकृत और मूक दो प्रकारके होते हैं । दोनों ही केवली कर्मोंके नाश करनेवाले
और सम्पूर्ण पदार्थोंके द्रष्टा होते हैं । अन्तर केवल इतना ही है कि अन्तःकृत केवलीके संसारसे मुक्त होनेका
समय बहुत नजदीक रहता है, या कहना चाहिए कि मुक्त होनेके कुछ समय पहले ही अन्तःकृत केवलीको
केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है; तथा मूककेवली किसी शारीरिक दोषके कारण उपदेश देनेमें असमर्थ होते हैं,
इसलिए वे मौन रहते हैं । उक्त दोनों केवली किसी सिद्धान्तकी रचना नहीं कर सकते हैं । यही कारण है,
कि अतीतदोष और अनन्तविज्ञानके धारक होते हुए भी मुण्डकेवलियोंका निराकरण करनेके लिए ग्रन्थकारने
१. ताल्वादिजन्मा ननु वर्णवर्गो वर्णात्मको वेद इति स्फुटं च ।
पुंसश्च ताल्वादि ततः कथं स्यादपौरुषेयोऽयमिति प्रतीतिः ॥
२. (१) द्रव्यभावमुण्डनप्रधानस्तथाविधबाह्यातिशयशून्यः केवली ।
(२) संविग्नो भवनिर्वेदादात्मनिःसरणं तु यः ।
आत्मार्थं संप्रवृत्तोऽसौ सदा स्यान्मण्डकेवली ॥
(३) यः पुनः सम्यक्त्वार्वाप्तो भवनेर्गुण्यदर्शनात्तन्निर्वेदादात्मनिःसररणमेव केवलमभिवाञ्छति तथैव
चेष्टते स मुण्डकेवली भवति इति ।
्णुम् । नन्वतिशयानां परिमिततयैव सिद्धान्ते प्रसिद्धू-Wait,वर्धिष्णुम्: Look at वर्धिष्णुम्in line 8:वर्धिष्णुम्- wait, the letter isर्धि? Yes, वर्धिष्णुम् ।`
Line 9:
त्वात्कथं वर्धमानतोपपत्तिः । इति चेत्, न । यथा निशीथचूर्णौ१ भगवतां श्रीमदर्हतामष्टोत्तर-
Line 10:
सहस्रसङ्ख्याद्वाह्यलक्षणसङ्ख्ययाया उपलक्षणत्वेनान्तरङ्गलक्षणानां सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम् ।
Wait, सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम् vs सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम्: look at सत्त्वादिनामानन्त्यमुक्तम्:
सत्त्वा or सत्त्वादीनामानन्त्यमुक्तम्?
Look at सत्त्वादीनाम्:
There is an ी matra on द: सत्त्वादीनामानन्त्यमुक्तम्!
Yes, दी has dirgha-ii matra!
Line 11:
एवमतिशयानामधिकृतपरिगणनायोगेऽप्यपरिमितत्वमविरुद्धम् । ततो नातिशयश्रिया वर्ध-
Line 12:
अन्य. यो. व्य. श्लोक १ ] स्याद्वादमञ्जरी ७
षितरागादिदोष इति । अबाध्यसिद्धान्तता च श्रुतकेवल्य¹दिष्वपि दृश्यतेऽतस्तदपोहायाप्त-
मुख्यमिति विशेषणम् । आप्तिर्हि रागद्वेषमोहानामैकान्तिक आत्यन्तिकश्च² क्षयः, सा येषामस्ति
ते खल्वाप्ताः । अभ्रादित्वाद्³मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः । तेषु मध्ये मुखमिव सर्वाङ्गानां प्रधान-
त्वेन मुख्यम् । “शाखादेर्यः⁴” इति तुल्ये यः । अमर्त्यपूज्यता च तथाविधगुरुपदेशपरिचर्या-
पर्याप्तविद्याचरणसम्पन्नानां सामान्यमुनीनामपि न दुर्घटा । अतस्तन्निराकरणाय स्वयम्भुवमिति
विशेषणम् । स्वयम्-आत्मनैव, परोपदेशनिरपेक्षतयाऽवगततत्त्वो भवतीति स्वयम्भूः-स्वयं
संबुद्धः, तम् । एवंविधं चरमजिनेन्द्रं स्तोतुं-स्तुतिविषयीकर्तुम् अहं यतिष्ये-यत्नं करिष्यामि ।
अत्र चाचार्यो भविष्यत्कालप्रयोगेण योगिनामप्यशक्यमनुष्ठानं भगवद्गुणस्तवनं मन्यमानः
श्रद्धामेव स्तुतिकरणेऽसाधारणं कारणं ज्ञापयन् यत्नकरणमेव मदधीनं पुनर्यथाऽवस्थितभग-
वद्गुणस्तवनसिद्धिरिति सूचितवान् । अहमिति च गतार्थत्वेऽपि परोपदेशान्यानुवृत्त्यादि-
निरपेक्षतया निजश्रद्धयैव स्तुतिप्रारम्भ इति ज्ञापनार्थम् ॥
अथवा । श्रीवर्धमानादिविशेषणचतुष्टयमनन्तविज्ञानादिपदचतुष्टयेन सह हेतुहेतु-
मद्भावेन व्याख्यायते । यत एव श्रीवर्धमानम्, अत एवानन्तविज्ञानम् । श्रिया-कृत्स्नकर्म-
दोषोंको जीतकर उन्हें जड़मूलसे नष्ट कर दिया है, उसे जिन कहते हैं । 'अबाध्यसिद्धान्त' श्रुतकेवली आदिमें
भी पाया जाता है, उसका निराकरण करनेके लिए 'आप्तमुख्य' विशेषण दिया गया है । जिसके राग, द्वेष
और मोहका सर्वथा क्षय हो गया है, उसे आप्त कहते हैं । [ यहाँ अभ्रादिगणमें मत्वर्थमें 'अच्' प्रत्यय हुआ
है; ( 'अभ्रादिभ्यः' हेमशब्दानुशासन ७।२।४६ ) । जिस प्रकार सम्पूर्ण अंगोंमें मुख प्रधान है, इसी तरह
जिनेन्द्रभगवान् आप्तोंमें प्रधान हैं, इसलिए उन्हें आप्तमुख्य कहा गया है । यहाँ 'शाखादेर्यः' ( हेमशब्दानु-
शासन ७।१।११४ ) सूत्रसे तुल्य अर्थमें 'य' प्रत्यय हुआ है ] । सद्गुरुओंके उपदेश और सेवासे पर्याप्त
ज्ञान और चारित्रको प्राप्त करनेवाले सामान्य मुनि भी देवों द्वारा पूजे जाते हैं, इसलिए उनका निराकरण
करनेके लिए 'स्वयम्भू' विशेषण दिया गया है । जिसने दूसरेके उपदेशके बिना स्वयं ही तत्त्वोंको जान लिया
है, वह स्वयम्भू कहलाता है-जो स्वयं सम्बुद्ध हो । इन पूर्वोक्त विशेषणोंसे युक्त अन्तिम जिनेन्द्र ( वर्धमान-
स्वामी ) की स्तुति करनेका मैं ( हेमचन्द्र ) प्रयत्न करूँगा । भगवान्के गुणोंका स्तवन योगियों द्वारा भी
अशक्य है, और असाधारण श्रद्धाके वश ही उन गुणोंकी स्तुति की जाती है, यह सूचित करनेके लिए
आचार्यने 'यतिष्ये' भविष्यकालका प्रयोग किया है । अर्थात् प्रयत्न करना ही मेरे अधीन है, यथावस्थित
भगवान्के गुणोंके स्तवनकी सिद्धि नहीं, यही इससे सूचित होता है । यद्यपि 'यतिष्ये' कहनेसे 'अहं' का
स्वयं बोध हो जाता है, फिर भी दूसरोंके उपदेशके बिना; बिना किसीकी आज्ञाके, केवल अपनी ही भक्तिसे
मैं इस स्तवनको आरम्भ करता हूँ, यह बतानेके लिए 'अहं' पद दिया गया है ।
अथवा-(१) श्रीवर्धमानं, (२) जिनं, (३) आप्तमुख्यं, (४) स्वयम्भुवं-ये चारों विशेषण क्रमशः
(१) अनन्तविज्ञानं, (२) अतीतदोषं, (३) अबाध्यसिद्धान्तं, (४) अमर्त्यपूज्यंके साथ कारण और कार्यरूपसे
प्रतिपादित किये जा सकते हैं । भगवान् सम्पूर्ण कर्मोंके नाशसे उत्पन्न होनेवाली अनन्तचतुष्टय लक्ष्मीसे
१. श्रुतेन केवलिनः श्रुतकेवलिनः, चतुर्दशपूर्वधरत्वात् ।
अथ प्रभवः प्रभुः । शय्यम्भवो यशोभद्रः सम्भूतविजयस्ततः ॥३३॥
भद्रबाहुः स्थूलभद्रः श्रुतकेवलिनो हि षट् ॥३४॥
इति अभिधानचिन्तामणौ प्रथमकाण्डे ।
२. निःशेषीकृतेऽपि पुनरुद्भवमाशङ्क्यात्यन्तिकः, अभूयःसम्भवदोषविनाशः ।
३. 'अभ्रादिभ्यः' हैमसूत्रम् ७।२।४६ ।
४. हैमसूत्रम् ७।१।११४ ।
८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १
क्षयाविर्भूतानन्तचतुष्क१सम्पद्रूपया वर्धमानम् । यद्यपि श्रीवर्धमानस्य परमेश्वरस्यानन्तचतुष्क-
सम्पत्तेरुत्पत्त्यनन्तरं सर्वकालं तुल्यत्वाच्चयापचयौ न स्तः, तथापि निरपचयत्वेन शाश्वतिकाव-
स्थानयोगाद्वर्धमानत्वमुपचर्यते । यद्यपि च श्रीवर्धमानविशेषणेनानन्तचतुष्कान्तर्भावित्वेनानन्त-
विज्ञानत्वमपि सिद्धम्, तथाप्यनन्तविज्ञानस्यैव परोपकारसाधकतमत्वाद्, भगवत्प्रवृत्तेश्च
परोपकारैकनिबन्धनत्वाद्, अनन्तविज्ञानत्वं शेषानन्तत्रयात् पृथग् निर्धार्याचार्येणोक्तम् ॥
ननु यथा जगन्नाथस्यानन्तविज्ञानं परार्थं, तथाऽनन्तदर्शनस्यापि केवलदर्शनापरपर्यायस्य
परार्थ्यमन्याहतमेव । केवलज्ञानकेवलदर्शनाभ्यामेव हि स्वामी क्रमप्रवृत्तिभ्यामुपलब्धं
सामान्यविशेषात्मकं पदार्थसार्थं परेभ्यः प्ररूपयति । तत्किमर्थं तन्नोपात्तम् ? इति चेत्,
उच्यते । विज्ञानशब्देन तस्यापि संग्रहाददोषः, ज्ञानमात्राया२ उभयत्रापि समानत्वात् । य एव
हि अभ्यन्तरीकृतसमता३ख्यधर्मा विषमताधर्मविशिष्टा ज्ञानेन गम्यन्ते ऽर्थाः, त एव ह्यभ्यन्तरी-
कृतविषमताधर्माः समताधर्मविशिष्टा दर्शनेन गम्यन्ते; जीवस्वाभाव्यात् । सामान्यप्रधान-
मुपसर्जनीकृत४विशेषमर्थग्रहणं दर्शनमुच्यते । तथा प्रधानविशेषमुपसर्जनीकृतसामान्यं च
ज्ञानमिति ॥
तथा यत एव जिनम्, अत एवातीपदोषम् । रागादिजेतृत्वाद्वि जिनः । न चाजिनस्या-
तीतदोषता । तथा यत एवाप्तमुख्यम्, अत एवावाध्यसिद्धान्तम् । आप्तो हि प्रत्ययित
उच्यते । तत आप्तेषु मुख्यं श्रेष्ठमाप्तमुख्यम् । आप्तमुख्यत्वं च प्रभोरविसंवादिवचनतया
विश्वविश्वासभूमित्वात् । अत एवाबाध्यसिद्धान्तम् । न हि यथावज्ज्ञानावलोकितवस्तुवादी
वृद्धिंगत हैं, अतएव अनन्तविज्ञानके धारक हैं। यद्यपि वर्धमानस्वामीके अनन्तचतुष्टय रूप लक्ष्मी सर्वदा एक
समान रहती है, अतएव उसमें घटना-बढ़ना नहीं होता, फिर भी उस लक्ष्मीके सदा एक समान रहनेके
कारण उसमें वर्धमानताका उपचारसे प्रतिपादन किया गया है। तथा, यद्यपि श्रीवर्धमान विशेषणसे अनन्त-
विज्ञान अनन्तचतुष्टयमें गर्भित हो जाता है, फिर भी अनन्तविज्ञानसे ही जीवोंका परोपकार होता है, और
परोपकारके लिए ही भगवान्की प्रवृत्ति होती है, इसलिए अनन्तविज्ञानको अनन्तदर्शन, अनन्तचारित्र और
अनन्तवीर्य इन तीनोंसे पृथक् कहा है।
शंका—जिस प्रकार भगवान्का अनन्तज्ञान परोपकारके लिए कहा जाता है, उसी तरह अनन्त-
दर्शन—केवलदर्शन—भी परोपकारके लिए ही होता है। क्योंकि क्रमसे होनेवाले केवलज्ञान और केवलदर्शनसे
जाने हुए सामान्य-विशेष पदार्थोंको ही भगवान् दूसरोंको प्रतिपादित करते हैं। फिर, यहाँ अनन्तदर्शनका
उल्लेख क्यों नहीं किया है? समाधान—अनन्तज्ञानमें ज्ञान शब्दसे दर्शनका भी सूचन होता है, क्योंकि
केवलज्ञान और केवलदर्शन दोनोंमें ज्ञानकी मात्रा समान है। कारण कि जो पदार्थ सामान्य धर्मोंको गौण
करके विशेष धर्मों सहित ज्ञानसे जाने जाते हैं, वे ही पदार्थ विशेष धर्मोंकी गौणतापूर्वक सामान्य धर्मों
सहित दर्शनसे जाने जाते हैं; क्योंकि ज्ञान और दर्शन दोनों ही जीवके स्वभाव हैं। सामान्यकी मुख्यतापूर्वक
विशेषको गौण करके पदार्थके जाननेको दर्शन कहते हैं। तथा विशेषकी मुख्यतापूर्वक सामान्यको गौण करके
किसी वस्तुके जाननेको ज्ञान कहते हैं।
अतएव भगवान् जिन हैं, इसी कारण दोषोंसे रहित हैं। रागादि जीतनेके कारण उन्हें जिन कहा
गया है। जो जिन नहीं हैं, वे दोषोंसे रहित नहीं हैं। भगवान् आप्तोंमें मुख्य हैं, इसलिए उनका सिद्धान्त
बाधारहित है। जो प्रतिति (विश्वास) के योग्य है, उसे आप्त कहते हैं। जो आप्तोंमें प्रधान अर्थात् श्रेष्ठ
हो वह आप्तमुख्य है। भगवान् के वचनोंमें कोई विसंवाद न होनेसे तथा सब प्राणियोंकी विश्वासभूमि होनेसे
१. (१) अनन्तज्ञान (२) अनन्तदर्शन (३) अनन्तचारित्र (४) अनन्तवीर्य इति चतुष्कम् ।
२. ज्ञानेयत्तायाः । ३. समता—सामान्याख्यधर्मः । ४. उपसर्जनं—गौणम् ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २ ] स्याद्वादमञ्जरी ९
सिद्धान्तः कुनयैर्बाधितुं शक्यते । यत एव स्वयम्भुवम्, अत एवामर्त्यपूज्यम् । पूज्यते हि
देवदेवो जगत्त्रयविलक्षणलक्षणेन स्वयंसम्बुद्धत्वगुणेन सौधर्मेन्द्रादिभिरमर्त्यैरिति । अत्र च
श्रीवर्धमानमिति विशेषणतया यद् व्याख्यातं तदयोगव्यवच्छेदाभिधानप्रथमद्वात्रिंशिकाप्रथम-
काव्यतृतीयपादवर्तमानं “श्रीवर्धमानाभिधमात्मरूपम्” इति विशेष्यवर्तमानं बुद्धौ सम्प्रधार्य
विज्ञेयम् । तत्र हि आत्मरूपमिति विशेष्यपदम्, प्रकृष्ट आत्मा आत्मरूपस्तं परमात्मानमिति
यावत् । आवृत्त्या वा विशेषणमपि विशेष्यतया व्याख्येयम् ॥ इति प्रथमवृत्तार्थः ॥१॥
अस्यां च स्तुतावन्ययोगव्यवच्छेदोऽधिकृतस्तस्य च तीर्थान्तरीयपरिकल्पि-
ततत्त्वाभासनिरासेन तेषामाप्तत्वव्यवच्छेदः स्वरूपम् । तच्च भगवतो यथावस्थितव-
स्तुतत्त्ववादित्वव्यापनेनैव
१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २
हे नाथ ! अयं-मल्लक्षणो जनः; तव गुणान्तरेभ्यो-यथार्थवादव्यतिरिक्तेभ्योऽनन्य-
साधारणशरीरलक्षणादिभ्यः, स्पृह्यालुरेव - श्रद्धालु रेव । किमर्थम् ? स्तवाय- स्तुतिकरणाय ।
इयं "तादर्थ्ये चतुर्थी"१। पूर्वत्र तु “स्पृहेर्य्याप्यं वा”२ इतिलक्षणा चतुर्थी । तव गुणान्तराण्यपि
स्तोतुं स्पृहावानयं३ जन इति भावः । ननु यदि गुणान्तरस्तुतावपि स्पृहयालुता तत्किं४ तान्यपि
स्तोष्यति स उत नेत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह-किन्त्विति - अभ्युपगमपूर्वक विशेषद्योतने निपातः ।
एकम् - एकमेव । यथार्थवादं - यथावस्थितवस्तुतत्त्वप्रख्यापनाख्यं त्वदीयं गुणम्, अयं
जनो विगाहतां - स्तुतिक्रियया समन्ताद्व्याप्नोतु । तस्मिन्नेकस्मिन्नपि हि गुणे वर्णिते तन्त्रान्त-
रोयदैवतेभ्यो वैशिष्ट्यख्यापनद्वारेण वस्तुतः सर्वगुणस्तवनसिद्धेः ।
अथ प्रस्तुतगुणस्तुतिः सम्यक् परीक्षणाक्षमाणां दिव्यदृशामे५वौचितीं६मञ्चति, नार्वाग्दृशां७
भवादृशामित्याशङ्कां विशेषणद्वारेण निराकरोति । यतोऽयं जनः परीक्षाविधिदुविदग्धः -
अधिकृतगुणविशेषपरीक्षणविधौ दुर्विदग्धः - पण्डितंमन्य इति यावत् । अयमाशयः । यद्यपि
जगद्गुरोर्यथार्थवादित्वगुणपरीक्षा मादृशां मतेरगोचरः, तथापि भक्तिश्रद्धातिशयात् तस्यामह-
मात्मानं विदग्धमिव मन्य इति । विशुद्धश्रद्धाभक्तिव्यक्तिमात्रस्वरूपत्वात् स्तुतेः ॥ इति
वृत्तार्थः ॥२॥
व्याख्यार्थ - हे नाथ ! मैं (हेमचन्द्र ) आपके यथार्थवादके अतिरिक्त दूसरोंमें न पाये जानेवाले
शरीरलक्षण आदि अन्य गुणोंके प्रति भी श्रद्धा रखता हूँ । [ 'स्तवाय' यहाँ 'तादर्थ्ये चतुर्थी' (२।२।५४)
सूत्रसे तादर्थ्यमें चतुर्थी, तथा 'गुणान्तरेभ्यः' पदमें 'स्पृहेर्य्याप्यं वा' (२।२।२६) सूत्रसे स्पृह् धातुके कर्ममें
विकल्पसे चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग हुआ है ] । तात्पर्य यह कि आपके अन्य गुणोंका स्तवन करनेकी भी मेरी
इच्छा है । शंका - यदि अन्य गुणोंके स्तवन करने में भी आपकी श्रद्धा है तो उनकी उपेक्षा क्यों करते हैं ?
समाधान - इसका उत्तर श्लोकके उत्तरार्धमें दिया गया है । 'किन्तु' शब्दका यहाँ स्वीकृतिपूर्वक विशेष
अर्थ में निपात हुआ है । यथार्थवाद नामक एक ही गुणके वर्णनसे अन्यमतों द्वारा मान्य देवताओंसे भगवान्की
विशिष्टता सिद्ध होती है इसलिए इस एक गुणके स्तवनसे भगवान्के सम्पूर्ण गुणोंका स्तवन हो जाता है ।
शंका - उत्तम रीतिसे परीक्षा करने में समर्थ दिव्य, नेत्रवाले मुनीश्वर ही भगवान्के गुणोंकी स्तुति
कर सकते हैं, आप जैसे छद्मस्थोंमें स्तुति करनेकी योग्यता नहीं है । समाधान - प्रस्तुत गुणोंकी परीक्षामें
अपनेको पण्डित मानकर मैं ( हेमचन्द्र ) स्तुति आरम्भ करता हूँ । तात्पर्य यह है कि यद्यपि भगवान्के
यथार्थवादित्व गुणकी परीक्षा करना मेरी बुद्धिके बाहर है, फिर भी भक्ति और श्रद्धाके वश मैं उस
परीक्षामें अपनेको पण्डित समझता हूँ । क्योंकि विशुद्ध श्रद्धा और भक्ति प्रकट करना ही स्तुति है ।। यह
श्लोकका अर्थ है ॥२॥
भावार्थ-यद्यपि भगवान् अनन्त गुणोंसे भूषित हैं, परन्तु अन्य मतों द्वारा मान्य आप्तोंसे भगवानकी
असाधारणता दिखानेके लिये भगवान्के यथार्थवाद गुणका स्तवन करना ही पर्याप्त है। अतएव हेमचन्द्रा-
चार्य दूसरे गुणोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए भी यहाँपर भगवानके यथार्थवाद गुणकी ही स्तुति करते हैं ।
१. हैमसूत्रम् २।२।५४ । २. हैमसूत्रम् २।२।२६ । ३. 'स्पृहावानेवायम्' पाठान्तरम् । ४. 'तत्किमर्थं
तत्रोपेक्षा इत्याशङ्क्योत्तरार्धमाह' पाठान्तरम् । ५. अतीन्द्रियज्ञानिनां । ६. योग्यतां ।
७. छद्मस्थानां ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक ३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११
अथ ये कुतीर्थ्याः कुशास्त्रवासनावासितस्वान्ततया त्रिभुवनस्वामिनं स्वामित्वेन न
प्रतिपन्नाः, तानपि तत्त्वविचारणां प्रति शिक्षयन्नाह—
गुणेष्वसूर्या दधतः परेऽमी मा शिश्रियनाम भवन्तमीशम् ।
तथापि संमील्य विलोचनानि विचारयन्तां नयवर्त्म सत्यम् ॥३॥
अमी इति—"अदसस्तु विप्रकृष्टे" इति वचनात् तत्त्वात्तत्त्वविमर्शबाह्यतया दूरीकरणा-
र्हत्वाद् विप्रकृष्टाः, परे—कुतीर्थिकाः, भवन्तं—त्वाम्, अनन्यसामान्यसकलगुणनिलयमपि;
मा ईशं शिश्रियन्—मा स्वामित्वेन प्रतिपद्यन्ताम् । यतो गुणेष्वसूर्या दधतः—गुणेषु दोषा-
विष्करणं ह्यसूया। यो हि यत्र मत्सरी भवति स तदाश्रयं नानुरुध्यते, यथा माधुर्यमत्सरी
करभः पुण्ड्रेक्षुकाण्डम् । गुणाश्रयश्च भवान् । एवं परतर्थिकानां भगवदाज्ञाप्रतिपत्तिं प्रतिषिध्य
स्तुतिकारो माध्यस्थ्यमिवास्थाय, तान्प्रति हितशिक्षामुत्तरार्धेनोपदिशति । तथापि—त्वदाज्ञा-
प्रतिपत्तेरभावेऽपि, लोचनानि नेत्राणि, संमील्य—मिलितपुटीकृत्य, सत्यं—युक्तियुक्तं, नयवर्त्म—
न्यायमार्गं, विचारयन्तां—विमर्शविषयीकुर्वन्तु ॥
अत्र च विचारयन्तामित्यात्मनेपदेन फलवत्कर्तृविषयेणैव ज्ञापयत्याचार्यो यद्वितथ-
नयपथविचारणया तेषामेव फलं, वयं केवलमुपदेष्टारः । किं तत्फलम् ? इति चेत्, प्रेक्षावत्तेति
ब्रूमः । संमील्य विलोचनानीति च वदतः प्रायस्तत्त्वविचारणमेकाग्रताहेतुनयननिमीलनपूर्वकं
लोके प्रसिद्धमित्यभिप्रायः । अथवा अयमुपदेशस्तेभ्योऽरोचमान एवाचार्येण वितीर्यते ततो-
ऽस्वदमानोऽप्ययं कटुकौषधपानन्यायेनायतिसुखत्वाद् भवद्भिर्नेत्रे निमील्य पेय एवेत्याकूतम् ॥
मिथ्याशास्त्रोंकी वासनासे दूषित जो कुतीर्थिक तीन लोकके स्वामी जिनभगवान्को स्वामी नहीं मानते,
उन्हें उपदेश देनेके लिए कहते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, यद्यपि आपके गुणोंमें ईर्ष्या रखनेवाले तीर्थिक आपको स्वामी नहीं मानते,
परन्तु ये लोग आपके सत्य न्याय मार्गका ज़रा नेत्र बन्द करके विचार तो करें ।
व्याख्यार्थ—'अमी परे भवन्तं मां ईशं शिश्रियन्, यतः गुणेषु असूयां दधतः' तत्त्व और अतत्त्वका
विचार न करनेवाले दूरस्थ परमतावलम्बी असाधारण गुणोंके समूह ऐसे आपको ईश्वर नहीं मानते, क्योंकि
वे आपके गुणोंमें ईर्ष्या करते हैं । गुणोंके रहते हुए भी दोषान्वेषणको असूया ( ईर्ष्या ) कहते हैं । जो
जिन गुणोंमें ईर्ष्या करता है, वह उन गुणोंको गुणरूपसे नहीं स्वीकार करता । जैसे माधुर्य रससे ईर्ष्या
करनेवाला ऊँट पौण्डेको नहीं चाहता । परन्तु गुण आपमें मौजूद हैं। इस प्रकार भगवान्की आज्ञाकी
स्वीकारोक्तिका प्रतिषेध करनेवाले तीर्थिकोंके प्रति उदासीन भाव रखते हुए आचार्य उपदेश करते हैं ।
'तथापि'—आपकी आज्ञाको न मानकर भी, तैर्थिक लोग नेत्र बन्द करके आपके युक्तियुक्त न्यायमार्गका
ज़रा विचार तो करें ।
यहाँ 'विचारयन्तां' आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है, इसलिए क्रियाका फल कर्त्ताको ही मिलना
चाहिए । अर्थात् सच्चे न्यायमार्गका विचार करनेसे तैर्थिक लोगोंको ही फल मिलेगा क्योंकि हम तो केवल
उपदेश देनेवाले हैं । वह फल कौन-सा है ? प्रेक्षावान होना ही उस फलकी सार्थकता है । यहाँ किसी
तत्त्वका विचार करते समय एकाग्रता प्राप्त करनेके लिए नेत्रोंको बन्द कर विचार करनेकी लौकिक विधिका
सूचन किया गया है । अथवा उपदेशके रुचिकर नहीं होनेपर भी आचार्य इसका उपदेश देते हैं । अतएव
'कटुक औषध-पान' न्यायसे इस उपदेशके कटु होनेपर भी यह उपदेश आगामी कालमें सुखकर होगा,
इसलिए इस उपदेशका नेत्र निमीलित करके पान करना चाहिए ।
१. इदमस्तु संनिकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम् । अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥ १ ॥
इति सम्पूर्णः श्लोकः ।
१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक ३
ननु यदि च पारमेश्वरे वचसि तेषामविवेकातिरेकादरोचकता, तत्किमर्थं तान्
प्रत्युपदेशकलेश इति ? नैवम् । परोपकारसारप्रवृत्तीनां महात्मनां प्रतिपाद्यगतां१ रुचिमरुचिं
वानपेक्ष्य हितोपदेशप्रवृत्तिदर्शनात् । तेषां हि परार्थस्यैव स्वार्थत्वेनाभिमतत्वात् । न च
हितोपदेशादपरः पारमार्थिकः परार्थः । तथा चर्षम्—
“रूसउ वा परो मा वा, विसं वा परियत्तऊ ।
भासियव्वा हिया भासा सपक्खगुणकारिया” ॥२
उवाच च वाचकमुख्यः३—
“न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यैकान्ततो हितश्रवणात् ।
ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति” ॥४
इति वृत्तार्थः ॥३॥
अथ यथावन्नयवर्त्मविचारमेव प्रपञ्चयितुं पराभिप्रेततत्त्वानां प्रामाण्यं निराकुर्वन्ना-
द्वितस्तावत्काव्यषट्केनौलूक्यमताभिमततत्त्वानि दूषयितुकामस्तदन्तःपातिनौ प्रथमतं
सामान्यविशेषौ दूषयन्नाह—
शंका—यदि अविवेककी प्रचुरतासे किसीको जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंमें रुचि नहीं होती, तो आप
उसे क्यों उपदेश देनेका कष्ट उठाते हैं ? समाधान—यह बात नहीं है । परोपकार स्वभाववाले महात्मा
पुरुष किसी पुरुषको रुचि और अरुचिको न देखकर हितका उपदेश करते हैं । क्योंकि महात्मा लोग दूसरेके
उपकारको ही अपना उपकार समझते हैं। हितका उपदेश देनेके बराबर दूसरा कोई पारमार्थिक उपकार
नहीं है। आर्षवाक्य है—
"उपदेश दिया जानेवाला पुरुष चाहे रोष करे, चाहे वह उपदेशको विषरूप समझे, परन्तु
स्वपक्ष हितरूप वचन अवश्य कहने चाहिए"
उमास्वाति वाचकमुख्यने भी कहा है—
“सभी उपदेश सुननेवालोंको पुण्य नहीं होता है । परन्तु अनुग्रह बुद्धिसे हितका उपदेश देनेवालेको
निश्चय ही पुण्य मिलता है ।”
यह श्लोकका अर्थ है ॥३॥
भावार्थ—एकान्तरूपसे वस्तु तत्त्वको स्वीकार करनेवाले अन्यमतावलम्बी आपके गुणोंमें ईर्ष्याबुद्धि
रखते हुए आपको अपना इष्टदेव नहीं मानते । परन्तु यदि वे लोग एकान्तका आग्रह छोड़कर आप द्वारा
प्रतिपादित न्यायमार्गका विचार करें, तो उन्हें आपकी महत्ता स्वयं ही प्रकट हो जायगी ।
अब यथार्थ नयमार्गका विचार करनेके लिए परमतावलम्बियों द्वारा मान्य तत्त्वोंके प्रामाण्यका
निराकरण करनेके हेतु छह श्लोकोंमें वैशेषिकमतके तत्त्वोंमें दूषण बताते हुए सर्वप्रथम ‘सामान्य-विशेष’में
दोष दिखाते हैं।
१. बोध्यछात्रविषयिणीम् ।
२. छाया—रुषतु वा परो मा वा विषं वा परिवर्तयतु (विषवत् प्रतिभातु वा) ।
भाषितव्या हिता भाषा स्वपक्षगुणकारिका ॥
एतदर्थक एव श्लोको श्रीहेमचन्द्रकृतश्रेणिकचरित्रे द्वितीयसर्गे ३२ उपलभ्यते । तथाहि—
परो रुष्यतु वा मा वा विषवत् प्रतिभातु वा ।
भाषितव्या हिता भाषा स्वपक्षगुणकारिणी ॥३२॥
३. उमास्वातिः । अयमुमास्वामीत्यपि भण्यते । ४. तत्त्वार्थसूत्रसम्बन्धकारिकासु २९ श्लोकः ।