स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
स्वभावान्तराभ्याम् तावपि स्वभावान्तराभ्यामिति । येनात्मना सामान्यस्याधिकरणं तेन
सामान्यस्य विशेषस्य च, येन च, विशेषस्याधिकरणं तेन विशेषस्य सामान्यस्य चेति संकर-
दोषः१ । येन स्वभावेन सामान्यं तेन विशेषः, येन विशेषस्तेन सामान्यमिति व्यतिकरः२ ।
ततश्च वस्तुनोऽसाधारणाकारेण निश्चेतुमशक्तेः संशयः । ततश्चाप्रतिपत्तिः । ततश्च प्रमाण-
विषयव्यवस्थाहानिरिति ॥
एते च दोषाः स्याद्वादस्य जात्यन्तरत्वाद् निरवकाशा एव । अतः स्याद्वादमर्मवेदिभि-
रुद्धरणीयास्तत्तदुपपत्तिभिरिति स्वतन्त्रतया निरपेक्षयोरेव सामान्यविशेषयोर्विधिप्रतिषेधरूप-
योस्तेषामवकाशात् । अथवा विरोधशब्दोऽत्र दोषवाची यथा विरुद्धमाचरतीति दुष्टमित्यर्थः ।
ततश्च विरोधेभ्यो विरोधवैयधिकरण्यादिदोषेभ्यो भीता इति व्याख्येयम् । एवं च सामान्य-
शब्देन सर्वा अपि दोषव्यक्तयः संगृहीता भवन्ति ॥ इति काव्यार्थः ॥ २४ ॥
का अधिकरण हो जानेसे, तथा जिस रूपसे पदार्थ विशेष ( नास्तित्व ) का अधिकरण होता है, उसी रूपसे
विशेष ( नास्तित्व ) और सामान्य ( अस्तित्व ) का अधिकरण हो जानेसे संकर दोष आता है । अर्थात्
जिस रूपसे ( स्वरूप चतुष्टयसे ) पदार्थमें अस्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी रूपसे ( स्वरूप चतुष्टयसे )
उसी पदार्थमें नास्तित्व धर्मका सद्भाव होनेका प्रसंग आ जानेके कारण, तथा जिस रूपसे (पररूप चतुष्टयसे)
पदार्थमें नास्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी रूपसे ( पररूप चतुष्टयसे ) उसी पदार्थमें अस्तित्व धर्मका
सद्भाव होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है । ( ५ ) जिस स्वरूपसे पदार्थमें सामान्य-अस्तित्व-का सद्भाव
होता है, उसी स्वरूपसे, उसी पदार्थमें विशेष-नास्तित्व-का सद्भाव होनेसे, तथा जिस स्वरूपसे पदार्थमें
विशेष-नास्तित्व-का सद्भाव होता है, उसी स्वरूपसे, उसी पदार्थमें सामान्य-अस्तित्व-का सद्भाव होनेसे
व्यतिकर नामक दोष आता है । ( ६ ) व्यतिकर दोष आ जानेसे वस्तुका सत्त्वरूप या असत्त्वरूप
असाधारण धर्मके द्वारा निश्चय करनेकी शक्तिका अभाव होनेके कारण संशय नामक दोष उपस्थित होता
है । ( ७ ) संशय होनेसे वस्तुका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता, अतएव स्याद्वादमें अप्रतिपत्ति दोष आता
है । ( ८ ) तथा, वस्तुका यथार्थ ज्ञान न होनेसे वस्तुकी व्यवस्था नहीं बनती, अतएव स्याद्वादमें विषय-
व्यवस्थाहानि ( अभाव ) दोष आता है ।
( उक्त आठ दोषोंका परिहार - ( १ ) किसी न किसी प्रकारसे प्रतीतिका-ज्ञानका-विषय
बननेवाले पदार्थमें स्वरूपकी अपेक्षासे विपरीत भासमान विवक्षित सत्त्वधर्ममें, और पररूपकी अपेक्षासे
भासमान विवक्षित असत्त्वधर्ममें विरोध नहीं होता । दो धर्मोंमेंसे एक धर्मका एक पदार्थमें सद्भाव होनेपर
जब दूसरे धर्मकी उपलब्धि नहीं होती, तब अनुपलब्धिसे उपलभ्यमान धर्म और अनुपलभ्यमान धर्ममें विरोधकी
सिद्धि होती है । स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावके रूपसे पदार्थका जब अस्तित्व होता है, तब
परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावके रूपसे ( अर्थात् जिस पदार्थमें स्वरूपादिचतुष्टयसे अस्तित्व धर्मका
सद्भाव होता है, उसी पदार्थमें पररूपचतुष्टयका अभाव होनेसे ) उसी पदार्थके नास्तित्व धर्मका उपलब्ध
( प्राप्ति ) नहीं होता, ऐसी बात नहीं है । क्योंकि जिस प्रकार स्वरूपादिसे अस्तित्व धर्मका सद्भाव अनुभवसे
सिद्ध है, उसी प्रकार पररूपादिसे नास्तित्व धर्मका सद्भाव भी अनुभवसे सिद्ध है । वस्तुका सर्वथा अर्थात्
स्वरूप और पररूपसे अस्तित्व ही वस्तुका स्वरूप नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार स्वरूपसे अस्तित्व वस्तुका
स्वरूप होता है, उसी प्रकार पररूपसे भी अस्तित्व वस्तुका धर्म बन जायगा । वस्तुका सर्वथा अर्थात् स्वरूप
और पररूपसे नास्तित्व भी वस्तुका स्वरूप नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार पररूपसे नास्तित्व वस्तुका स्वरूप
होता है, उसी प्रकार स्वरूपसे भी नास्तित्व वस्तुका धर्म बन जायगा ।
१. येन रूपेण सत्त्वं तेन रूपेणासत्त्वस्यापि प्रसंगः । येन रूपेण चासत्त्वं तेन रूपेण सत्त्वस्यापि प्रसंग इति
संकरः । “सर्वेषां युगपत्प्राप्तिस्संकरः” इत्यभिधानात् ।
२. येन रूपेण सत्त्वं तेनरूपेणासत्त्वमेव स्यान्न तु सत्त्वं । येन रूपेण चासत्त्वं तेन सत्त्वमेव स्यान्नत्वसत्त्वम्
इति व्यतिकरः । “परस्परविषयगमनं व्यतिकरः” इति वचनात् । सप्तभंगीतरंगिण्यां पृ. ८२ ।