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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 458 में से

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पृष्ठ 283

अन्य. यो. व्य. श्लोक २५ ] स्याद्वादमञ्जरी २३१
अथानेकान्तवादस्य सर्वद्रव्यपर्यायव्यापित्वेऽपि मूलभेदापेक्षया चातुर्विध्याभिधानद्वारेण
भगवतस्तत्त्वामृतरसास्वादसौहित्यमुपवर्णयन्नाह—
स्यान्नाशि नित्यं सदृशं विरूपं वाच्यं न वाच्यं सदसत्तदेव ।
विपश्चितां नाथ निपीततत्त्वसुधोद्गतोद्गारपरम्परेयम् ॥२५॥
स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकमष्टास्वपि पदेषु योज्यम् । तदेव अधिकृतमेवैकं वस्तु
स्यात् कथञ्चिद् नाशि विनशनशीलमनित्यमित्यर्थः । स्यान्नित्यम् अविनाशिधर्मीत्यर्थः ।
एतावता नित्यानित्यलक्षणमेकं विधानम् । तथा स्यात् सदृशमनुवृत्तिहेतुसामान्यरूपम् । स्याद्
विरूपं विविधरूपम् विसदृशपरिणामात्मकं व्यावृत्तिहेतुविशेषरूपमित्यर्थः । अनेन सामान्य-
होनेके कारण निरपेक्ष विधिरूप सामान्य तथा प्रतिषेध रूप विशेषमें ही उन दोषोंको स्थान मिलता है । अथवा
‘विरोध’ शब्द यहाँ दोषका वाचक है । जैसे, विरुद्ध आचरण करता है; यहाँ ‘विरुद्ध’ शब्दका अर्थ ‘दुष्ट’ है ।
अतएव विरोधों—विरोध, वैयधिकरण्य आदि दोषों–से भयभीत, यह अर्थ करना चाहिये । इस प्रकार ‘विरोध’
इस सामान्य शब्दसे सभी दोषोंका ग्रहण हो जाता है । यह श्लोकका अर्थ है ॥ २४ ॥
भावार्थ—प्रत्येक वस्तुमें अनंत धर्म मौजूद हैं । प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी
अपेक्षा सत् रूप, और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा असत् रूप है । वस्तुके अस्तित्व और
नास्तित्व धर्मोंका एक साथ कथन नहीं कहा जा सकता, इसलिये प्रत्येक वस्तु किसी अपेक्षासे अवक्तव्य भी
है । किसी वस्तुमें अविरोध भावसे अस्तित्व और नास्तित्वकी कल्पना करनेको सप्तभंगी कहते हैं ( प्रश्नवशा-
देकस्मिन् वस्तुनि अविरोधेन विधिप्रतिषेधकल्पना सप्तभंगी¹ ) । वस्तुमें अस्तित्व और नास्तित्व परस्पर विरुद्ध
धर्मोंकी कल्पना किसी अपेक्षाको लेकर ही की जाती है । अतएव स्वद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित्
अस्ति है, और परद्रव्य आदिकी अपेक्षा वस्तु कथंचित् नास्ति है । इसीलिये सप्तभंगीवादमें विरोध, वैयधि-
करण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति और अभाव नामक दोषोंके लिये कोई अवकाश नहीं
है । विरोध आदि दोषोंके निराकरण करनेसे शांकरभाष्य और सर्वदर्शनसंग्रहमें शंकर और माधव
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विरोध, संशय आदि दोषोंका भी परिहार हो जाता है । क्योंकि वस्तुमें अस्तित्व
और नास्तित्व धर्म भिन्न-भिन्न अपेक्षाओंको लेकर ही माने गये हैं । कारण कि जिस अपेक्षासे वस्तु अस्ति है,
उसी अपेक्षासे स्याद्वादियोंने वस्तुको नास्ति स्वीकार नहीं किया है ।
अनेकान्तवाद सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंमें रहता है, परन्तु मुख्य भेदोंकी अपेक्षा स्यात् नित्य, स्यात्
अनित्य; स्यात् सामान्य, स्यात् विशेष; स्यात् वाच्य, स्यात् अवाच्य; स्यात् सत्, स्यात् असत्के भेदसे
अनेकांतके चार भेद बताये गये हैं—
श्लोकार्थ—हे विद्वानोंके शिरोमणि ! अपने अनेकान्त रूपी अमृतको पीकर प्रत्येक वस्तुको कथंचित्
अनित्य, कथंचित् नित्य; कथंचित् सामान्य, कथंचित् विशेष; कथंचित् वाच्य, कथंचित् अवाच्य; कथंचित्
सत् और कथंचित् असत् प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—‘स्यात्’ शब्द अनेकांतका सूचक है । उसे नित्य, अनित्य आदि आठों वचनोंके साथ
लगाना चाहिये । ( १ ) प्रत्येक वस्तु विनाशी होनेके कारण कथंचित् अनित्य, और अविनाशो होनेके कारण
कथंचित् नित्य है । ( २ ) प्रत्येक वस्तु सामान्य रूप होनेसे कथंचित् सामान्य, और विशेष रूप होनेसे
कथंचित् विशेष है । ( ३ ) प्रत्येक पदार्थ वक्तव्य होनेसे कथंचित् वाच्य, और अवक्तव्य होनेसे कथंचित्
१ तत्त्वार्थराजवार्तिक पृ० २४ ।