स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २४
प्रतिपादन करनेवाले वाक्यका प्रयोग देखा जाता है, 'कपाल उत्पन्न होगा' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग
नहीं। और जिस प्रकार घटका नाश होनेपर जो घटका अभाव होता है, वह अभाव घटके नाशके अनन्तर
उत्पन्न होनेवाले कपालके स्वरूपका होनेपर भी, 'घट नष्ट हुआ' इस प्रकारके वाक्यका ही प्रयोग देखा जाता
है, इसी प्रकार प्रकृत विषयमें भी 'पट नहीं है' इस वाक्यका प्रयोग करना ही उचित है, 'घट नहीं है' इस
वाक्यका प्रयोग करना उचित नहीं। समाधान—इसका परिहार निम्न प्रकार है : घटके भावाभावा-
त्मकत्व—विधिनिषेधात्मकत्व—अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तत्व—की सिद्धि हो जानेपर हमारा विवाद ही समाप्त
हो गया। क्योंकि हमारा अभीष्ट जो घटका भावाभावात्मकत्व है, उसकी सिद्धि हो गयी है। शब्दका—
वाक्य—का प्रयोग तो पूर्व पूर्व प्रयोगके अनुसार ही होगा। शब्दका प्रयोग पदार्थकी सत्ताके अधीन नहीं
होता। स्पष्टीकरणः—'देवदत्त पकाता है' इस वाक्यमें प्रश्न होता है कि क्या देवदत्तका अर्थ देवदत्तका शरीर
है या देवदत्तकी आत्मा है या देवदत्तके शरीरसे युक्त देवदत्तकी आत्मा है ? यदि देवदत्तका अर्थ देवदत्तका
शरीर हो तो 'देवदत्तका शरीर पकाता है' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग करनेकी आपत्ति उपस्थित हो जाती
है। यदि देवदत्तका अर्थ देवदत्तकी आत्मा हो तो 'देवदत्तकी आत्मा पकाती है' इस प्रकारके वाक्यका प्रयोग
करनेकी आपत्ति उपस्थित हो जाती है। 'देवदत्तके शरीरसे युक्त देवदत्तकी आत्मा पकाती है' इस प्रकारके
वाक्यके प्रयोगका अभाव होनेसे तीसरे पक्षमें भी उपपत्ति घटित नहीं होती। इस प्रकार प्रतिपादित प्रयोगके
अभावमें पूर्व पूर्व प्रयोगका अभाव ही शरण है और इस प्रकार पूर्व पूर्व प्रयोगके अनुसार वाक्यके प्रयोगकी
प्रवृत्ति होनेसे शब्दप्रयोगके आधारपर प्रश्न करना ठीक नहीं है।
दूसरी बात :—घट आदिमें रहनेवाला पटादिरूप पर पदार्थके स्वरूपका जो अभाव होता है वह घटसे
भिन्न होता है या अभिन्न ? घटमें जो घटभिन्न पदार्थके स्वरूपका अभाव होता है, यदि वह घटसे भिन्न हो
तो उस अभावके भी घटसे भिन्न होनेसे, उस घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी उस घटमें कल्पना
करनी चाहिये। क्योंकि घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी घटमें कल्पना न की जाये तो घट-
भिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावका घटसे भिन्नत्व घटित होनेसे घटके कथंचित् असद्रूपत्वकी—नास्तित्वकी—
सिद्धि नहीं होती, और घटमें घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावके अभावकी कल्पना की जानेपर अनवस्था
नामक दोष आता है। क्योंकि घटभिन्न पदार्थके स्वरूपके अभावका अभाव भी घटसे भिन्न होता है और घट
आदिमें घटभिन्न पटरूप पदार्थके आतान-वितानरूप स्वरूपके अभावके अभावकी घटमें कल्पना की जानेपर,
घटभिन्न सभी पदार्थोंके स्वरूपोंके घटरूप हो जानेकी—घटके स्वरूप बन जानेकी—आपत्ति उपस्थित हो
जाती है। क्योंकि दो अभावरूप दो निषेधोंसे प्रकृतकी—विधिकी—सिद्धि हो जाती है। ( 'द्वौ नञौ प्रकृतार्थं
गमयतः' ऐसा नियम है । ) घटमें रहनेवाला घटभिन्न पटके स्वरूपका अभाव घटसे भिन्न न हो तो घटसे
भिन्न न होनेवाले अस्तित्व धर्मसे जिस प्रकार घटादिमें अस्तित्व धर्मका सद्भाव होता है, उसी प्रकार घटसे
भिन्न न होनेवाले नास्तित्वधर्मसे घटादिमें सिद्ध हुए नास्तित्वधर्मके सद्भावको भी स्वीकार करना चाहिये।
शंका—स्वरूपसे पदार्थका अस्तित्व ही पदार्थका पररूपसे नास्तित्व होता है और पररूपसे पदार्थका
नास्तित्व ही पदार्थका स्वरूपसे अस्तित्व होता है, इसलिये अस्तित्व और नास्तित्व इन धर्मोंमें एक वस्तुमें
भेद न होनेसे—दोनों धर्मोंकी एकरूपता होनेसे—पदार्थकी अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तता कैसे हो सकती है ?
समाधान--ऐसा कहना हो तो हम कहते हैं कि भावके—अस्तित्वके—द्वारा अपेक्षणीय निमित्त और अभाव-
के—नास्तित्वके—द्वारा अपेक्षणीय निमित्तमें भेद होनेसे पदार्थकी अस्तित्वनास्तित्वधर्मयुक्तता हो जाती है।
स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्व-भावरूप निमित्तकी अपेक्षासे पदार्थ ज्ञातामें अपने अस्तित्व धर्मका ज्ञान
उत्पन्न कराता है, तथा परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावरूप निमित्तकी अपेक्षासे ज्ञातामें अपने नास्तित्व
धर्मका ज्ञान उत्पन्न कराता है। इस तरह एक पदार्थमें जैसे एकत्व, द्वित्व आदि संख्याओंमें जिस प्रकार भेद
होता है, उसी प्रकार एक पदार्थमें अस्तित्व धर्म और नास्तित्व धर्ममें होता है। एक द्रव्यमें अन्य द्रव्यकी
अपेक्षासे प्रकट होनेवाली द्वित्वादि संख्या, जिसके अपने एक द्रव्यकी ही अपेक्षा होती है, ऐसी एकत्व संख्यासे