स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
३४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
ईश्वर इन तीन पदार्थोंको मानना चाहिये । जीव और जगत शरीर रूप है और परब्रह्म शरीरी है । रामा-
नुजका समय ११ वीं शताब्दी माना जाता है ।
वल्लभ—ये शुद्धाद्वैतके मुख्य प्रवर्तक गिने जाते हैं। इनके मतमें यह जगत परब्रह्मका ही अविकृत
परिणाम है। इसे माया रूप समझकर ब्रह्मकी विवर्त नहीं कह सकते । इसलिये ब्रह्मको माया रहित मानना
चाहिये । ब्रह्मन् अंशी है तथा जीव और जड़ ब्रह्मके अंश हैं। जीव भक्तिके द्वारा ही परब्रह्मको प्राप्त करता
है । शुद्धाद्वैतको अविकृत ब्रह्मवाद भी कहते हैं । वल्लभका समय ईसाकी १५ वीं शताब्दी है ।
विज्ञानभिक्षु—ये अविभागाद्वैतके स्थापक माने जाते हैं। केवलाद्वैत और शुद्धाद्वैतका इन्होंने खंडन
किया है। इनके मतमें जिस प्रकार जलमें शक्कर डालनेसे शक्कर जलके साथ अविभक्त हो जाती है, उसी
तरह पर जड़-अजड़ जगत परब्रह्ममें अविभक्तरूपसे रहता है। विज्ञानभिक्षुका समय ईसाकी १७ वीं शताब्दी है।
श्रीकंठाचार्य—ये शक्तिविशिष्ट अद्वैतको मानते हैं। यह सिद्धांत अद्वैतवाद केवलाद्वैतके साथ मिलता
जुलता है । अन्तर इतना ही है कि यहाँ ब्रह्मको सविशेष भावसे प्रधान, और निर्विशेष भावसे गौण माना
गया है । ब्रह्मतत्त्व चित् शक्ति और आनन्द शक्तिसे युक्त है । यहाँपर इस शक्तितत्त्वको माया रूप अथवा
अविद्या रूप न मानकर उसे चिन्मय माना गया है । श्रीकंठका समय १५वीं शताब्दी है ।
भट्टभास्कर—ये औपाधिक भेदाभेदको मानते हैं । भट्टभास्कर भेद और अभेद दोनोंको सत्य मानते हैं ।
ब्रह्म और जगतमें कार्य-कारण संबंध है । इसलिये कार्य और कारण दोनों ही सत्य हैं; कारणको सत्य और
कार्यको कल्पित नहीं कहा जा सकता । भट्टभास्करका समय ईसाकी १० वीं शताब्दी माना जाता है ।
निम्बार्क—स्वाभाविक भेदाभेदको मानते हैं। इनके मतमें जगत ब्रह्मका परिणाम है, इसे काल्पनिक
नहीं कह सकते । निम्बार्कके मतमें जीव और जगतको न ईश्वरसे सर्वथा अभिन्न कह सकते हैं, और न सर्वथा
भिन्न। अतएव चेतन और अचेतनको ईश्वरसे भिन्नाभिन्न मानना चाहिये। निम्बार्कका समय ११वीं शताब्दी है ।
मध्व—मध्व द्वैत वेदान्ती माने जाते हैं। मध्वके अनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे भेदकी ही
सिद्धि होती है । पदार्थ दो तरहके होते हैं—स्वतंत्र और परतंत्र । ईश्वर स्वतंत्र पदार्थ है । परतंत्र पदार्थ
भाव और अभावके भेदसे दो प्रकारके हैं। भावके दो भेद हैं—चेतन और अचेतन । चेतन और अचेतन ईश्वरके
आधीन हैं । मध्वको पूर्णप्रज्ञ अथवा आनन्दतीर्थ भी कहा जाता है। मध्वका समय ईसाकी १२ वीं शताब्दी है ।१
शंकरका मायावाद
कुछ लोगोंका कहना कि शंकराचार्यने मायावादके सिद्धांतोंकी रचना बौद्धोंके विज्ञानवाद और शून्य-
वादके आधारसे की है । बादरायणके ब्रह्मसूत्रोंमें, भगवद्गीतामें और वृहदारण्यक, छान्दोग्य आदि उपनिषदोंमें
मायावादके सिद्धांत नहीं पाये जाते, विज्ञानभिक्षु शंकराचार्यको ‘प्रच्छन्नबौद्ध’ कहकर उल्लेख करते हैं, पद्म-
पुराणमें ‘मायावाद’ को असत् शास्त्र कहा गया है, तथा मध्व शून्यवादियोंके शून्य और मायावादियोंके ब्रह्मको
एक बताते हैं । इससे मालूम होता है कि शंकर अपने परमगुरु गौड़पादके सिद्धांतोंसे प्रभावित थे । प्रोफेसर
दासगुप्तके अनुसार ये गौड़पाद स्वयं बौद्ध विद्वान थे, और उपनिषदों और बुद्धके सिद्धांतोंमें भेद नहीं समझते
थे । गौड़पादने माण्डूक्य उपनिषद्के ऊपर माण्डूक्यकारिका टीका लिखकर बौद्ध और औपनिषदिक सिद्धांतोंका
समन्वय किया है । आगे चलकर गौड़पादके सिद्धांतोंका उनके शिष्य शंकराचार्यने प्रसार किया२ । प्रोफेसर
ध्रुव इस मतसे सहमत नहीं हैं । ध्रुवका मत है कि हीनयान बौद्धदर्शन ब्राह्मणदर्शनसे प्रभावित होकर ही
महायान बौद्धदर्शनके रूपमें विकसित हुआ है ।३
१. विशेषके लिये देखिये नर्मदाशंकरका हिंदतत्त्वज्ञाननो इतिहास उत्तरार्ध पृ० १७४-१८८ ।
२. गौड़पाद आचार्यकी माण्डूक्यकारिका और नागार्जुनकी माध्यमिककारिकाकी तुलनाके लिये देखिये प्रोफे-
सर दासगुप्तकी A History of Indian Philosohpy Vol. I पृ. ४२३ से ४२८ ।
३. देखिए प्रोफेसर ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी पृ० ६२ भूमिका ।
चार्वाक परिशिष्ट ( छ )
( श्लोक २० )
चार्वाक मत
चार्वाक पुण्य-पाप आदि परोक्ष वस्तुओंको स्वीकार नहीं करते, इसलिये इन्हें चार्वाक कहते हैं ।१
सुन्दर वाणी होनेके कारण भी ये लोग चार्वाक कहे जाते हैं ।२ चार्वाक सामान्य लोगोंके समान आचरण
करनेके कारण लोकायत अथवा लोकायतिक कहे जाते हैं ।३ पुण्य पापको न स्वीकार करनेके कारण इन्हें
नास्तिक कहा गया है ।४ आत्माको न माननेके कारण इन्हें अक्रियावादी कहा गया है । चार्वाक वृहस्पतिके
शिष्य थे । वृहस्पतिने देवताओंके शत्रु असुरोंको मोहित करनेके लिये चार्वाक मतकी सृष्टि की थी । धूर्त
चार्वाक और सुशिक्षित चार्वाकके भेदसे चार्वाक दो प्रकारके बताये गये हैं । धूर्त चार्वाक पृथिवी, अप्, तेज
और वायु इन चार भूतोंको छोड़कर आत्माको अलग पदार्थ नहीं मानते । सुशिक्षित चार्वाक शरीरसे भिन्न
आत्माका अस्तित्व मानते हैं, परन्तु उनके मतमें यह आत्मा शरीरके नाश होनेके साथ ही नष्ट हो जाता है ।
कोई चार्वाक चतुर्भूत रूप जगत्को न मानकर आकाशको पांचवां भूत स्वीकार करके संसारको पंचभूत
रूप मानते हैं । "चार्वाक मतके साधु कापालिक होते हैं । ये शरीरपर भस्म लगाते हैं, और ब्राह्मणसे लेकर
अंत्यज तक किसी भी जातिके हो सकते हैं । ये मद्य और मांसका भक्षण करते हैं, व्यभिचार करते हैं, प्रत्येक
वर्ष इकट्ठे होकर स्त्रियोंसे क्रीड़ा करते हैं, तथा कामको छोड़कर और कोई धर्म नहीं मानते ।"५ परयोगी
आनंदघनजीने चार्वाक मतकी उपमा जिनेन्द्रकी कोखसे दी है ।६
१. चर्वन्ति, भक्षयन्ति तत्त्वतो न मन्यन्ते पुण्यपापादिकं परोक्षं वस्तुजातमिति चार्वाकाः । गुणरत्नसूरि ।
२. चारुः लोकसंमतः वाकः वाक्यम् यस्य सः । वाचस्पत्यकोश ।
३. लोकाः निर्विचाराः सामान्यलोकास्तद्वदाचरन्ति स्मेति लोकायता लोकायतिका इत्यपि । गुणरत्न ।
४. नास्ति पुण्यं पापमिति मतिरस्य नास्तिकः । हेमचन्द्र ।
यह ध्यान देने योग्य है कि वैदिक पुराणोंमें अद्वैत वेदान्तके प्रतिपादक शंकराचार्यको चार्वाक,
जैन और बौद्धोंकी तरह नास्तिक बताकर शंकरके मायावादको असत् शास्त्र कहा है—
मायावादी वेदान्ती ( शंकर भारती ) अपि नास्तिक एव पर्यवसाने संपद्यते इति ज्ञेयम् ।
अत्र प्रमाणानि सांख्यप्रवचनभाष्योदाहृतानि पद्मपुराणवचनानि यथा—
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमेव च ।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ॥
अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयंल्लोकगर्हितम् ।
कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥
सर्वकर्मपरिभ्रंशान्नैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते ।
परमात्मजीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥
सांख्यप्रवचन भाष्य १-१ भूमिका । न्यायकोश पृ० ३७२ ।
५. गुणरत्न षड्दर्शनसमुच्चय टीका ।
६. "लोकायतिक कूख जिनवरनी, अंश-विचार जो कीजे;
तत्त्व-विचार सुधारस धारा, गुरुगम विण केम पीजे" श्रीनेमिनाथजीनुं स्तवन, गा० ४ ।
पं० बेचनदास-जैनदर्शन पृ० ८० भूमिका।
३५० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
चार्वाकों के सिद्धांत
चार्वाक आत्माको नहीं मानते । इनके मतमें चैतन्य विशिष्ट देहको ही आत्मा माना गया है । जिस
समय भौतिक शरीरका नाश होता है, उस समय आत्माका भी नाश हो जाता है, अतएव कोई परलोक-
जानेवाली आत्मा भिन्न वस्तु नहीं है । इसलिये चार्वाकोंका सिद्धांत है कि जब तक जीना है, तब तक खूब
आनंदके साथ जोवनको यापन करना चाहिये, क्योंकि मरनेके बाद फिरसे जीवका जन्म नहीं होता ।
चार्वाक लोग धर्म, अधर्म और पुण्य, पापको नहीं मानते । इनके मतमें एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । इसलिये
इनके मतमें संसारसे बाह्य कोई स्वर्ग, नरक, मोक्ष और ईश्वर जैसी वस्तु नहीं है । वास्तवमें कांटा लग जाने
आदिसे उत्पन्न होनेवाला दुख ही नरक है, लोकमें प्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहका छोड़ना ही मोक्ष है, और
स्त्रीका आलिंगन करना ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है । चार्वाक वेदको नहीं मानते, तथा याज्ञिक हिंसाका और
श्राद्ध आदि कर्मोंका घोर विरोध करते हैं ।¹
चार्वाक साहित्य
चार्वाक साहित्यका कोई भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं है । इसलिये चार्वाकोंके सिद्धांतोंके प्रामाणिक ज्ञान
प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं है । आजीविक आदि सम्प्रदायोंकी तरह चार्वाक मतका थोड़ा बहुत ज्ञान जैन,
बौद्ध और ब्राह्मणोंके ग्रंथोंसे होता है । चार्वाक सिद्धांतोंके आद्य प्रणेता बृहस्पति कहे जाते हैं । गुणरत्न और
जयन्तभट्ट दो चार्वाकसूत्रोंका उल्लेख करते हैं, इससे जान पड़ता है कि बृहस्पतिने चार्वाकशास्त्रकी रचना
सूत्ररूपमें की थी । शान्तरक्षित तत्त्वसंग्रहमें चार्वाक सम्प्रदायके प्ररूपक कम्बलाश्वतरके एक सूत्रका उल्लेख
करते हैं ।² विद्वानोंका कहना है कि बौद्ध सूत्रोंमें वर्णित अजितकेशकम्बली और कम्बलाश्वतर दोनों एक ही
व्यक्ति थे ।³ इनका समय ईसवी सन् पूर्व ५५०-५०० बताया जाता है । चार्वाकके सिद्धांतोंका संक्षिप्त वर्णन
जयन्तकी न्यायमंजरी, माधवका सर्वदर्शनसंग्रह, गुणरत्नकी षड्दर्शनसमुच्चय टीका और महाभारत आदि
ग्रंथोंमें पाया जाता है ।
१. लोकायत दर्शनकी देनके लिए देखिये जगदीशचन्द्र जैन, भारतीय तत्त्व चिन्तन, पृ० ५९-६१ ।
२. कायादेव ततो ज्ञानं प्राणापानाद्यधिष्ठितात् ।
युक्तं जायत इत्येतत्कम्बलाश्वतरोदितम् ॥
तथा च सूत्रम्-कायादेवेति । तत्त्वसंग्रह श्लोक १८६४ पंजिका ।
३. तत्त्वसंग्रह, अंग्रेजी भूमिका ।
विविध परिशिष्ट ( ज )
श्लो १ पृ० ३ पं० १६ आजीविक
भारतके अनेक सम्प्रदायोंकी तरह आजीविक सम्प्रदायका नाम भी आज निश्शेष हो चुका है ।
आजीविक मतके माननेवालोंके क्या सिद्धांत थे, इस मतके कौन-कौन मुख्य आचार्य थे, उन्होंने किन-किन
ग्रंथोंका निर्माण किया था, आदिके विषयमें प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये आज कोई भी साधन नहीं
हैं । इसलिये आजीविक सम्प्रदायके विषयमें जो कुछ थोड़े बहुत सत्य अथवा अर्धसत्य रूपमें जैन और बौद्ध
शास्त्रोंमें उल्लेख मिलते हैं, हमें उन्हींसे सन्तोष करना पड़ता है । ई० स० पूर्व ३९१ में अशोकका आजीविकों-
को एक गुफा प्रदान करनेका उल्लेख मिलता है । ईसाकी ६ ठी शताब्दीके विद्वान वराहमिहिर अपने वृहज्जा-
तकमें आजीविकोंको एकदण्डी कहकर उल्लेख करते हैं । ई० स० ५७६ में शीलांक, ई० स० ५९० में हला-
युध आजीविक और दिगम्बरोंको, और मणिभद्र आजीविक और बौद्धोंको पर्यायवाची मानकर उल्लेख करते
हैं, तथा ई० स० १२३५ में राजराज नामके चोल राजाके शिलालेखोंपरसे आजीविकोंके ऊपर कर लगानेका
अनुमान किया जाता है । १ जैन और बौद्ध साहित्यमें नंदवच्छ, किससंकिच्च और मख्खलि गोशाल इन तीन
आजीविक मतके नायकोंका कथन आता है । मख्खलिगोशाल बुद्ध और महावीरके समकालीन प्रतिस्पर्धियोंमें
से माने जाते हैं । भगवती आदि जैन आगमोंके अनुसार, गोशाल महावीरकी तपस्याके समय महावीरके शिष्य
बनकर छह वर्ष तक उनके साथ रहे, और वादमें महावीरके प्रतिस्पर्धि बनकर आजीविक सम्प्रदायके नेता
बने । गोशालक भाग्यवादी थे । इनके मतमें सम्पूर्ण जीव अवश, दुर्बल, निर्वीर्य हैं, और भवितव्यताके वशमें
हैं । जीवोंके संक्लेशका कोई हेतु नहीं है, बिना हेतु और बिना प्रत्ययके प्राणी संक्लेशको प्राप्त होते हैं । गोशा-
लक आत्माको, पुनर्जन्मको और जीवके मुक्तिसे लौटनेको स्वीकार करते थे । उनके मतमें प्रत्येक पदार्थमें
जीव विद्यमान हैं । गोशालकने जीवोंको एकेन्द्रिय आदिके विभागमें विभक्त किया था, वे जीव हिंसा न करने-
पर ज़ोर देते थे, मुख्य योनि चौदह लाख मानते थे । भिक्षाके वास्ते पात्र नहीं रखते थे, हाथमें भोजन करते
थे, मद्य, मांस, कंदमूल और उद्दिष्ट भोजनके त्यागी होते थे, ओर नग्न रहा करते थे । आजीविक लोगोंका
दूसरा नाम तेरासिय ( त्रैराशिक ) भी है । ये लोग प्रत्येक वस्तुको सत्, असत् और सदसत् तीन तरहसे
कहते थे, इसलिये ये तेरासिय कहे जाने लगे । २
श्लोक १५ पृ० पं० संवर-प्रतिसंवर
क्षेमेन्द्रने सांख्यतत्त्वविवेचनमें संवर ( संचर ) और प्रतिसंवर ( प्रतिसंचर ) का लक्षण निम्न प्रकार-
से किया है —
संचर—
साम्यवस्थागुणानां या प्रकृति सा स्वभावतः ।
कालक्षोभेण वैषम्यात् क्षेत्रे परयुते पुरा ॥
बुद्धितत्त्वञ्चाहंकारस्त्रिविधोऽपि व्यजायत ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि महाभूतानि च क्रमात् ॥
एवं क्रमेणैवोत्पत्तिः संचरः परिकीर्तितः ।
१. प्रोफेसर होर्नल ईसाकी छठी शताब्दीतक आजीविकदर्शनके स्वतंत्र आचार्योंके होनेका अनुमान करते हैं ।
२. प्रोफेसर याकोबी और प्रोफेसर बरुआ आदि विद्वानोंके अनुसार महावीरके जैनधर्मके सिद्धान्तोंके ऊपर
गोशालके सिद्धान्तोंका प्रभाव पड़ा है। विशेषके लिये देखिये प्रोफेसर बरुआकी Pre-Buddhist Indian
३५२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
प्रतिसंचर—
व्युत्क्रमेणैव लीयन्ते तन्मात्रे भूतपंचकम् ।
तन्मात्राणीन्द्रियाणि अहंकारे विलीयते ।
अहंकारोऽथ बुद्धौ तु बुद्धिरव्यक्तसंज्ञके ।
अव्यक्तं न क्वचिल्लीनं प्रतिसंचर इति स्मृतः ।
श्लोक २० पृ० पं० क्रियावादी-अक्रियावादी ।
क्रियावादी जीवोंके अपने अपने कर्मोंके अनुसार फल मिलनेके सिद्धान्तको मानते हैं । अक्रियावादियोंका
सिद्धांत इस सिद्धांतसे बिलकुल उलटा है । जैन और बौद्ध आगम ग्रंथोंमें पकुधकात्यायन और मख्खलिगोशालको
अक्रियावादी कहकर उल्लेख किया गया है । निगंठ नातपुत्त बुद्धको क्रियावाद और अक्रियावाद दोनों सिद्धा-
न्तोंके माननेवाला कहते हैं ।¹ प्रोफेसर बेनीमाधव बरुआ आदि विद्वानोंका मत हैं कि जैन धर्मका मौलिक नाम
किरियावाद (क्रियावाद) था । क्रियावादी महावीर अक्रियावादी और अज्ञानवादियोंका विरोध करते थे,
पुण्य-पाप, आस्रव-बंध, निर्जरा-मोक्षको स्वीकार करते थे, और पुरुषार्थको प्रधान ²मानते थे । जैन ग्रंथोंमें
परमतवादियोंके ३६३ मतोंमें क्रियावादी और अक्रियावादियोंके मतोंको गिनाया गया है । क्रियावादी आत्माको
मानते हैं । इनके मतमें दुःख स्वयंकृत है, अन्यकृत नहीं । इनके कौत्कल, कांडविद्धि, कौशिक, हरिशमश्रु,
मांछयिक, रोमस, हारित, मुंड और अश्वलायन आदि १८० भेद हैं । अक्रियावादी प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्तिके
पश्चात् ही पदार्थका नाश मानते हैं । अक्रियावादी आत्माके अस्तित्वको नहीं मानते, और अपने माने हुए
तत्त्वोंका निश्चित रूपसे प्ररूपण नहीं कर सकते । राजवार्तिककारने अक्रियावादियोंके मरीच, कुमार, कपिल,
उलूक, गार्ग्य, व्याघ्रभूति, वाढलि, मौद्गलायन, माठर प्रभृति ४० भेद माने हैं ।³
philosophy भाग ३ अ. २१; प्रो. होर्नेले—Encyclopaedia of Religion and Ethics
जि० पृ० २२९ । आजीविकोंकी गणना पाँच प्रकारके श्रमणोंमें की गई है । विशेषके लिये देखिये जगदी-
शचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ. १२-१७, ४१९-२१
१. तेव्हां नातपुत्त म्हणाला, 'तूं क्रियावादी असून अक्रियावादी अशा श्रमण गोतमाला भेटण्याची कां इच्छा
करितोस ?' तरीहि सिंह गेलाच. तेव्हां बुद्धानें त्यास आपणांस क्रियावादी व अक्रियावादी ही दोन्हीं
विशेषणें कशीं लागू पडतील हें अनेक प्रकारांनीं सांगितलें (महावग्ग ६-३१ अंगत्तर ८-१२) देखिये
राजवाडेका दीघनिकाय भाग १ मराठी भाषांतर पृ० १०० ।
२. देखिये Pre-Buddhist Indian Philosophy.
३. तथा देखिये, जगदीशचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्यमें भारतीय समाज, पृ० ४२१-२२ ।
अनुक्रमणिका
स्याद्वादमंजरीके अवतरण( १ )
स्याद्वाद मंजरीमें निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रन्थकार ( २ )
स्याद्वाद मंजरीके श्लोकोंकी सूची ( ३ )
स्याद्वाद मंजरीके शब्दोंकी सूची ( ४ )
स्याद्वाद मंजरीके न्याय ( ५ )
स्याद्वाद मंजरींके विशेष शब्दोंकी सूची ( ६ )
स्याद्वाद मंजरीके संस्कृत, तथा हिन्दी-अनुवादकी टिप्पणियोंके ग्रन्थ ओर ग्रन्थकार( ७ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची ( ८ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची.(९ )
अयोगव्यवच्छेदिकाके टिप्पणीके ग्रन्थ ( १० )
परिशिष्टोंके विशेष शब्दोंकी सूची ( ११ )
परिशिष्टोंमें उपयुक्त ग्रंथोंकी सूची( १२ )
संपादनमें उपयुक्त ग्रंथोंकी सूची ( १३ )
स्याद्वादमंजरीके अवतरण ( १ )
श्लोक १
ज्ञानिनो धर्मतीर्थस्य कर्तारः परमं पदम् । पृष्ठ
गत्वागच्छन्ति भूयोऽपि भवं तीर्थनिकारतः ॥ [ ] ४
सर्वं पश्यतु वा मा वा तत्त्वमिष्टं तु पश्यतु ।
कीटसंख्यापरिज्ञानं तस्य नः क्वोपयुज्यते ॥
तस्मादनुष्ठानगतं ज्ञानमस्य विचार्यताम् ।
प्रमाणं दूरदर्शी चेदेते गृध्रानुपास्महे ॥ [ वैशेषिकवचन ] ४
जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ।।
[ आचारांग १-३-४-१२२ ] ४
एको भावः सर्वथा येन दृष्टः सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टा एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥ [ ] ५
अभ्रादित्वात् ( अभ्रादिम्यः ) [ हैमशब्दानुशासन ७-२-४६ ] ७
शाखादेर्यः [ हैमशब्दानुशासन ७-१-११४ ] ८
श्रीवर्धमानाभिधमात्मरूपम् [ अयोगव्यवच्छेदिका १ ] ९
श्लोक २
तादर्थ्ये चतुर्थी [ हैमशब्दानुशासन २-२-५४ ] १०
स्पृहेर्येप्स्यं वा [ हैमशब्दानुशासन २-२-२६ ] १०
श्लोक ३
अदसस्तु विप्रकृष्टे [ हैमव्याकरण संग्रहश्लोक ] ११
- रुसउ वा परो मा वा विसं वा परियत्तऊ ।
भासियन्वा हिया भासा सपक्खगुणकारिया ॥
[ हेमचन्द्र-श्रेणिकचरित्र २-३२ ] १२
न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यैकान्ततो हितश्रवणात् ।
ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति ॥
[ वाचकमुख्य उमास्वाति-तत्त्वार्थभाष्यकारिका २९ ] १३
श्लोक ४
गम्ययपः कर्मधारे [ हैमशब्दानुशासन २-२-७४ ] १४
श्लोक ५
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-२६ ] १५
अवकाशदमाकाशम् [ उत्तराध्ययन-भावविजयगणिवृत्ति २८-९ ] १८ - ये अवतरण सम्पूर्णतया उपलब्ध न होकर कुछ अंशमें ही उपलब्ध होते हैं ।
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ३
पृष्ठ
अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा यद्विरुद्धधर्माध्यासः कारणभेदश्चेति [ ] १८
अप्रच्युतानुत्पन्नस्थिरैकरूपं नित्यम् [ ] १९
तद्भावाव्ययं नित्यं [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-३० ] १९
- द्रव्यं पर्यायवियुतं पर्याया द्रव्यवर्जिताः ।
क्व कदा केन किंरूपा दृष्टा मानेन केन वा ॥
[ सन्मतितर्क १-१२ ] १९ - त्रिविधः खल्वयं धर्मिणः परिणामो धर्मलक्षणावस्थारूपः ।
.... इत्युभयमुपपन्नमिति [ योगसूत्र ३-१३ व्यासभाष्य ] २१
सा तु द्विविधा नित्याऽनित्या च....त्वनित्या
[ प्रशस्तपादभाष्य-पृथिवी निरूपण ] २२
शब्दकारणत्ववचनात् संयोगविभागी
[ प्रशस्तपादभाष्य आकाशनिरूपण ] २२
यो यत्रैव स यत्रैव यो यदैव तदैव सः ।
न देशकालयोर्व्याप्तिर्भावानामिह विद्यते ॥ [ ] २५
भागे सिंहो नरो भागे योऽर्थो भागद्वयात्मकः ।
तमभागं विभागेन नरसिंहं प्रचक्षते ॥ [ ] २७
श्लोक ६
सर्वे गत्यर्था ज्ञानार्थाः [ हेमहंसगणि-हेमचन्द्रव्याकरण न्याय ४४ ] ३०
ईश्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा ।
अन्यो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ॥
[ महाभारत वनपर्व ] ३०
अपगतमले हि मनसि...........शूलमभव्यस्य
[ कादम्बरी पूर्वार्ध पृ. १०३ ] ३१
सद्धर्मबीजवपनानघकौशलस्य
यल्लोकबान्धव तवापि खिलान्यभूवन् ।
तन्नाद्भुतं खगकुलेष्विह तामसेषु
सूर्यांशवो मधुकरीचरणावदाताः ॥
[ सिद्धसेन-द्वात्रिंशिका २-१३ ] ३२
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतः पाणिरुत विश्वतः पात् ।
[ शुक्लयजुर्वेद संहिता १७-१९ ] ३४
किरणा गुणा न दव्वं तेसिं पयासो गुणो न वा दव्वं ।
जं नाणं आयगुणो कहमदव्वो स अन्नत्थ ॥
गन्तूण न परिच्छिन्दइ नाणं गेयं तयम्मि देसम्मि ।
आयत्थं चिय नवरं अचित्तसत्ती उ विण्णेयं ॥
लोहोवलस्स सत्ती आयत्था चेव भिन्नदेसंपि ।
लोहं आगरिसंती दीसइ इह कज्जपच्चक्खा ॥
एवमिह नाणसत्ती आयत्था चेव हंदि लोगंतं ।
जइ परिच्छिदइ सम्मं को णु विरोहो भवे तत्थ ॥
[ हरिभद्र—धर्मसंग्रहणी ३७०-३७३ ] ३६
४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
पृष्ठ
न हिंस्यात् सर्वभूतानि [ छान्दोग्य उपनिषद् अ. ८ ] ३८
षट्शतानि नियुज्यन्ते पशूनां मध्यमेऽहनि ।
अश्वमेधस्य वचनात् न्यूनानि पशुभिस्त्रिभिः ॥ [ ] ३८
अग्निषोमीयं पशुमालभेत [ ऐतरेय आरण्यक ६-१३ ] ३८
सप्तदश प्राजापत्यान् पशुनालभेत [ तैत्तिरीय संहिता १-४ ] ३८
नानृतं ब्रूयात् [ ] ३८
ब्राह्मणार्थेऽनृतं ब्रूयात् [ ] ३८
- न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । ....
प्राणात्यये सर्वधनापहारे पंचानृतान्याहुरपातकानि ॥
[ वसिष्ठधर्मसूत्र १६-३६ ] ३८
परद्रव्याणि लोष्ठवत् [ ] ३८ - यद्यपि ब्राह्मणो हठेन.........स्वं ददाति
[ मनुस्मृति १-१०१ ] ३८
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति [ देवी भागवत ] ३८
अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् ।
दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसन्ततिम् ॥ [ आपस्तम्भ ] ३९
श्लोक ७
आवर्जिता किंचिदिव स्तनाभ्यां [ कुमारसंभव ३-५४ ] ४३
उद्वृत्तः क इव सुखावहः परेषांम् [ शिशुपालवध ] ४३
प्राप्तानामेव प्राप्तिः समवायः [ ] ४३
अव्यभिचारी मुख्योऽविकलोऽसाधारणोऽन्तरंगश्च ।
विपरीतो गौणोऽर्थः सति मुख्ये धीः कथं गौणे ॥
[ ] ४६
ईहाद्याः प्रत्ययभेदतः [ हैमलिंगानुशासन पुंस्त्री. ५ ] ४७
श्लोक ८
पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशः कालो दिगात्मा मन इति नव द्रव्याणि
[ वैशेषिकसूत्र १-१-५ ] ४८
रूपरसगंधस्पर्शसंख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे
बुद्धिः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नश्च
[ वैशेषिकसूत्र १-१-६ तथा प्रशस्तपादभाष्य ] ४८
अन्तेषु भवा अन्त्याः............तेऽन्त्या विशेषाः
[ प्रशस्तपादभाष्य पृ. १६८ ] ५० - द्रव्यगुणकर्मसु सा सत्ता [ वैशेषिक सूत्र १-२-७ ] ५१
व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानवस्थितिः ।
रूपहानिरसंबन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥
[ उदयनाचार्य—किरणावलि द्रव्यप्रकरण पृ. १६१ ] ५१
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सर्वगतत्वेऽप्यात्मनो देहप्रदेशे ज्ञातृत्वम् । नान्यत्र शरीरस्योपभोगायतनत्वात् ।
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अन्यथा तस्य वैयर्थ्यात् [ श्रीधर—न्यायकन्दली ] ६८
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*नानात्मनो व्यवस्थातः [ वैशेषिकसूत्र ३-२-२० ] ६९
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आकाशोऽपि सदेशः सकृत्सर्वमूर्ताभिसंबंधार्हत्वात्
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[ द्रव्यालंकार ] ७१
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स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ५
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न हि वै सशरीरस्य प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति । पृष्ठ
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अशरीरं वा वसन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः ॥
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[ छान्दोग्य उपनिषद् ८-१२ ] ५३
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यावदात्मगुणाः सर्वे नोच्छिन्ना वासनादयः ।
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`तावदात्यन्तिकी दुःखव्यावृत्तिर्न विकल्प्यते
६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्लोक १० पृष्ठ
ईयकारके [ हैमशब्दानुशासन ३-२-१२१ ] ७७
बहुभिरात्मप्रदेशैरधिष्ठाता देहावयवा मर्माणि [ ] ७७
गुणादस्त्रियां न वा [ हैमशब्दानुशासन २-२-७७ ] ७७
लब्धिख्यात्यर्थिना तु स्याद् दुःस्थितेनामहात्मना ।
छलजातिप्रधानो यः स विवाद इति स्मृतः ॥
[ हरिभद्रसूरि-अष्टक १२-४ ] ७७
अभ्युपेत्य पक्षं यो न स्थापयति स वैतण्डिक इत्युच्यते
[ उद्योतकर—न्यायवार्तिक १-१-१ ] ७७
दुःशिक्षितकुतर्कशलेशवाचालितानाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपमण्डिताः ॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्प्रतारितः ।
मा गादिति छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः । [ ] ७८
प्रमाणप्रमेय········निःश्रेयसाधिगमः
[ गौतम न्यायसूत्र १-१-१ ] ७८
अर्थोपलब्धिहेतुः प्रमाणम् [ वात्स्यायनभाष्य ] ७९
सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम् [ भासर्वज्ञ—न्यायसार ] ७९
स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम् [ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार और प्रमाणमीमांसा ] ७९
प्रवृत्तिदोषजनितं सुखदुःखात्मकं मुख्यं फलं तत्साधनं तु गौणम्
[ जयन्त—न्यायमंजरी ] ८०
द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु प्रमेयम् [ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार ] ८०
साधर्म्यवैधर्म्यं........कार्यसमाः [ गौतम न्यायसूत्र ५-१-१ ] ८१
श्लोक ११
महोक्षं वा महाजं वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत्
[ याज्ञवल्क्यस्मृति आचार १०९ ] ८८
द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु ।
औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पंच तु ॥
[ मनुस्मृति ३—२६८ ] ८८
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्
[ चाणक्य १—७ ] ८८
संबद्धं वर्तमानं च गृह्यते चक्षुरादिना
[ मी. श्लोकवार्तिक ४-८४ ] ९०
पुढवाइयाण जहवि हु होइ विणासो जिणालयाहिन्तो ।
तव्विसया विसुद्धदिट्ठिस्स नियमओ अतिय अणुकंपा ॥
एयाहिंतो बुद्धा विरया रक्खन्ति जेण पुढवाई ।
इत्तो निव्वाणगया अबाहिया अभवविमाणं ॥
रोगीसिरावेहो इव सुविज्जिकिरिया व सुप्पुउत्ताओ ।
परिणामसुंदरच्चिय चिट्ठा से वाहजोगे वि ॥
[ जिनेश्वरसूरि-पंचलिंगी ५८, ५९, ६० ] ९१
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ७
पृष्ठ
श्वेत वायव्यमजमालभेत भूतिकामः [ शतपथ ब्राह्मण ] ९१
ओषध्यः पशवो वृक्षास्तिर्यंचः पक्षिणस्तथा ।
यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युच्छ्रितं पुनः ॥
[ मनुस्मृति ५–४० ] ६२
यूपं छित्वा पशून् हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् ।
यद्येवं गम्यते स्वर्गे नरके केन गम्यते ॥ [ ] ९२
अचिन्त्यो हि मणिमन्त्रौषधीनां प्रभावः [ ] ९२
आरोग्गबोहिलाभं समाहिवरमुत्तमं दिंतु [ आवश्यक २४–६ ] ९३
देवोपहारव्याजेन यज्ञव्याजेन येऽथवा ।
घ्नन्ति जन्तून् गतघृणा घोरां ते यान्ति दुर्गतिम्
[ | ९४
अन्धे तमसि मज्जामः पशुभिर्ये यजामहे ।
हिंसा नाम भवेद्धर्मो न भूतो न भविष्यति ॥ [ | ९४
अग्निर्ममितस्माद्विक्षाकृतादेनसो मुञ्चतु [ ] ९४
ज्ञानपालिपरिक्षिप्ते ब्रह्मचर्यदयाम्भसि ।
स्नात्वाऽतिविमले तीर्थे पापकंकापहारिणी ॥
ध्यानाग्नौ जीवकुण्डस्थे दममारुतदीपिते ।
असत्कर्मसमित्क्षेपैरग्निहोत्रं कुरुत्तमम् ॥
कषायपशुभिर्दुष्टैर्धर्मकामार्थनाशकैः ।
शममन्त्रहुतैर्यज्ञं विधेहि निहितं बुधैः ॥
प्राणिघातात् तु यो धर्ममीहते मूढमानसः ।
स वाञ्छति सुधावृष्टिं कृष्णाहिमुखकोटरात् ॥ [ महाभारत ] ९४
चतुर्थ्यन्तं पदमेव देवता [ ] ९५
शब्देतरत्वे युगपद् भिन्नदेशेषु यष्टृषु ।
न सा प्रयाति सांनिध्यं मूर्तत्वादस्मदादिवत् ॥ [ मृगेन्द्र ] ९५
अग्निमुखा वै देवाः [ आश्वलायन गृह्यसूत्र ४ ] ९५
मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत् तृप्तिकारणम् ।
तन्निर्वाणप्रदीपस्य स्नेहः संवर्धयेच्छिखाम् ॥ [ ] ९७
अतीन्द्रियाणामर्थानां साक्षाद् द्रष्टा न विद्यते
नित्येभ्यो वेदवाक्येभ्यो यथार्थत्वविनिश्चयः ॥ [ ] ९८
ताल्वादिजन्मा ननु वर्णवर्गो वर्णात्मको वेद इति स्फुटं च ।
पुंसश्च ताल्वादि ततः कथं स्यादपौरुषेयोऽयमितिप्रतीतिः ॥
[ ] ९९
अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः [ तैत्तिरीय संहिता ] ९९
न हिंस्यात् सर्वभूतानि [ छान्दोग्य अ. ८ ] ९९
सव्वत्थसंजमं संजमाओ अप्पाणमेव रक्खिज्जा ।
मुच्चइ अइवायाओ पुणो विसोही नयाऽविरई ॥ [ ] १००
उत्पद्यते हि सावस्था देशकालमयान् प्रति ।
यस्यामकार्यं कार्यं स्यात् कर्म कार्यं तु वर्जयेत् ॥
[ ] १००
८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
कालाविरोधि निर्दिष्टं ज्वरादौ लङ्घनं हितं । पृष्ठ
ऋतेऽनिलश्रमक्रोधशोककामकृतज्वरान् ॥ [ ] १०१
पूजया विपुलं राज्यमग्निकार्येण संपदः ।
तपः पापविशुद्धयर्थं ज्ञानं ध्यानं च मुक्तिदम् ॥
[ व्यास-महाभारत ] १०१
श्लोक १२
- सत्संप्रयोगे इन्द्रियबुद्धिजन्मलक्षणं ज्ञानं, ततोऽर्थप्राकट्यं, तस्मादर्था-
पत्तिः, तया प्रवर्तकज्ञानस्योपलंभः [ जैमिनीसूत्र १-१-४५ ] १०७
श्लोक १३
ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः ।
[ रघुवंश १०-६ ] १११
सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तत्पश्यति कश्चन ॥
[ छान्दोग्य उपनिषद् ३-१४ ] ११२
आहुर्विधातृ प्रत्यक्षं न निषेद्धृ विपश्चितः ।
नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण प्रबाध्यते ॥ [ ] ११३
अस्ति ह्यालोचनाज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम् ।
बालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥
[ मी. श्लोकवार्तिक प्रत्यक्षसूत्र ११२ ] ११४
यदद्वैतं तद् ब्रह्मणो रूपं [ ] ११४
प्रत्यक्षाद्यवतारः स्याद् भावांशो गृह्यते यदा ।
व्यापारस्तदनुत्पत्तेरभावांशे जिघृक्षते ॥
[ मी. श्लोकवार्तिक अभाव. १७ ] ११५
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यं ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥
[ ऋग्वेद पुरुषसूक्त ] ११५
यदेजति यन्नैजति यद्दूरे यदन्तिके ।
यदन्तरस्य सर्वस्य यदुत सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
[ ईशावास्य उपनिषद् ] ११६ - श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः अनुमन्तव्यो
[ बृहदारण्यक उपनिषद् ] ११६
सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तत् पश्यति कश्चन ॥
[ छान्दोग्य ३-१४ ] ११६ - निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत् खरविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वेन विशेषास्तद्वदेव हि ॥
[ मी. श्लोकवार्तिक आकृति १० ] ११७
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) ९
हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेद् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययोः । पृष्ठ
हेतुना चेद् विना सिद्धिद्वैतं वाङ्मात्रतो न किम् ॥
[ आप्तमीमांसा २-२६ ] ११८
कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं विरुध्यते ।
विद्याऽविद्याद्वयं न स्याद्बन्धमोक्षद्वयं तथा ॥
[ आप्तमीमांसा २-२५ ] ११८
श्लोक १४
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥
[ भर्तृहरि-वाक्यपदीय १-१२४ ] १२०
एतासु पंचस्ववभासनीपु प्रत्यक्षबोधे स्फुटमङ्गुलीपु ।
साधारणं रूपमवेक्षते यः शृंगं शिरस्यात्मन ईक्षते सः ॥
[ अशोक-सामान्यदूषणदिक् प्रसारिता ] १२२
अभिहाणं अभिहेयाउ होई भिण्णं अभिण्णं च ।
खुरअग्गिमोयगुच्चारणम्मि जम्हा उ वयणसवणाणं ॥ १२८
नवि छेओ नवि दाहो ण पूरणं तेण भिन्नं तु ।
जम्हा य मोयगुच्चारणम्मि तत्थेव पच्चओ होई ॥
न य होइ स अन्नत्थे तेण अभिन्नं तदत्थाओ ।
[ भद्रबाहु ] १२९
विकल्पयोनयः शब्दा विकल्पा शब्दयोनयः ।
कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपि ॥ [ ] १२९
सर्वमस्ति स्वरूपेण पररूपेण नास्ति च ।
अन्यथा सर्वसत्त्वं स्यात् स्वरूपस्याप्यसंभवः ॥ [ ] १३०
जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ ।
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ ॥
[ आचारांग १-३-४-१२२ ] १३०
एको भावः सर्वथा येन दृष्टः
सर्वे भावाः सर्वथा तेन दृष्टाः ।
सर्वे भावाः सर्वथा येन दृष्टाः
एको भावः सर्वथा तेन दृष्टः ॥ [ ] १३०
स्वाभाविकसामर्थ्यसमयाभ्यामर्थबोधनिबन्धनं शब्दः
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार ४-११ ] १३२
अपोहः शब्दलिंगाम्यां न वस्तु विधिनोच्यते । [ दिङ्नाग ] १३३
श्लोक १५
तस्मान्न बध्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित् ।
संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः ॥
[ सांख्यकारिका ६२ ] १३५
१० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या प्रकृतिविकृतयः सप्त । पृष्ठं
षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥
[ सांख्यकारिका ३ ] १३६
अमूर्तश्चेतनो भोगी नित्यः सर्वगतोऽक्रियः
अकर्ता निर्गुणः सूक्ष्म आत्मा कापिलदर्शने ॥ [ ] १३७
शुद्धोपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति तमनुपश्यन्
अतदात्मापि तदात्मक इव प्रतिभासते [ व्यासभाष्य ] १३७
सर्वो व्यवहर्ता आलोच्य............बुद्धेरसाधारणो व्यापारः
[ सांख्यतत्त्वकौमुदी २३ ] १३७
बुद्धिदर्पणसंक्रान्तमर्थप्रतिबिम्बकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति ।
तदेव भोक्तृत्वमस्य न त्वात्मनो विकारापत्तिः
[ वादमहार्णव ] १३७
विविक्ते दृक्परिणतौ बुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥ [ आसुरि ] १३८
पुरुषोऽविकृतार्मव स्वनिर्भासमचेतनम् ।
मनः करोति सान्निध्यादुपधिः स्फटिकं यथा ॥
[ विन्ध्यवासी ] १३८
अपरिणामिनी भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे
प्रतिसंक्रान्ते च तद्वृत्तिमनुभवति [ व्यासभाष्य ] १३९
शब्दगुणमाकाशम् [ वैशेषिकसूत्र ] १४०
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेन भूत्वा
इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥
[ मुण्डक उपनिषद् १-२-१० ] १४१
रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ॥
[ सांख्यकारिका ५९ ] १४२
श्लोक १६
× उभयत्र तदेव ज्ञानं प्रमाणफलमधिगमरूपत्वात् [ न्यायप्रवेश पृ० ७ ] १४४
× उभयत्रेति प्रत्यक्षेऽनुमाने च तदेव ज्ञानं प्रत्यक्षाऽनुमानलक्षणं फलं कार्यम् ।
कुतः । अधिगमरूपत्वादिति परिच्छेदरूपत्वात् । तथाहि । परिच्छेदरूपमेव
ज्ञानमुत्पद्यते । न च परिच्छेदादृतेऽन्यद् ज्ञानफलम्, भिन्नाधिकरणत्वात् ।
इति सर्वथा न प्रत्यक्षानुमानाभ्यां भिन्नं फलमस्तीति ।
[ हरिभद्रसूरि—न्यायप्रवेशवृत्ति पृ. ३६ ] १४४
द्विसंबंधसंवित्तिर्नैकरूपप्रवेदनात् ।
द्वयोः स्वरूपग्रहणे सति संबंधवेदनम् ॥ [ ] १४६
× इन अवतरणोंके लिये मुनि हिमांशुविजयजीने मेरा ध्यान आकर्षित किया है ।
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण·( १ ) ११
अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः पृष्ठ
[ न्यायबिन्दु १-१९, २० ] १४६
नीलनिर्भासं हि विज्ञानं........नीलसंवेदनरूपम् [ न्यायबिन्दु टीका ] १४६
नाकारणं विषयः [ ] १५२
ण णिहाणगया भग्गा पुंजो णत्थि अणागए ।
णिव्वुया णेव चिट्ठंति आरग्गे सरिसवोपमा ॥ [ ] १५३
अर्थेन घटयत्येनां न हि मुक्त्वार्थरूपताम् ।
तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥ [ ] १५५
भूतियेषां क्रिया सैव कारणं सैव चोच्यते [ ] १५७
प्रत्येकं यो भवेद्दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः [ ] १५७
स्वाकारबुद्धिजनका दृश्या नेन्द्रियगोचराः [ ] १५८
यदि संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ।
न चेत् संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ॥
[ प्रज्ञाकरगुप्त-प्रमाणवार्तिकालंकार ] १५९
नान्योऽनुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवो परः ।
ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वयं सैव प्रकाशते ॥
बाह्यो न विद्यते ह्यर्थो यथा बालैर्विकल्प्यते ।
वासनालुठितं चित्तमर्थाभासे प्रवर्तते ॥ [ ] १५९
अणुहूयदिट्ठिचितिय सुयपयइवियारदेवयाणू वा ।
सुमिणस्स निमित्ताईं पुण्णं पावं च णाभावो ॥
[ जिनभद्रगणि-विशेषावश्यकभाष्य १७०३ । ] १६०
आशामोदकतृप्ता ये ये चास्वादितमोदकाः ।
रसवीर्यविपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥ [ ] १६०
श्लोक १७
सर्व एवायमनुमानानुमेयव्यवहारो बुद्ध्यारूढेन धर्मधर्मिभावेन
न बहिः सदसत्त्वमपेक्षते [ दिङ्नाग ] १६८
यथा यथा विचार्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा ।
यदेतद् स्वयमर्थेभ्यो रोचते तत्र के वयम् ॥ [ ] १७१
सुखादि चेत्यमानं हि स्वतन्त्रं नानुभूयते ।
मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ॥
इदं सुखमिति ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् ।
अहं सुखोति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ॥
[ न्यायमंजरी पृ. ४३३ ] १७२
देशितो नाशिनो भावा दृष्टा निखिलनश्वराः ।
मेघपङ्क्त्यादयो यद्वत् एवं रागादयो मताः ॥ [ ] १७६
रागाद्वा द्वेषाद्वा मोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतन् ।
यस्य तु नैते दोषास्तस्यानृतकारणं किं स्यात् ॥ [ ] १७६
एगे आया [ ठाणांग १-१ ] १७७
.१२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
नासन्न सन्न सदसन्न चाप्यनुभयात्मकं । पृष्ठ
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥ [ ] १७८
श्लोक १८
यच्चित्तं तच्चित्तान्तरा प्रतिसंधत्ते यथेदानीन्तनं चित्तं चित्तं च
मरणकालभावि [ मोक्षाकरगुप्त ] १८०
निखिलवासनोच्छेदे विगतविषयाकारोपप्लवविशुद्धज्ञानोत्पादो मोक्षः
[ ] १८२
यस्मिन्नेव हि संताने आहिता कर्मवासना ।
फलं तत्रैव संधत्ते कपसिं रक्ता यथा ॥ [ ] १८३
इत्येकनवते कल्पे शक्त्या मे पुरुषो हतः ।
तेन कर्मविपाकेन पादे विद्धोऽस्मि भिक्षवः ॥ [ ] १८४
श्लोक १९
प्रत्येकं यो भवेद् दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः [ ] १८७
श्लोक २०
नास्तिकास्तिकदैष्टिकम् [ हैमशब्दानुशासन ६-४-६६ ] १९२
वयः शक्तिशीले [ हैमशब्दानुशासन ५-२-२४ ] १९३
न चायं भूतधर्मः सत्त्वकठिनत्वादिवत् ।........
धर्मः फलं च भूतानां उपयोगो भवेद् यदि ।
प्रत्येकमुपलंभः स्यादुत्पादो वा विलक्षणात् ॥
[ द्रव्यालंकार ] १९६
श्लोक २१
वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः [ हैमशब्दानुशासन ७-२-६१ ] १९७
सर्वव्यक्तिषु नियतं क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेषः ।
सत्योश्चित्यपचित्योराकृतिजातिव्यवस्थानात् ॥
[ तत्त्वार्थभाष्य ५-२९ ] १९८
यद्युत्पादादयः भिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकं ।
अथोत्पादादयोऽभिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् ॥ [ ] १९९
घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
अगोरसव्रतो नोभे तस्माद् वस्तु त्रयात्मकम् ॥ [ आप्तमीमांसा ५९, ६० ] १९९
श्लोक २२
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-२९ ] २०३
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण (१) १३
श्लोक २३ पृष्ठ
भागा एव हि भासंते संनिविष्टास्तथा तथा ।
तद्भात्रैव पुनः कश्चिन्निर्भागः संप्रतीयते ॥ [ ] २०५
अर्पितानर्पितसिद्धेः [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-३१ ],, २०५
सदसदविसेसणाउ भवहेउजहिच्छिओवलंभाउ ।
णाणफलाभावाउ मिच्छादिट्ठिस्स अण्णाणं ॥
[ विशेषावश्यकभाष्य ११५ ] २०६
विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति
न प्रेत्य संज्ञास्ति [ बृहदारण्यक उपनिषद् २-४-१२ ] २०६
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषाभूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ [ मनुस्मृति ५-५६ ] २०७
आमासु य पक्वासु य विपच्चमाणासु मंसपेसीसु ।
आयंतिअमुववाओ भणिओ उ निगोअजीवाणं ॥
मज्जे महुम्मि मंसम्मि णवणीअम्मि चउत्थए ।
उप्पज्जंति अणंता तव्वण्णा तत्थ जंतूणो ॥
मेहुणसण्णा रुढो णवलक्ख हणेइ सुहुमजीवाणं ।
केवलिणा पण्णत्ता सहिहअंवा सया कालं ॥
[ रत्नशेखर—संबोधसप्ततिका ६६, ६५, ६३ ] २०८
इत्थीजोणीए संभवंति बेइंदिया उ जे जीवा ।
इक्को व दो व तिण्णि व लक्खपुहुत्तं उ उक्कोसं ॥
पुरिसेण सह गयाए तेसिं जीवाण होइ उद्धवणं ।
वेणुगदिट्ठं तेणं तत्तायसलागणाएणं ॥
पंचिंदिया मणुस्सा एगनरभुत्ताणरिगब्भम्मि ।
उक्कोसं णवलक्खा जायंति एगवेलाए ॥
णवलक्खाणं मज्झे जायइ इक्कस्स दोण्ह व समत्ती ।
सेसा पुण एमेव य विलयं वच्चंति तत्थेव ॥ [ ] २०८
तुः स्याद् भेदेऽवधारणे [ अमरकोश ३-२३९ ] २०९
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादद् यस्तयोस्तुल्यं भवेत् फलम् ॥ [ मनुस्मृति ५-५३ ] २०९
एकरात्रोषितस्यापि या गतिर्ब्रह्मचारिणः ।
न सा क्रतुसहस्रेण प्राप्तुं शक्या युधिष्ठिर ॥ [ ] २०९
वाक्येऽवधारणं तावदनिष्टार्थनिवृत्तये ।
कर्तव्यमन्यथानुक्तसमत्वात् तस्य कुत्रचित् ॥
[-त. श्लोकवार्तिक १-६-५३ ] २१०
सोऽप्रयुक्तोऽपि वा तज्ज्ञैः सर्वत्रार्थात्प्रतीयते ।
तथैवकारोऽयोगादिव्यवच्छेदप्रयोजनः ॥
[ त. श्लोकवार्तिक १-६-५६ ] २११
अर्पितानर्पितसिद्धेः [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र ५-३१ ] २१२
३४ श्रीमद्वाजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्लोक २६ पृष्ठ
शकाहँ कृत्याञ्च [ हैमशब्दानुशासन ५-४-३५ ] २३५
श्लोक २७
अप्राप्तानां प्राप्तिः [ प्रशस्तपाद ] २३७
वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चमंण्यंस्ति तयोः फलम् ।
चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलः ॥ [ ] २३७
यस्मिन्नेव हि संताने आहिता कर्मवासना ।
फलं तत्रैव संधत्ते कपसि रक्तता यथा ॥ [ ] २३८
परिणामोऽवस्थान्तरगमनं न च सर्वथा हावस्थानम् ।
न च सर्वथा विनाशः परिणामस्तद्विदामिष्टः ॥ [ ] २३९
अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः
[ व्यासभाष्य ३-१३ ] २३९
तात्स्थ्यात् तद्व्यपदेशः [ ] २४०
श्लोक २८
प्रमाणनयैरधिगमः [ तत्त्वार्थाधिगमसूत्र १-६ ] २४०
शास्त्यसूवृक्तिख्यातेरङ् [ हैमशब्दानुशासन ३-४-६० ] २४२
श्वयत्यसुवचपतः श्वास्थवोचपपञ्चम् [ हैमशब्दानुशासन ४-३-१०३ ] २४२
स्वरादेस्तासु [ हैमशब्दानुशासन ४-४-३१ ] २४२
जावइआ वयणपहा तावइआ चेव हुंति नयवाया [ सन्मतितर्क ३-३७ ] २४३
लौकिकसम उपचारप्रायो विस्तूतार्थो व्यवहार [ तत्त्वार्थभाष्य १-३५ ] २४४
यदेवार्थक्रियाकारि तदेव परमार्थसत् [ ] २४५
अन्यदेव हि सामान्यमभिन्नज्ञानकारणम् ।
विशेषोऽप्यन्य एवेति मन्यते नैगमो नयः ॥
सद्रूपतानतिक्रान्तं स्वस्वभावमिदं जगत् ।
सत्तारूपतया सर्वं संगृह्णन् संग्रहो मतः ॥
व्यवहारस्तु तामेव प्रतिवस्तुव्यवस्थिताम् ।
तथैव दृश्यमानत्वाद् व्यापारयति देहिनः ॥
तत्रर्जुसूत्रनीतिः स्याद् शुद्धपर्यायसंश्रिता ।
नश्वरस्यैव भावस्य भावात् स्थितिवियोगतः ॥
विरोधलिंगसंख्यादिभेदाद् भिन्नस्वभावताम् ।
तस्यैव मन्यमानोऽयं शब्दः प्रत्यवतिष्ठते ॥
तथाविधस्य तस्यापि वस्तुनः क्षणवर्तिनः ।
ब्रूते समभिरूढस्तु संज्ञाभेदेन भिन्नताम् ॥
एकस्यापि ध्वनेर्वाच्यं सदा तन्नोपपद्यते ।
क्रियाभेदेन भिन्नत्वाद् एवंभूतोऽभिमन्यते ॥ [ ] २४७
नीयते येन श्रुताख्यप्रमाणविषयीकृतस्य अर्थस्य अंशस्तदितरांशोदासीन्यतः स
प्रतिपत्तुरभिप्रायविशेषो नय इति ।................सप्तभंगीमनुव्रजति
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार ७-१.५३ ] २४८
स्याद्वादमञ्जरीके अवतरण ( १ ) १५
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नयास्तव स्यात्पदलांछना इमे रसोपविद्धा इव लोहधातवः ।
भवन्त्यभिप्रेतफला यतस्ततो भवन्तमार्याः प्रणता हितैषिणः ॥
[ समन्तभद्र-स्वयंम्भूस्तोत्र विमलनाथस्तव ६५ ] २५१
तच्च द्विविधं प्रत्यक्षं परोक्षं च......आत्ममात्रापेक्षम्
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार २-१,४,५,६,१८ ] २५१
तत्र संस्कारप्रबोधसम्भूत........परार्थानुमानमुपचारात्
[ प्रमाणनय. ३-३-२३ ] २५१
आप्तवचनाद् च आविर्भूतार्थसंवेदनमागमः । उपचाराद्
आप्तवचनं च [ प्रमाणनय. ४-१, २ ] २५२
श्लोक २९
दग्धे बीजं यथात्यन्तं प्रादुर्भवति नांकुरः ।
कर्मबीजे तथा दग्धे न रोहति भवांकुरः ॥ [ ] २५७
सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः [ योगसूत्र २-१३ ] २५७
सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो...........जातिरायुर्भोगः [ व्यासभाष्य ] २५७
न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य [ अक्षपाद ४-१-६४ ] २५७
संघे वानूछ्र्वै [ हैमशब्दानुशासन ५-३-८० ] २५७
गोला य असंखिज्जा असंखणिगोअ गोलओ भणिओ ।
इक्किक्कम्मि णिगोए अणन्तजीवा मुणेअव्वा ॥
सिज्झन्ति जत्तिया खलु इह संव्यवहारजीवरासीओ ।
एंति अणाइवणस्सइ रासीओ तत्तिआ तम्मि ॥ [ ] २५९
अतएव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।
ब्रह्माण्डलोकजीवानामनन्तत्वाद् अशून्यता ॥
अत्यन्यूनातिरिक्तत्वैर्युज्यते परिमाणवत् ।
वस्तुष्वपरिमेये तु नूनं तेषामसंभवः ॥ [ वार्तिककार ] २६०
श्लोक ३०
पुन्नाम्नि घः [ हैमशब्दानुशासन ५-३-१३० ] २६२
अत्थं भासइ अरहा सुत्तं गंथंति गणहरा णिउणं
[ विशेषावश्यकभाष्य १११९ ] २६३
उप्पन्ने वा विगमे वा धुवेत्ति वा [ ] २६३
उदधाविव सर्वसिन्धवः समुदीर्णास्त्वयि नाथ दृष्टयः ।
न च तासु भवान् प्रदृश्यते प्रविभक्तासु सरित्स्विवोदधिः ॥
[ सिद्धसेन द्वा. द्वात्रिंशिका ४-१५ ] २६४
श्लोक ३१
काऊण नमुक्कारं सिद्धाणमभिग्गहं तु सो गिण्हे [ ] २६५
अरहन्तुवएसेणं सिद्धा गच्छंति तेण अरहाई
[ विशेषावश्यकभाष्य ३२१३ ] २६६