स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
यशोविजयजीने योगके ऊपर अध्यात्मसार, अध्यात्मोपनिषद्, तथा योगलक्षण, पातंजलयोगलक्षणविचार, योग-
भेद, योगविवेक, योगावतार, मित्रा, तारादित्रय, योगमाहात्म्य आदि द्वात्रिंशिकायें लिखनेके साथ हरिभद्रकी
योगविंशिका और षोडशकपर टीका लिखकर, पतंजलिके योगसूत्रोंपर जैन प्रक्रियाके अनुसार वृत्ति रची है।
यशोविजयजीने उक्त ग्रंथोंमें भगवद्गीता, योगवासिष्ठ, तैत्तिरीय उपनिषद्, पातंजल योगसूत्र आदि वैदिक ग्रंथों
का उपयोग किया है और साथ ही जैन और पतंजलिके योगकी प्रक्रियाओंकी तुलना करते हुए अनेक स्थलोंपर
पतंजलिकी प्रक्रियाका प्रतिवाद किया है। १ बौद्ध ग्रंथोंमें भी योगका वर्णन मिलता है। स्वयं बुद्धने बोधि
प्राप्त करनेके पूर्व योगका अभ्यास किया था। पातंजल योगदर्शनकी तरह बौद्ध शास्त्रोंमें भी अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा आदिको धर्मके प्रधान अङ्ग मान इनके विशद वर्णन
के साथ हेय, हेयहेतु, हान और हानोपायको तरह दुःख, समुदाय, निरोध और मार्ग इन चार आर्यसत्योंका
उपदेश दिया है। महायान सम्प्रदायकी विज्ञानवाद शाखा योगाभ्यासपर विशेष ध्यान देनेके कारण ही योगा-
चार नामसे कही जाती थी। योगाचार सम्प्रदायमें ध्यान, पारमिता, समाधि आदि प्रक्रियाओंका विस्तृत
वर्णन पाया जाता है। बौद्धतन्त्रकी क्रियातन्त्रका नाम बहुत महत्त्वका है। अनुत्तरयोगतन्त्रके पंचक्रममें भी
योगकी पांच दशाओंका वर्णन आता है। हीनयान सम्प्रदायमें भी योगाभ्यासको महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया
है। २
१. जैन योगके विषयमें विशेष जाननेके लिए देखिये पं० सुखलालजीकी योगदर्शन और योगविंशिकाकी भूमिका।
२. हीनयानके योगसंबंधी सिद्धांतोंके लिये देखिये मिसेज राइस डेविड्सका Yogavchara's Mannual,
पाली टैक्स्ट सोसायटी, १९१६ ।