स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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इनके अतिरिक्त सनक, नन्द, सनातन, सनत्कुमार, अंगिरा वोढु आदि अनेक सांख्य विचारक हो गये
हैं, जिनका अब केवल नाम शेष रह गया है।
योगदर्शन
योगशब्द ऋग्वेदमें अनेक स्थलोंपर आता है, परन्तु यहाँ यह शब्द प्रायः जोड़नेके अर्थमें प्रयुक्त हुआ
है। श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय, कठ, मैत्रायणी आदि प्राचीन उपनिषदोंमें योग समाधिके अर्थमें पाया जाता है।
यहाँ योगके अंगोंका वर्णन किया गया है। आगे जाकर शांडिल्य, योगतत्त्व, ध्यानविन्दु, हंस, अमृतनाद,
वराह, नादविन्दु, योगकुण्डली आदि उत्तरकालकी उपनिषदोंमें यौगिक प्रक्रियाओंका सांगोपांग वर्णन मिलता
है। सांख्यदर्शनके कपिल मुनिकी तरह हिरण्यगर्भ योगदर्शनके आदि वक्ता माने जाते हैं। हिरण्यगर्भको
स्वयंभू भी कहते हैं। महाभारत और श्वेताश्वतर उपनिषद्में हिरण्यगर्भका नाम आता है। पतंजलि आधुनिक
योगसूत्रोंके व्यवस्थापक समझे जाते हैं। १ व्यासभाष्यके टीकाकार वाचस्पति और विज्ञानभिक्षु भी पतंजलिका
योगसूत्रोंके कर्त्ता रूपमें उल्लेख नहीं करते। प्रो० दासगुप्त आदि विद्वानोंके मतानुसार व्याकरण महाभाष्यकार
और योगसूत्रकार पतंजलि दोनों एक ही व्यक्ति थे। पतंजलिका समय ईसाके पूर्व दूसरी शताब्दी माना जाता
है। पतंजलिके योगसूत्रोंके ऊपर व्यासने भाष्य लिखा है। व्यासका समय ईसाकी चौथी शताब्दी कहा
जाता है। ये व्यास महाभारत और पुराणकार व्याससे भिन्न व्यक्ति माने जाते हैं। व्यासके भाष्यके ऊपर
वाचस्पति मिश्रने तत्त्ववैशारदी नामकी टीका लिखी है। व्यासभाष्यपर भोज (दसवीं शताब्दी) ने भोजवृत्ति,
विज्ञानभिक्षुने योगवार्त्तिक और नागोजी भट्ट (सतरहवीं शताब्दी) ने छायाव्याख्या नामकी टीकायें लिखी हैं।
योगकी अनेक शाखायें हैं। सामान्यसे योगके दो भेद हैं-राजयोग और हठयोग। पतंजलि ऋषिके योगको
राजयोग कहते हैं। प्राणायाम आदिसे परमात्माके साक्षात्कार करनेको हठयोग कहते हैं। हठयोगके ऊपर
हठयोगप्रदीपिका, शिवसंहिता, घेरण्डसंहिता आदि शास्त्र मुख्य हैं। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोगके भेद-
से योगके तीन भेद भी होते हैं। योगतत्त्व उपनिषद्में मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग इस तरह
योगके चार भेद किये हैं।
जैन और बौद्ध दर्शनमें योग
महाभारत, पुराण, भगवद्गीता आदि वैदिक ग्रंथोंके अतिरिक्त जैन और बौद्ध साहित्यमें
भी योगका विशद वर्णन मिलता है। जैन आगम ग्रन्थ और प्राचीन जैन संस्कृत साहित्यमें योग
शब्द प्रायः ध्यानके अर्थमें प्रयुक्त किया गया है। यहाँ ध्यानका लक्षण, भेद प्रभेद आदिका विस्तृत वर्णन मिलता
है। योगविषयक साहित्यको पल्लवित करनेमें सर्वप्रथम हरिभद्रसूरिका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है।
हरिभद्रने योगके ऊपर योगबिन्दु, योगदृष्टिसमुच्चय, योगविंशिका, षोडशक आदि ग्रन्थोंके लिखनेके साथ पतं-
जलिके योगशास्त्रका पांडित्य प्राप्त करके पतंजलिके योगसूत्रोंके साथ जैनयोगकी प्रक्रियाओंकी तुलना की है।
हरिभद्रके योगदृष्टिसमुच्चयमें मित्रा; तारा आदि आठ दृष्टियोंका स्वरूप जैन साहित्यमें बिलकुल अभूतपूर्व है।
जैन योगशास्त्रके दूसरे विद्वान् हेमचन्द्रसूरि हैं। इन्होंने योगपर योगशास्त्र नामक स्वतंत्र ग्रंथ लिखकर अनेक
जैन यौगिक प्रक्रियाओंका पतंजलिकी प्रक्रियाओंसे समन्वय किया है। हेमचन्द्रके योगशास्त्रमें शुभचन्द्र आचार्य
के ज्ञानार्णवमें आये हुए ध्यान आदिके वर्णनके साथ ध्यान, आसन आदिका विस्तृत वर्णन मिलता है। जैन-
योग-साहित्यको वृद्धिगत करनेवाले सतरहवीं सदीके अंतिम विद्वान् यशोविजय उपाध्याय माने जाते हैं।
१. तुलना करो-ननु
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ।
इति याज्ञवल्क्यस्मृतेः पतंजलिः कथं योगस्य शासितेति चेत्-अद्धा । अतएव तत्र तत्र पुराणादौ विशिष्य
योगस्य विप्रकीर्णतया दुर्ग्राह्यार्थत्वं मन्यमानेन भगवता कृपासिंधुना फणिपतिना सारं संजिघृक्षुणानुशासन-
मारब्धं न तु साक्षाच्छासनम् । सर्वदर्शनसंग्रह १५ ।
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