स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
षड्दर्शनसमुच्चयकी टीकामें सांख्यमतके साधुओंके आचारका निम्न प्रकारसे वर्णन किया वै—“सांख्य मतके
अनुयायी साधु त्रिदंडी अथवा एकदंडी होते हैं, ये कौपीन धारण करते हैं, गेरुए रंगके वस्त्र पहिनते हैं, बहुतसे
चोटी रखते हैं, बहुतसे जटा बढ़ाते हैं, और बहुतसे छुरेसे मुंडन कराते हैं । ये मृगचर्मका आसन रखते हैं,
ब्राह्मणोंके घर आहार लेते हैं, पांच ग्रास मात्र भोजन करते हैं, और बारह अक्षरोंको जाप करते हैं। इनके
भक्त नमस्कार करते समय 'ओं नमो नारायणाय' कहते हैं, और साधु केवल 'नारायणाय नमः' बोलते
हैं । सांख्य परिव्राजक जीवोंकी रक्षाके लिए लकड़ीको मुखवस्त्रिका (बीटा) रखते हैं। ये जीवोंकी दया
पालनेके लिये स्वयं जल छाननेका वस्त्र रखते हैं और अपने भक्तोंको पानी छाननेके लिये छत्तीस अंगुल लंबा
और बीस अंगुल चौड़ा मजबूत बस्त्र रखनेका उपदेश देते हैं। ये मीठे पानीमें खारा पानी मिलानेसे जीवोंकी
हिंसा मानते हैं, और जलकी एक बूँदमें अनंत जीवोंका अस्तित्व स्वीकार करते हैं। इनके आचार्योंके