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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 458 में से

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पृष्ठ 374

न्याय-वैशेषिक परिशिष्ट ( ग )
( श्लोक ४ से १० तक )
न्याय-वैशेषिकदर्शन
( १ ) न्याय दर्शनके मूल प्रवर्तक अक्षपाद गौतम कहे जाते हैं। अक्षपादको महायोगी, अहल्यापति
आदि नामोंसे भी कहा गया है¹। पुराणोंके अनुसार स्वमतदूषक व्यास ऋषिका मुख देखनेके लिए गौतमके
पैरोंमें नेत्र थे, इसलिए इनका नाम अक्षपाद पड़ा²। प्राचीन मान्यताके अनुसार, गौतम ऋषिके आश्रममें
वृष्टिके न होनेपर भी वरुणके वरसे वृक्ष आदि वनस्पतियाँ सदा हरी भरी रहा करती थीं। नैयायिक
योग; और शैव नामसे भी कहे जाते हैं। नैयायिक दर्शनमें शिव भगवान जगतकी सृष्टि और संहार
करते हैं; वे व्यापक, नित्य, एक और सर्वज्ञ हैं, और इनकी बुद्धि शाश्वती रहती है। नैयायिक लोग प्रमाण,
प्रमेय संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति
और निग्रहस्थान इन सोलह तत्त्वोंके ज्ञानसे दुखका नाश होनेपर मुक्ति स्वीकार करते हैं। ये लोग प्रत्यक्ष,
अनुमान, उपमान, और आगम इन चार प्रमाणोंको मानते हैं।³ ( २ ) वैशेषिक दर्शनके आद्यप्रणेता
कणाद कहे जाते हैं। कणादको कणभक्ष अथवा औलूक्य नामसे भी कहा गया है। पौराणिक मान्यताके
अनुसार, कणाद ऋषि रास्तेमें पड़े हुए चावलोंके कणोंका आहार करके कपोती वृत्तिसे अपना निर्वाह करते
थे, अतएव इनका नाम कणाद अथवा कणभक्ष पड़ा⁴। कणादने काश्यपगोत्री उलूक ऋषिके घर जन्म
१. अक्षपादो महायोगी गौतमाख्योऽभवन्मुनिः ।
गोदावरीसमानेता अहल्यायाः पतिः प्रभुः ॥
स्कन्दपुराण, कुमारिकाखण्ड ।
२. पुराणोंमें सांख्य-योगकी तरह अक्षपाद और कणादप्रणीत शास्त्रोंको श्रुतिविरुद्ध कहा है—
अक्षपादप्रणीते च काणादे योगसांख्ययोः ।
त्याज्यः श्रुतिविरुद्धोऽर्थः । पद्मपुराण; न्यायकोश पृ. २ ।
३. न्याय ग्रन्थोंमें प्रमाणके लक्षण निम्न प्रकारसे मिलते हैं—
( क ) जिस प्रत्यक्ष आदिके द्वारा प्रमाता पदार्थोंको यथार्थ रूपसे जानता है, उसे प्रमाण कहते हैं--
प्रमाता येनार्थं प्रमिणोति तत् प्रमाणम् । वात्स्यायनभाष्य १-१-१ ।
( ख ) जो ज्ञानमें कारण हो, उसे प्रमाण कहते हैं--उपलब्धिहेतुः प्रमाणम् । उद्योतकर, न्यायवार्तिक ।
( ग ) अव्यभिचारी और असंदिग्ध रूपसे पदार्थोंके ज्ञान करनेवाली बोधाबोध स्वभाववाली सामग्रीको
प्रमाण कहते हैं--अव्यभिचारिणीमसंदिग्धार्योपलब्धिम् विदधति बोधाबोधस्वभावा सामग्री
प्रमाणम् । जयन्त, न्यायमंजरी पृ. १२ ।
( घ ) पदार्थोंके यथार्थ रूपसे जाननेको प्रमा और प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं--यथार्थानुभवः
प्रमा । तत्साधनं च प्रमाणम् । उदयन, तात्पर्यपरिशुद्धि ।
( ङ ) प्रमासे नित्य संबंध रखनेवाले परमेश्वरको प्रमाण कहते हैं--साधनाश्रयव्यतिरिक्तत्वे सति
प्रमाव्याप्तं प्रमाणम् । सर्वदर्शनसंग्रह, अक्षपाददर्शन ।
४. मुनिविशेषस्य कापोतीं वृत्तिममुष्ठितवतो रथ्यानिपतितांस्तण्डुलकणानादाय कृताहारस्याहारनिमित्तात्
कणाद इति संज्ञाऽजनि । षड्दर्शनसमुच्चय, गुणरत्नटीका, पृ. १०७ ।