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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१५
स्तित्वस्य स एव शेषविशेषाणामिति सम्बन्धेनाभेदवृत्तिः । ५ य एव चोपकारोऽस्तित्वेन स्वानुर-
क्तत्वकरणं स एव शेषैरपि गुणैरित्युपकारेणाभेदवृत्तिः । ६ य एव गुणिनः सम्बन्धी देशः
क्षेत्रलक्षणोऽस्तित्वस्य स एवान्यगुणानामिति गुणिदेशेनाभेदवृत्तिः । ७ य एव चैकवस्त्वात्म-
नास्तित्वस्य संसर्गः स एव शेषधर्माणामिति संसर्गेणाभेदवृत्तिः । अविष्वग्भावेऽभेदः प्रधानम्
भेदो गौणः, संसर्गे तु भेदः प्रधानम् अभेदो गौण इति विशेषः । ८ य एव चास्तीति शब्दोऽ-
स्तित्वधर्मात्मकस्य वस्तुनो वाचकः स एव शेषानन्तधर्मात्मकस्यापीति शब्देनाभेदवृत्तिः पर्या-
यार्थिकनयगुणभावे द्रव्यार्थिकनयप्राधान्याद् उपपद्यते ॥
तादात्म्य सम्बन्ध अस्तित्वमें रहता है, उसी तरह उक्त सम्बन्ध अन्य धर्मोंमें भी रहता है, इसलिये सम्बन्धकी
अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म अभिन्न हैं ( ५ ) उपकार—जो उपकार अस्तित्वके द्वारा अपने स्वरूपमें अनुराग
उत्पन्न करता है, वही उपकार अन्य धर्मोंके द्वारा भी अनुराग पैदा करता है, अतएव उपकारकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद है । ( ६ ) गुणिदेश ( द्रव्यका आधार )—जो क्षेत्र द्रव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले
अस्तित्वका है, वही क्षेत्र अन्य धर्मोंका है, अतएव अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद भाव है । ( ७ ) संसर्ग—
एक वस्तुकी अपेक्षासे जो संसर्ग अस्तित्वका है, वही संसर्ग अन्य धर्मोंका भी है, इसलिए संसर्गकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद हैं । सम्बन्धमें अभेदकी प्रधानता और भेदकी गौणता, तथा संसर्गमें भेदकी
प्रधानता और अभेदकी गौणता होती है । ( ८ ) शब्द—जिस 'अस्ति' शब्दसे अस्तित्व धर्मका ज्ञान होता
है, उसी 'अस्ति' शब्दसे अन्य धर्म भी जाने जाते हैं, अतएव शब्दकी अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म परस्पर
अभिन्न हैं । जिस समय पर्यायार्थिक नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी प्रधानता होती हैं, उस समय
पदार्थोंके धर्मोंमें अभेद भावका ज्ञान होनेसे अभेदवृत्ति होती है ।
[ स्पष्टीकरण: ( १ ) काल—'जीव आदि पदार्थ 'कथंचित् अस्तिरूप हो हैं'—इस उदाहरणमें
जीव आदि रूप पदार्थमें जितने काल तक अस्तित्व गुण विद्यमान रहता है, उतने काल तक और
भी अनन्त धर्म पाये जाते हैं । इस प्रकार जीव आदि एक पदार्थमें अस्तित्व एवं अन्य धर्मोंकी स्थिति
कालकी दृष्टिसे अभेद रूप है । इसी तरह घटका उदाहरण लिया जा सकता है । जितने काल तक घटमें
अस्तित्व धर्म रहता है, उतने काल तक घटके अन्य धर्म भी विद्यमान रहते हैं । जिस कालमें घटका अस्तित्व
नष्ट हो जाता है उस कालमें घटके अन्य धर्मोंका भी अभाव हो जाता है । इससे स्पष्ट है कि पदार्थके
अस्तित्व धर्मके साथ उसके अन्य धर्मोंका अविनाभाव—तादात्म्य-अभेद-सिद्ध हो जाता है । जीव द्रव्यमें
रहनेवाला अस्तित्व गुण अनादिनिधन है इसलिये उसका ज्ञान सामान्यरूप धर्म भी अनादि निधन होता है,
क्योंकि जीवके अस्तित्वसे ज्ञानगुण कालकी दृष्टिसे अभिन्न है । अतएव पदार्थके अस्तित्व धर्मका जितना
काल होता है, उतना ही काल उसके अन्य धर्मोंका उस पदार्थमें .अस्तिरूप रहनेका होता है । इसलिये
पदार्थके अस्तित्व धर्म और उसके शेष धर्मोंमें कालको दृष्टिसे अभेद है । ( २ ) आत्मरूप—जिस प्रकार
अस्तित्व गुणका पदार्थका स्वभाव है, उसी प्रकार अन्य अनन्त गुण भी पदार्थके स्वभाव हैं । इस प्रकार
एक पदार्थमें पदार्थके गुण होना रूप स्वभावसे पदार्थका अस्तित्व धर्म एवं शेष अनन्त धर्म भी रहते हैं ।
अतएव एक पदार्थमें अस्तित्व आदि सभी धर्मोंकी स्वस्वरूप ( आत्मस्वरूप ) की दृष्टिसे अभेदवृत्ति रहतो
है । जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थका गुण होना स्वस्वरूप है, उसी प्रकार अन्य ज्ञान आदि रूप
अनन्त गुणोंका जीव पदार्थका गुण होना भी स्वस्वरूप है । अतः जीवरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य
शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्मकी आत्मस्वरूप दृष्टिसे अभेद वृत्ति होती है । जिस प्रकार घटका गुण
होना अस्तित्वका स्वरूप है, उसी प्रकार उसके अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी घटका गुण होना स्वस्वरूप
है । अतः घटरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य शेष अनंत धर्मोंकी आत्मस्वरूपकी दृष्टिसे अभेद वृत्ति
है । ( ३ ) अर्थ—जो पदार्थ अस्तित्व गुणका आधार होता है, वही अन्य अक्रमभावी पर्यायों-गुणोंका-आधार
होता है । इस प्रकार एक द्रव्यका अस्तित्व धर्म और उसके अन्य अनन्त गुणों जब एक ही पदार्थ आधार

२१६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २३
होता है, तब अर्थकी दृष्टिसे उन गुणोंमें अभेद होता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थ आश्रय
होता है, उसी प्रकार अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी जीवद्रव्य आश्रय होता है। अतः अस्तित्व धर्म और
अन्य शेष ज्ञान आदिरूप अनन्त धर्मंका एक जीव पदार्थके आश्रित होनेसे अर्थकी दृष्टिसे उन धर्मोंमें अभेद हैं।
(४) सम्बन्ध—जिस प्रकार अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्यरूप सम्बन्ध होता है, वैसे ही
कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अन्य समस्त धर्मोंका उस पदार्थके साथ रहता है। इस प्रकार पदार्थके अस्तित्व
धर्मका और उसके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अर्थात् अभेद होनेसे,
उन सभी धर्मोंमें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद होता है। इस प्रकार अस्तित्व धर्मका जीव पदार्थके साथ कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्ध होनेसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्ममें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद
होता है। (५) उपकार—पदार्थका अस्तित्व गुणके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना पदार्थका अस्तित्व
गुणकृत उपकार होता है। इसी प्रकार उस पदार्थके शेष अन्य गुणोंके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना, उसी
पदार्थका शेष गुणकृत उपकार होता है। पदार्थके अस्तित्व गुणकृत तथा उस पदार्थके आश्रित अन्य शेष गुणों
द्वारा किये जानेवाले उपकारके एक होनेसे अस्तित्व गुण तथा उसके अन्य शेष गुणोंमें उपकारकी दृष्टिसे अभेद
है। आचार्यप्रवर श्रीविद्यानन्दने उपकार शब्दका अर्थ 'स्वानुरक्तत्वकरणं' किया है—अर्थात् अपनी
विशेषताको पदार्थमें निर्माण करना। उदाहरणार्थ, नीलवर्ण पुद्गलका गुण है, वह गुण पुद्गलमें अपने
वैशिष्ट्यका निर्माण करता है। पदार्थमें अस्तित्व गुण अपने वैशिष्ट्यको निर्माण करता है। यदि अस्तित्व
गुणका वैशिष्ट्य पदार्थमें न हो तो पदार्थका अभाव हो जायेगा। इस वैशिष्ट्यको पदार्थमें निर्माण करना
ही पदार्थका गुणकृत उपकार है। जिस प्रकार अस्तित्वगुण पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर
पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है, उसी प्रकार नीलत्व आदि रूप अन्य गुण भी पुद्गल
पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर उसी पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है। अतः
अस्तित्व धर्म और अन्य शेष नीलत्व आदि धर्म, पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यके निर्माणकर्ता होनेके कारण
उपकारकी दृष्टिसे अभिन्न हैं। (६) गुणिदेश—जो अस्तित्व धर्मका गुणिदेश होता है वही अन्य धर्मोंका भी
होता है। इस प्रकार गुणिदेशकी दृष्टिसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष धर्मोंमें अभेद है। गुणी अर्थात् गुणवान्
पदार्थके जितने प्रदेशोंमें अस्तित्व धर्म होता है, उतने ही प्रदेशोंमें अन्य शेष गुणोंका होना ही अस्तित्व गुण
तथा अन्य शेष गुणोंमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद सिद्ध करता है। पदार्थके सभी प्रदेशोंमें अस्तित्व गुण होता
है। इस अस्तित्व गुणके समान पदार्थके सभी प्रदेशोंमें उसके अन्य शेष गुण भी होते हैं। अस्तित्व गुण
जीवके कुछ प्रदेशोंमें हो, और कुछमें न हो—ऐसा कभी नहीं होता। यह गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें पाया
जाता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें होता है, उसी प्रकार जीवके शेष अन्य ज्ञान आदि
अनंत गुण भी होते हैं। अतः जीवका अस्तित्व गुण और उसके शेष ज्ञान आदि गुणमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद
है। (७) संसर्ग—एक पदार्थके रूपसे अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ जो संसर्ग होता है, वही एक वस्तुके
स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ संसर्ग होता है। इस प्रकार एक पदार्थके
साथ एक वस्तुके स्वभावके रूपसे अस्तित्व धर्मका संसर्ग होनेसे तथा उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका एक
वस्तुके स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके साथ संसर्ग होनेसे, उस पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य
शेष धर्मोंमें संसर्गकी दृष्टिसे अभेद होता है। संसर्ग दो भिन्न पदार्थोंमें होता है। लोकव्यवहारमें पर्यायार्थिक-
नयकी दृष्टिसे गुण-गुणीमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। गुण और गुणीमें द्रव्यार्थिकनयकी दृष्टिसे
भेदका अभाव होता है—अर्थात् अभेद होता है, फिर भी 'यह अग्निकी उष्णता है'—यहाँ अग्नि और
उष्णतामें वस्तुतः अभेद होने पर भी उनमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। इस व्यवहारसे उनके
भेदका संस्कार जो दृढ़ हो गया होता है, उसका अभाव द्रव्यार्थिक नयकी सहायतासे किया जाता है। कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्धमें अभेद मुख्य होता है और भेद गौण, तथा संसर्गमें भेद मुख्य होता है और अभेद गौण ।
यही तादात्म्य संबंध तथा संसर्ग (संयोग) संबंधमें भेद है। कथंचित् तादात्म्य कथंचित् भेदाभेद रूप होता

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१७
द्रव्यार्थिकगुणभावे पर्यायार्थिकप्राधान्ये तु न गुणानामभेदवृत्तिः सम्भवाद् । समकाल-
मेकत्र नानागुणानामसम्भवात्, सम्भवे वा तदाश्रयस्य तावद्वा भेदप्रसङ्गात् । नानागुणानां
सम्बन्धिना आत्मरूपस्य च भिन्नत्वात्, आत्मरूपाभेदे तेषां भेदस्य विरोधात् । स्वाश्रयस्यार्थ-
स्यापि नानात्वाद्, अन्यथा नानागुणाश्रयत्वस्य विरोधात् । सम्बन्धस्य च सम्बन्धिभेदेन
भेददर्शनाद् नानासम्बन्धिभिरेकत्र सम्भवाघटनात् । तैः क्रियमाणस्योपकारस्य च प्रतिनियत-
रूपस्यानेकत्वात् अनेकैरुपकारिभिः क्रियमाणस्योपकारस्य विरोधात् । गुणिदेशस्य प्रतिगुणं
भेदात् तद्भेदे भिन्नार्थगुणानामपि गुणिदेशाभेदप्रसङ्गात् । संसर्गस्य च प्रतिसंसर्गिभेदात्
तद्भेदे संसर्गिभेदविरोधात् । शब्दस्य प्रतिविषयं नानात्वात् सर्वगुणानामेकशब्दवाच्यतायां
सर्वार्थानामेकशब्दवाच्यतापत्तेः शब्दान्तरवैफल्यापत्तेः ।
है। भेद विशिष्ट अभेदको संबंध तथा अभेद विशिष्ट भेदको संसर्ग कहते हैं । ( ८ ) जो 'अस्ति' शब्द
अस्तित्वधर्मसे युक्त पदार्थका वाचक होता है, वही 'अस्ति' शब्द अनंत धर्मोंसे युक्त पदार्थका वाचक होता है।
इस प्रकार अस्तित्व धर्मयुक्त पदार्थ तथा शेष अन्य अनंतधर्मोंसे युक्त वही पदार्थ, 'अस्ति' शब्दका वाच्य
होनेसे, शब्दकी दृष्टिसे अभिन्न है । जिन गुणोंमें पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे भेद होता है, उन गुणोंमें पर्यायार्थिक
नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी मुख्यता होनेपर अभेद घटित होता है) १ ।
द्रव्यार्थिक नयको गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर पदार्थाश्रित गुणोंकी अभेद रूपसे
स्थिति नहीं होती : ( १ ) विभिन्न गुण एक कालमें एक स्थान पर नहीं रह सकते । यदि विभिन्न गुण एक
कालमें, एक वस्तुमें, एक साथ रहें तो गुणोंके आश्रित द्रव्योंमें भी उतने ही भेद मानने चाहिये । (२) विभिन्न
गुणोंका अपने-अपने स्वरूप ( आत्मरूप ) वाले स्वभिन्न गुणके स्वरूपसे भेद है; क्योंकि वे एक दूसरेके स्वरूपमें
नहीं रहते, इसलिये गुणोंमें अभेद नहीं है। यदि गुणोंमें परस्पर भेद न हो, तो गुणोंको भिन्न-भिन्न नहीं
मानना चाहिये । ( ३ ) गुणोंके आश्रयभूत पदार्थ ( अर्थ ) भी अनेक हैं; यदि गुणोंके आधार अनेक न हों
तो वे नाना गुणोंके आश्रित नहीं कहे जा सकते । ( ४ ) संबंधियोंके भिन्न-भिन्न होने कारण संबंधका भेद
दिखाई देनेसे भी गुणोंमें अभिन्नता संभव नहीं, क्योंकि एक संबंधसे भिन्न-भिन्न संबंधियोंके साथ संबंध नहीं
बन सकता । ( ५ ) उपकारकी अपेक्षा भी गुण परस्पर अभिन्न नहीं हैं। अनेक उपकारियोंमेंसे प्रत्येक
उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें तथा अन्य उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें विरोध है ।
( ६ ) गुणिदेशकी अपेक्षासे भी गुण अभिन्न नहीं हैं। अन्यथा प्रत्येक गुणका आश्रयभूत गुणिरूप देश तथा
स्वभिन्न गुणके आश्रयभूत गुणिरूप देशमें भेद न होनेपर, भिन्न पदार्थोंके गुणोंके भी जो गुणिरूप देश हैं, उनका
पूर्वोक्त गुणिरूप देशके साथ अभेदका प्रसंग आ जायेगा । ( ७ ) संसर्गकी अपेक्षा भी गुण भिन्न हैं। अन्यथा
एक पदार्थके साथ जितने संसर्ग करनेवाले होते हैं, उतने ही संसर्गोंके परस्पर भिन्न होनेपर भी, उन संसर्गोंको
अभिन्न मानने पर, संसर्ग करनेवालोंमें भेद उपस्थित हो जायेगा । ( ८ ) तथा शब्दकी अपेक्षासे भी गुण
भिन्न नहीं हैं । अन्यथा सभी गुणोंकी एक शब्दके द्वारा वाच्यता होनेपर, उनके आश्रयभूत सभी पदार्थोंकी
एक शब्द द्वारा वाच्यता होनेकी आपत्ति उपस्थित हो जानेसे उन सभी पदार्थोंमेंसे प्रत्येक पदार्थके वाचक
शब्दोंकी निष्फलताका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा ।
( स्पष्टीकरण : जब द्रव्यार्थिक नयकी गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होती है, तब एक
पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य शेष अनंत धर्मोंमें काल आदिकी दृष्टिसे अभेदकी संभाव्यता
नहीं होती । ( १ ) एक समयमें पदार्थकी एक ही पर्याय होती है—अनेक नहीं । उत्तर पर्यायसे युक्त उसी
पदार्थका पूर्व पर्यायसे युक्त पदार्थसे भेद होता है । यदि पूर्व पर्याययुक्त और उत्तर पर्याययुक्त पदार्थमें भेद
स्वीकार न किया तो बाल्यावस्था और कुमारावस्थामें भेद नहीं होगा, तथा बालक कभी कुमारावस्थाके रूपमें
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।
२८

२१८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
परिणत नहीं हो सकेगा। पदार्थमें प्रतिसमय अर्थपर्यायें जन्म लेती रहती हैं, अतः प्रतिक्षण पदार्थकी
भिन्नता घटित होती रहती है। इस अर्थपर्यायके भी प्रतिक्षण भिन्न रूप होनेसे अर्थपर्याययुक्त पदार्थकी
प्रतिक्षण भिन्नता सिद्ध होती है। एक समयमें एक ही अर्थपर्याय होती है—अनेक अर्थपर्यायें नहीं। पदार्थकी
अर्थपर्यायके कारण व्यक्त होनेवाली भिन्नता, उन अर्थपर्यायोंके काल भिन्न-भिन्न होनेसे होती है। प्रत्येक
समयमें होनेवाली पदार्थकी भिन्नताके कारण अर्थपर्यायोंके कालोंकी भिन्नता होनेसे, एक पदार्थमें, एक समयमें,
अनेकविध गुणोंके अस्तित्वका होना असंभव है। ऐसी अवस्थामें भी यदि एक पदार्थमें, एक समयमें,
अनेकविध गुणोंका होना संभव माना तो पदार्थमें एक समयमें जितने गुण होंगे उतने ही प्रकार एक पदार्थके
एक समयमें होंगे। अतः पदार्थकी विविधता कालभेद-निमित्तक होनेसे, कालकी दृष्टिसे द्रव्याश्रित अनेक
गुणोंमें अभेद सिद्ध नहीं होता, अपितु भेद ही सिद्ध होता है। (२) एक पदार्थके आश्रित अनेक गुणोंका
द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे एक ही पदार्थका आश्रय करनेका स्वरूप एक होनेसे, उन सभी गुणोंमें अभेद होता है,
फिर भी द्रव्यार्थिक नयके गौण और पर्यायार्थिक नयके मुख्य होनेपर एक पदार्थके आश्रित अनेक गुणोंमें अभेदकी
सिद्धि नहीं होतो, किन्तु भेदकी ही सिद्धि होती है। क्योंकि अनेक गुणोंमेंसे प्रत्येक गुणका स्वरूप स्वभिन्न अन्य
गुणके स्वरूपसे भिन्न होता है, और उन गुणोंके स्वरूपमें भेद नहीं होता—ऐसा माननेसे उनकी परस्पर भिन्नताका
अभाव हो जाता है। स्पर्श, रस, गंध और वर्ण—ये चार गुण पुद्गलके आश्रित हैं। ये सभी गुण द्रव्यार्थिक
नयकी दृष्टिसे परस्पर भिन्न नहीं होते—अपितु अभिन्न होते हैं। क्योंकि पुद्गलका आश्रय ग्रहण करनेका उनका
एक ही स्वभाव होता है। द्रव्यार्थिक नयकी गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर उन गुणोंमें अभेदकी
सिद्धि नहीं होती। क्योंकि चारों गुणोंका एक स्वभाव नहीं होता—वह भिन्न होता है। यदि इन चारों गुणों
का स्वभाव एक होता तो उनमें होनेवाले भेदका अभाव हो जाता और उनकी चारकी संख्या न रह पाती।
अतः पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर एक द्रव्याश्रित अनेक गुणोंमें स्वरूपकी दृष्टिसे अभेद सिद्ध नहीं
होता। (३) अक्रमभावि पर्याय रूप अनेक गुणोंके आश्रयभूत एक पदार्थकी दृष्टिसे भी उन अनेक गुणोंमें
अभेदकी सिद्धि नहीं होती। क्योंकि गुणोंकी अनेकताके कारण उनके आश्रयभूत पदार्थका भी अनेकरूपत्व
सिद्ध हो जाता है। गुणोंमें भेद होनेसे उनके आश्रयभूत गुणी का—पदार्थका—भी भेद हो जाता है। एक
समयमें एक ही गुणरूप अक्रमभावी पर्याय होती है। एक पदार्थमें अनेक गुण होनेसे अक्रमभावी पर्यायें भी
अनेक होती हैं। अक्रमभावी पर्यायोंकी अनेकताके कारण गुणाश्रयभूत पदार्थकी भी अनेकता सिद्ध हो
जाती है। जब गुणाश्रयभूत पदार्थकी अनेकता पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे सिद्ध होती है, तब पदार्थकी
दृष्टिसे पदार्थके गुणोंमें अभेदकी सिद्धि होना असंभव है। यदि गुणाश्रयभूत पदार्थकी अनेकता नहीं
होती—ऐसा स्वीकार करें तो पदार्थके अनेक गुणोंका आश्रय होनेमें विरोध उपस्थित होता है। यद्यपि
आम्लरस गुणयुक्त कच्चे आममें और मधुररस युक्त पके हुए आममें एकत्व प्रत्यभिज्ञानसे एकत्वकी
सिद्धि होती है, अथवा द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे उभयावस्थापन्न आमका एकत्व सिद्ध हो जाता है,
फिर भी आम्लरस गुणयुक्त आम्रफलसे मधुररस गुणयुक्त पके हुए आम्रफलका पर्यायार्थिक नयकी
दृष्टिसे भिन्नत्व ही सिद्ध होता है। यदि भिन्न-भिन्न रसगुणोंसे युक्त आम्रफलमें कथंचित् भी भेद नहीं
होता—सर्वथा अभेद ही होता है, ऐसा स्वीकार किया जाये तो कच्चे आम्रफलमें और पके हुए आम्रफलमें
सर्वथा अभेदकी सिद्धि हो जानेसे, आम्लरस गुणसे मधुररस गुणके भेदका अभाव सिद्ध हो जायेगा, तथा
आम्रफलका नाना गुणाश्रयत्व भी न रहेगा और यह आम कच्चा है और यह पका हुआ है, यह व्यवहार
न बन सकेगा। अतः रसगुणके भेदके कारण उन भिन्न रसोंके आश्रयमें भी भिन्नता होती है—यह स्वीकार
करना पड़ेगा। अतः अर्थकी दृष्टिसे भी नाना गुणाश्रयभूत पदार्थका द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे एकत्व सिद्ध
हो जानेपर भी, पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे, उस पदार्थका अनेकत्व सिद्ध हो जाता है, तो अनेक गुणोंमें
अर्थकी दृष्टिसे अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकती। (४) प्रत्येक पदार्थ अनेक या अनंत गुणोंका आश्रय होता
है। द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे यद्यपि पदार्थका एकत्व होता है, फिर भी पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे पदार्थाश्रित

जितने गुण होते हैं उतने ही उसके भेद होते हैं। एक गुणके आश्रयभूत पदार्थका भेद दूसरे गुणके आश्रयभूत
पदार्थके भेदसे पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे भिन्न होता है। पदार्थका भेद और तदाश्रित गुणमें तादात्म्य संबंध
होता है। पदार्थका भेद और तदाश्रित गुण दोनों संबंधी हैं। पदार्थके जितने भेद होते हैं, और तदाश्रित
जितने गुण होते हैं, उतने ही संबंधी होते हैं। पदार्थके भेदोंमें परस्पर भिन्नत्व होनेसे और तदाश्रित गुणोंमें
व्यवहार नयकी दृष्टिसे भेद होनेसे, एक सम्बन्धियुगलसे अन्य संबंधियुगलका भेद होता है। संबंधियुगलोंमें
परस्पर भेद होनेसे उनमें होनेवाले संबंधोंमें भी भेद होता है। संबंधियोंमें भेद होनेसे संबंधोंमें भेद होनेके
कारण, अनेक संबंधियोंके होनेसे, एक पदार्थमें एक ही संबंधका सद्भाव घटित नहीं होता—अनेक संबंधोंका
सद्भाव घटित होनेके कारण एक पदार्थके आश्रित अनेक गुणोंमें अभेदकी सिद्धि घटित नहीं होती। आम्र-
फलरूप पदार्थके एक होनेपर भी, जिसके साथ आम्लरसगुणका तादात्म्य होता है, वह आम्ररसकी अवस्था
और आम्लरसगुण तथा जिसके साथ मधुररस गुणका तादात्म्य होता है वह आम्रफलकी अवस्था
और मधुररसगुण—इन दोनोंमें परस्पर भिन्नता होती है। इन संबंधियुगलोंमें परस्पर भिन्नता
होनेसे उन युगलोंमें होनेवाले तादात्म्य स्वरूप संबंधोंमें भिन्नता होती है। अतः अनेक संबंधियोंके कारण
एक आम्रफलमें होनेवाले संबंधोंका एकत्व सिद्ध न होनेसे, आम्रफलके आम्लरसगुण और मधुररसगुणमें
अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकती। यहाँ संबंधोंकी भिन्नता पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे सिद्ध की गई हैं। (५)
गुणोंकी अपनी विशेषतासे—अपने विशेष स्वरूपसे—अपने आश्रयभूत पदार्थको युक्त करना ही पदार्थका
गुणकृत उपकार है। एक पदार्थमें अनेक-अनंत-गुण होते हैं। प्रत्येक गुण अपने आश्रयभूत पदार्थको अपने
स्वरूपसे युक्त बनाकर उस पदार्थका उपकार करता है। प्रत्येक गुणका स्वरूप निश्चित होनेसे उस गुणके
द्वारा किया जानेवाला उपकार भी निश्चित स्वरूप वाला होता है। भिन्न-भिन्न गुणोंके द्वारा किये जाने वाले
उपकारोंके निश्चित स्वरूपवाले होनेसे, अन्योन्याव्यावर्तक होनेके कारण परस्पर भिन्न होनेसे तथा अनेक होनेके
कारण, पदार्थका उपकार करनेवाले गुणोंमें भेदकी सिद्धि होती है। जब कच्चे आमको आम्लरसगुण
अपने स्वरूपसे युक्त करता है—व्याप्त करता है—तब आम्रफल क्रमसे खट्टा और मीठा कहा जाता है।
आम्लरसगुण कृत उपकार और मधुररसगुण कृत उपकारमें परस्पर भेद होता है। यदि उपकारोंमें भेद
न हुआ तो 'खट्टा आम' और 'मीठा आम'—आमकी ये अवस्थायें ही न रहेंगीं। अतः विभिन्न गुणकृत
उपकारोंमें भेद होनेसे एक पदार्थके गुणोंमें भेदकी सिद्धि हो जाती है। अथवा यदि पदार्थके सभी गुणोंमें
भेद न होता तो एक ही इन्द्रियके सभी गुणोंका ग्रहण हो जाता। यदि आम्रफलके स्पर्श, रस, गंध और
वर्णमें सर्वथा अभेद होता तो नेत्र इन्द्रिय द्वारा सभी गुणोंका युगपत् ग्रहण हो जाता। जब नेत्र इन्द्रिय द्वारा
सभी गुणोंका युगपत् ग्रहण नहीं होता ओर जब प्रत्येक गुणका उपकार भिन्न है, तब आम्रफलके सभी
गुण पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे, अन्योन्य-भिन्न हैं। (६) गुणोंके भेदसे ही पदार्थोंमें भेद पाया जाता है।
क्योंकि गुण ही पदार्थोंकी अन्योन्य-भिन्नताका कारण होते हैं। अतः गुणीकी-अनेक गुणाश्रित पदार्थकी—
द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे, पदार्थ जितने गुणोंका आश्रय होता हैं, उतने ही उसके भेद हो जाते हैं। आम्रफलके
सभी प्रदेशोंके आम्लरसगुणसे युक्त होनेसे कच्चा आम, पके हुए आम्रफलसे भिन्न होता है। क्योंकि पके हुए
आम्रफलके सभी प्रदेश मधुररसगुणसे युक्त होते हैं। आम्लरसगुण और मधुररसगुणके परस्पर भिन्न
होनेसे उनके आश्रयभूत आम्रफलमें, उनके द्रव्याथिक नयकी दृष्टिसे एक होनेपर भी पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे
उनमें विभिन्नता होती है। अतः गुणोंके भेदके कारण द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे पदार्थका एकत्व निर्बाध
होनेपर भी, पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे उस पदार्थमें भेदोंकी—अनेक रूपत्वकी-सिद्धि होती है। अतः पदार्थके
जितने गुण होते हैं, उतने उसके भेद होनेसे, उनके भेदोंसे गुणोंमें भी भेदकी सिद्धि हो जानेसे, एक
द्रव्याश्रित गुणोंमें अभेदकी सिद्धि नहीं होती। यदि गुणोंके भेद होनेपर गुणिदेशमें अभेद ही स्वीकार किया
जाय तो ज्ञानगुण और स्पर्श आदि गुणोंके परस्पर भिन्न होनेपर भी तदाश्रयभूत पदार्थोंमें अभेदकी सिद्धि
हो जायेगी--अर्थात् जीव और पुद्गल द्रव्यमें एक द्रव्यत्वकी सिद्धिका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। किन्तु

२२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
तत्त्वतोऽस्तित्वादीनामेकत्र वस्तुन्येवमभेदवृत्तेरसम्भवे कालादिभिर्भिन्नात्मनामभेदोप-
चारः क्रियते । तद्वेताभ्यमभेदवृत्त्यभेदोपचाराभ्यां कृत्वा प्रमाणप्रतिपन्नानन्तधर्मात्मकस्य
वस्तुनः समसमयं यदभिधायकं वाक्यं स सकलादेशः प्रमाणवाक्यापरपर्यायः, नयविषयी-
जीव द्रव्य और पुद्गल द्रव्य एक रूप नहीं हैं, क्योंकि उनके असाधारण धर्म-गुण-परस्पर व्यावर्तक हैं। इससे
स्पष्ट है कि जीवरूप गुणी और पुद्गलरूप गुणीके परस्पर भिन्न होनेसे उनके गुणोंकी परस्पर भिन्नता
सिद्ध होती है। अतः प्रत्येक गुणके गुणिदेशके भिन्न होनेसे, एक पदार्थाश्रित अनंत गुणोंमें गुणिदेशकी दृष्टिसे
अभेदकी सिद्धि नहीं होती। (७) दो विभिन्न पदार्थोंमें होनेवाले संयोगको संसर्ग कहते हैं। गुण और गुणीमें
तथा परिणाम और परिणामीमें, यद्यपि द्रव्यार्थिक या निश्चय नयकी दृष्टिसे अभेद होता है, फिर भी पर्यायार्थिक
या व्यवहार नयकी दृष्टिसे भेद ही होता है। व्यवहार नयकी दृष्टिसे उनमें भेदहोनेसे, परिणाम और परिणामी
तथा गुण और गुणीका जो संबंध होता है, वह संयोगरूप-संसर्गरूप-होता है। परिणाम और परिणामी तथा
गुण और गुणी दोनों संसर्गी हैं। गुणीके जितने भी गुण होते हैं वे संसर्गी हैं। गुणरूप संसर्गीके भेदसे गुण
और गुणीके सभी संसर्ग भिन्न होते हैं। यदि गुणोंमें भेद न होता तो संसर्गोंमें भी भेद न होता। प्रति समय
पदार्थकी पर्यायरूपसे परिणति होती है। उस पर्यायके साथ गुणका संसर्ग होता है। अतः द्रव्यकी प्रत्येक
पर्यायरूप संसर्गी और गुणरूप संसर्गी स्वभिन्न संसर्गियुगलसे भिन्न होता है। अतः संसर्गिभेदसे संसर्गभेदकी
सिद्धि हो जाती है। संसर्गभेदके कारण गुणोंमें अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकती। दण्डग्रहण कालमें होनेवाली
देवदत्तकी पर्याय तथा दण्ड-इन दोनोंमें जो संसर्ग होता है, वह छत्रग्रहण कालमें होनेवाली देवदत्तकी पर्याय
और छत्र-इनमें होनेवाले संसर्गसे भिन्न होनेके कारण, जिस प्रकार दण्ड और छत्रमें अभेद सिद्ध नहीं होता,
उसी प्रकार संसर्ग भेदके कारण पदार्थके अनेक गुणोंमें भेद नहीं होता। (८) वाच्यभूत अर्थके [अनेक और
भिन्न होनेसे, उनके वाचक शब्द अनेक और भिन्न होते हैं। एक पदार्थगत अनेक वाच्यभूत धर्मोंके वाचक
शब्द अनेक और भिन्न-भिन्न होते हैं। धर्मोंके वाचक शब्दके भिन्न-भिन्न होनेसे-एक शब्दके द्वारा वाच्य न
होनेसे-शब्दकी दृष्टिसे भी, एक पदार्थाश्रित धर्मों-गुणों-में अभेंदकी सिद्धि नहीं होती। यदि एक पदार्थके
आश्रित अनन्त धर्मोंका वाचक एक ही शब्द होता है--ऐसा स्वीकार किया गया, तो सभी पदार्थोंका वाचक
एक ही शब्दके होनेकी आपत्ति उपस्थित हो जानेसे, अन्य शब्दोंकी विफलता होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता
है। इस प्रकार व्यवहार नय या पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे अस्तित्व आदि धर्मोंका एक वस्तुमें अभेद रूपसे
आश्रित रहना असंभव होनेके कारण, काल आदि की दृष्टिसे भिन्न स्वरूप होनेवाले धर्मोंमें अभेदका उपचार
किया जाता है-अर्थात् 'इनमें भेद नहीं होता', ऐस उपचारसे कहा जाता है।
इससे स्पष्ट है कि द्रव्यार्थिक नय या निश्चय नयकी दृष्टिसे पदार्थाश्रित अनंत धर्मोंमें, तथा पदार्थ
और उसके अनंत धर्मोंमें अभेद होता है, तथा पर्यायार्थिक नय या व्यवहार नयकी दृष्टिसे उनमें भेद होता
है। जब पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे अनन्त गुणोंमें, तथा गुण और गुणीमें भेदकी प्रधानता होती है, तब
अभेदका उपचार किया जाता है, तथा जब द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे अनंत गुणोंमें तथा गुण और गुणीमें
अभेदकी प्रधानता होती है, तब भेदका उपचार किया जाता है) ।¹
द्रव्यार्थिक नयकी गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर काल आदिसे परस्पर भिन्न
होनेवाले अस्तित्व आदि गुणोंकी एक पदार्थमें, वस्तुतः इस प्रकार अन्योन्य-भेद रूपसे स्थितिकी संभाव्यता
न होनेपर, 'अस्तित्व आदि गुणोंकी एक पदार्थमें अभेदसे-अन्योन्य-भेद रूपसे-स्थिति होती है'-ऐसा
अभेदका उपचार किया जाता है। अतएव अभेदवृत्ति और अभेदोपचार-इन दोनोंसे, प्रमाणद्वारा प्रतिपन्न
अनन्त धर्मोंसे युक्त वस्तुका युगपत् प्रतिपादन करनेवाला वाक्य सकलादेश अथवा प्रमाणवाक्य है। तथा, नयके
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २२१
कृतस्य वस्तुधर्मस्य भेदवृत्तिप्राधान्याद् भेदोपचाराद् वा क्रमेण यदभिधायकं वाक्यं स विकला-
देशो नयवाक्यापरपर्यायः । इति स्थितम् । ततः साधूक्तम् आदेशभेदोदितसप्तभङ्गम् ॥
इति काव्यार्थः ॥ २३ ॥
द्वारा विषयीकृत वस्तुधर्मका पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे उस वस्तुधर्मकी, उस वस्तुके अन्य धर्मोंसे भिन्न
रूपसे वस्तुमें स्थितिकी प्रधानता होनेसे, तथा द्रव्यार्थिक नयकी दृष्टिसे वस्तुधर्मके, उस वस्तुके अन्य धर्मोंसे
अभिन्न रूपसे स्थिति होनेके कारण, उस वस्तुधर्मका उस वस्तुके अन्य धर्मोंसे भेदका उपचार होनेसे,
क्रमसे प्रतिपादन करनेवाला वाक्य विकलादेश अथवा नयवाक्य है । यह सिद्ध हो गया । अतएव सकलादेश और
विकलादेशके भेदसे जिसके सात भंग प्रतिपादित किये गये हैं, वह ठीक ही है ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥२३॥
भावार्थ—इस श्लोकमें जैन दर्शनके सात भंगोंका प्ररूपण किया गया है । ‘सप्तभंगी’ अनेकान्तवाद-
का समर्थन करनेवाली युक्तिविद्या है । जैन सिद्धांतके अनुसार प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म विद्यमान हैं ।
इन अनन्त धर्मोंका कथन एक समयमें किसी एक शब्दसे नहीं किया जा सकता । इसलिये जैन विद्वानोंने
नयवाक्यका निर्देश किया है। इसी प्रमाणवाक्य और नयवाक्यको क्रमसे सकलादेश और विकलादेश
कहते हैं। पदार्थके धर्मोंका काल, आत्मरूप, अर्थ, संबंध, उपकार, गुणिदेश, संसर्ग और शब्दकी अपेक्षा
अभेद रूपसे एक साथ कथन करनेवाले वाक्यको सकलादेश, अथवा प्रमाणवाक्य कहते हैं । तथा काल,
आत्मरूप आदिकी भेद विवक्षासे पदार्थोंके धर्मोंको क्रमसे कहनेवाले वाक्यको विकलादेश, अथवा नयवाक्य
कहते हैं। सकलादेश और विकलादेश प्रमाणसप्तभंगी और नयसप्तभंगीके भेदसे सात-सात वाक्योंमें
विभक्त हैं ।
( १ ) स्यादस्ति जीवः—किसी अपेक्षासे जीव अस्ति रूप ही है । इस भंगमें द्रव्यार्थिक नयकी
प्रधानता, और पर्यायार्थिक नयकी गौणता है। इसलिये जब हम कहते हैं कि ‘स्यादस्त्येव जीवः’, तो
इसका अर्थ होता है कि किसी अपेक्षासे जीवके अस्तित्व धर्मकी प्रधानता, और नास्तित्व धर्मकी गौणता
है। दूसरे शब्दोंमें हम कह सकते हैं कि जीव अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा विद्यमान है,
और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा नहीं। यदि जीव अपने द्रव्य आदिकी अपेक्षा अस्ति रूप,
और दूसरे द्रव्य आदिकी अपेक्षा नास्ति रूप न हो, तो जीवका स्वरूप नहीं बन सकता । ( २ ) स्यान्नास्ति
जीवः—किसी अपेक्षासे जीव नास्ति रूप ही है। इस भंगमें पर्यायार्थिक नयकी मुख्यता, और द्रव्यार्थिक
नयकी गौणता है। जीव परसत्ताके अभावकी अपेक्षाको मुख्य करके नास्ति रूप है, तथा स्वसत्ताके भावकी
अपेक्षाको गौण करके अस्ति रूप है। यदि पदार्थोंमें परसत्ताका अभाव न माना जाय, तो समस्त पदार्थ एक
रूप हो जाय । यह परसत्ताका अभाव अस्तित्व रूपकी तरह स्वसत्ताके भावकी अपेक्षा रखता है । इसलिये
जिस प्रकार स्वसत्ताका भाव अस्तित्व रूपसे है, और नास्तित्व रूपसे नहीं, उसी तरह परसत्ताका अभाव भी
स्वसत्ताके भावकी अपेक्षा रखता है । कोई भी वस्तु सर्वथा भाव अथवा अभाव रूप नहीं हो सकती,
इसलिये भाव और अभावको सापेक्ष ही मानना चाहिये । ( ३ ) स्यादस्ति च नास्ति च जीवः—जीव
कथंचित् अस्ति और नास्ति स्वरूप है । इस नयमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक दोनों नयोंकी प्रधानता है ।
जिस समय वक्ताके अस्ति और नास्ति दोनों धर्मोंके कथन करनेकी विवक्षा होती है, उस समय इस
भंगका व्यवहार होता है । यह नय भी कथंचित् रूप है । यदि वस्तुके स्वरूपको सर्वथा वक्तव्य मानकर
किसी अपेक्षासे भी अवक्तव्य न मानें, तो एकान्त पक्षमें अनेक दूषण आते हैं। ( ४ ) स्यादवक्तव्य
जीवः—जीव कथंचित् अवक्तव्य ही है। इस भंगमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक दोनों नयोंकी अप्रधानता
है। ऊपर कहा चुका है कि जिस समय वस्तुका स्वरूप एक नयकी अपेक्षा कहा जाता है, उस समय
दूसरा नय सर्वथा निरपेक्ष नहीं रहता । किन्तु जिस नयकी जहां विवक्षा होती है, वह नय वहां प्रधान
होता है, और जिस नयकी जहां विवक्षा नहीं होती, वह नय वहां गौण होता हैं। प्रथम भंगमें जीवके

२२२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
अनन्तरं भगवद्दर्शितस्यानेकान्तात्मनो वस्तुनो बुधरूपवेद्यत्वमुक्तम् । अनेकान्तात्मकत्वं
च सप्तभङ्गीप्ररूपणेन सुखोन्नेयं स्यादिति सापि निरूपिता । तस्यां च विरुद्धधर्माध्यासितं
वस्तु पश्यन्त एकान्तवादिनोऽबुधरूपा विरोधमुद्भावयन्ति तेषां प्रमाणमार्गात् च्यवनमाह—
उपाधिभेदोपहितं विरुद्धं नार्थेष्वसत्त्वं सदवाच्यते च ।
इत्यप्रबुध्यैव विरोधभीता जडास्तदेकान्तहताः पतन्ति ॥२४॥
अर्थेषु पदार्थेषु चेतनाचेतनेषु असत्त्वं नास्तित्वं न विरुद्धं न विरोधावरुद्धम् । अस्तित्वेन
सह विरोधं नानुभवतीत्यर्थः । न केवलमसत्त्वं न विरुद्धम् किंतु सदवाच्यते च । सत्त्वावाच्यं
च सद्वाच्ये, तयोर्भावौ सद्वाच्यते । अस्तित्वावक्तव्यत्वे इत्यर्थः । ते अपि न विरुद्धे ।
तथाहि—अस्तित्वं नास्तित्वेन सह न विरुध्यते । अवक्तव्यत्वमपि विधिनिषेधात्मकमन्योन्यं
न विरुध्यते । अथवा अवक्तव्यत्वं वक्तव्यत्वेन साकं न विरोधमुद्वहति । अनेन च नास्तित्वा-
अस्तित्वकी मुख्यता है, दूसरे भंगमें नास्तित्व धर्मकी मुख्यता है। अस्तित्व और नास्तित्व दोनों धर्मोंकी
मुख्यतासे जीवका एक साथ कथन करना संभव नहीं है, क्योंकि एक शब्दसे अनेक गुणोंका निरूपण नहीं
हो सकता । इसलिये एक साथ अस्तित्व और नास्तित्व दोनों धर्मोंकी अपेक्षासे जीव कथंचित् अवक्तव्य
ही है। ( ५ ) स्यादस्ति च अवक्तव्यश्च जीवः—जीव कथंचित् अस्ति रूप और अवक्तव्य रूप है।
इस नयमें द्रव्यार्थिक नयकी प्रधानता, और द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिककी अप्रधानता है। किंचित् द्रव्यार्थ
अथवा पर्यायर्थ विशेषके आश्रयसे जीव अस्ति स्वरूप है, तथा द्रव्यसामान्य और पर्यायसामान्य अथवा द्रव्यविशेष
और पर्यायविशेषकी एक साथ अभिन्न विवक्षासे जीव अवक्तव्य स्वरूप है। जैसे, जीवत्व अथवा मनुष्यत्वकी
अपेक्षासे आत्मा अस्तित्व स्वरूप है, तथा द्रव्यसामान्य और पर्यायसामान्यकी अपेक्षा वस्तुके भाव और
अवस्तुके अभावके एक साथ अभेदकी अपेक्षा आत्मा अवक्तव्य है। ( ६ ) स्यान्नास्ति च अवक्तव्यश्च
जीवः—जीव कथंचित् नास्ति और अवक्तव्य रूप है। इस भंगमें पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता, और
द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक दोनोंकी अप्रधानता है। जीव पर्यायकी अपेक्षासे नास्ति रूप है, तथा अस्तित्व
और नास्तित्व दोनों धर्मोंकी एक साथ अभेद विवक्षासे अवक्तव्य स्वरूप है। ( ७ ) स्यादस्ति च नास्ति
चावक्तव्यश्च जीवः—जीव कथंचित् अस्ति, नास्ति और अवक्तव्य रूप है। जीव द्रव्यकी अपेक्षा अस्ति,
पर्यायकी अपेक्षा नास्ति और द्रव्य-पर्याय दोनोंकी एक साथ अपेक्षासे अवक्तव्य रूप है। इस भंगमें द्रव्यार्थिक
और पर्यायार्थिक दोनोंकी प्रधानता और अप्रधानता है।
जिन भगवान् द्वारा प्रतिपादित अनेकान्तात्मक वस्तु पंडितों द्वारा जानने योग्य है, यह कहा जा
चुका है। सप्तभंगीके प्ररूपणके द्वारा वस्तुके अनेकान्तात्मक होनेका ज्ञान सुखपूर्वक होता है, इसलिये उस
सप्तभंगीका भी प्ररूपण कर दिया गया है। वस्तुको विरुद्धधर्माध्यासित रूपमें देखनेवाले एकांतवादी
अज्ञानी लोग उस सप्तभंगीमें विरोधकी उद्भावना करते हैं। ये एकान्तवादी सन्मार्गसे च्युत होते हैं—
श्लोकार्थ—पदार्थोंमें अंशोंके अनेकत्वसे व्यक्त हुआ नास्तित्व अस्तित्वका, अस्तित्व नास्तित्वका
तथा अवक्तव्य वक्तव्यका विरोधी नहीं होता । ऐसा जाने बिना ही वस्तुगत धर्मोंमें विरोध होनेके भयसे
व्याकुल, सत्त्व आदि रूप एकान्तोंसे आहत मूर्ख लोग न्यायमार्गसे च्युत होते हैं।
व्याख्यार्थ—जिस तरह चेतन और अचेतन पदार्थोंमें अस्तित्व और नास्तित्वमें परस्पर कोई
विरोध नहीं, उसी तरह विधि और निषेध रूप अवक्तव्यका भी अस्तित्व और नास्तित्वसे विरोध नहीं है।
अथवा, अवक्तव्यका वक्तव्यके साथ कोई विरोध नहीं, इसलिये अवक्तव्यका अस्तित्व और नास्तित्वसे भी
विरोध नहीं है। अतएव अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य इन तीन मूल भंगोंमें परस्पर विरोध न होनेसे

अन्य. यो. व्य. श्लोक २४ ] स्याद्वादमञ्जरी २२३
स्तित्वावक्तव्यत्वलक्षणभङ्गत्रयेण सकलसप्तभङ्ग्या निर्विरोधता उपलक्षिता । अमीषामेव त्रयाणां
मुख्यत्वाच्छेषभङ्गानां च संयोगजत्वेनामीष्वेवान्तर्भावादिति ॥
नन्वेते धर्माः परस्परं विरुद्धाः तत्कथमेकत्र वस्तुन्येषां समावेशः संभवति इति विशेषण-
द्वारेण हेतुमाह उपाधिभेदोपहितम् इति । उपाधयोऽवच्छेदका अंशप्रकाराः तेषां भेदो नानात्वम्,
तेनोपहितमर्पितम् । असत्त्वस्य विशेषणमेतत् । उपाधिभेदोपहितं सदर्थेष्वसत्त्वं न विरुद्धम् ।
सद्वाच्यतयोश्च वचनभेदं कृत्वा योजनीयम् । उपाधिभेदोपहिते सती सद्वाच्यते अपि
न विरुद्धे ।
अयमभिप्रायः । परस्परपरिहारेण ये वर्तेते तयोः शीतोष्णवत् सहानवस्थानलक्षणो
विरोधः । न चात्रैवम्, सत्त्वासत्त्वयोरितरेतरमविवग्भावेन वर्तनात् । न हि घटादौ सत्त्वम-
सत्त्वं परिहृत्य वर्तते, पररूपेणापि सत्त्वप्रसङ्गात् । तथा च तद्व्यतिरिक्तान्तरान्तराणां नैरर्थक्यम्,
तेनैव त्रिभुवनार्थसाध्यार्थक्रियाणां सिद्धेः । न चासत्त्वं सत्त्वं परिहृत्य वर्तते, स्वरूपेणाप्य-
सम्पूर्ण सप्तभंगीमें भी कोई विरोध नहीं आता क्योंकि आदिके तीन भंग ही मुख्य भंग हैं, शेष भंग इन्हीं
तीनोंके संयोगसे बनते हैं, अतएव उनका इन्हींमें अंतर्भाव हो जाता है ।
शंका—अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य परस्पर विरुद्ध हैं, अतएव ये किसी वस्तुमें एक साथ
नहीं रह सकते । समाधान—वास्तवमें अस्तित्व आदिमें विरोध नहीं है, क्योंकि अस्तित्व आदि किसी
अपेक्षासे स्वीकार किये गये हैं । पदार्थोंमें अस्तित्व, नास्तित्व आदि अनेक धर्म विद्यमान हैं । जिस समय
हम पदार्थोंमें अस्तित्व धर्म सिद्ध करते हैं, उस समय अस्तित्व धर्मकी प्रधानता और अन्य धर्मोंकी गौणता
रहती है । अतएव अस्तित्व और नास्तित्व धर्ममें परस्पर विरोध नहीं है । इसी तरह अस्तित्व और
अवक्तव्य भी अपेक्षाके भेदसे माने गये हैं । इसलिये इनमें विरोध नहीं आता ।
यहाँ अभिप्राय है—जिस प्रकार उष्णका परिहार करके शीत अस्तिरूप होता है, और शीतका
परिहार करके उष्ण अस्ति रूप होता है—अर्थात् शीत और उष्ण एक पदार्थमें एक साथ नहीं रहते—
उसी प्रकार जो एक दूसरेका परिहार करके स्वयं अस्तिरूप होता है; उसीमें सहानवस्थारूप विरोध होता है ।
लेकिन यहाँ यह बात नहीं है । क्योंकि सत्त्व अर्थात् अस्तित्व धर्म और असत्त्व अर्थात् नास्तित्व धर्म परस्पर
तादात्म्य संबंधको प्राप्त होकर—एक दूसरेका परिहार न करते हुए एक वस्तुमें एक साथ रहते हैं । घट
आदि पदार्थमें होनेवाला घट स्वरूपसे सत्त्व ( अस्तित्व ), उस घट आदि पदार्थमें होनेवाले घटभिन्न
पदार्थके स्वरूपसे असत्त्व ( नास्तित्व ) का परिहार करके घट आदि पदार्थोंमें नहीं रहता—अर्थात् दोनों धर्म
घट आदि पदार्थमें रहते हैं । क्योंकि यदि घट आदि पदार्थमें होनेवाले घटस्वरूपसे सत्त्वके द्वारा उस घट आदि
पदार्थमें होनेवाले घट आदि भिन्न पदार्थके स्वरूपसे असत्त्व ( नास्तित्व ) का परिहार किया गया तो घट
आदि पदार्थसे भिन्न पदार्थके स्वरूपसे असत्त्वका घट आदि पदार्थमें अभाव हो जानेसे, घट आदि पदार्थके घट
आदि पदार्थ-भिन्न पदार्थके स्वरूपसे युक्त बन जाने अथवा पररूपसे भी सद्रूप होनेका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा ।
तथा, घट आदि पदार्थकी घट आदि पदार्थ-भिन्न पदार्थके स्वरूपसे भी सद्रूपता होनेपर, घट आदि पदार्थ
भिन्न पदार्थ निरर्थक बन जायेंगे । क्योंकि तीनों लोकोंके पदार्थके द्वारा सिद्ध की जानेवाली अर्थक्रियाओं की
सिद्धि उसी घट पदार्थसे हो जायेगी । तथा असत्त्व—घट आदि पदार्थ-भिन्न पदार्थके स्वरूपसे घट आदि
पदार्थका नास्तित्त्व—घट आदि पदार्थमें घट आदि पदार्थके स्वरूपसे होनेवाले सत्त्व ( अस्तित्व ) का परिहार
करके घट आदि पदार्थमें नहीं रहता । यदि ऐसा होतो घट आदि पदार्थके स्वरूपसे घट आदि पदार्थमें होनेवाले
सत्त्व (अस्तित्व) का घट आदि पदार्थ-भिन्न पदार्थके स्वरूपसे घट आदि पदार्थमें होनेवाले असत्त्व ( नास्तित्व )
द्वारा परिहार किया जानेसे, घट आदि पदार्थमें होनेवाले स्वरूपसे सत्त्व (अस्तित्व) का अभाव हो जानेके कारण,
घट आदि पदार्थके स्वरूपसे भी असत्त्व (नास्तित्व) हो जानेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । घट आदि पदार्थ-

२२४ श्रीमद्द्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
सत्त्वप्राप्तेः । तथा च निरूपाख्यत्वात् सर्वशून्यतेति । तदा हि विरोधः स्याद् यद्येकोपाधिकं
सत्त्वमसत्त्वं च स्यात् । न चैवम् । यतो न हि येनैवांशेन सत्त्वं तेनैवासत्त्वमपि । किं त्वन्यो-
पाधिकं सत्त्वम्, अन्योपाधिकं पुनरसत्त्वम् । स्वरूपेण हि सत्त्वं पररूपेण चासत्त्वम् ॥
दृष्टं ह्येकस्मिन्नेव चित्रपटावयवनि अन्योपाधिकं तु नीलत्वम्, अन्योपाधिकाश्चेतरे
वर्णाः । नीलत्वं हि नीलीरागाद्युपाधिकम्, वर्णान्तराणि च तत्तद्रञ्जनद्रव्योपाधिकानि । एवं
मेचकरत्नेऽपि तत्तद्वर्णपुद्गलोपाधिकं वैचित्र्यमवसेयम् । न चैभिर्दृष्टान्तैः सत्त्वासत्त्वयोर्भिन्न-
देशत्वप्राप्तिः चित्रपटाद्यवयविन एकत्वात् तत्रापि भिन्नदेशत्वासिद्धेः । कथंचित्पक्षस्तु दृष्टान्ते
दाष्ट्रान्तिके च स्याद्वादिनां न दुर्लभः । एवमप्यपरितोषश्चेद् आयुष्यमतः, तर्ह्येकस्यैव पुंसस्तत्तदु-
पाधिभेदात् पितृत्वपुत्रत्वमातुलत्वभागिनेयत्वपितृव्यत्वभ्रातृव्यत्वादिधर्माणां परस्परविरुद्धा-
नामपि प्रसिद्धिरर्शनात् किं वाच्यम् । एवमवक्तव्यत्वादयोऽपि वाच्या इति ॥
उक्तप्रकारेण उपाधिभेदेन वास्तवं विरोधाभावमप्रबुध्यैवाज्ञात्वैव । एवकारोऽवधारणे ।
स च तेषां सम्यग्ज्ञानस्याभाव एव न पुनर्लेशतोऽपि भाव इति व्यनक्ति । ततस्ते विरोधभीताः
सत्त्वासत्त्वादिधर्माणाम्बहिर्मुखशेमुष्या संभावितो वा विरोधः सहानवस्थानादिः, तस्माद्
भीतास्त्रस्तमानसाः । अत एव जडाः तात्त्विकभयहेतोरभावेऽपि तथाविधपशुवद् भीरुत्वान्मूर्खाः
परवादिनः । तदेकान्तहताः तेषां सत्त्वादिधर्माणाम् य एकान्त इतरधर्मनिषेधेन स्वाभिप्रेतधर्म-
व्यवस्थापननिश्चयस्तेन हता इव हताः । पतन्ति स्खलन्ति पतिताश्च सन्तस्ते न्यायमार्गाक्रमणे
न समर्थाः । न्यायमार्गाध्वनीनानां च सर्वेषामप्याक्रमणीयतां यान्तीति भावः । यद्वा पतन्तीति
प्रमाणमार्गतः च्यवन्ते । लोके हि सन्मार्गच्युताः पतित इति परिभाष्यते । अथवा यथा वज्रा-
का स्वस्वरूपसे भी अस्तित्व न रहा तो सभी पदार्थोंके निरुपाय बन जानेसे—सभी पदार्थों

अन्य. यो. व्य. श्लोक २४ ] स्याद्वादमञ्जरी २२५
द्विप्रहारेण हतः पतितो मूर्च्छामितुच्छामानसाद्य निरुद्धवाक्प्रसरो भवति, एवं तेऽपि वादिनः
स्वाभिमतैकान्तवादेन युक्तिसरणीमननुसरता वज्राशनिप्रायेण निहताः सन्तः स्याद्वादिनां
पुरतोऽकिञ्चित्करा वाङ्मात्रमपि नोच्चारयितुमीशत इति ।
अत्र च विरोधस्योपलक्षणत्वात् वैयधिकरण्यम् अनवस्था संकरः व्यतिकरः संशयः
अप्रतिपत्तिः विषयव्यवस्थाहानिरित्येतेऽपि परोद्भाविता दोषा अभ्यूह्याः । तथाहि—सामान्य-
विशेषात्मकं वस्तु इत्युपन्यस्ते परे उपालम्भारो भवन्ति । यथा—सामान्यविशेषयोर्विधि-
प्रतिषेधरूपयोर्विरुद्धधर्मयोरेकत्राभिन्ने वस्तुनि असंभवात् शीतोष्णवदिति विरोधः । न हि
यदेव विधेरधिकरणं तदेव प्रतिषेधस्याधिकरणं भवितुमर्हति, एकरूपतापत्तेः, ततो वैयधि-
करण्यमपि¹ भवति । अपरं च येनात्मना सामान्यस्याधिकरणं येन च विशेषस्य तावप्यात्मानौ
एकेनैव स्वभावेनाधिकरोति द्वाभ्यां वा स्वभावाभ्याम् ? एकेनैव चेत् तत्र पूर्ववद् विरोधः ।
द्वाभ्यां वा स्वभावाभ्यां सामान्यविशेषाख्यं स्वभावद्वयमधिकरोति तदानवस्था², तावपि
निषेध करके अपने मतको स्थापित करनेके लिये एकान्त पक्षका अवलम्बन लेनेवाले युक्तिमार्गका अनुसरण
करनेमें असमर्थ मूर्ख एकान्तवादी एकान्तवादके वज्रप्रहारसे स्याद्वादियोंके समक्ष निस्तेज होकर न्यायमार्गसे
च्युत होकर अवाक् हो जाते हैं।
शंका—इस श्लोकमें 'विरोधभीताः' इस सामासिक पदमें पाये जानेवाले 'विरोध' शब्दके उप-
लक्षण होनेसे दूसरोंके द्वारा प्रतिपादित विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति
और विषयव्यवस्थाहानि—ये आठ दोष आते हैं : ( १ ) जिस प्रकार एक अभिन्न वस्तुमें शीत और उष्ण
इन विरुद्ध धर्मोंके सद्भावका संभव न होनेसे उन दोनोंमें विरोध होता है, उसी प्रकार एक अभिन्न वस्तुमें
विधिरूप ( अस्तित्व रूप ) सामान्य धर्म तथा प्रतिषेध रूप ( नास्तित्व रूप ) विशेष धर्म—इन विरुद्ध धर्मोंके
सद्भाव न होनेसे उन दोनोंमें विरोध होता है । ( २ ) जो विधि ( विधिरूप सामान्य अर्थात् अस्तित्व ) का
अधिकरण होता है, वही प्रतिषेध ( प्रतिषेधरूप विशेष अर्थात् नास्तित्व ) का अधिकरण होने योग्य नहीं ।
अन्यथ। उन दोनोंके एक रूप होनेसे विधि और प्रतिषेध, इन दोनोंकी एकरूपताका प्रसंग उपस्थित हो
जायँगा । विधि धर्म और प्रतिषेध धर्म ( अस्तित्व और नास्तित्व धर्म ) का अधिकरण एक होनेसे दोनोंका
अभेद सिद्ध हो जानेका प्रसंग उपस्थित होनेके कारण उन दोनोंके अधिकरणोंमें भी भेद सिद्ध होता है—
वैयधिकरण्य । ( ३ ) जिस रूप—स्वरूप—से पदार्थ ( विधिरूप—अस्तित्वरूप ) सामान्यका अधिकरण होता
है और जिस रूपसे ( पररूपसे ) वही पदार्थ ( प्रतिषेध रूप—नास्तित्व रूप ) विशेषका अधिकरण होता है,
उन दोनों रूपों ( स्वरूप और पररूप ) को एक ही रूपसे ( स्वरूप और पररूप—इन दोनों रूपोंमेंसे किसी
एक रूपसे ) वह पदार्थ धारण करता है, अथवा उन दोनों रूपोंसे धारण करता है ? ( स्वरूप और पररूप )
इन दोनों रूपोंमेंसे किसी एक ही रूपसे ( स्वरूप और पररूप इन रूपोंको ) धारण करता हो तो एक अभिन्न
पदार्थमें इन दोनों रूपोंका सद्भाव होनेमें विरोध उपस्थित हो जाता है—एक ही स्वभावसे एक ही अभिन्न
पदार्थमें स्वरूप और पररूपका सद्भाव होनेमें विरोध उपस्थित होता है । स्वरूप और पररूप इन दोनों
स्वभावोंसे सामान्यरूप और विशेषरूप इन दोनों स्वभावों ( पदार्थों ) को धारण करता है, यदि ऐसा स्वीकार
किया जाये तो अनवस्था दोष उपस्थित होता है । क्योंकि वे दोनों स्वरूप और पररूप स्वभावोंको, अन्य
स्वरूप और पररूप—इन दो स्वभावोंसे, फिर इन स्वरूप और पररूप स्वभावोंको अन्य स्वरूप और पररूप—इन
दो स्वभावोंसे धारण करनेकी अप्रामाणिक अनंत कल्पनायें करनी पड़ती हैं । ( ४ ) जिस स्वरूपसे पदार्थ
सामान्य ( अस्तित्वका ) का अधिकरण होता है, उसी रूपसे सामान्य ( अस्तित्व ) और विशेष ( नास्तित्व )
१. विभिन्नाधिकरणवृत्तित्वम् ।
२. अप्रामाणिकपदार्थपरम्परापरिकल्पनाविश्रान्त्यभावश्चानवस्था ।
२९

२२६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
स्वभावान्तराभ्याम् तावपि स्वभावान्तराभ्यामिति । येनात्मना सामान्यस्याधिकरणं तेन
सामान्यस्य विशेषस्य च, येन च, विशेषस्याधिकरणं तेन विशेषस्य सामान्यस्य चेति संकर-
दोषः१ । येन स्वभावेन सामान्यं तेन विशेषः, येन विशेषस्तेन सामान्यमिति व्यतिकरः२ ।
ततश्च वस्तुनोऽसाधारणाकारेण निश्चेतुमशक्तेः संशयः । ततश्चाप्रतिपत्तिः । ततश्च प्रमाण-
विषयव्यवस्थाहानिरिति ॥
एते च दोषाः स्याद्वादस्य जात्यन्तरत्वाद् निरवकाशा एव । अतः स्याद्वादमर्मवेदिभि-
रुद्धरणीयास्तत्तदुपपत्तिभिरिति स्वतन्त्रतया निरपेक्षयोरेव सामान्यविशेषयोर्विधिप्रतिषेधरूप-
योस्तेषामवकाशात् । अथवा विरोधशब्दोऽत्र दोषवाची यथा विरुद्धमाचरतीति दुष्टमित्यर्थः ।
ततश्च विरोधेभ्यो विरोधवैयधिकरण्यादिदोषेभ्यो भीता इति व्याख्येयम् । एवं च सामान्य-
शब्देन सर्वा अपि दोषव्यक्तयः संगृहीता भवन्ति ॥ इति काव्यार्थः ॥ २४ ॥
का अधिकरण हो जानेसे, तथा जिस रूपसे पदार्थ विशेष ( नास्तित्व ) का अधिकरण होता है, उसी रूपसे
विशेष ( नास्तित्व ) और सामान्य ( अस्तित्व ) का अधिकरण हो जानेसे संकर दोष आता है । अर्थात्
जिस रूपसे ( स्वरूप चतुष्टयसे ) पदार्थमें अस्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी रूपसे ( स्वरूप चतुष्टयसे )
उसी पदार्थमें नास्तित्व धर्मका सद्भाव होनेका प्रसंग आ जानेके कारण, तथा जिस रूपसे (पररूप चतुष्टयसे)
पदार्थमें नास्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी रूपसे ( पररूप चतुष्टयसे ) उसी पदार्थमें अस्तित्व धर्मका
सद्भाव होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । ( ५ ) जिस स्वरूपसे पदार्थमें सामान्य-अस्तित्व-का सद्भाव
होता है, उसी स्वरूपसे, उसी पदार्थमें विशेष-नास्तित्व-का सद्भाव होनेसे, तथा जिस स्वरूपसे पदार्थमें
विशेष-नास्तित्व-का सद्भाव होता है, उसी स्वरूपसे, उसी पदार्थमें सामान्य-अस्तित्व-का सद्भाव होनेसे
व्यतिकर नामक दोष आता है । ( ६ ) व्यतिकर दोष आ जानेसे वस्तुका सत्त्वरूप या असत्त्वरूप
असाधारण धर्मके द्वारा निश्चय करनेकी शक्तिका अभाव होनेके कारण संशय नामक दोष उपस्थित होता
है । ( ७ ) संशय होनेसे वस्तुका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता, अतएव स्याद्वादमें अप्रतिपत्ति दोष आता
है । ( ८ ) तथा, वस्तुका यथार्थ ज्ञान न होनेसे वस्तुकी व्यवस्था नहीं बनती, अतएव स्याद्वादमें विषय-
व्यवस्थाहानि ( अभाव ) दोष आता है ।
( उक्त आठ दोषोंका परिहार - ( १ ) किसी न किसी प्रकारसे प्रतीतिका-ज्ञानका-विषय
बननेवाले पदार्थमें स्वरूपकी अपेक्षासे विपरीत भासमान विवक्षित सत्त्वधर्ममें, और पररूपकी अपेक्षासे
भासमान विवक्षित असत्त्वधर्ममें विरोध नहीं होता । दो धर्मोंमेंसे एक धर्मका एक पदार्थमें सद्भाव होनेपर
जब दूसरे धर्मकी उपलब्धि नहीं होती, तब अनुपलब्धिसे उपलभ्यमान धर्म और अनुपलभ्यमान धर्ममें विरोधकी
सिद्धि होती है । स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावके रूपसे पदार्थका जब अस्तित्व होता है, तब
परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावके रूपसे ( अर्थात् जिस पदार्थमें स्वरूपादिचतुष्टयसे अस्तित्व धर्मका
सद्भाव होता है, उसी पदार्थमें पररूपचतुष्टयका अभाव होनेसे ) उसी पदार्थके नास्तित्व धर्मका उपलब्ध
( प्राप्ति ) नहीं होता, ऐसी बात नहीं है । क्योंकि जिस प्रकार स्वरूपादिसे अस्तित्व धर्मका सद्भाव अनुभवसे
सिद्ध है, उसी प्रकार पररूपादिसे नास्तित्व धर्मका सद्भाव भी अनुभवसे सिद्ध है । वस्तुका सर्वथा अर्थात्
स्वरूप और पररूपसे अस्तित्व ही वस्तुका स्वरूप नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार स्वरूपसे अस्तित्व वस्तुका
स्वरूप होता है, उसी प्रकार पररूपसे भी अस्तित्व वस्तुका धर्म बन जायगा । वस्तुका सर्वथा अर्थात् स्वरूप
और पररूपसे नास्तित्व भी वस्तुका स्वरूप नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार पररूपसे नास्तित्व वस्तुका स्वरूप
होता है, उसी प्रकार स्वरूपसे भी नास्तित्व वस्तुका धर्म बन जायगा ।
१. येन रूपेण सत्त्वं तेन रूपेणासत्त्वस्यापि प्रसंगः । येन रूपेण चासत्त्वं तेन रूपेण सत्त्वस्यापि प्रसंग इति
संकरः । “सर्वेषां युगपत्प्राप्तिस्संकरः” इत्यभिधानात् ।
२. येन रूपेण सत्त्वं तेनरूपेणासत्त्वमेव स्यान्न तु सत्त्वं । येन रूपेण चासत्त्वं तेन सत्त्वमेव स्यान्नत्वसत्त्वम्
इति व्यतिकरः । “परस्परविषयगमनं व्यतिकरः” इति वचनात् । सप्तभंगीतरंगिण्यां पृ. ८२ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २४ ] स्याद्वादमञ्जरी २२७
शंका—पररूपसे वस्तुका जो नास्तित्व धर्म है, उसका अर्थ वस्तुमें उस वस्तुसे भिन्न वस्तुके
स्वरूपका अभाव ही है। घटमें पटके स्वरूपका अभाव होनेपर 'घट नहीं है', ऐसा नहीं कहा जा सकता;
क्योंकि भूतलमें घटका अभाव होनेपर 'भूतलमें घट नहीं है' इस वाक्यकी जिस प्रकार प्रवृत्ति होती है,
उसी प्रकार घटमें पटके स्वरूपका अभाव होनेपर 'घटमें पट नहीं है', ऐसा ही कहना उचित है
समाधान—यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि वह विचारको सह्य नहीं है। घट आदिमें जो घट
आदिसे भिन्न पटके स्वरूपका अभाव होता है, वह पट आदिका धर्म होता है या घटका धर्म होता है ?
घट आदिमें पटके स्वरूपका अभाव पटका धर्म नहीं हो सकता; क्योंकि उसके पटका धर्म होनेसे व्याघात
होता है—विरोध उपस्थित हो जाता है। पटके स्वरूपका अभाव पटमें नहीं होता; क्योंकि पटके स्वरूपका
पटमें अभाव होनेसे पटका अभाव हो जानेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। पदार्थका अपना धर्म उसी
पदार्थमें नहीं होता, ऐसा नहीं कहना चाहिये। क्योंकि उस धर्मका, पदार्थका अपना धर्म होनेमें विरोध आता
है और घटका पटके धर्मका आधार होना घटित नहीं होता । क्योंकि पटके धर्मका आधार घट होता है,
ऐसा माननेसे घटके आतान-वितान-आकारका आधार हो जानेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। पटके
स्वरूपका अभाव—नास्तित्व—घटका धर्म है, इस पक्षको स्वीकार करनेसे विवादकी ही समाप्ति हो जाती
है। क्योंकि पदार्थके साथ अस्तित्व धर्मका तादात्म्यसंबंध होनेसे जिस प्रकार पदार्थ अस्तित्वधर्मात्मक होता
है, उसी प्रकार पदार्थके साथ (पररूपसे) नास्तित्व धर्मका तादात्म्यसंबंध होनेसे पदार्थ नास्तित्वधर्मात्मक
होता है। इस प्रकार 'घट नहीं है' यह प्रयोग ठीक है। यदि 'घट नहीं है' यह प्रयोग ठीक न हो तो जिस
प्रकार पदार्थका नास्तित्व धर्मके साथ तादात्म्यसंबंध होनेपर भी पदार्थ असत्—नास्तिरूप—नहीं हो सकता,
उसी प्रकार उसी पदार्थका अस्तित्व धर्मके साथ तादात्म्यसंबंध होनेपर भी वह पदार्थ सत्—अस्तित्वरूप—
नहीं हो सकेगा ।
शंका—घटमें पटके रूपके अभावका अर्थ है—घटमें रहने वाले पटरूपके अभावका प्रतियोगित्व ।
( जिसका अभाव बताया जाता है वह प्रतियोगी कहा जाता है। घटके अभावका प्रतियोगी घट होता है ।)
वह पटके रूपके—धर्मके—अभावका प्रतियोगी पटका रूप या धर्म है। उदाहरण—'भूतलमें घट नहीं है' इस
वाक्यमें भूतलमें जो घटका नास्तित्व है, वह भूतलमें होनेवाले घटके अभावका प्रतियोगित्व ही है। वह
घटके रूपके—धर्मके—अभावका प्रतियोगी घटका रूप या धर्म है। समाधान—यह कथन ठीक नहीं है ।
क्योंकि इस तरह भी जैसे घटके अभावका भूतलका धर्म होनेमें विरोध उपस्थित नहीं होता, वैसे ही पटके
रूपके अभावका घटका धर्म होनेमें विरोध उपस्थित नहीं होता । इस प्रकार घटका भावाभावात्मकत्व—
अस्तित्त्वनास्तित्त्वधर्मात्मकत्व या विधिप्रतिषेधात्मकत्व—सिद्ध हो जाता है। क्योंकि कथंचित्तादात्म्यरूप
संबंधसे जिसका पदार्थके साथ संबंध होता है वही पदार्थका अपना धर्म होता है ।
शंका—इस प्रकार घटमें स्वरूपसे भावधर्मके—अस्तित्वधर्मके—और पररूपाभावसे अभाव धर्मके—
नास्तित्व धर्मके—सद्भावकी सिद्धि होनेपर भी 'घट है, पट नहीं है' ऐसा ही कहना चाहिये । क्योंकि पटके
अभावका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यकी उक्त प्रकारसे—'पट नहीं है' इस प्रकारसे—प्रवृत्ति होती है। जिस
प्रकार 'भूतलमें घट नहीं है' इस प्रकार घटके अभावका प्रतिपादन करनेवाला वाक्य प्रवृत्त होता है, 'भूतल
नहीं है' इस प्रकारका वाक्य प्रवृत्त नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृत विषयमें घटमें पटका अर्थात् पटके
स्वरूपका अभाव घटका धर्म होनेपर भी, 'पट नहीं है' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग करना उचित है ।
क्योंकि अभावका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यमें अभावके प्रतियोगीका प्राधान्य होता है (घटमें पटके
अभावका प्रतिपादन करनेवाले वाक्यमें पटरूप प्रतियोगीका प्राधान्य होता है) । जिस प्रकार घटरूप
परिणामकी उत्पत्तिके पूर्वकालमें जो घटका अभाव होता है, वह अभाव कपालरूप होनेपर भी कपालकी
अवस्थामें 'घट उत्पन्न होगा' इस प्रकारके ही घटकी उत्पत्ति कालके पूर्वकालमें होनेवाले घटके अभावका

२२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
प्रतिपादन करनेवाले वाक्यका प्रयोग देखा जाता है, 'कपाल उत्पन्न होगा' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग
नहीं। और जिस प्रकार घटका नाश होनेपर जो घटका अभाव होता है, वह अभाव घटके नाशके अनन्तर
उत्पन्न होनेवाले कपालके स्वरूपका होनेपर भी, 'घट नष्ट हुआ' इस प्रकारके वाक्यका ही प्रयोग देखा जाता
है, इसी प्रकार प्रकृत विषयमें भी 'पट नहीं है' इस वाक्यका प्रयोग करना ही उचित है, 'घट नहीं है' इस
वाक्यका प्रयोग करना उचित नहीं। समाधान—इसका परिहार निम्न प्रकार है : घटके भावाभावा-
त्मकत्व—विधिनिषेधात्मकत्व—अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तत्व—की सिद्धि हो जानेपर हमारा विवाद ही समाप्त
हो गया। क्योंकि हमारा अभीष्ट जो घटका भावाभावात्मकत्व है, उसकी सिद्धि हो गयी है। शब्दका—
वाक्य—का प्रयोग तो पूर्व पूर्व प्रयोगके अनुसार ही होगा। शब्दका प्रयोग पदार्थकी सत्ताके अधीन नहीं
होता। स्पष्टीकरणः—'देवदत्त पकाता है' इस वाक्यमें प्रश्न होता है कि क्या देवदत्तका अर्थ देवदत्तका शरीर
है या देवदत्तकी आत्मा है या देवदत्तके शरीरसे युक्त देवदत्तकी आत्मा है ? यदि देवदत्तका अर्थ देवदत्तका
शरीर हो तो 'देवदत्तका शरीर पकाता है' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग करनेकी आपत्ति उपस्थित हो जाती
है। यदि देवदत्तका अर्थ देवदत्तकी आत्मा हो तो 'देवदत्तकी आत्मा पकाती है' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग
करनेकी आपत्ति उपस्थित हो जाती है। 'देवदत्तके शरीरसे युक्त देवदत्तकी आत्मा पकाती है' इस प्रकारके
वाक्यके प्रयोगका अभाव होनेसे तीसरे पक्षमें भी उपपत्ति घटित नहीं होती। इस प्रकार प्रतिपादित प्रयोगके
अभावमें पूर्व पूर्व प्रयोगका अभाव ही शरण है और इस प्रकार पूर्व पूर्व प्रयोगके अनुसार वाक्यके प्रयोगकी
प्रवृत्ति होनेसे शब्दप्रयोगके आधारपर प्रश्न करना ठीक नहीं है।
दूसरी बात :—घट आदिमें रहनेवाला पटादिरूप पर पदार्थके स्वरूपका जो अभाव होता है वह घटसे
भिन्न होता है या अभिन्न ? घटमें जो घटभिन्न पदार्थके स्वरूपका अभाव होता है, यदि वह घटसे भिन्न हो
तो उस अभावके भी घटसे भिन्न होनेसे, उस घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी उस घटमें कल्पना
करनी चाहिये। क्योंकि घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी घटमें कल्पना न की जाये तो घट-
भिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावका घटसे भिन्नत्व घटित होनेसे घटके कथंचित् असद्रूपत्वकी—नास्तित्वकी—
सिद्धि नहीं होती, और घटमें घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी कल्पना की जानेपर अनवस्था
नामक दोष आता है। क्योंकि घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावका अभाव भी घटसे भिन्न होता है और घट
आदिमें घटभिन्न पटरूप पदार्थके आतान-वितानरूप स्वरूपके अभावके अभावकी घटमें कल्पना की जानेपर,
घटभिन्न सभी पदार्थोंके स्वरूपोंके घटरूप हो जानेकी—घटके स्वरूप बन जानेकी—आपत्ति उपस्थित हो
जाती है। क्योंकि दो अभावरूप दो निषेधोंसे प्रकृतकी—विधिकी—सिद्धि हो जाती है। ( 'द्वौ नञौ प्रकृतार्थं
गमयतः' ऐसा नियम है । ) घटमें रहनेवाला घटभिन्न पटके स्वरूपका अभाव घटसे भिन्न न हो तो घटसे
भिन्न न होनेवाले अस्तित्व धर्मसे जिस प्रकार घटादिमें अस्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी प्रकार घटसे
भिन्न न होनेवाले नास्तित्वधर्मसे घटादिमें सिद्ध हुए नास्तित्वधर्मके सद्भावको भी स्वीकार करना चाहिये।
शंका—स्वरूपसे पदार्थका अस्तित्व ही पदार्थका पररूपसे नास्तित्व होता है और पररूपसे पदार्थका
नास्तित्व ही पदार्थका स्वरूपसे अस्तित्व होता है, इसलिये अस्तित्व और नास्तित्व इन धर्मोंमें एक वस्तुमें
भेद न होनेसे—दोनों धर्मोंकी एकरूपता होनेसे—पदार्थकी अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तता कैसे हो सकती है ?
समाधान--ऐसा कहना हो तो हम कहते हैं कि भावके—अस्तित्वके—द्वारा अपेक्षणीय निमित्त और अभाव-
के—नास्तित्वके—द्वारा अपेक्षणीय निमित्तमें भेद होनेसे पदार्थकी अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तता हो जाती है।
स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्व-भावरूप निमित्तकी अपेक्षासे पदार्थ ज्ञातामें अपने अस्तित्व धर्मका ज्ञान
उत्पन्न कराता है, तथा परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावरूप निमित्तकी अपेक्षासे ज्ञातामें अपने नास्तित्व
धर्मका ज्ञान उत्पन्न कराता है। इस तरह एक पदार्थमें जैसे एकत्व, द्वित्व आदि संख्याओंमें जिस प्रकार भेद
होता है, उसी प्रकार एक पदार्थमें अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्ममें होता है। एक द्रव्यमें अन्य द्रव्यकी
अपेक्षासे प्रकट होनेवाली द्वित्वादि संख्या, जिसके अपने एक द्रव्यकी ही अपेक्षा होती है, ऐसी एकत्व संख्यासे

अन्य. यो. व्य. श्लोक २४ ] स्याद्वादमञ्जरी २२९
भिन्नरूपसे प्रतीत नहीं होती—यह बात नहीं है । एकत्वरूप और द्वित्वरूप यह उभयरूप संख्या संख्यावान्
पदार्थसे भिन्न ही नहीं होती; क्योंकि उसके उभयरूप संख्यावान पदार्थसे भिन्न होनेसे, उस पदार्थके असंख्येय—
अगणनीय--हो जानेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । द्रव्यके साथ संख्याका समवायसंबंध होनेसे द्रव्य संख्येय—
गणनीय--बन जाता है, ऐसी बात नहीं है । क्योंकि कथंचित् तादात्म्यसंबंधको छोड़कर अन्य समवायका
होना असंभव है । इस प्रकार अपेक्षणीय स्वरूप और पररूपमें भेद होनेसे पदार्थके अस्तित्व धर्म और नास्तित्व
धर्ममें भेदकी सिद्धि हो जाती है । परस्पर भिन्न अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्म इन दो धर्मोंकी सत्ताका
एक पदार्थमें ज्ञान हो जानेसे इन दोनों धर्मोंमें कौनसा विरोध हो सकता है ?
शंका—अस्तित्व धर्मके और नास्तित्व धर्मके सद्भावका एक वस्तुमें होनेवाला ज्ञान मिथ्या होता
है । समाधान—ठीक नहीं है। क्योंकि एक वस्तुमें रहनेवाले अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्मके सद्भावके
ज्ञानको बाधित करनेवालेका अभाव है। उस ज्ञानको बाधित करनेवाला विरोध है, यह कहना ठीक नहीं।
क्योंकि विरोधका सद्भाव होनेपर उस विरोधसे उक्त ज्ञानके बाधित होनेसे उक्त ज्ञानके मिथ्यापनकी सिद्धि,
तथा उक्त ज्ञानके मिथ्यापनकी सिद्धि होनेपर अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्ममें विरोधके सद्भावकी सिद्धि
होनेसे अन्योन्याश्रय नामका दोष उपस्थित हो जाता है। वध्य-घातकभावरूपसे, सहानवस्थानरूपसे और
प्रतिवध्य-प्रतिबन्धकभावरूपसे विरोध तीन प्रकारका होता है। उन तीनोंमेंसे प्रथम विरोधमें सर्प और
नकुल, अग्नि और जल आदि विषय आते हैं। वह वध्यघातकभावरूप विरोध एक कालमें विद्यमान होनेवाले
पदार्थोंका संयोग होनेपर होता है; क्योंकि जिस प्रकार द्वित्व अनेकोंके अर्थात् दो पदार्थोंके आश्रयसे होता है,
उसीप्रकार संयोग दो या अनेक पदार्थोंके आश्रयसे होता है—एक पदार्थके आश्रयसे नहीं। अग्निका नाश
जल नहीं करता, क्योंकि जलका अग्निके साथ संयोग न होनेपर भी यदि जल अग्निका नाश करता है, ऐसा
माना जाये तो सर्वत्र अग्निका अभाव हो जानेका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। अतएव संयोग होनेपर उत्तर
कालमें बलवानके द्वारा दूसरा बाधित किया जाता है। इसी प्रकार एक ही कालमें एक पदार्थमें अस्तित्व
धर्म और नास्तित्व धर्मका क्षणमात्रके लिये भी सद्भाव होता है, ऐसा प्रतिपक्षीके द्वारा नहीं माना जाता
जिससे कि उन दोनों धर्मोंमें वध्यघातकभावरूप विरोधकी कल्पना की जा सके। यदि अस्तित्व और नास्तित्व
धर्मकी स्थिति आपके द्वारा एक पदार्थमें मानी गयी तो अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्म इन दोनोंके समान
बलवाले होनेसे, उनमें वध्य-घातकभावरूप विरोधका सद्भाव नहीं हो सकता। उन अस्तित्वरूप और
नास्तित्वरूप दोनों धर्मोंमें सहानवस्थानरूप विरोध भी नहीं हो सकता। यह सहानवस्थानरूप विरोध—एक
साथ एक पदार्थमें स्थित न होना रूप विरोध-भिन्न-भिन्न कालोंमें एक पदार्थमें या स्थानमें होनेवाले दोनोंमें,
आम्रफलमें श्यामत्व और पीतत्वके समान होता है। अर्थात् जिस प्रकार आम्रफलमें भिन्न-भिन्न कालोंमें
होनेवाले श्यामत्व और पीतत्वके आम्रफलमें समान कालमें रहनेमें विरोध होता है, उसी प्रकार एक पदार्थमें
भिन्न-भिन्न कालोंमें रहनेवाले दोनोंमें सहानवस्थानरूप—एक साथ एक पदार्थमें स्थित न होना रूप—विरोध
होता है। आम्रफलमें उत्पन्न होनेवाला पीतत्व पूर्वकालमें उत्पन्न हुए श्यामत्वको (हरेपनको) नष्ट करता
है। श्यामत्व और पीतत्व जिस प्रकार पूर्वकाल और उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले होते हैं, उसी प्रकार
पदार्थमें रहनेवाले अस्तित्व और नास्तित्व पूर्वकाल और उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले नहीं होते। यदि अस्तित्व
और नास्तित्व पूर्वकाल और उत्तरकालमें उत्पन्न होनेवाले हों तो अस्तित्वके कालमें नास्तित्वका अभाव
होनेसे जीवका केवल अस्तित्व सभीकी प्राप्ति कर लेगा—सभी पदार्थ जीवरूप बन जायेंगे। जीवके नास्तित्व—
पररूपसे होनेवाले नास्तित्व—के कालमें यदि जीवके स्वरूपसे अस्तित्वका अभाव हो गया तो बन्ध-मोक्षादि
व्यवहारके विषयमें विरोध उपस्थित हो जायगा। जिसका सर्वथा अभाव होता है, उसके पुन: आत्मलाभका—
उत्पत्तिका—अभाव होनेसे और जिसका सर्वथा सद्भाव होता है उसका पुनः अभावको प्राप्त होना घटित
न होनेसे, इन अस्तित्व और नास्तित्व धर्मोंकी एक पदार्थमें एक साथ होनेवाली स्थितिका अभाव होना ठीक
नहीं है। इसी प्रकार अस्तित्व और नास्तित्वमें प्रतिबध्य-प्रतिबंधकभावरूप विरोधका भी संभव नहीं है।

२३० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
उदाहरण—चंद्रकान्तमणि रूप दाहके प्रतिबंधका सद्भाव होनेपर अग्निसे पदार्थमें दहन क्रिया उत्पन्न नहीं
होती इसलिये चंद्रकांतमणि और पदार्थगत अग्निजन्य दहनक्रियामें प्रतिबध्य-प्रतिबंधक भावरूप विरोधका
होना युक्त है । जिस प्रकार चंद्रकांतमणिके अस्तित्वकालमें पदार्थगत अग्निजन्य दहनक्रियाका प्रतिबंध होता
है, उसी प्रकार पदार्थके स्वरूपसे अस्तिरूप होनेके कालमें पररूपसे नास्तिरूप होनेमें प्रतिबंध नहीं होता ।
क्योंकि स्वरूपसे अस्तित्वकालमें भी पररूप आदिसे नास्तित्व अनुभवसिद्ध .है । एक पदार्थमें अस्तित्व धर्म
और नास्तित्व धर्म नहीं रहते इसकी सिद्धि करते हुए शीत और उष्ण इन धर्मोंके एक पदार्थमें न रहनेका
जो दृष्टांत दिया है, वह ठीक नहीं है । क्योंकि एक धूपपात्र आदिमें अवच्छेदकके भेदसे शीत और उष्णका
उपलम्भ होनेसे शीत और उष्णमें विरोधकी सिद्धि नहीं होती । [ धूप जलानेसे गर्म बना हुआ धूपपात्र बर्फकी
दृष्टिसे गर्म होता है और प्रखर अग्निकी दृष्टिसे शीत होता है । अतः धूपपात्रमें एक साथ शीत धर्मकी और
उष्ण धर्मकी प्राप्ति होनेसे उन दोनों धर्मोंमें विरोध नहीं हो सकता । ] जिस प्रकार एक वृक्ष आदिमें
चलत्व और अचलत्वकी, एक घट आदिमें रक्तत्व और अरक्तत्वकी और एक शरीर आदिमें आवृतत्व और
अनावृतत्वकी उपलब्धि होनेसे, उन युगलधर्मोंमें विरोधका अभाव होता है, उसी प्रकार सत्त्व (अस्तित्व )
और असत्त्व ( नास्तित्व ) इन दोनों धर्मोंके एक पदार्थमें पाये जानेसे उनमें भी विरोधका अभाव होता है ।
( २ ) इस पूर्वोक्त युक्तिसिद्ध कथनसे सत्त्व धर्मके और असत्त्व धर्मके भिन्नाधिकरणत्वका—अर्थात् उनके
अधिकरण भिन्न भिन्न होते हैं, इस कथनका--परिहार हो गया; क्योंकि सत्त्व धर्म और असत्त्व धर्मकी
एकाधिकरणता अनुभवसे सिद्ध है । ( ३ ) जो अनवस्था नामक दोष स्याद्वादमें बताया गया है, वह दोष भी
अनेकान्तवादियोंके नहीं है । क्योंकि पदार्थका अनन्तधर्मात्मकत्व प्रमाणोंसे ज्ञात होनेके कारण, अनंतधर्मात्मक
पदार्थको स्वयं स्वीकार करनेसे अप्रामाणिक पदार्थपरंपराकी परिकल्पनाका अभाव होता है । कहनेका
अभिप्राय यह है : स्वरूपसे अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका पदार्थके साथ जब कथंचित्-
तादात्म्य है, तब अस्तित्व धर्म स्वरूपसे अस्तिरूप है और पररूपसे नास्तिरूप है । तथा पररूपसे नास्तित्व अपने
रूपसे अस्तिरूप है और पररूपसे नास्तिरूप हैं, यह कहनेकी, और ये दोनों स्वरूप भी स्वरूपसे अस्तिरूप
और पररूपसे नास्तिरूप हैं, यह कहनेकी आवश्यकता न होनेसे अप्रामाणिक पदार्थपरंपराकी परिकल्पना करनेकी
आवश्यकता नहीं है । (४) स्वरूपसे अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका एक पदार्थके साथ कथंचित्ता-
दात्म्यसंबंध होनेसे पदार्थका अस्तित्व जिस रूपसे होता है, उसी रूपसे नास्तित्वके होनेका, और नास्तित्व जिस
रूपसे होता है उसी रूपसे अस्तित्वके होनेका प्रसंग उपस्थित न होनेसे संकर दोष नहीं आता । ( ५ ) स्वरूपसे
अस्तित्व धर्मका और पररूपसे नास्तित्व धर्मका एक पदार्थके साथ कथंचित्तादात्म्यसंबंध होनेसे पदार्थका
अस्तित्व धर्म जिस रूपसे होता है उस रूपसे नास्तित्व ही होगा, अस्तित्व नहीं, और नास्तित्व धर्म जिस रूपसे
होता है उस रूपसे अस्तित्व ही होगा, नास्तित्व नहीं, इस प्रकारसे व्यतिरेक दोष नहीं आता । ( ६ ) स्वरूपसे
अस्तित्वका और पररूपसे नास्तित्वका एक ही पदार्थमें सद्भाव होनेके कारण वस्तु सदसदात्मक होनेसे पदार्थ
सद्रूप है या असद्रूप है ? इस प्रकार उभयकोटिक ज्ञानका अभाव होनेसे अनेकान्तवादमें संशय नामक दोष
भी नहीं आता । ( ७ ) संशयका अभाव होनेसे अर्थात् पदार्थ सदसदात्मक ही हैं इस प्रकारके निश्चयका
सद्भाव होनेसे अनिश्चयरूप अप्रतिपत्ति नामक दोष भी नहीं होता, और ( ८ ) अप्रतिपत्ति नामक दोषका
अभाव होनेसे अर्थात् वस्तुके सदसदात्मकत्वरूप स्वरूपके निश्चयके सद्भावसे अनेकांतवादमें वस्तुव्यवस्थाहानि
नामक दोष भी नहीं आता । जिस पदार्थकी अनुभवसे सिद्धि होती है उसके विषयमें कोई भी दोष नहीं
आता । जिस पदार्थकी सिद्धि अनुभवसे नहीं होती; उसमें दोष आते हैं । )१
एकान्तवादकी जातिसे स्याद्वादकी जाति भिन्न है, अतएव स्याद्वादमें इन दोषोंके लिये स्थान नहीं
है, अतः स्याद्वादके मर्मज्ञोंको उन उपपत्तियोंके द्वारा उन दोषोंको दूर कर देना चाहिये । क्योंकि स्वतन्त्र
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २५ ] स्याद्वादमञ्जरी २३१
अथानेकान्तवादस्य सर्वद्रव्यपर्यायव्यापित्वेऽपि मूलभेदापेक्षया चातुर्विध्याभिधानद्वारेण
भगवतस्तत्त्वामृतरसास्वादसौहित्यमुपवर्णयन्नाह—
स्यान्नाशि नित्यं सदृशं विरूपं वाच्यं न वाच्यं सदसत्तदेव ।
विपश्चितां नाथ निपीततत्त्वसुधोद्गतोद्गारपरम्परेयम् ॥२५॥
स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकमष्टास्वपि पदेषु योज्यम् । तदेव अधिकृतमेवैकं वस्तु
स्यात् कथञ्चिद् नाशि विनशनशीलमनित्यमित्यर्थः । स्यान्नित्यम् अविनाशिधर्मीत्यर्थः ।
एतावता नित्यानित्यलक्षणमेकं विधानम् । तथा स्यात् सदृशमनुवृत्तिहेतुसामान्यरूपम् । स्याद्
विरूपं विविधरूपम् विसदृशपरिणामात्मकं व्यावृत्तिहेतुविशेषरूपमित्यर्थः । अनेन सामान्य-
होनेके कारण निरपेक्ष विधिरूप सामान्य तथा प्रतिषेध रूप विशेषमें ही उन दोषोंको स्थान मिलता है । अथवा
‘विरोध’ शब्द यहाँ दोषका वाचक है । जैसे, विरुद्ध आचरण करता है; यहाँ ‘विरुद्ध’ शब्दका अर्थ ‘दुष्ट’ है ।
अतएव विरोधों—विरोध, वैयधिकरण्य आदि दोषों–से भयभीत, यह अर्थ करना चाहिये । इस प्रकार ‘विरोध’
इस सामान्य शब्दसे सभी दोषोंका ग्रहण हो जाता है । यह श्लोकका अर्थ है ॥ २४ ॥
भावार्थ—प्रत्येक वस्तुमें अनंत धर्म मौजूद हैं । प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा सत् रूप, और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा असत् रूप है । वस्तुके अस्तित्व और
नास्तित्व धर्मोंका एक साथ कथन नहीं कहा जा सकता, इसलिये प्रत्येक वस्तु किसी अपेक्षासे अवक्तव्य भी
है । किसी वस्तुमें अविरोध भावसे अस्तित्व और नास्तित्वकी कल्पना करनेको सप्तभंगी कहते हैं ( प्रश्नवशा-
देकस्मिन् वस्तुनि अविरोधेन विधिप्रतिषेधकल्पना सप्तभंगी¹ ) । वस्तुमें अस्तित्व और नास्तित्व परस्पर विरुद्ध
धर्मोंकी कल्पना किसी अपेक्षाको लेकर ही की जाती है । अतएव स्वद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित्
अस्ति है, और परद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित् नास्ति है । इसीलिये सप्तभंगीवादमें विरोध, वैयधि-
करण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति और अभाव नामक दोषोंके लिये कोई अवकाश नहीं
है । विरोध आदि दोषोंके निराकरण करनेसे शांकरभाष्य और सर्वदर्शनसंग्रहमें शंकर और माधव
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विरोध, संशय आदि दोषोंका भी परिहार हो जाता है । क्योंकि वस्तुमें अस्तित्व
और नास्तित्व धर्म भिन्न-भिन्न अपेक्षाओंको लेकर ही माने गये हैं । कारण कि जिस अपेक्षासे वस्तु अस्ति है,
उसी अपेक्षासे स्याद्वादियोंने वस्तुको नास्ति स्वीकार नहीं किया है ।
अनेकान्तवाद सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंमें रहता है, परन्तु मुख्य भेदोंकी अपेक्षा स्यात् नित्य, स्यात्
अनित्य; स्यात् सामान्य, स्यात् विशेष; स्यात् वाच्य, स्यात् अवाच्य; स्यात् सत्, स्यात् असत्के भेदसे
अनेकांतके चार भेद बताये गये हैं—
श्लोकार्थ—हे विद्वानोंके शिरोमणि ! अपने अनेकान्त रूपी अमृतको पीकर प्रत्येक वस्तुको कथंचित्
अनित्य, कथंचित् नित्य; कथंचित् सामान्य, कथंचित् विशेष; कथंचित् वाच्य, कथंचित् अवाच्य; कथंचित्
सत् और कथंचित् असत् प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—‘स्यात्’ शब्द अनेकांतका सूचक है । उसे नित्य, अनित्य आदि आठों वचनोंके साथ
लगाना चाहिये । ( १ ) प्रत्येक वस्तु विनाशी होनेके कारण कथंचित् अनित्य, और अविनाशो होनेके कारण
कथंचित् नित्य है । ( २ ) प्रत्येक वस्तु सामान्य रूप होनेसे कथंचित् सामान्य, और विशेष रूप होनेसे
कथंचित् विशेष है । ( ३ ) प्रत्येक पदार्थ वक्तव्य होनेसे कथंचित् वाच्य, और अवक्तव्य होनेसे कथंचित्
१ तत्त्वार्थराजवार्तिक पृ० २४ ।

२३२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २५
विशेषरूपो द्वितीयः प्रकारः । तथा स्याद् वाच्यं वक्तव्यम् । स्याद् न वाच्यमवक्तव्यमित्यर्थः ।
अत्र च समासेऽवाच्यमिति युक्तम्, तथाप्यवाच्यपदं योन्यादौ रूढ़मित्यसभ्यतापरिहारार्थं
न वाच्यमित्यसमस्तं चकार स्तुतिकारः । एतेनाभिलाप्यानभिलाप्यस्वरूपस्तृतीयो भेदः । तथा
स्यात्सद् विद्यमानमस्तिरूपमित्यर्थः । स्याद् असत् तद्विलक्षणमिति । अनेन सदसद्वाख्या
चतुर्थी विधा ॥
हे विपश्चितां नाथ संख्यावतां मुख्य इयमनन्तरोक्ता निपीततत्त्वसुधोद्गारपरम्परा ।
तवेति प्रकरणात् सामर्थ्याद्वा गम्यते । तत्त्वं यथावस्थितवस्तुस्वरूपपरिच्छेदः । तदेव जरा-
मरणापहारित्वाद् विबुधोपभोग्यत्वाद् मिथ्यात्वविषोर्मिनिराकरिष्णुत्वाद् आन्तराह्लाद-
कारित्वाच्च सुधा पीयूषं तत्त्वसुधा । नितरामनन्यसामान्यतया पीता आस्वादिता या तत्त्वसुधा
तस्या उद्गता प्रादुर्भूता तत्कारणिका उद्गारपरम्परा उद्गारश्रेणिरिवेत्यर्थः । यथा हि
कश्चिदाकण्ठं पीयूषरसमापीय तदनुविधायिनीमुद्गारपरम्परां मुञ्चति, तथा भगवानपि
जरामरणापहारि तत्त्वामृतं स्वैरमास्वाद्य तद्रसानुविधायिनीं प्रस्तुतानेकान्तवादभेदचतुष्टयी-
लक्षणा मुद्गारपरम्परां देशनामुखेनोद्गीर्णवानित्याशयः ॥
अथवा यैरेकान्तवादिभिर्मिथ्यात्वगरलभोजनमातृप्ति भक्षितं तेषां तत्तद्वचनरूपा
उद्गारप्रकाराः प्राक् प्रदर्शिताः । यैस्तु पचेलिमप्राचीनपुण्यप्राग्भारानुग्रहीतैर्जगद्गुरुवदनेन्दुनिः-
स्यन्दि तत्त्वामृतं मनोहृत्य पीतम्, तेषां विपश्चितां यथार्थवाद्विदुषां हे नाथ इयं पूर्वदल-
दर्शितोल्लेखशेखरा उद्गारपरम्परेति व्याख्येयम् । एते च चत्वारोऽपि वादास्तेषु तेषु स्थानेषु
प्रागेव चर्चिताः । तथाहि—'आद्योपमाम्योम समस्वभावम्' इति वृत्ते नित्यानित्यवादः
प्रदर्शितः । 'अनेकमेकात्मकमवेव वाच्यम्' इति काव्ये सामान्यविशेषवादः संसूचितः । सप्त-
भङ्ग्यामभिलाप्यवादः सदसद्वादश्च चर्चितः । इति न भूयः प्रयासः ॥ इति काव्यार्थः ॥ २५ ॥
अवाच्य है । लोकमें अवाच्य शब्द योनि आदिके अर्थ में प्रयुक्त होता है, अतएव स्तुतिकार हेमचन्द्र आचार्यने
श्लोकमें 'अवाच्य' शब्द न कह कर 'न वाच्यं' पद प्रयोग किया है । ( ४ ) तथा प्रत्येक पदार्थ अस्ति रूप
है, इसलिये कथंचित् 'सत्' नास्ति रूप है, इसलिये कथंचित् असत् है ।
हे विद्वानोंके शिरोमणि ! जिस प्रकार कोई मनुष्य अमृतका खूब पान करके पीछेसे बार बार डकार
लेता है, उसी प्रकार आपने जन्म और मरणके नाश करनेवाली, विद्वानोंके उपभोग्य, मिथ्यात्व-विषको
निर्विष करनेवाली, और आह्लाद उत्पन्न करनेवाली तत्त्व-सुधाका असाधारण रूपसे पान करके अनेकान्तवादके
चार मुख्य भेदोंकी उद्गारपरम्पराको उपदेशके द्वारा प्रगट किया है ।
अथवा, जिन एकान्तवादियोंने मिथ्यात्वरूपी विष-भोजनका खूब तृप्त होकर भक्षण किया है, उनके
वचनरूपी उद्गारोंका वर्णन कर चुके हैं । जिन पुण्यात्मा लोगोंने संसारके स्वामी आपके मुख-चन्द्रसे झरते
हुए अमृतका तृप्त होने तक पान किया है, उन यथार्थ वक्ता विद्वानोंके मुखसे अनेकान्तवादके चार मुख्य भेदोंकी
उद्गारपरम्परा प्रगट हुई है । इन चार वादोंमें 'आद्योपमाम्योम समस्वभावं' श्लोकमें नित्यानित्यवाद,
'अनेकमेकात्मकमवेव वाच्यम्' श्लोकमें सामान्य-विशेषवाद, तथा सप्तभंगीवादमें वाच्य-अवाच्य और सत्-असत्
वादका वर्णन किया गया है । यह श्लोकका अर्थ है ॥ २५ ॥
भावार्थ—स्याद्वादियोंके मतमें प्रत्येक वस्तु किसी अपेक्षासे नित्य-अनित्य, किसी अपेक्षासे वाच्य-
अवाच्य, और किसी अपेक्षासे सत्-असत् है । इन चारों वादोंका स्याद्वादमें समावेश हो जाता है । अतएव
प्रत्येक पदार्थको द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा नित्य, सामान्य, अवाच्य और सत्, तथा पर्यायार्थिक नयसे अनित्य,
विशेष, वाच्य और असत् मानना ही न्यायसंगत है । वस्तुमें एकान्त रूपसे नित्य, अनित्य आदि धर्मोंके
माननेसे विरोध आता है । अतएव प्रत्येक वस्तुको अनेकांतात्मक मानना चाहिये ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २६ ] स्याद्वादमञ्जरी २३३
इदानीं नित्यानित्यपक्षयोः परस्परदूषणप्रकाशनबद्धलक्षतया वैरायमाणयोरितरेतरोदी-
रितविविधहेतुहेतिसंनिपातसंजातविनिपातयोर्यत्नसिद्धप्रतिपक्षप्रतिक्षेपस्य सर्वोत्कर्षमाह—
य एव दोषाः किल नित्यवादे विनाशवादेऽपि समास्त एव ।
परस्परध्वंसिषु कण्टकेषु जयत्यधृष्यं जिनशासनं ते ॥ २६ ॥
किलेति निश्चये । य एव नित्यवादे नित्यैकान्तवादे दोषा अनित्यैकान्तवादिभिः
प्रसञ्जिताः क्रमयौगपद्याभ्यामर्थक्रियानुपपत्त्यादयः, त एव विनाशवादेऽपि क्षणिकैकान्तवादेऽपि
समाः तुल्याः, नित्यैकान्तवादिभिः प्रसज्यमाना अन्यूनाधिकाः ॥
तथाहि—नित्यवादी प्रमाणयति । सर्वं नित्यं सत्त्वात् । क्षणिके सदसत्कालयोरर्थ-
क्रियाविरोधात् तल्लक्षणं सत्त्वं नावस्थां बध्नातोति ततो निवर्त मानमनन्यशरणतया नित्यत्वेऽ-
वतिष्ठते । तथाहि—क्षणिकोऽर्थः सन्वा कार्यं कुर्याद् असन्वा ? गत्यन्तराभावात् । न
तावदाद्यः पक्षः, समसमयवर्तिनि व्यापारायोगात् सकलभावानां परस्परं कार्यकारणभाव-
प्राप्त्यातिप्रसङ्गाच्च । नापि द्वितीयः पक्षः क्षोदं क्षमते, असतः कार्यकारणशक्तिविकलत्वात् ;
अन्यथा शशविषाणादयोऽपि कार्यकरणायोत्सहेरन् , विशेषाभावात् इति ॥
अनित्यवादी नित्यवादिनं प्रति पुनरेवं प्रमाणयति । सर्वं क्षणिकं सत्त्वात् । अक्षणिके

एकान्त नित्य और एकान्त अनित्यवादके माननेवाले एक दूसरेके दोष दिखाकर परस्पर लड़ते हैं,
और एक दूसरेके सिद्धांतोंका खंडन करनेके लिये नाना प्रकारके हेतुरूपी शस्त्रोंके प्रहारसे गिर पड़ते हैं,
अतएव प्रयत्नके विना ही भगवान्‌के शासनकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है—
श्लोकार्थ—नित्य एकान्तवादमें जो दोष आते हैं, वे ही दोष अनित्य एकांतवादमें समान रूपसे
आते हैं। जब क्षुद्र शत्रु एक दूसरेका विध्वंस करनेमें लगे रहते हैं तब जिनेन्द्र भगवान्‌का अजेय शासन
विजयी होता है।
व्याख्यार्थ—यहाँ 'किल' शब्द निश्चय अर्थमें है। 'नित्यवादियोंके मतमें क्रमसे अथवा एक साथ
अर्थक्रिया नहीं हो सकती' इस प्रकार जो अनित्यवादियोंने एकान्त नित्य पक्षमें दूषण दिये थे, वे सब दोष
अनित्यवादियोंके पक्षमें भी आते हैं ।
नित्यवादी—'समस्त पदार्थ नित्य हैं, सद्रूप होनेसे ।' क्षणिक पदार्थोंकी भूत, भविष्य और वर्तमान
काल में कोई अर्थक्रिया नहीं हो सकती, क्योंकि अपने प्रयोजन ( कार्य ) की उत्पत्ति करनेमें विरोध उपस्थित
होनेसे, क्षणिक पदार्थ ( कार्यकी उत्पत्तिके लिये ) स्थिरत्वको—एक क्षणसे अधिक काल तककी स्थितिको—
धारण नहीं करता । अतः वह क्षणिकत्वसे निवृत्त होता हुआ, अन्य किसीकी शरण प्राप्ति न होनेसे नित्यत्वमें
आकर मिल जाता है । तथाहि—प्रश्न होता है कि क्षणिक पदार्थ अस्तिरूप होता हुआ अपना कार्य करता है
या अपना अभाव होनेपर अपना कार्य करता है ? 'क्षण मात्र रूप अपने अस्तित्व कालमें वह अपना कार्य
करता है', यह प्रथम पक्ष ठीक नहीं । क्योंकि जिस कालमें क्षणिक पदार्थ उत्पन्न होने जाता है', उसी कालमें
उत्पन्न होनेवाले कार्यकी उत्पत्तिके लिये क्षणिक पदार्थमें उत्पत्ति क्रियाका होना घटित नहीं होता; तथा
एक-एक कालमें होनेवाले पदार्थोंमें कार्यकारण भाव होनेसे, समकालवर्ती सभी पदार्थोंमें परस्पर कार्यकारण
भाव होनेका अतिप्रसंग उपस्थित हो जाता है । 'क्षणिक पदार्थका अभाव होनेपर वह पदार्थ अपना कार्य
करता है', यह दूसरा पक्ष भी खरा नहीं उतरता । क्योंकि जिसका सद्भाव नहीं होता उसमें अपना कार्य
करनेकी शक्तिका अभाव होता है । यदि ऐसी बात न हो तो शशविषाण आदि भी कार्य करनेके लिये
उत्साही हो जायेंगे क्योंकि असत् पदार्थ और शशविषाणमें भेद नहीं है ।
अनित्यवादी—( नित्य एकांतवादीका खंडन करते हुए ) 'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं; सद्रूप होनेसे ।'
३०

२३४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २६
क्रमयौगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधाद् अर्थक्रियाकारित्वस्य च भावलक्षणत्वात्, ततोऽर्थक्रिया
व्यावर्तमाना स्वक्रोडीकृतां सत्तां व्यावर्तयेदिति क्षणिकसिद्धिः। न हि नित्योऽर्थोऽर्थक्रियां
क्रमेण प्रवर्तयितुमुत्सहते, पूर्वार्थक्रियाकरणस्वभावोपमर्द्दद्वारेणोत्तरक्रियायां क्रमेण प्रवृत्तेः,
अन्यथा पूर्वक्रियाकरणाविरामप्रसङ्गात् । तत्स्वभावप्रच्यवे च नित्यता प्रयाति, अतादवस्थ्य-
स्यानित्यता लक्षणत्वात् । अथ नित्योऽपि क्रमवर्तिनं सहकारिकारणमर्थमुदीक्षमाणस्तावदासीत्,
पश्चात् तमासाद्य क्रमेण कार्यं कुर्यादिति चेत्। न। सहकारिकारणस्य नित्येऽकिञ्चित्करस्यापि
प्रतीक्षणेऽनवस्थाप्रसङ्गात् । नापि यौगपद्येन नित्योऽर्थोऽर्थक्रियाः कुरुते अध्यक्षविरोधात् । न
ह्येककालं सकलाः क्रियाः प्रारभमाणः कश्चिदुपलभ्यते। करोतु वा। तथाप्याद्यक्षण एव सकल-
क्रियापरिसमाप्तेर्द्वितीयादिक्षणेषु अकुर्वाणस्यानित्यता बलाद् आढौकते, करणाकरणयोरेकस्मिन्
विरोधाद् इति ॥
तदेवमेकान्तद्वयेऽपि ये हेतवस्ते युक्तिसाम्याद् विरुद्धं न व्यभिचरन्तीत्यविचारि-
तरमणीयतया मुग्धजनस्य ध्यान्ध्यं¹ चोत्पादयन्तीति विरुद्धा व्यभिचारिणोऽनैकान्तिका
अर्थक्रियाकारित्व (प्रयोजनभूतता) ही सत्का लक्षण है। पदार्थोंको अक्षणिक-कूटस्थ नित्य-माननेमें उनमें
क्रमसे अथवा एक साथ अर्थक्रिया होनेमें विरोध उपस्थित होनेसे; तथा अर्थक्रियाका कर्ता होना, पदार्थका
स्वरूप होनेसे, उस नित्य पदार्थसे पृथक् होनेवाली अर्थक्रिया अपने द्वारा व्याप्त नित्य पदार्थकी सत्ताको उस
पदार्थसे पृथक् कर देगी-अर्थक्रियाका पदार्थमें अभाव हो जानेसे पदार्थका अस्तित्व ही न रहेगा। इस प्रकार
क्षणिक पदार्थके-पदार्थके क्षणिकत्वके-अनित्यत्वकी सिद्धि होती है। नित्य पदार्थ अपनी अर्थक्रियाको
क्रमसे करनेमें समर्थ नहीं होता। क्योंकि पदार्थके प्रयोजनभूत पूर्वकालवर्ती कार्यको करनेके स्वभावके विनाश
द्वारा पदार्थके प्रयोजनभूत उत्तरकालवर्ती कार्यको उत्पन्न करनेकी क्रिया करनेकी पदार्थकी प्रवृत्ति होती है।
पूर्व कार्योत्पादन क्रिया करनेके स्वभावका यदि विनाश न किया गया तो पूर्वकालवर्ती कार्य करनेकी क्रियाका
अंत न होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। पूर्व कार्योत्पादन क्रिया करनेके स्वभावका नाश होनेपर पदार्थकी
नित्यता नष्ट हो जाती है, क्योंकि पदार्थकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंका क्रमसे अभाव होते रहना ही अनित्यताका
लक्षण है। यदि कहो कि 'पदार्थ नित्य होनेपर भी क्रमवर्ती सहकारिकारणभूत अर्थकी अपेक्षा करता हुआ
रहता है और बादमें उस सहकारिकारणभूत पदार्थको प्राप्त करके क्रमसे कार्य करता है'-तो यह कहना
भी ठीक नहीं। क्योंकि नित्य पदार्थके विषयमें-नित्य पदार्थको अपनी अर्थक्रिया करनेमें प्रवृत्त करनेके
विषयमें -सहकारिकारणभूत पदार्थकी अपेक्षा करने पर, वह सहकारिकारणभूत पदार्थ भी नित्य होनेसे
अकिंचित्कर होनेके कारण, उसे किंचित्कर बनानेके लिये, अन्य सहकारिकारणभूत पदार्थकी अपेक्षा करनी
होगी। इस प्रकार अन्य-अन्य सहकारिकारणभूत पदार्थोंकी अपेक्षा करनेसे अनवस्था नामक दोष
आता है। नित्य पदार्थ एक साथ (युगपत्) भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यक्षसे विरोध आता है।
कारण कि अर्थक्रिया सदा क्रमसे होती है, कभी एक समयमें होती हुई नहीं देखी जाती। यदि सम्पूर्ण
अर्थक्रियाओंका एक क्षणमें होना स्वीकार करो तो सम्पूर्ण क्रियाओंके प्रथम क्षणमें समाप्त हो जानेसे द्वितीय
क्षण आदिमें न करनेवाली अनित्यता जबरन आकर उपस्थित हो जायेगी; क्योंकि क्रिया और अक्रिया दोनों
एक नित्य पदार्थमें नहीं रह सकते।
इस प्रकार उक्त दोनों पक्षोंमें नित्य और अनित्यवादको सिद्ध करनेके लिये जो 'सत्त्व' हेतु दिया गया है,
वह विरुद्ध हेतु है। इस प्रकारके हेतु, जब तक उनका विचार नहीं किया जाता, तभी तक सुन्दर मालूम होते हैं,
इसलिये ये हेतु भोले लोगोंकी बुद्धिमें जड़ता पैदा करनेवाले होनेसे अनैकान्तिक हेतु हैं। यहाँ नित्य और
१. धियः मान्द्यम् ।