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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 458 में से

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पृष्ठ 387

स्याद्वादमञ्जरी ( परिशिष्ट ) ३३५
प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण माने गये हैं। वैदिक ग्रन्थोंमें कपिलको नास्तिक और श्रुतिविरुद्ध १
तंत्रका प्रवर्तक कहकर कपिलप्रणीत सांख्य और पतंजलिके योगशास्त्रको अनुपादेय कहा है ।
सांख्यदर्शनके प्ररूपक
कपिल—सांख्यदर्शनके आद्य प्रणेता, आदि विद्वान कपिल परमर्षि कहे जाते हैं २ । कपिल क्षत्रिय थे ।
कुछ लोग कपिलको ब्रह्माका पुत्र बताते हैं । भागवतमें कपिलको विष्णुका अवतार कहकर उन्हें अपनी माता
देवहूतिको सांख्य तत्त्वज्ञानका उपदेष्टा कहा गया है ३ । विज्ञानभिक्षुने कपिलको अग्निका अवतार बताया है ।
श्वेताश्वतर उपनिषद्में कपिलका हिरण्यगर्भके अवतार रूपमें उल्लेख आता है । रामायणमें कपिल योगीको
वासुदेवका अवतार और सगरके साठ हजार पुत्रोंका दाहक बताया गया है । अश्वघोष बुद्धके जन्मस्थान
कपिलवस्तुको कपिल ऋषिकी बसाई हुई नगरी कहकर उल्लेख करते हैं। कपिलने अपने पवित्र और प्रधान
दर्शनको सर्व प्रथम आसुरिको सिखाया था ! आसुरिने पंचशिखको सिखाया और पंचशिखने इस दर्शनको
विस्तृत किया । पंचशिखके पश्चात् यह दर्शन भार्गव, वाल्मीकि, हारीत और देवल प्रभृतिने और ईश्वरकृष्णने
सीखा । कपिलको सांख्यप्रवचनसूत्र और तत्त्वसमास नामके ग्रंथोंका प्रणेता कहा जाता है, परन्तु इस कथनका
कोई आधार नहीं जान पड़ता ४ ।
आसुरि—आसुरि कपिलके साक्षात् शिष्य और पंचशिखके गुरु कहे जाते हैं । आसुरिका मत था कि
सुख और दुख बुद्धिके विकार हैं और ये जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें है, उसी तरह पुरुषमें प्रति-
विम्बित होते हैं ५ आसुरिके सिद्धांतोंके विषयमें विशेष पता नहीं लगता । आसुरिका समय ईसाके पूर्व ६००
वर्ष कहा जाता है ।
पंचशिख—वाचस्पतिमिश्र, भावागणेश आदि टीकाकार पंचशिखका उल्लेख करते हैं । भावागणेशकी
योगसूत्रवृत्तिसे मालूम होता है कि तत्त्वसमासपर पंचशिखने विवरण अथवा व्याख्या लिखी थी । पंचशिखका
वर्णन महाभारतमें आता है। कहा जाता है कि पंचशिख अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंद-
मय आत्माके शिखास्थानमें रहनेवाले ब्रह्माको जानते थे, इसलिये उनका नाम पंचशिख पड़ा। कपिल मतका
अनुसरण करनेके कारण पंचशिख कापिलेय नामसे भी कहे जाते थे । चीनके बौद्ध सम्प्रदायके अनुसार पंच-
१. अतश्च सिद्धमात्मभेदकल्पनयापि कपिलस्य तन्त्रं वेदविरुद्धं वेदानुसारि मनुवचनविरुद्धं च। ब्रह्मसूत्र, शांकरभाष्य
२-१-१ । तथा-नास्तिककपिलप्रणीतसांख्यस्य पतञ्जलिप्रणीतयोगशास्त्रस्य चानुपादेयत्वमुक्तं भारते मोक्षधर्मेषु—
सांख्यं योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च।
ज्ञानान्येतानि भिन्नानि नात्र कार्या विचारणा ।।
गीता. मध्वभाष्य, अ. २ श्लो. ३९ । न्यायकोश पृ. ९०४ टिप्पणी ।
२. सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः पुरातनः ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः । महाभारत, मोक्षधर्म ।
प्रो. राधाकृष्णन् आदि विद्वान् सांख्य सिद्धांतके अव्यक्त बीजका ऋग्वेदमें पाये जानेका उल्लेख करते हैं।
३. कपिलस्तत्त्वसंख्याता भगवानात्ममायया ।
जातः स्वयमजः साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम् । भागवत ३-२५-१ ।
४. सांख्यसूत्र सर्वप्रथम अनिरुद्ध ( १५०० ई. स. ) की वृत्ति सहित और कुछ समय बाद विज्ञानभिक्षुके
भाष्य ( १६५० ई. स. ) सहित देखनेमे आते हैं। अनिरुद्ध और विज्ञानभिक्षुके पूर्ववर्ती ईश्वरकृष्ण,
शंकर, वाचस्पतिमिश्र, माधव आदि विद्वान सांख्यसूत्रोंका उल्लेख नहीं करते, इस परसे विद्वान
सांख्यसूत्रोंको चौदहवीं शताब्दीके बाद बना हुआ अनुमान करते हैं ।
५. देखिये पृ. १३८ ।