स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
(२) आत्मा पांच स्कंधोंसे भिन्न पदार्थ है :
बौद्धोंको दूसरो मान्यता है कि आत्मा पंचस्कंधोंसे पृथक् पदार्थ है। यह मान्यता नैयायिक आदि
दार्शनिकों जैसी ही है। यहां पर आत्मा (पुद्गल) को पांच स्कंध रूप बोझको ढोनेवाला कहा हैं।१
(३) आत्मा पांच स्कंधोंसे न भिन्न है, न अभिन्न :
बौद्धोंके आत्मा संबंधी तीसरे सिद्धान्तको माननेवाले पुद्गलवादी वात्सीपुत्रीय बौद्ध हैं। ये लोग आत्मा-
के अस्तित्वको मानते हैं, परन्तु इनके अनुसार जिस तरह अग्निको न जलती हुई लकड़ीसे भिन्न कह सकते
हैं, और न अभिन्न, परन्तु फिर भी अग्नि भिन्न वस्तु है; उसी तरह यद्यपि पुद्गल भिन्न पदार्थ है, परन्तु यह
पुद्गल न पांच स्कंधोंसे सर्वथा भिन्न कहा जा सकता है और न अभिन्न । यह न नित्य है, और न अनित्य ।
यह पुद्गल अपने अच्छे, बुरे कर्मोंका कर्ता और भोक्ता है, इसलिये इसके अस्तित्वका निषेध नहीं कर सकते ।
(४) आत्मा अव्याकृत है :
इस मान्यताके अनुसार आत्मा क्या है, यह नहीं कहा जा सकता । (क) जिस समय
अनुराधने बुद्धसे प्रश्न किया कि क्या जीव रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञानसे बाह्य है
तो बुद्धने उत्तर दिया कि तुम इसी लोकमें जीव दिखानेमें समर्थ नहीं, फिर परलोककी बात तो दूर
रही; इसलिये मैं 'दुःख, और दुखका निरोध' इन दो तत्त्वोंका ही उपदेश करता हूँ । जिस प्रकार किसी
तीरसे आहत मनुष्यका 'यह तीर किसने मारा है'? कौनसे समयमें मारा है ? कौनसी दिशासे आया है ?'
आदि प्रश्न करना वृथा है, क्योंकि उस समय मनुष्यको इन सब प्रश्नोत्तरोंमें न पड़कर घावकी रक्षा की ही
बात सोचनी चाहिये; उसी प्रकार आत्मा क्या है ? परलोक क्या है ? मरनेके बाद तथागत पैदा होता है
या नहीं ? आदि प्रश्न अव्याकृत हैं२ । (ख) बहुतसी जगह आत्माके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर बुद्ध मौन
धारण करते हैं३ । इस मौनका कारण हैं कि यदि वे कहें कि आत्मा है तो लोग शाश्वतवादी हो जाते हैं और
यदि कहा जाये कि आत्मा नहीं है, तो लोग उच्छेदवादी हो जाते हैं। अतएव एक ओर शाश्वतवाद और
दूसरी ओर उच्छेदवादका निराकरण करनेके लिये मौन रहना ही ठीक समझा गया४ । (ग) अनेक बौद्ध
तथा—दुखमेव हि न कोचि दुःखितो ।
कारको न किरियाव विज्जति ।
अत्थि निवृत्ति न निवृत्तो पुमा ।
मग्गमत्थि गमको न विज्जति ॥ विसुद्धिमग्ग, अध्याय १६ ।
तथा देखिये कथावत्थु १-२; अभिधर्मकोश ३-१८ टीका; दीघनिकाय, पायासिझुत्त; संयुत्तनिकाय
५-१०-६ ।
१. “भारं वो भिक्षवो देशयिष्यामि भारादानं भारनिक्षेपं भारहारं च । तत्र भारः पंचोपादानस्कंधाः,
भारादानं तृप्तिः, भारनिक्षेपो मोक्षः, भारहारः पुद्गलाः......” तत्त्वसंग्रहपंजिका, आत्मवादपरीक्षा ३४६;
तथा धम्मपद, अत्तवग्गो ।
२. संयुत्तनिकाय, अनुराधसुत्त; तथा—‘स्कंधाः सत्त्वा एव ततो भिन्ना वा' इति प्रश्नः सत्त्वस्य विषये,
सत्त्वश्च नास्त्येव किमपि वस्तु । तेनायं प्रश्नः ‘वन्ध्यापुत्रः शुक्ल कृष्णो वा' इतिवत् स्थापनीय (अनु-
त्तरितं ) एव । अभिधर्मकोश ५-२२ टिप्पणी; बुद्धचर्या पृ. १८६ से आगे ।
३. किंनु खो गोतम अत्यत्ताति ।
एवं वुत्ते भगवा तुण्ही अहोसि ॥
किं पन भो गोतम नत्थत्ताति ॥
दुतियंपि खो भगवा तुण्ही अहोसि । संयुत्तनिकाय ४-१०० ।
४. अस्तीति शाश्वतग्राहो नास्तीत्युच्छेददर्शनं । तस्मादस्तित्वनास्तित्वे नाश्रीयेत विचक्षणः ॥
माध्यमिककारिका १८-१० ।