स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
अन्य. यो. व्य. श्लोक १९ ] स्याद्वादमञ्जरी १६१
पोतसमानं त्वच्छासनम्, कूपस्तम्भसंनिभः स्याद्वादः। पक्षिपोतोपमा वादिनः। ते च स्वाभि-
मतपक्षप्ररूपणोड्डयनेन मुक्तिलक्षणतटप्राप्तये कृतप्रयत्ना अपि तस्माद् इष्टार्थसिद्धिमपश्यन्तो
व्यावृत्त्य स्याद्वादरूपकूपस्तम्भालङ्कृततावकीनशासनप्रवहणोपसर्पणमेव यदि शरणीकुर्वते,
तदा तेषां भवार्णवाद् बहिर्निष्क्रमणमनोरथः सफलतां कलयति नापरथा ॥इति काव्यार्थः ॥१९॥
एवं क्रियावादिनां१ प्रावादुकानां कतिपयकुग्रहनिग्रहं विधाय सांप्रतमक्रियावादिनां
लौकायतिकानं२ मतं सर्वाधमत्वादन्ते उपन्यस्यन् तन्मतमूलस्य प्रत्यक्षप्रमाणस्यानुमानादि-
प्रमाणान्तरानङ्गीकारेऽकिंचित्करत्वप्रदर्शनेन तेषां प्रज्ञायाः प्रमादमादर्शयति—
क्षणमें नष्ट होता हैं, कोई भी वस्तु नित्य नहीं है । जिस प्रकार दीपककी लौके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहते
हुए भी लौके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें एकसा ज्ञान होनेके कारण यह वही लौ है, यह ज्ञान होता है, वैसे ही
पदार्थोंके प्रत्येक क्षणमें बदलते रहनेपर भी पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें एकसा ज्ञान होनेसे पदार्थको
एकताका ज्ञान होता है । पदार्थोंके प्रत्येक क्षणमें नष्ट होते हुए भी परस्पर भिन्न क्षणोंको जोड़नेवाली शक्ति-
को वासना, अथवा सन्तान कहते हैं। यह नाना क्षणोंकी परम्परा ही वासना है। इसी वासनाकी उत्तरोत्तर
अनेक क्षणपरंपराके कार्य-कारण सम्बन्धसे कर्ता, भोक्ता आदिका व्यवहार होता है, वास्तवमें कर्ता और
भोक्ता कोई नित्य पदार्थ नहीं है। जैन—वासना और क्षणसंतति परस्पर अभिन्न हैं, भिन्न हैं, अथवा
अनुभय ? ( क ) यदि वासना और क्षणसंतति अभिन्न हैं, तो दोमेंसे एकको ही मानना चाहिये । ( ख )
यदि वासना और क्षणसंततिको भिन्न मानो, तो दोनोंमें कोई सम्बन्ध नहीं बन सकता । ( ग ) भिन्न और
अभिन्न दोनों विकल्प स्वीकार न करके यदि वासना और क्षणसंतति भिन्न-अभिन्नके अभाव रूप मानो, तो
अनेकान्त मत छोड़ कर, दूसरे वादियोंके मतमें भेद और अभेदसे विलक्षण कोई तीसरा पक्ष नहीं बन सकता ।
विज्ञानवादी बौद्ध—हम लोग आलयविज्ञानको वासना कहते हैं। अहंकार-संयुक्त चेतनाको
आलयविज्ञान कहते हैं। आलयविज्ञानमें प्रवृत्तिविज्ञान रूप सम्पूर्ण धर्म कार्य रूपसे उत्पन्न होते हैं, इस
आलयविज्ञानसे पूर्व क्षणसे उत्पन्न चेतनाकी शक्तिसे युक्त उत्तर क्षण उत्पन्न होता है। इसी आलयविज्ञान
( वासना ) से परस्पर भिन्न पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सम्बन्ध होता है। जैन—क्षणिकवादी बौद्धोंके मतमें
स्वयं आलयविज्ञान भी नित्य नहीं कहा जा सकता । अतएव क्षणिक आलयविज्ञान परस्पर असंबद्ध पूर्व और
उत्तर क्षणोंको नहीं जोड़ सकता । इसलिये आलयविज्ञान द्वारा पूर्व क्षणसे उत्तरक्षणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ।
अतएव बौद्धोंको पदार्थोंको सर्वथा अनित्य न मान कर कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य ही मानना
चाहिये । क्योंकि प्रत्येक वस्तु क्षणमें नयी-नयी उत्पन्न होनेकी अपेक्षा अनित्य है, तथा वस्तुकी क्षण-क्षणमें
पलटनेवाली भूत, भविष्य और वर्तमान पर्याय किसी नित्य द्रव्य ( वासना ) से परस्पर संबद्ध होती है, इस-
लिये अनित्य है ।
इस प्रकार क्रियावादियों ( आत्मवादी ) के सिद्धान्तोंका खंडन करके, अक्रियावादी ( अनात्मवादी )
लोकायत लोगोंके मतका खंडन करते हुए, अनुमान आदि प्रमाणोंके बिना प्रत्यक्ष प्रमाणकी असिद्धि बता कर
उनके ज्ञानकी मन्दता दिखाते हैं—
१. क्रियावादिनो नाम येषामात्मनोऽस्तित्वं प्रत्यविप्रतिपत्तिः । ये त्वक्रियावादिनस्तेऽस्तीति क्रियाविशिष्टमात्मानं
नेच्छन्त्येव, अस्तित्वे वा शरीरेण सहैकत्वान्यत्वाभ्यामवक्तव्यत्वमिच्छन्ति । उत्तराध्ययनसूत्रे २३, शीलांक-
टीकायां ।
२. लोकाः निर्विचाराः सामान्यलोकास्तद्वदाचरन्ति स्मेति लोकायता लोकायतिका इत्यपि । बृहस्पति-
प्रणीतमतत्वेन बार्हस्पत्याश्चेति । षड्दर्शनसमुच्चयोपरि गुणरत्नटीकायां पृ०.१२२.।
१९२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २०
विनानुमानेन पराभिसन्धिमसंविदानस्य तु नास्तिकस्य ।
न साम्प्रतं वक्तुमपि क्व चेष्टा क्व दृष्टमात्रं च दृहा प्रमादः ॥२०॥
प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमिति मन्यते चार्वाकः । तत्र सन्नह्यते । अनु पश्चाद् लिङ्गसंवन्ध-
ग्रहणस्मरणानन्तरम् मीयते परिच्छिद्यते देशकालस्वभावविप्रकृष्टोऽर्थोऽनेन ज्ञानविशेषेण
इत्यनुमानं । प्रस्तावात् स्वार्थानुमानम्' । तेनानुमानेन लैङ्गिकप्रामाणेन विना पराभिसन्धिं
पराभिप्रायम्, असंविदानस्य सम्यग् अजानानस्य । तुशब्दः पूर्ववादिभ्यो भेदद्योतनार्थः ।
पूर्वेषां वादिनामास्तिकतया विप्रतिपत्तिस्थानेषु क्षोदः कृतः, नास्तिकस्य तु वक्तुमपि नौचिती
कुत एव तेन सह क्षोद इति तुशब्दार्थः । नास्ति परलोकः पुण्यम् पापम् इति वा मतिरस्य ।
"नास्तिकास्तिकदैष्टिकम्" इति निपातनात् नास्तिकः । तस्य नास्तिकस्य लौकायतिकस्य,
वक्तुमपि न सांप्रतं वचनमप्युच्चारयितुं नोचितम् । ततस्तूष्णींभाव एवास्य श्रेयान्, दूरे प्रामा-
णिकपरिषदि प्रविश्य प्रमाणोपन्यासगोष्ठी ॥
वचनं हि परप्रत्यायनाय प्रतिपाद्यते । परेण चाप्रतिपित्सितमर्थं प्रतिपादयन् नासौ
सतामवधेयवचनो भवति, उन्मत्तवत् । ननु कथमिव तूष्णीकतैवास्य श्रेयसी यावता चेष्टा-
विशेषादिना प्रतिपाद्यस्याभिप्रायमनुमाय सुकरमेवानेन वचनोच्चारणम् इत्याशङ्कयाह क्व
चेष्टा क्व दृष्टमात्रं च इति । क्वेति बृहदन्तरे । चेष्टा इङ्गितम् । पराभिप्रायस्यानुमेयस्य
लिङ्गम् । क्व च दृष्टमात्रम् । दर्शनं दृष्टं । भावे क्तः । दृष्टमेव दृष्टमात्रम् प्रत्यक्षमात्रम्, तस्य
लिङ्गनिरपेक्षप्रवृत्तित्वात् । अत एव दूरमन्तरमेतयोः । न हि प्रत्यक्षेणातीन्द्रियाः परचेतोवृत्तयः
श्लोकार्थ- अनुमानके बिना चार्वाक लोग दूसरेका अभिप्राय नहीं समझ सकते । अतएव चार्वाक
लोगोंको बोलनेकी चेष्टा भी नहीं करनी चाहिये । क्योंकि चेष्टा और प्रत्यक्ष दोनोंमें बहुत अन्तर है । यह
कितना प्रमाद है !
व्याख्यार्थ- चार्वाक- केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । इसलिये पांच इन्द्रियोंके विषयके बाह्य
कोई वस्तु नहीं है । जैन - जिसके द्वारा अविनाभाव सम्बन्धके स्मरणपूर्वक देश, काल और स्वभाव सम्वन्धी
दूर पदार्थोंका ज्ञान हो, उसे स्वार्थानुमान कहते हैं (अनु पश्चात् मीयते परिच्छिद्यते) स्वार्थानुमान परोपदेशके
बिना होता है, और परार्थानुमानमें दूसरोंको समझानेके लिये पक्ष और हेतुका प्रयोग किया जाता है । अनु-
मान प्रमाणके बिना दूसरोंका अभिप्राय समझमें नहीं आ सकता । अब तकके श्लोकोंमें आस्तिक मतका खंडन
किया गया है । परलोक, पुण्य और पापको न माननेवाले नास्तिक चार्वाक लोग वचनोंका उच्चारण भी
नहीं कर सकते, अतएव नास्तिकोंके लिये प्रामाणिक पुरुषोंकी सभासे दूर रह कर मौन रहना ही श्रेयस्कर
है । "नास्तिकास्तिकदैष्टिकम्" इस निपात सूत्रसे नास्तिक शब्द बनता है ।
दूसरोंको ज्ञान करानेके लिये ही वचनोंका प्रयोग किया जाता है । दूसरेके द्वारा अप्रतिपित्सित
(जिसे जानने की इच्छा न हो ) अर्थको प्रतिपादन करनेवालेका वचन उन्मत्त पुरुषके वचनके समान आदर-
णीय नहीं हो सकते । 'इसका मौन रहना ही कैसे श्रेयस्कर हो सकता हैं ? दूसरेके अनुमानका विषय बने हुए
अभिप्रायको जाननेकी चेष्टाविशेष आदिसे, जिसको प्रतिपादन करना होता है, उसका अभिप्राय जानकर,
उसके द्वारा वचनोच्चारण करना ठीक हैं' - इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं । कहाँ चेष्टा ( इंगित ) और
कहाँ प्रत्यक्षदर्शन ! दूसरेके अभिप्रायको बतानेवाली चेष्टामें और प्रत्यक्षसे किसी पदार्थको जाननेमें बहुत
अन्तर है । क्योंकि चेष्टा दूसरेके अभिप्रायको जाननेमें लिंग है, और प्रत्यक्ष लिंगके बिना ही उत्पन्न होता है ।
प्रत्यक्षसे इन्द्रियोंके बाह्य दूसरेके मनका अभिप्राय नहीं जाना जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष इन्द्रियजन्य ही होता
१. अनुमानं द्विविधं स्वार्थं परार्थं च । तत्र हेतुग्रहणसम्बन्धस्मरणकारकं साध्यविधानं स्वार्थम् । पक्षहेतुवचनात्मकं
परार्थमनुमानमुपचारात् । प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कारे ३-१०, २३ । २ हैमसूत्रे ६-४-६६ ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २० ] स्याद्वादमञ्जरी १९३
परिज्ञातुं शक्याः, तस्यैन्द्रियकत्वात् । मुखप्रसादादिचेष्टया तु लिङ्गभूतया पराभिप्रायस्य निश्चये
अनुमानप्रमाणमनिच्छतोऽपि तस्य बलादापतितम् । तथाहि—मद्वचनश्रवणाभिप्रायवानयं
पुरुषः, तादृग् मुखप्रसादादिचेष्टान्यथानुपपत्तेरिति । अतश्च हहा प्रमादः । हहा इति खेदे ।
अहो तस्य प्रमादः प्रमत्तता, यदनुभूयमानमप्यनुमानं प्रत्यक्षमात्राङ्गीकारेणापह्नुते ॥
अत्र संपूर्वस्य वेत्तेरकर्मकत्वे एवात्मनेपदम्, अत्र तु कर्मास्ति तत्कथमत्रानश् । अत्रो-
च्यते । अत्र संवेदितुं शक्तः संविदान इति कार्यम् । “वयःशक्तिशीले”१ इति शक्तौ शानविधा-
नात् । ततश्चायमर्थः । अनुमानेन विना पराभिसंहितं सम्यग् वेदितुमशक्तस्येति । एवं परबुद्धि-
ज्ञानान्यथानुपपत्त्यायमनुमानं हठाद् अङ्गीकारितः ॥
तथा प्रकारान्तरेणाप्ययमङ्गीकारयितव्यः । तथाहि—चार्वाकः काश्चित् ज्ञानव्यक्तीः संवा-
दित्वेनाव्यभिचारिणीरुपलभ्य, अन्याश्च विसंवादित्वेन व्यभिचारिणीः पुनः कालान्तरे तादृशी-
तराणां ज्ञानव्यक्तीनामवश्यं प्रमाणतेतरते व्यवस्थापयेत् ; न च संनिहितार्थबलेनोत्पद्यमानं
पूर्वापरपरामर्शशून्यं प्रत्यक्षं पूर्वापरकालभाविनीनां ज्ञानव्यक्तीनां प्रामाण्याप्रामाण्यव्यवस्थापकं
निमित्तमुपलक्षयितुं क्षमते । न चायं स्वप्रतीतिगोचराणामपि ज्ञानव्यक्तीनां परं प्रति प्रामाण्यम-
प्रामाण्यं वा व्यवस्थापयितुं प्रभवति । तस्माद् यथादृष्टज्ञानव्यक्तिसाधर्म्यद्वारेणेदानीन्तनज्ञान-
व्यक्तीनां प्रामाण्याप्रामाण्यव्यवस्थापकम् परप्रतिपादकं च प्रमाणान्तरमनुमानरूपमुपासीत ।
है । अतएव लिंगभूत मुख आदिकी चेष्टासे दूसरेके अभिप्रायको जाननेके लिये अनुमान प्रमाणको स्वीकार
करनेकी अनिच्छा होनेपर भी प्रत्यक्षके अतिरिक्त अनुमान प्रमाणको जबरन मानना पड़ता है । तथाहि—'यह
पुरुष मेरे वचनोंको सुननेकी इच्छा रखता है, क्योंकि यदि उसकी उक्त इच्छा न होती तो उसकी मुख-
प्रसाद आदि रूप चेष्टायें न दिखाई देतीं'—इस प्रकारका ज्ञान अनुमानके बिना नहीं होता । खेद है कि चार्वाक
लोग इस प्रकार अनुमान प्रमाणका अनुभव करते हुए भी अनुमानको उड़ाकर केवल प्रत्यक्षको ही स्वीकार
करना चाहते हैं।
शंका—सं-विद् धातु अकर्मक होनेपर आत्मनेपदमें ही प्रयुक्त होती है, इसलिये यहाँ 'पराभिसन्धिम्'
कर्मके होते हुए सं-विद् धातुमें 'आनश्' प्रत्यय होकर 'संविदानस्य' शब्द नहीं बन सकता । समाधान—
जो जाननेके लिये समर्थ हो, उसे 'संविदान' कहते है । यहाँ “वयःशक्तिशीले” सूत्रसे सामर्थ्यके अर्थमें 'शान'
प्रत्यय होनेसे 'संविदान' शब्द बना है । इसलिये यहाँ यह अर्थ होता है कि नास्तिक लोग दूसरे लोगोंके
अभिप्रायको सम्यक्रूपसे समझनेमें असमर्थ (असंविदानस्य) हैं, अतएव दूसरेके अभिप्रायको जाननेके लिये
अनुमान प्रमाण अवश्य मानना चाहिये ।
(क) तथा, प्रकारान्तसे भी अनुमान प्रमाण अंगीकार करना आवश्यक है। तथाहि—संवादी
होनेके कारण कुछ ज्ञानव्यक्तियोंको अव्यभिचारी, तथा विसंवादी होनेके कारण अन्य ज्ञानव्यक्तियोंको व्यभि-
चारी जानकर, पुनः कालान्तरमें संवादी एवं विसंवादी ज्ञानव्यक्तियोंकी प्रमाणता और अप्रमाणताका चार्वाक
अवश्यमेव निर्णय कर सकता है । किन्तु पूर्व एवं अपरकालमें उत्पन्न होनेवाले ज्ञानव्यक्तियोंके प्रामाण्य और
अप्रामाण्यका निर्णय करनेमें साधनभूत समीपस्थ अर्थके बलसे उत्पन्न होनेवाले पूर्व एवं अपर कालवर्ती पदार्थों-
के संबंधसे शून्य प्रत्यक्षको लक्ष्य करनेके लियें वह समर्थ नहीं है। अपने अनुभवका विषय बने हुए ज्ञानव्यक्तियों-
का दूसरेके लिये प्रमाण्य और अप्रामाण्यका निश्चय करनेके लिये चार्वाक समर्थ नहीं है। (ख) चार्वाक लोग
प्रत्यक्षसे दूसरोंके प्रति ज्ञानको प्रमाण अथवा अप्रमाण नहीं ठहरा सकते। अतएव पूर्व कालमें जाने हुए ज्ञान-
की समानता देखकर वर्तमान कालके ज्ञानको प्रमाण अथवा अप्रमाण ठहरानेके लिये प्रत्यक्षके अतिरिक्त
अनुमानके रूपमें कोई दूसरा प्रमाण अवश्य मानना चाहिये । प्रत्यक्षके अतिरिक्त दूसरा प्रमाण अनुमान ही हो
१. हैमसूत्रे ५-२-२४
२५
१९४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २०
परलोकादिनिषेधश्च न प्रत्यक्षमात्रेण शक्यः कर्तुम्, संनिहितमात्रविषयत्वात् तस्य । परलोका-
दिकं चाप्रतिषिध्य नायं सुखमास्ते, प्रमाणान्तरं च नेच्छतीति डिम्भहेवाकः ॥
किञ्च, प्रत्यक्षस्याप्यर्थाव्यभिचारादेव प्रामाण्यम्, कथमितरथा स्नानपानावगाहनाद्यर्थ-
क्रियाऽसमर्थे मरुमरीचिकानिचयचुम्बिनि जलज्ञाने न प्रामाण्यम् ? तच्च अर्थप्रतिबद्धलिङ्गशब्द-
द्वारा समुन्मज्जतोरनुमानागमयोरप्यर्थाव्यभिचारादेव किं नेष्यते ? व्यभिचारिणोरप्यनयोर्दर्श-
नाद् अप्रामाण्यमिति चेत्, प्रत्यक्षस्यापि तिमिरादिदोषाद् निशीथिनीनाथयुगलावलम्बिनोऽ-
प्रमाणस्य दर्शनात् सर्वत्राप्रामाण्यप्रसङ्गः । प्रत्यक्षाभासं तदिति चेत्, इतरत्रापि तुल्यमेतत्
अन्यत्र पक्षपातात् । एवं च प्रत्यक्षमात्रेण वस्तुव्यवस्थानुपपत्तेः तन्मूला जीवपुण्यापुण्यपरलोक-
निषेधादिवादा अप्रमाणमेव ॥
एवं नास्तिकाभिमतो भूतचिद्वादोऽपि निराकार्यः । तथा च द्रव्यालङ्कारकारौ उपयोग-
वर्णने—"न चायं भूतधर्मः सत्त्वकठिनत्वादिवद् मद्याङ्गेषु भ्रम्यादिसद्गशक्तिवद् वा प्रत्येक-
मनुपलम्भात् । अनभिव्यक्तावात्मसिद्धिः । कायाकारपरिणतेभ्यस्तेभ्यः स उत्पद्यते इति चेत्,
कायपरिणामोऽपि तन्मात्रभावी न कादाचित्कः । अन्यस्त्वात्मैव स्यात् । अहेतुत्वे न देशादि-
सकता है । (ग) प्रत्यक्ष प्रमाणसे परलोक आदिका निषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष पासके पदार्थों-
को ही जान सकता है । परलोकका अभाव माने बिना चार्वाक लोगोंको शांति नहीं मिलती, और साथ ही
वे लोग प्रत्यक्षके अतिरिक्त अन्य प्रमाण न माननेकी भी हठ करते हैं—यह कैसी बालचेष्टा है !
तथा, प्रत्यक्षका प्रामाण्य ( ज्ञेयार्थको जाननेकी क्रियाकी-प्रमितिकी-उत्पत्तिमें साधकतम )
प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञेय पदार्थके ज्ञानका अविसंवादित्व होनेपर ही सिद्ध होता है । यदि प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञेय पदार्थका
ज्ञान अविसंवादी न होने पर भी प्रत्यक्षका प्रामाण्य सिद्ध होता हो तो स्नान, पान, अवगाहन आदि प्रयोजन
की निष्पत्ति करनेमें असमर्थ मृगतृष्णा विषयक जलज्ञानमें प्रामाण्य कैसे नहीं हो सकता ? अर्थके साथ प्रति-
बद्ध ( अविनाभाव युक्त ) ऐसे हेतु और शब्दके द्वारा उत्पन्न अनुमान एवं आगमके द्वारा ज्ञात पदार्थके ज्ञानकी
अविसंवादिता होनेसे इन दोनोंका प्रामाण्य क्यों स्वीकार नहीं किया जाता ? यदि कहो कि अनुमान और
आगममें ज्ञात पदार्थके ज्ञानकी अविसंवादिता नहीं देखी जाती इसलिये उन्हें प्रमाण नहीं माना जा सकता,
तो इस प्रकार प्रत्यक्षमें भी तिमिर आदि नेत्ररोगके कारण एक चन्द्रमाका दो चन्द्रमा रूप ज्ञान होता है,
इसलिये प्रत्यक्षको भी सर्वत्र अप्रमाण ही मानना चाहिये । यदि कहो कि नेत्ररोगके कारण एक चन्द्रमाके
स्थानपर दो चन्द्रमा दिखाई देते हैं, इसलिये एक चन्द्रमामें दो चन्द्रका ज्ञान प्रत्यक्षाभास है, तो इसी तरह हम
सदोष अनुमानको अनुमानाभास, और सदोष आगमको आगमाभास कहते हैं । अतएव केवल प्रत्यक्ष प्रमाणसे
पदार्थोंका निश्चित स्वरूप नहीं जाना जा सकता, इसलिये प्रत्यक्ष प्रमाणका अवलम्बन लेकर जीव, पुण्य, पाप,
परलोक आदिका निषेध करनेवाले दर्शन अप्रमाण ही हैं ।
इससे नास्तिक लोगोंके भूतचिद्वाद (पांच भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति) का भी निराकरण करना चाहिये ।
द्रव्यालंकारके (दो) कर्ता उपयोगका वर्णन करते समय कहते हैं—"जिस प्रकार सत्त्व, कठिनत्व आदि भूतोंके
धर्म हैं, अथवा जिस प्रकार मादक द्रव्योंमें थकावट एवं मद उत्पन्न करनेवाली शक्ति होती है, उसी प्रकार
पंच महाभूतोंमेंसे प्रत्येक भूतमें चैतन्य नहीं पाया जाता, अतएव वह भूतधर्म नहीं है । यह चैतन्य भूतोंमें
अभिव्यक्त नहीं होता, अतएव आत्माकी सिद्धि होती है । चार्वाक—जिस समय पृथिवी आदि पांच महाभूत
शरीर रूपमें परिणत होते हैं, उसी समय उनमें चैतन्य उत्पन्न हो जाता है । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि
यदि आप लोग पृथिवी आदिके मिलनेसे ही शरीरका परिणमन मानते हैं, तो वह अनित्य नहीं होता (शरीरके
अनित्य न होनेके कारण उसकी उत्पत्ति होना असंभव है, अतएव चैतन्य धर्मकी भी उत्पत्ति नहीं होती ) ।
और यदि पृथिवी आदिके अतिरिक्त चैतन्य कोई भिन्न वस्तु है, तो उसे आत्मा कहना चाहिये । यदि चैतन्य
अन्य. यो. व्य. श्लोक २० ] स्याद्वादमञ्जरी १९५
नियमः । मृतादपि च स्यात् । शोणिताद्युपाधिः सुप्तादावप्यस्ति । न च सतस्तस्योत्पत्तिः, भूयो-
भूयः प्रसङ्गात् । अलब्धआत्मनश्च प्रसिद्धमर्थक्रियाकारित्वं विरुध्यते । असतः सकलशक्तिविकलस्य
कथमुत्पत्तौ कर्तृत्वम्, अन्यस्यापि प्रसङ्गात् ? तन्न भूतकार्यमुपयोगः ॥
कुतस्तर्हि सुप्तोत्थितस्य तदुदयः ? असंवेदनेन चैतन्यस्याभावात् । न, जाग्रदवस्थानुभूतस्य
स्मरणात् । असंवेदनं तु निद्रोपघातात् । कथं तर्हि कायविकृतौ चैतन्यविकृतिः ? नैकान्तः,
श्वित्रादिना कश्मलवपुषोऽपि बुद्धिशुद्धेः, अविकारे च भावनाविशेषतः प्रीत्यादिभेददर्शनात्
शोकादिना बुद्धिविकृतौ कायविकारादर्शनाच्च । परिणामिनो विना च न कार्योत्पत्तिः । न च
भूतान्येव तथा परिणमन्ति विजातीयत्वात् । काठिन्यादेरनुपलम्भात् । अणव एवेन्द्रियग्राह्यत्व-
रूपां स्थूलतां प्रतिपद्यन्ते तज्जात्यादि चोपलभ्यते । तन्न भूतानां धर्मः फलं वा उपयोगः । तथा
भवांश्च यदाक्षिपति तदस्य लक्षणम् । स चात्मा स्वसंविदितः । भूतानां तथाभावे बहिर्मुखं
स्याद् । गौरोऽहमित्यादि तु नान्तर्मुखं वाह्यकरणजन्यत्वात् । अनभ्युपगतानुमानप्रामाण्यस्य
चात्मनिषेधोऽपि दुर्लभः ।
धर्मको अहेतुक माना जाय तो देश और कालका नियम नहीं बन सकता । यदि कहो कि भूतोंके शरीर रूपमें
परिणमन होनेसे चैतन्यकी उत्पत्ति होती है, तो मृतक पुरुषमें भी चैतन्य पाया जाना चाहिये, क्योंकि वहाँ
भी पृथिवी आदिका कायरूप परिणमन मौजूद है। यदि कहो कि मृतक पुरुषमें रक्तका संचार नहीं होता,
अतएव मुर्देमें चेतन शक्तिका अभाव है, तो सोते हुए मनुष्यमें रक्तका संचार होनेपर भी उसे ज्ञान क्यों नहीं
होता ? तथा, यदि कहो कि चैतन्य धर्मका सद्भाव होनेपर भी उसकी उत्पत्ति होती है तो यह भी ठीक नहीं ।
क्योंकि चैतन्य धर्मकी पुनः पुनः उत्पत्ति होनेका प्रसंग आयेगा; तथा, अनुत्पन्न चैतन्यधर्मका अर्थक्रियाकारित्व
विरुद्ध पड़ेगा । जिस पदार्थका सर्वथा अभाव है, और जो सर्व शक्तिसे रहित है, वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता
कैसे हो सकता है ? यदि सकल शक्तिशून्य असत् पदार्थको भी उत्पत्ति क्रियाका कर्ता माना जाये तो विशिष्ट
शक्तिशून्य पदार्थको भी कर्ता माननेका प्रसंग उपस्थित होगा । अतएव उपयोग अर्थात् चैतन्य धर्म पंच
महाभूतोंत्पन्न कार्य नहीं है ।
शंका—यदि पृथिवी आदि पांच भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती, तो सो कर उठनेवाले पुरुषमें
चेतन शक्ति कहाँसे आती है, क्योंकि सोनेके समय पूर्व चेतन शक्ति नष्ट हो जाती है । समाधान—सो कर
उठनेके पश्चात् हमें जाग्रत अवस्थामें अनुभूत पदार्थोंका ही स्मरण होता है । सोते समय चेतन शक्तिका
निद्राके उदयसे आच्छादन हो जाता है । शंका—यदि शरीर और चैतन्यका कोई संबंध नहीं है, तो शरीरमें
विकार उत्पन्न होनेसे चेतनामें विकार क्यों होता है ? समाधान--यह एकान्त नियम नहीं है। क्योंकि
बहुतसे कोढ़ी पुरुष भी बुद्धिमान होते हैं, और शरीरमें किसी प्रकारका विकार न होनेपर भी बुद्धिमें राग,
द्वेष आदिका भावनाविशेषके कारण सद्भाव पाया जाता है; इसी तरह शोक आदिसे बुद्धिमें विकार होनेपर
भी शरीरमें विकार नहीं देखा जाता । परिणामी अर्थात् परिणमनशील उपादानके अभावमें कार्य अर्थात्
परिणामकी उत्पत्ति नहीं होती । तथा, पृथिवी आदि पंचभूतोंका चैतन्य रूप परिणमन मानना ठीक नहीं,
क्योंकि पृथिवी आदि चैतन्यके विजातीय हैं—पृथिवी आदिकी तरह चैतन्यमें काठिन्य आदि गुण नहीं
पाये जाते । परमाणु ही इन्द्रियग्राह्यत्व रूप स्थूल पर्यायको धारण करते हैं, और स्थूल पर्यायको प्राप्त
करनेपर भी परमाणुओंकी जातिमें कोई अन्तर नहीं पड़ता । अतएव चैतन्य पृथिवी आदि पांच भूतोंका धर्म
अथवा फल (कार्य) नहीं कहा जा सकता । तथा, आपलोग जिस पर आक्षेप करते हैं, हम उसे ही आत्मा
कहते हैं । आत्मा स्वसंवेदनका विषय है । यदि आत्मा भूतोंसे उत्पन्न हो, तो 'मैं गोरा हूँ' यह अंतर्मुख ज्ञान
न होकर 'यह गोरा है' इस प्रकारका बहिर्मुख ज्ञान होना चाहिये, क्योंकि वह बाह्य कारणसे उत्पन्न होता
है । तथा, अनुमान प्रमाणके स्वीकार किये बिना आत्माका निषेध नहीं किया जा सकता ।
१९६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २१
धर्मः फलं च भूतानाम् उपयोगो भवेद् यदि ।
प्रत्येकमुपलम्भः स्यादुत्पादो वा विलक्षणात् ॥”
इति काव्यार्थः ॥ २० ॥
एवमुक्तयुक्तिभिरेकान्तवादप्रतिक्षेपमाख्याय साम्प्रतमनाद्यविद्यावासनाप्रवासितसन्म-
तयः प्रत्यक्षोपलक्ष्यमाणमप्यनेकान्तवादं येऽवमन्यन्ते तेषामुन्मत्ततामाविर्भावयन्नाह—
प्रतिक्षणोत्पादविनाशयोगिस्थिरैकमध्यक्षमपीक्षमाणः ।
जिन त्वदाज्ञामवमन्यते यः स वातकी नाथ पिशाचकी वा ॥२१॥
प्रतिक्षणं प्रतिसमयम् । उत्पादेनोत्तराकारस्वीकाररूपेण विनाशेन च पूर्वाकारपरिहार-
लक्षणेन युज्यत इत्येवंशीलं प्रतिक्षणोत्पादविनाशयोगि । किं तत् ? स्थिरैकं कर्मतापन्नं । स्थिर-
'यदि चैतन्य ( उपयोग ) पृथिवी आदि भूतोंका धर्म या कार्य हो, तो प्रत्येक पदार्थमें चैतन्यकी
उपलब्धि होनी चाहिये, और विजातीय पदार्थोंसे सजातीय पदार्थोंकी उत्पत्ति होनी चाहिये' ॥ यह श्लोकका
अर्थ है ॥
भावार्थ—चार्वाक (१) प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है । अतएव पांच इन्द्रियोंके बाह्य कोई वस्तु नहीं
है, इसलिए स्वर्ग, नरक और मोक्षका सद्भाव नहीं मानना चाहिये । वास्तवमें कण्टक आदिसे उत्पन्न होने-
वाले दुखको नरक कहते हैं, प्रजाके नियन्ता राजाको ईश्वर कहते हैं, और देहको छोड़नेको मोक्ष कहते हैं ।
अतएव मनुष्य जीवनको खूब आनन्दसे बिताना चाहिये, कारण कि मरनेके बाद फिर संसारमें जन्म नहीं
होता । जैन—अनुमान प्रमाणके बिना दूसरेके मनका अभिप्राय ज्ञात नहीं हो सकता । क्योंकि प्रत्यक्षसे
इन्द्रियोंके बाह्य दूसरोंका अभिप्राय नहीं जाना जा सकता । 'यह पुरुष मेरे वचनोंको सुनना चाहता है, क्योंकि
इसके मुँहपर अमुक प्रकारकी चेष्टा दिखाई देती है'—इस प्रकारका ज्ञान अनुमानके बिना नहीं हो सकता ।
तथा, बिना अनुमान प्रमाणके ज्ञानके प्रामाण्य और अप्रामाण्य का भी निश्चय नहीं हो सकता । इसके अति-
रिक्त, प्रत्यक्षकी सत्यता भी अनुमानसे ही जानी जाती है । इसलिये अनुमान अवश्य मानना चाहिये ।
चार्वाक—(२) जिस प्रकार मादक पदार्थोंसे मदशक्ति पैदा होती है, वैसे ही पृथिवी आदि भूतोंसे
चैतन्यकी उत्पत्ति होती है । पाँच भूतोंके नाश होनेसे चैतन्यका भी नाश हो जाता है, इसलिये आत्मा कोई
वस्तु नहीं है । आत्माके अभाव होनेसे धर्म, अधर्म, और पुण्य, पाप भी कोई वस्तु नहीं ठहरते । जैन—यदि
मादक शक्तिकी तरह चैतन्यको पांच भूतोंका विकार माना जाय, तो जिस तरह मदशक्ति प्रत्येक मादक
पदार्थमें पायी जाती है, वैसे ही चेतन शक्तिको भी प्रत्येक पदार्थमें उपलब्ध होना चाहिये । तथा, यदि पृथिवी
आदिसे चेतन शक्ति उत्पन्न हो, तो मृतक पुरुषमें भी चेतना माननी चाहिये । इसके अतिरिक्त, पृथिवी आदि
चैतन्यके विजातीय हैं, क्योंकि चैतन्यमें पृथिवीके काठिन्य आदि गुण नहीं पाये जाते । अतएव चेतना शक्तिको
भौतिक विकार नहीं मानकर आत्माको स्वतंत्र पदार्थ मानना चाहिये ।
इस प्रकार एकान्तवादका खंडन करके, अनादि अविद्याकी वासनासे मलिन बुद्धिवाले जो लोग
अनेकांतको प्रत्यक्षसे देखते हुए भी उसकी अवमानना करते हैं, उनकी उन्मत्तताका प्रदर्शन करते हैं—
श्लोकार्थ—हे नाथ, प्रत्येक क्षणमें उत्पन्न और नाश होनेवाले पदार्थोंको प्रत्यक्षसे स्थिर देखकर
भी वातरोग अथवा पिशाचसे ग्रस्त लोगोंकी तरह लोग आपकी आज्ञाकी अवहेलना करते हैं ।
व्याख्यार्थ—प्रत्येक द्रव्य प्रतिक्षण उत्तर पर्यायोंके होनेसे उत्पन्न ( उत्पाद ) और पूर्व पर्यायोंके
नाश होनेसे नष्ट ( व्यय ) होकर भी स्थिर रहता है । जिस प्रकार चैत्र और मैत्र दोनों भाइयोंका अधिकरण
अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९७
मुत्पादविनाशयोरनुयायित्वात् त्रिकालवर्ति यदेकं द्रव्यं स्थिरैकम् । एकशब्दोऽत्र साधारणवाची ।
उत्पादे विनाशे च तत्साधारणम्, अन्वयिद्रव्यत्वात् । यथा चैत्रमैत्रयोरेका जननी साधारणे-
त्यर्थः । इत्थमेव हि तयोरेकाधिकरणता पर्यायाणां, कथञ्चिदनेकत्वेऽपि तस्य कथञ्चिदेकत्वात् ।
एवं त्र्यात्मकं वस्तु अध्यक्षमपीक्षमाणः प्रत्यक्षमवलोकयन् अपि । हे जिन रागादिजैत्र ।
त्वदाज्ञाम् आ सामस्त्येनानन्तधर्मविशिष्टतया ज्ञायन्तेऽवबुद्ध्यन्ते जीवाजीवादयः पदार्था यया
सा आज्ञा आगमः ,शासनं तवाज्ञा त्वदाज्ञा । तां त्वदाज्ञां भवत्प्रणीतस्याद्वादमुद्राम् यः
कश्चिदविवेकी अवमन्यतेऽवजानाति । जात्यपेक्षमेकवचनमवज्ञया वा । स पुरुषपशुर्वातकी
पिशाचकी वा । वातो रोगविशेषोऽस्यास्तीति वातकी । वातकीव वातकी । वातूल इत्यर्थः । एवं
पिशाचकीव पिशाचकी । भूताविष्ट इत्यर्थः ॥
अत्र वाशब्दः समुच्चयार्थः उपमानार्थो वा । स पुरुषापसदो वातकिपिशाचकिभ्यामधि-
रोहति तुलामित्यर्थः । “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” १इत्यनेन मत्वर्थीयः कश्चान्तः । एवं
पिशाचकीत्यपि । यथा किल वातेन पिशाचेन वाक्रान्तवपुर्वस्तुतत्त्वं साक्षात्कुर्वन्नपि तदावेश-
वशात् अन्यथा प्रतिपद्यते एवमयमप्येकान्तवादापस्मारै२रपवश इति । अत्र च जिनेति साभि-
प्रायम् । रागादिजेतृत्वाद् हि जिनः । ततश्च यः किल विगलितदोषकालुष्यतयावधेयवचन-
स्यापि तत्रभवतः शासनमवमन्यते तस्य कथं नोन्मत्ततेति भावः । नाथ हे स्वामिन् । अलब्धस्य
सम्यग्दर्शनादेर्लम्भकतया लब्धस्य च तस्यैव निरतिचारपरिपालनोपदेशदायितया च योगक्षेम-
करत्वोपपत्तेर्नाथः । तस्यामन्त्रणम् ॥
एक माता है, उसी तरह उत्पाद और विनाश दोनोंका अधिकरण एक अन्वयी द्रव्य है, इसलिये उत्पाद और
विनाशके रहते हुए भी द्रव्य सदा स्थिर रहता है । क्योंकि उत्पाद और व्यय रूप पर्यायोंके कथंचित् अनेक
होने पर भी द्रव्य कथंचित् एक माना गया है । इस प्रकार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप पदार्थोंको प्रत्यक्षसे
देखकर भी वातरोग अथवा पिशाचसे ग्रस्त लोगोंकी तरह अविवेकी लोग आपकी अनेकान्त रूप आज्ञाका
उल्लंघन करते हैं ।
यहाँ 'वा' शब्द समुच्चय अथवा उपमान अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । इसलिये यह अर्थ होता है कि
आपकी आज्ञाको उल्लंघन करनेवाले अधम पुरुष वातकी ( वात रोगसे ग्रस्त ) अथवा पिशाचकी ( पिशाचसे
ग्रस्त ) की तरह हैं । यहाँ “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” सूत्रसे वात और पिशाच शब्दसे मत्वर्थमें इन्
प्रत्यय होकर अन्तमें 'क' लग जाता है । जिस प्रकार वात और पिशाचसे ग्रस्त पुरुष पदार्थोंको देखते हुए
भी उन्हें वात और पिशाचके आवेशमें अन्यथा रूपसे प्रतिपादन करता है, वैसे ही एकान्तवाद रूपी अपस्मार
( मृगी ) से पीड़ित मनुष्य प्रत्येक पदार्थमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य अवस्थायें देखकर भी उन्हें अन्यथा
रूपसे प्रतिपादन करता है । श्लोकमें 'जिन' शब्दका प्रयोग विशेष अर्थ बतानेके लिये किया गया है । जिसने
राग, द्वेष आदि दोषोंको जीत लिया है, उसे जिन कहते हैं । अतएव आपके वचनोंके निर्दोष होनेपर भी
जो लोग उनकी अवज्ञा करते हैं, उन्हें उन्मत्त ही कहना चाहिये । हे स्वामिन्, आप सम्यग्दर्शनको प्राप्त
करानेवाले और उसे निरतिचार पालन करनेका उपदेश देनेवाले होनेके कारण सुख और शांतिके दाता हैं,
इसलिये आप नाथ हैं ।
१. हैमसूत्रे ७-२-६१ ।
२. अपस्मर्यते पूर्ववृत्तं विस्मर्यतेऽनेन । रोगविशेषः ।
तमःप्रवेशो संरम्भो दोषोद्रेकहतस्मृतेः ।
अपस्मार इति ज्ञेयो गदो घोरश्चतुर्विधः ॥
शब्दकल्पद्रुमे ।
१९८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २१
वस्तुतत्त्वं चोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकम् । तथाहि सर्वं वस्तु द्रव्यात्मना नोत्पद्यते विपद्यते
वा, परिस्फुटमन्वयदर्शनात् । लूनपुनर्जातनखादिष्वन्वयदर्शनेन व्यभिचार इति न वाच्यम्,
प्रमाणेन बाध्यमानस्यान्वयस्यापरिस्फुटत्वात् । न च प्रस्तुतोऽन्वयः प्रमाणविरुद्धः सत्यप्रत्य-
भिज्ञानसिद्धत्वात् ।
“सर्वव्यक्तिषु नियतं क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेषः ।
सत्योश्चित्यपचित्योराकृतिजातित्यवस्थानात्” ॥
इति वचनात् ॥
ततो द्रव्यात्मना स्थितिरेव सर्वस्य वस्तुनः । पर्यायात्मना तु सर्वं वस्तूत्पद्यते विपद्यते
च, अस्खलितपर्यायानुभवसद्भावात् । न चैवं शुक्ले शङ्खे पीतादिपर्यायानुभवेन व्यभिचारः, तस्य
स्खलद्रूपत्वात् । न खलु सोऽस्खलद्रूपो येन पूर्वाकारविनाशाजह
अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९९
ननूत्पादादयः परस्परं भिद्यन्ते न वा ? यदि भिद्यन्ते, कथमेकं वस्तु त्रयात्मकम् ? न
भिद्यन्ते चेत्, तथापि कथमेकं त्रयात्मकम् ? तथा च
"यद्युत्पादादयो भिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् ।
अथोत्पादादयोऽभिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् "
इति चेत्, तदयुक्तं, कथञ्चिद्भिन्नलक्षणत्वेन तेषां कथञ्चिद्भेदाभ्युपगमात् । तथाहि-उत्पादविनाश-
ध्रौव्याणि स्याद् भिन्नानि, भिन्नलक्षणत्वात्, रूपादिवदिति । न च भिन्नलक्षणत्वमसिद्धम् ।
असत आत्मलाभः सतः सत्तावियोगः द्रव्यरूपतयानुवर्तनं च खलूत्पादादीनां परस्परमसंकीर्णानि
लक्षणानि सकललोकसाक्षिकान्येव ॥
न चामी भिन्नलक्षणा अपि परस्परानपेक्षाः, खपुष्पवदसत्त्वापत्तेः । तथाहि-उत्पादः केवलो
नास्ति, स्थितिविगमराहित्वात् कूर्मरोमवत् । तथा विनाशः केवलो नास्ति, स्थित्युत्पत्तिरहि-
तत्त्वात्, तद्वत् । एवं स्थितिः केवला नास्ति, विनाशोत्पादशून्यत्वात्, तद्वदेव । इत्यन्योऽन्या-
पेक्षाणामुत्पादादीनां वस्तुनि सत्त्वं प्रतिपत्तव्यम् । तथा चोक्तम्--
“घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥ १ ॥
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
अगोरसव्रतो नोभे तस्माद् वस्तु त्रयात्मकम् ॥ २ ॥१”
शंका-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, या अभिन्न ? यदि उत्पाद आदि परस्पर भिन्न
हैं, तो वस्तुका स्वरूप उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप नहीं कहा जा सकता । यदि वे परस्पर अभिन्न हैं, तो
तीनों एक रूप होनेसे तीन रूप कैसे हो सकते हैं ? कहा भी है--
“यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, तो वे तीन रूप नहीं कहे जा सकते । यदि उत्पाद
आदि अभिन्न हैं, तो उन्हें तीन रूप न मानकर एक ही मानना चाहिये ।”
समाधान--यह ठीक नहीं। क्योंकि हम लोग उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद होनेसे
उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद मानते हैं । तथाहि—उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य कथंचित् भिन्न
हैं, भिन्न लक्षणवाले होनेसे; रूप, रस, स्पर्श और गंधकी भाँति । यहाँ भिन्न लक्षणरूप हेतु असिद्ध नहीं
है । उत्पत्तिके पूर्व जिसका ( कथंचित् ) अभाव होता है उसका प्रादुर्भाव ( आत्मलाभ ), जो विद्यमान होता
है उसकी सत्ताका अभाव, तथा द्रव्य रूपसे अनुवर्तन—ये वस्तुतः उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके परस्पर
असंकीर्ण लक्षण सभीके द्वारा जाने जाते हैं ।
उत्पाद आदि परस्पर भिन्न होकर भी एक दूसरेसे निरपेक्ष नहीं हैं । यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य
को एक दूसरेसे निरपेक्ष मानें, तो आकाश-पुष्पकी तरह उनका अभाव मानना पड़े । अतएव जैसे कछुवेकी
पीठपर बालोंके नाश और स्थितिके विना, बालोंका केवल उत्पाद होना संभव नहीं है, उसी तरह व्यय
और ध्रौव्यसे रहित केवल उत्पादका होना नहीं बन सकता । इसी प्रकार कछुवेके बालोंकी तरह उत्पाद
और ध्रौव्यसे रहित केवल व्यय, तथा उत्पाद और नाशसे रहित केवल स्थिति भी संभव नहीं है ।
अतएव एक दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप वस्तुका लक्षण स्वीकार करना चाहिये ।
कहा भी है--
“घड़े, मुकुट और सोनेके चाहनेवाले पुरुष घड़ेके नाश, मुकुटके उत्पाद, और सोनेकी स्थितिमें क्रमसे
शोक, हर्ष और माध्यस्थ भाव रखते हैं । तथा, ‘मैं दूध ही पीऊँगा’ इस प्रकारका व्रत रखनेवाला पुरुष सिर्फ
दूध ही पीता है, दही नहीं खाता; ‘मैं आज दही ही खाऊँगा’ इस प्रकारका नियम लेनेवाला पुरुष सिर्फ दही
१ आप्तमीमांसायां ५९,६०
२०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
इति काव्यार्थः ॥ २१ ॥
अथान्ययोगव्यवच्छेदस्य प्रस्तुतत्वात् आस्तां तावत्साक्षाद् भवान्, भवदीयप्रवचना-
वयवा अपि परतीर्थिकतिरस्कारबद्धकक्षा इत्याशयवान् स्तुतिकारः स्याद्वादन्यव्यवस्थापनाय प्रयोग-
मुपन्यस्यन् स्तुतिमाह—
अनन्तधर्मात्मकमेव तत्त्वमतोऽन्यथा सत्त्वमसूपपादम् ।
इति प्रमाणान्यपि ते कुवादिकुरङ्गसंत्रासनसिंहनादाः ॥ २२ ॥
तत्त्वं परमार्थभूतं वस्तु जीवाजीवलक्षणम् अनन्तधर्मात्मकमेव । अनन्तास्त्रिकाल-
विषयत्वाद् अपरिमिता ये धर्माः सहभाविनः क्रमभाविनश्च पर्यायाः । त एवात्मा स्वरूपं
यस्य तदनन्तधर्मात्मकम् । एवकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । अत एवाह अतोऽन्यथा इत्यादि ।
ही खाता है, दूध नहीं पीता; और गोरसका व्रत लेनेवाला पुरुष दूध और दही दोनों नहीं खाता । अतः
प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप है ।”
( यहाँ उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको दृष्टांतसे समझाया गया है । एक राजाके एक पुत्र और एक पुत्री
थी । राजाकी पुत्रीके पास एक सोनेका घड़ा था, राजाके पुत्रने उस घड़ेको तुड़वा कर उसका मुकुट बनवा
लिया । घड़ेके नष्ट होनेपर ( व्यय ) राजाकी पुत्रीको शोक हुआ, मुकुटकी उत्पत्ति होनेसे ( उत्पाद ) राजाके
पुत्रको हर्ष हुआ, तथा राजा दोनों अवस्थाओंमें मध्यस्थ था ( ध्रौव्य ), इसलिये राजाको शोक और हर्ष दोनों
नहीं हुए । इससे मालूम होता है, कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनों अवस्थायें मौजूद रहती
हैं । इसी प्रकार दूधका व्रती दही, और दहीका व्रती दूध, और गोरसका व्रती दही और दूध दोनों नहीं
खाता है । इसलिये प्रत्येक वस्तु तीनों रूप है ) ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—जैन दर्शनके अनुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही वस्तुका लक्षण है ( उत्पादव्यय-
ध्रौव्ययुक्तं सत् ) । वेदान्ती लोगोंके अनुसार, वस्तु तत्त्व सर्वथा नित्य, और बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
सर्वथा क्षणिक है । परन्तु जैन लोगोंका मत है कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं, इसलिये
पर्यायकी अपेक्षा वस्तु अनित्य है, तथा उत्पत्ति और नाश होते हुए भी हमें वस्तुकी स्थिरताका भान होता
है, अतएव द्रव्यकी अपेक्षा वस्तु नित्य है। अतएव जैन दर्शनमें प्रत्येक वस्तु कथंचित् नित्य, और कथंचित्
अनित्य स्वीकार की गई है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर कथंचित् भिन्न होकर भी सापेक्ष हैं । जिस
प्रकार नाश और स्थितिके विना केवल उत्पाद संभव नहीं है, तथा उत्पाद और स्थितिके विना नाश संभव
नहीं है, उसी तरह उत्पाद और नाशके विना स्थिति भी संभव नहीं । अतएव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको
ही वस्तुका लक्षण मानना चाहिये ।
साक्षात् भगवान्की बात तो दूर रही, भगवान्के उपदेशके कुछ अंश ही कुवादियोंको पराजित करनेमें
समर्थ हैं, इसलिये स्तुतिकार स्याद्वादका प्रतिपादन करते हैं—
श्लोकार्थ—प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म मौजूद हैं, पदार्थमें अनन्त धर्म माने बिना वस्तुकी सिद्धि
नहीं होती । अतएव आपके प्रमाणवाक्य कुवादी रूप मृगोंको डरानेके लिये सिंहकी गर्जनाके समान हैं ।
व्याख्यार्थ—जीवरूप और अजीवरूप परमार्थभूत वस्तु अनन्तधर्मात्मक होती है । त्रिकालविषय
होनेसे जो धर्म अनन्त हैं वे सहभावी पर्याय (गुणरूप) और क्रमभावी पर्यायरूप होते हैं । सहभावी और
क्रमभावी पर्यायें जिसका स्वरूप होती हैं, वह वस्तु अनंतधर्मात्मक होती है । यहाँ 'एव' शब्द, अनंतधर्मात्मक
न होनेवालो वस्तुका परिहार करनेके लिये प्रयुक्त किया गया है। अतएव 'अतोऽन्यथा' इत्यादि शब्दोंका
Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:
अन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०१
अतोऽन्यथा उक्तप्रकारवैपरीत्येन । सत्त्वं वस्तुतत्त्वम् । असूपपादं सुखेनोपपाद्यते घटनाकोटि-
संटङ्कमारोप्यते इति सूपपादं । न तथा असूपपादं । दुर्घटमित्यर्थः । अनेन साधनं दर्शितम् ।
तथाहि—तत्त्वमिति धर्मि । अनन्तधर्मात्मकत्वं साध्यो धर्मः । सत्त्वान्यथानुपपत्तेरिति हेतुः,
अन्यथानुपपन्नत्वैकलक्षणत्वाद्धेतोः । अन्तर्व्याप्त्यैव$^१$ साध्यस्य सिद्धत्वाद् दृष्टान्तादिभिर्न प्रयो-
जनम् । यदनन्तधर्मात्मकं न भवति तत् सदपि न भवति, यथा वियदिन्दीवरम् इति केवल-
व्यतिरेकी हेतुः, साधर्म्यदृष्टान्तानां पक्षकुक्षिनिक्षिप्तत्वेनान्वयायोगात् ।
अनन्तधर्मात्मकत्वं च आत्मनि तावद् साकारानाकारोपयोगिता । कर्तृत्वं भोक्तृत्वं
प्रदेशाष्टकनिश्चलता अमूर्तत्वम् असंख्यातप्रदेशात्मकता जीवत्वमित्यादयः$^३$ सहभाविनो
प्रयोग किया गया है। 'अतोऽन्यथा' अर्थात् उक्त प्रकारसे विपरीत । 'सत्त्व' अर्थात् वस्तुका स्वरूप । 'सूपपादं'—
सुखसे प्राप्त करने योग्य । जो 'सूपपाद' नहीं, वह 'असूपपाद' अर्थात् दुर्घट । इसके द्वारा साधन प्रदर्शित किया
गया है। तथाहि—'तत्त्वं' यह धर्मी है । 'अनन्त धर्मात्मकत्व' यह साध्यभूत धर्म है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
है; क्योंकि अन्यथानुपपन्नत्व हेतुका लक्षण है। 'वस्तुतत्त्व (पक्ष) अनन्त धर्मात्मक (साध्य) है, क्योंकि
दूसरे प्रकारसे वस्तुतत्त्वकी सिद्धि नहीं होती (हेतु)'—यहाँ अन्तर्व्याप्तिसे साध्यकी सिद्धि होती है, इसलिये
उक्त हेतुमें दृष्टांतकी आवश्यकता नहीं है । (जहाँ साधनसाध्यसे व्याप्त होता है, अर्थात् जहाँ साध्य अपने
स्वरूपसे साधनमें होता है, उसे अन्तर्व्याप्ति कहते हैं । जिस समय प्रतिवादीको व्याप्ति संबंधका ज्ञान करते
समय व्याप्ति-संबंधका स्मरण होता है, उस समय प्रतिवादीको हेतुके सर्वत्र साध्य युक्त होनेका ज्ञान होता है,
और साथ ही अन्तर्व्याप्ति ज्ञानसे प्रतिवादीको यह भी ज्ञान होता है कि प्रस्तुत पक्षमें वर्तमान हेतु भी साध्यसे
युक्त है । दृष्टांतके विना पक्षके भीतर ही हेतुसे साध्यकी सिद्धि हो जाती है, इसलिये यहाँ पक्षके बाहर
दृष्टांतके द्वारा कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ) । 'जो अनन्त धर्मात्मक नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता, जैसे
आकाशका फूल' । आकाशके फूलमें अनन्त धर्म नहीं रहते, इसलिये वह सत् भी नहीं है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः'
यह हेतु केवलव्यतिरेकी है । जहाँ जहाँ साध्य नहीं रहता, वहाँ वहाँ साधन नहीं रहता । क्योंकि 'जहाँ-जहाँ
सत् है, वहाँ वहाँ अनन्त धर्म पाये जाते हैं' इस अन्वयव्याप्तिमें दिया जानेवाला प्रत्येक दृष्टांत पक्षमें ही
गर्भित हो जाता है। अतएव यहाँ अन्वयव्याप्ति न बताकर केवल व्यतिरेक व्याप्ति बताई गई है ।
ज्ञानोपयोग, दर्शनोपयोग, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आठ मध्य प्रदेशोंकी स्थिरता, अमूर्तत्व, असंख्यात प्रदेशीपना
१. अन्तःपक्षमध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वमन्तर्व्याप्तिः । तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेः ।
अयमर्थः । अन्तर्व्याप्तेः साध्यसंसिद्धिशक्तौ बाह्यव्याप्तेर्वर्णनं वन्ध्यमेव । साध्यसंसिद्ध्यशक्तौ बाह्यव्याप्ते-
र्वर्णनं व्यर्थमेव ।
२. तत्र सर्वकालं जीवाष्टमध्यप्रदेशाः निरपवादाः सर्वजीवानां स्थिता एव । केवलिनामपि अयोगिनां सिद्धानां
च सर्वे प्रदेशा स्थिता एव । व्यायामदुःखपरितापोद्रेकपरिणतानां जीवानां यथोक्ताष्टमध्यप्रदेशवर्जिता
इतरे प्रदेशा अवस्थिता एव । शेषाणां प्राणिनां स्थिताश्चास्थिताश्चेति । तत्त्वार्थराजवार्तिके पृ० २०३
३. जीवो उवओगमओ अमृत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो ।
भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥
छाया—जीवः उपयोगमयः अमूर्ति कर्त्ता स्वदेहपरिमाणः ।
भोक्ता संसारस्थः सिद्धः स विस्रसा ऊर्ध्वगतिः ॥ द्रव्यसंग्रहे २
जीवसिद्धिः चार्वाकं प्रति; ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणं नैयायिकं प्रति; अमूर्तजीवस्थापनं भट्टचार्वा-
कद्वयं प्रति; कर्मकर्तृत्वस्थापनं सांख्यं प्रति; स्वदेहप्रमितिस्थापनं नैयायिकमीमांसकसांख्यत्रयं प्रति; कर्म-
भोक्तृत्वव्याख्यानं बौद्धं प्रति; संसारस्य व्याख्यानं सदाशिवं प्रति; सिद्धत्वव्याख्यानं भट्टाचार्वाकद्वयं प्रति;
ऊर्ध्वगतिस्वभावकथनं माण्डलिकग्रन्थकारं प्रति, इति मतार्थो ज्ञातव्यः । द्रव्यसंग्रहवृत्तौ ।
२६
२०२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
धर्माः। हर्षविषादशोकसुखदुःखदेवनरनारकतियंक्तवादयस्तु क्रमभाविनः। धर्मास्तिकाया-
दिष्वपि असंख्येयप्रदेशात्मकत्वम् गत्याद्युपग्रहकारित्वम्¹ मत्यादिज्ञानविषयत्वम् तत्तदवच्छेद-
कावच्छेदत्वम् अवस्थितत्वम् अरूपित्वम् एकद्रव्यत्वम् निष्क्रियत्वमित्यादयः । घटे पुनरामत्वम्
पाकजरूपादिमत्त्वम् पृथुबुध्नोदरत्वम् कम्बुग्रीवत्वम् जलादिधारणाहरणसामर्थ्यम् मत्यादि-
ज्ञानज्ञेयत्वम् नवत्वम् पुरातनत्वमित्यादयः । एवं सर्वपदार्थेष्वपि नानानयमताभिज्ञेन शाब्दा-
नार्थांश्च पर्यायान् प्रतीत्य वाच्यम् ॥
और जीवत्व इत्यादि आत्माके सहभावी धर्म हैं । [ जो धर्म सदा द्रव्यके साथ रहते हैं, उन्हें सहभावी धर्म
कहते हैं । सहभावी धर्म गुण भी कहे जाते हैं। ( १ ) व्यवहार नयकी अपेक्षा साकार ज्ञानोपयोग और निरा-
कार दर्शनोपयोग जीवका लक्षण है । ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग जीवसे कभी अलग नहीं होते । चक्षु,
अचक्षु, अवधि और केवलदर्शनके भेदसे दर्शनोपयोग चार, और मति, श्रुति अवधि, मनःपर्यय, केवल, कुमति,
कुश्रुति, और कुवधि ज्ञानके भेदसे ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका है। निश्चय नयसे शुद्ध अखंड केवलज्ञान ही
जीवका लक्षण है। नैयायिक लोग ज्ञान और दर्शनको आत्माका स्वभाव न मानकर उन्हें आत्माके साथ
समवाय संबंधसे संबद्ध मानते हैं, इसलिये जीवको उपयोग रूप बताया है। ( २ ) जीव कर्ता है। जीव
सांख्योंके पुरुषकी तरह कर्मोंसे निर्लिप्त होकर केवल द्रष्टाकी तरह नहीं रहता, किन्तु ज्ञानावरण आदि कर्मोंका
स्वयं करनेवाला निमित्तकर्ता है। यहाँ सांख्य मतके निराकरणके लिये जीवको कर्ता बताया गया है। ( ३ )
यह जीव सुख-दुख रूप कर्मोंके फलका भोग करता है । क्षणिकवादी बौद्धोंके मतमें जो कर्ता है, वह भोक्ता
नहीं हो सकता, इसलिये जीवको भोक्ता कहा गया है। ( ४ ) जीवके आठ मध्यप्रदेश सदा एकसे अवस्थित
रहते हैं। अयोगकेवली और सिद्धोंके सम्पूर्ण प्रदेश स्थिर रहते हैं। व्यायाम दुख, परिताप आदिसे युक्त
जीवोंके आठ प्रदेशोंके अतिरिक्त बाकीके प्रदेश प्रवृत्तिशोल होते हैं। शेष जीवोंके प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति दोनों
रूप प्रदेश होते हैं। ( ५ ) यह जीव स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णसे रहित है, इसलिये निश्चय नयसे अमूर्त
है। ( ६ ) जीव लोकाकाशके बराबर असंख्यात प्रदेशोंका धारक है । वास्तवमें जैन दर्शनके अनुसार नैयायिक,
मीमांसक आदि दर्शनोंकी तरह जीवको प्रदेशोंकी अपेक्षा व्यापक नहीं माना, किन्तु जैन दर्शनमें ज्ञानकी
अपेक्षा व्यवहार नयसे व्यापक कहा है।² ( ७ ) जीवमें जीवत्व जीवका पारिणामिक ( स्वाभाविक ) भाव है।
व्यवहार नयसे दस प्राण, और निश्चय नयसे चेतना जीवका जीवत्व है । ] हर्ष विषाद, शोक, सुख, दुख,
देव, मनुष्य, नारक, तिर्यंच आदि अवस्था जीवके क्रमभावी अर्थात् क्रमसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाले धर्म हैं।
(क्रमभावी धर्मोंका दूसरा नाम पर्याय भी है।) (१) धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय प्रत्येक द्रव्यमें असंख्यात
प्रदेश ( अविभाज्य अंश ) होते हैं। ( २ ) जिस प्रकार जल मछलीके चलानेमें सहायता करता है, और
वृक्षकी छाया पथिकके ठहरानेमें निमित्त होती है, उसी तरह धर्म गतिशील पदार्थोंकी गतिमें, और अधर्म
ठहरनेवाले पदार्थोंकी स्थितिमें निमित्त कारण होते हैं। ( ३ ) धर्म और अधर्म मति, श्रुति आदि ज्ञानोंसे
निश्चित किये जाते हैं। ( ४ ) धर्म और अधर्म अपने स्वरूपको छोड़कर पररूप नहीं होते, इसलिये परस्पर
मिश्रण न होनेसे अवस्थित हैं। ( ५ ) धर्म और अधर्म स्पर्श आदिसे रहित होनेसे अरूपी हैं। ( ६ ) एक
व्यक्तिरूप होनेसे एक हैं, तथा ( ७ ) क्रिया रहित होनेसे निष्क्रिय हैं। इसी प्रकार घड़ेमें कच्चापन, पक्कापन,
मोटापन, चौड़ापन, कम्बुग्रीवापन ( शंख जैसी गर्दन ) जलधारण, जलआहरण, ज्ञेयपन, नयापन, पुरानापन
आदि अनन्त धर्म रहते हैं। अतएव नाना नयोंकी दृष्टिसे शब्द और अर्थकी अपेक्षा प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म
विद्यमान हैं।
१. नित्यावस्थितान्यरूपणि । आ आकाशादेकद्रव्याणि । निष्क्रियाणि च । असंख्येयाः प्रदेशाः धर्माधर्मयोः ।
गतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारः। तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये पंचमाध्याये सूत्राणि ।
२. देखिये द्रव्यसंग्रहवृत्ति गा. १० ।
अन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०३
अत्र चात्मशब्देनानन्तेष्वपि धर्मेष्वनुवृत्तिरूपमन्वयिद्रव्यं ध्वनितम् । ततश्च “उत्पाद-
व्ययध्रौव्ययुक्तं सत्” इति व्यवस्थितम् । एवं तावदर्थेषु । शब्देष्वपि उदात्तानुदात्तस्वरितविवृत-
संवृतघोषवदघोषतालप्राणमहाप्राणतादयः तत्तदर्थप्रत्ययनशक्त्यादयश्चावसेयाः । अस्य हेतो-
रसिद्धविरुद्धानैकान्तिकत्वादिकण्टकोद्धारः स्वयमभ्यूह्यः । इत्येवमुल्लेखशेखराणि ते तव प्रमा-
णान्यपि न्यायोपपन्नसाधनवाक्यान्यपि । आस्तां तावद् साक्षात्कृतद्रव्यपर्यायनिकायो भवान् ।
यावदेतान्यपि कुवादिकुरङ्गसन्त्रासनसिंहनादाः कुवादिनः कुत्सितवादिनः । एकांशग्राहकनया-
नुयायिनोऽन्यतीर्थिकास्त एव संसारवनगहनवसनव्यसनितया कुरङ्गा मृगास्तेषां सम्यक्त्रासने
सिंहनादा इव सिंहनादाः । यथा सिंहस्य नादमात्रमप्याकर्ण्य कुरङ्गास्त्रासमासूत्रयन्ति, तथा
भवत्प्रणीतैवंप्रकारप्रमाणवचनान्यपि श्रुत्वा कुवादिनस्त्रस्तामश्नुवते प्रतिवचनप्रदानकातरतां
बिभ्रतीति यावत् । एकैकं त्वदुपज्ञं प्रमाणमन्ययोगव्यवच्छेदकमित्यर्थः ॥
अत्र प्रमाणानि इति बहुवचनमेवंजातीयानां प्रमाणानां भगवच्छासने आनन्त्यज्ञाप-
नार्थम्, एकैकस्य सूत्रस्य सर्वोदधिसलिलसर्वसरिद्वालुकानन्तगुणार्थत्वात् तेषां च सर्वेषामपि
सर्वविन्मूलतया प्रमाणत्वात् । अथवा “इत्यादिवहुवचनान्ता गणस्य संसूचका भवन्ति” इति
न्यायाद् इतिशब्देन प्रमाणबाहुल्यसूचनात् पूर्वार्द्धे एकस्मिन् अपि प्रमाणे उपन्यस्ते उचितमेव
बहुवचनम् ॥ इति काव्यार्थः ॥२२॥
अनन्तरमनन्तधर्मात्मकत्वं वस्तुनि साध्यं मुकुलितमुक्तम् । तदेव सप्तभङ्गीप्ररूपणद्वारेण
प्रपञ्चयन् भगवतो निरतिशयं वचनातिशयं च स्तुवन्नाह—
'अनन्त धर्मात्मक' शब्दमें आत्मा शब्दसे अनंत पर्यायोंमें रहनेवाले नित्य द्रव्यका सूचन होता हैं ।
अतएव “उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही 'सत्' का लक्षण है।” पदार्थोंकी तरह शब्दोंमें भी उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित, विवृत, संवृत, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण आदि तथा पदार्थोंके ज्ञान करानेकी शक्ति आदि अनन्त
धर्म पाये जाते हैं । 'तत्त्वं अनंतधर्मात्मकं सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' इस अनुमानमें जो 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
दिया गया है उसके असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनैकांतिकत्व आदि दोषोंके परिहार पर स्वयं विचार करना चाहिये ।
हे भगवन् ! आपकी बात तो दूर रही, आपके न्याययुक्त वचन ही कुवादीरूपी हरिणोंको संत्रस्त करनेके लिये
सिंहकी गर्जनाके समान हैं। जिस प्रकार सिंहकी गर्जनाको सुनकर जंगलके हरिण भयभीत होते हैं, उसी
प्रकार आपके स्याद्वादका निरूपण करनेवाले वचनोंको सुनकर वस्तुके केवल अंशमात्रको ग्रहण करनेवाले,
संसाररूपी गहन वनमें फिरनेवाले कुवादी लोग संत्रस्त होते हैं ।
एक एक विषयको खंडन करनेवाले बहुतसे प्रमाणोंका सूचन करनेके लिये श्लोकमें 'प्रमाणानि'
बहुवचन दिया है; क्योंकि भगवान्के प्रत्येक सूत्र सम्पूर्ण समुद्रोंके जलसे और सम्पूर्ण नदियोंकी बालुकासे भी
अनंतगुने हैं और वे सम्पूर्ण सूत्र सर्वज्ञ भगवान्के कहे हुए हैं, इसलिए प्रमाण हैं । अथवा “इति, आदि बहु
वचनवाले शब्दसमूहके सूचक होते हैं” इस न्यायसे 'इति' शब्दसे बहुतसे प्रमाणोंका सूचन होता है, अतएव
श्लोकके पूर्वार्धमें एक प्रमाणका उल्लेख करनेपर भी बहुवचन समझना चाहिये ॥ यह श्लोका अर्थ है ॥२२॥
भावार्थ—इस श्लोकमें प्रत्येक वस्तुको अनंत धर्मवाली सिद्ध किया गया है । जैन सिद्धांतके अनुसार
यदि पदार्थोंमें अनंत धर्म स्वीकार न किये जांय, तो वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती अतएव, 'प्रत्येक वस्तु अनन्त
धर्मात्मक है, क्योंकि वस्तुमें अनंत धर्म माने बिना वस्तुमें वस्तुत्व सिद्ध नहीं हो सकता । जो अनन्त धर्मात्मक
नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता। जैसे आकाश।' अतएव जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल सम्पूर्ण
द्रव्योंमें अनन्त धर्म स्वीकार करने चाहिये ।
वस्तुमें अनन्त धर्म होते हैं, इसीको सात भंगों द्वारा प्ररूपण करते हुए भगवान्के निरतिशय वचनाति-
शयकी स्तुति करते हुए कहते हैं—
२०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
अपर्ययं वस्तु समस्यमानमद्रव्यमेतच्च विविच्यमानम् ।
आदेशभेदोदितसप्तभङ्गमदीदृशस्त्वं बुधरूपवेद्यम् ॥२३॥
समस्यमानं संक्षेपेणोच्यमानं वस्तु अपर्ययम् अविवक्षितपर्यायम् । वसन्ति गुणपर्याया
अस्मिन्निति वस्तु धर्माधर्माकाशपुद्गलकालजीवलक्षणं द्रव्यषट्कम्¹ । अयमभिप्रायः । यदैक-
मेव वस्तु आत्मघटादिकं चेतनाचेतनं सतामपि पर्यायाणामविवक्षया द्रव्यरूपमेव वस्तु वक्तु-
मिष्यते । तदा संक्षेपेणाभ्यन्तरीकृतसकलपर्यायनिकायतवलक्षणेनाभिधीयमानत्वात् अपर्यय-
मित्युपदिश्यते । केवलद्रव्यरूपमेव इत्यर्थः । यथात्मायं घटोऽयमित्यादि, पर्यायाणां द्रव्यानति-
रेकात् । अतएव द्रव्यास्तिकनयाः शुद्धसंग्रहादयो द्रव्यमात्रमेवेच्छन्ति पर्यायाणां तदविष्वग्भूत-
त्वात् । पर्ययः पर्यवः पर्याय इत्यनर्थान्तरम् । अद्रव्यमित्यादि । चः पुनरर्थे । स च पूर्वस्माद्
विशेषद्योतने भिन्नक्रमश्च । विविच्यमानं चेति विवेकेन पृथग्रूपतयोच्यमानं पुनरेतद् वस्तु
अद्रव्यमेव । अविवक्षितान्वयिद्रव्यं केवलपर्यायरूपमित्यर्थः ॥
यदा ह्यात्मा ज्ञानदर्शनादीन् पर्यायानधिकृत्य प्रतिपर्यायं विचार्यते, तदा पर्याया एव
श्लोकार्थ—सहभावी और क्रमभावी पर्यायोंसे युक्त होनेपर भी संक्षेपमें कथन किये जाने पर
जिसकी पर्यायें गौण होती हैं, और विस्तारसे कथन किये जानेपर जिसकी पर्यायोंकी मुख्यता होती है, तथा
सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के भेदसे जिसके सात अंगोंका प्ररूपण किया गया है, ऐसी
पंडितों द्वारा समझने योग्य वस्तुका, हे भगवन् ! आपने ही प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—जब वस्तुका कथन संक्षेपमें किया जाता है, तब उसकी पर्याय विवक्षित नहीं होती—
वे गौण होती हैं। जिसमें गुण और पर्यायें रहती हैं, वह वस्तु धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, काल और
जीव--इन छह द्रव्यों [देखिये परिशिष्ट (क)] में विभक्त की जाती है। ( कोई आचार्य कालको पृथक् द्रव्य नहीं
मानते । उनके .मतमें पांच ही द्रव्य हैं) अभिप्राय यह है—चेतनात्मक आत्मरूप और अचेतनात्मक घट
आदि रूप एक ही वस्तुकी पर्यायोंके विद्यमान होने पर भी, उन पर्यायोंके कथन करनेकी इच्छा न होनेसे—
उन्हें गौण कर देनेसे—द्रव्यमात्र रूप वस्तुका कथन करना ही इष्ट होता है । अतएव संक्षेपसे प्रतिपादित
समस्त पर्यायसमूहके अन्तर्भाव होनेसे 'अपर्यय' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'अपर्यय'का अर्थ है केवल
द्रव्यरूप । उदाहरणके लिये, 'यह आत्मा है', 'यह घट है'—कहने पर, आत्मा और घटकी पर्यायें विद्यमान
होनेपर भी, उनके आत्मा और घटसे भिन्न न होनेके कारण, उनका निर्देश नहीं किया जाता; क्योंकि वे
विवक्षित नहीं हैं। अतएव द्रव्यास्तिक नयरूप शुद्ध संग्रह आदि नयोंको अपने विषयरूपसे द्रव्यमात्र ही इष्ट
होता है, क्योंकि पर्यायें द्रव्यसे भिन्न नहीं होतीं । 'पर्यय', 'पर्यव' 'पर्याय' शब्द पर्यायवाची हैं। जब
पर्यायोंका द्रव्यसे भिन्नरूपसे कथन किया जाता है तब अन्वयि द्रव्यकी विवक्षा न होनेसे वस्तु केवल पर्याय-
रूप होती है ।
जिस समय आत्माकी ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंकी मुख्यतासे आत्माका विचार किया जाता है,
१. केषांचिदाचार्याणां मते पंचास्तिकाया एव । कालो द्रव्यं पृथग् नास्ति । जीवादिष्वस्त्रपि कदाचित् काल-
शब्देन उच्यते । तथा चागमः । “किमयं भंते, कालोत्ति पवुच्चइ, गोयमा ! जीवा चेव अजीवा चेवत्ति” ।
अन्ये तु आचार्याः संगिरन्ते । अस्ति धर्मास्तिकायादिद्रव्यपंचकव्यतिरिक्तम् अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्ति षष्ठं
कालद्रव्यं, यन्निबन्धना एते ह्यः श्व इत्यादयः प्रत्ययाः शब्दाश्च प्रादुर्भवन्ति । आगमश्च । “कइ णं भंते
दव्वा पण्णत्ता ? गोयमा ! छ दव्वा पण्णत्ता । तं जहा-धम्मत्थिकाये अधम्मत्थिकाइए, आगासत्थिकाइए, पुग्ग-
लत्थिकाइए जीवत्थिकाइए अद्धासमये य” । हरिभद्रकृतधर्मसंग्रहिण्यां मलयगिरिटीकायां गा. ३२
अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] . स्याद्वादमञ्जरी २०५
प्रतिभासन्ते, न पुनरात्माख्यं किमपि द्रव्यम् । एवं घटोऽपि कुण्डलौष्ठपृथुबुध्नोदरपूर्वापरादि-
भागाद्यवयवापेक्षया विविच्यमानः पर्याया एव, न पुनर्धटाख्यं तदतिरिक्तं वस्तु । अतएव
पर्यायास्तिकनयानुपातिनः पठन्ति—
“भागा एव हि भासन्ते संनिविष्टास्तथा तथा ।
तद्वान्नैव पुनः कश्चिन्निर्भागः संप्रतीयते” ॥
इति । ततश्च द्रव्यपर्यायोभयात्मकत्वेऽपि वस्तुनो द्रव्यनयार्पणया पर्यायनयानर्पणया च द्रव्य-
रूपता, पर्यायनयार्पणया द्रव्यनयानर्पणया च पर्यायरूपता, उभयनयार्पणया च तदुभयरूपता ।
अत एवाह वाचकमुख्यः “अर्पितनर्पितासिद्धेः”१ इति । एवंविधं द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु त्वमेवा-
दीदृशस्त्वमेव दर्शितवान् नान्य इति काक्वावधारणावगतिः ॥
नन्वन्वेकाभिधानप्रत्यययोग्यं द्रव्यम्, अन्याभिधानप्रत्ययविषयाश्च पर्यायाः । तत्कथ-
मेकमेव वस्तूभयात्मकम् ? इत्याशङ्क्य विशेषणद्वारेण परिहरति आदेशभेदेत्यादि । आदेशभेदेन
सकलादेशविकलादेशलक्षणेन आदेशद्वयेन उदिताः प्रतिपादिताः सप्तसंख्या भङ्गा वचनप्रकारा
यस्मिन् वस्तुनि तत्तथा । ननु यदि भगवता त्रिभुवनवन्धुना निर्विशेषतया सर्वेभ्य एवंविधं
वस्तुतत्त्वमुपदर्शितम्, तर्हि किमर्थं तीर्थान्तरीयाः तत्र विप्रतिपद्यन्ते ? इत्याह बुधरूपवेद्यम्
इति । बुध्यन्ते यथावस्थितं वस्तुतत्त्वं सारेतरविषयविभागविचारणया इति बुधाः । प्रकृष्टाः
बुधाः बुधरूपाः नैसर्गिकाधिगमिकान्यतरसम्यग्दर्शनविशदीकृतज्ञानशालिनः प्राणिनः । तैरेव
उस समय केवल ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंका ही ज्ञान होता है, आत्मा कोई भिन्न पदार्थ दृष्टिगोचर नहीं
होता । इसी प्रकार जब हम घटके मोटेपन, गोलपन, पूर्वभाग, अपरभाग आदि अवयवोंको देखते हैं, उस
समय हमें घट द्रव्यका अलग ज्ञान न होकर घटकी पर्यायोंका ही ज्ञान होता है । अतएव पर्यायास्तिक नयको
माननेवाले कहते हैं—
“उस प्रकारसे पारस्परिक घनिष्ठ संयोगको प्राप्त अंश-अवयव-ही प्रतिभासित होते हैं । अंशवान्
पदार्थ ही प्रतिभासित होता है, कोई निरंश द्रव्य दिखाई ही नहीं देता ।”
अतएव प्रत्येक वस्तुके द्रव्य, पर्याय और उभयरूप होनेपर भो द्रव्यनयकी मुख्यतासे और पर्याय-
नयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान द्रव्यरूप, पर्यायनयकी मुख्यता और द्रव्यनयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान पर्याय
रूप, तथा द्रव्य और पर्याय दोनोंकी प्रधानतासे वस्तुका ज्ञान उभयरूप होता है । वाचकमुख्य उमास्वातिने
कहा भी है—‘‘द्रव्य और पर्यायकी मुख्यता और गौणतासे वस्तुकी सिद्धि होती है ।” वस्तुका यह द्रव्य और
पर्यायरूप स्वरूप आपने ( जिन भगवान्ने ) ही प्ररूपण किया है, दूसरे किसीने नहीं । यहाँ अवधारणाका ज्ञान
काकुसे होता है ।
शंका—द्रव्य और पर्याय दोनों भिन्न-भिन्न अभिधान और भिन्न-भिन्न ज्ञानके विषय होते हैं अतएव
एक वस्तुको द्रव्य और पर्याय दोनों रूप नहीं कह सकते । समाधान—इस शंकाका परिहार 'आदेशभेद'
विशेषणसे किया गया है । हमलोग सकल और विकल आदेशके भेदसे द्रव्य और पर्यायरूप वस्तुको मानते
हैं । इसी सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के ऊपर सप्तभंगी नय अवलम्बित है । शंका—
यदि तीनों लोकोंके बन्धु जिन भगवान्ने प्रत्येक वस्तुका सामान्य रूपसे सब लोगोंके लिये सप्तभंगो द्वारा
विवेचन किया है, तो अन्य वादी लोग सप्तभंगीके सिद्धांतको क्यों नहीं मानते ? समाधान—सप्तभंगी नयके
सूक्ष्म तत्त्वको निसर्गज और अधिगमज सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध उत्कृष्ट विद्वान हो समझ सकते हैं । केवल अपने
१. तत्त्वार्थाधिगमसूत्रे ५-३२ ।
२०६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
वेदितुं शक्यं वेद्यं परिच्छेद्यम्, न पुनः स्वस्वशास्त्रतत्त्वाभ्यासपरिपाकशाणानिशातबुद्धिभिर-
प्यन्यैः, तेषामनादिमिथ्यादर्शनवासनादूषितमतितया यथावस्थितवस्तुतत्त्वानवबोधेन बुधरू-
पत्वाभावात् । तथा चागमः—
“सदसदविसेसणाउ भवहेउजहेउजहिद्विओवलंभाउ ।
णाणफलाभावाउ मिच्छादिट्ठिस्स अण्णाणं”१ ॥
अतएव तत्परिगृहीतं द्वादशाङ्गमपि मिथ्याश्रुतमामनन्ति, तेषामुपपत्तिनिरपेक्षं
यदृच्छया वस्तुतत्त्वोपलम्भसंरम्भात् । सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतं तु मिथ्याश्रुतमपि सम्यक्श्रुततया
परिणमति । सम्यग्दृशां सर्वविदुपदेशानुसारिप्रवृत्तितया मिथ्याश्रुतोक्तस्याप्यर्थस्य यथावस्थित-
विधिनिषेधविषयतयोन्नयनात् । तथाहि किल वेदे “अजै
अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २०७
प्रतिभासमाना अपि तद्द्वयव्यवस्थापकतया१ व्याख्याताः । तथा स्मार्ता अपि—
“न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला”२ ॥
इति श्लोकं पठन्ति । अस्य च यथाश्रुतार्थव्याख्यानेऽसम्बद्धप्रलाप एव । यस्मिन् हि अनुष्ठीय-
माने दोषो नास्त्येव तस्मान्निवृत्तिः कथमिव महाफला भविष्यति, इज्याध्ययनदानादेरपि
निवृत्तिप्रसङ्गात् । तस्माद् अन्यद् एदंपर्यमस्य श्लोकस्य । तथाहि । न मांसभक्षणे कृतेऽदोषः
अपि तु दोष एव । एवं मद्यमैथुनयोरपि । कथं नादोष इत्याह । यतः प्रवृत्तिरेषा भूतानाम् ।
प्रवर्तन्त उत्पद्यन्तेऽस्यामीति प्रवृत्तिरुत्पत्तिस्थानम् । भूतानां जीवानाम् तत्तज्जीवसंसक्तिहेतु-
रित्यर्थः ॥
प्रसिद्धं च मांसमद्यमैथुनानां जीवसंसक्तिमूलकारणत्वमागमे—
न प्रेत्यसंज्ञास्ति ) आदि ऋचाओंका ( महावीर स्वामीके गणधर बननेसे पहले ) श्रीइन्द्रभूति आदि वैदिक
विद्वान जीव आदिका निषेध करते थे, परन्तु महावीर भगवान्ने उक्त वाक्यका “ज्ञान पाँच भूतोंके निमित्तसे
कथंचित् उत्पन्न होता है, और पाँच भूतोंमें परिवर्तन होनेसे ज्ञानमें परिवर्तन होता है, अतएव ज्ञानकी पूर्व
संज्ञा नहीं रहती” यह अर्थ करके जीव आदिकी सिद्धि की है । ( ग ) स्मार्त लोगोंका कहना है—
“न मांस खानेमें दोष है, न मद्य और मैथुन सेवन करनेमें पाप है, क्योंकि यह प्राणियोंका स्वभाव
है । हाँ, यदि मांस आदिसे निवृत्ति हो सके, तो इससे महान् फल होता है” ( न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये
न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ) ।
परन्तु ये वाक्य केवल प्रलाप मात्र हैं । कारण कि यदि मांस आदिके भक्षणमें दोष नहीं है, तो
उनसे निवृत्त होना महान् फल नहीं कहा जा सकता । यदि मांस आदिके सेवन करनेपर भी दोष न मानकर
उनसे निवृत्त होनेको महान् फल माना जाय, तो पूजा, अध्ययन, दान आदिके अनुष्ठानसे निवृत्त होनेको
भी महान् फल कहना चाहिये । अतएव “मांसके भक्षण करनेमें पुण्य (अदोष) नहीं है (न मांसभक्षणेऽदोषो),
तथा मद्य और मैथुन सेवन करनेमें भी दोष है, क्योंकि मांस, मद्य और मैथुन जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान
हैं ( प्रवृत्तिः-उत्पत्तिस्थानं एषा भूतानाम् ) । अतएव इनसे निवृत्त होना चाहिये”—यह श्लोकका अर्थ
करना चाहिये ।
आगममें भी मांस, मद्य और मैथुनको जीवोंकी उत्पत्तिका स्थान बताया है—
१. नतूच्छेदाभिधानमेतत् ‘एतेभ्यो भूतेभ्यो समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्यसंज्ञास्ति’ (बृह० २-४-१२)
इति, कथमेतदभेदाभिधानम् । नैष दोषः । विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेतद्विनाशाभिधानं नात्मोच्छेदाभि-
प्रायम् । ‘अत्रैव मा भगवान्मूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्ति’ इति पर्यनुयुज्य स्वयमेव श्रुत्यर्थान्तरस्य दर्शितत्वात्—
‘न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति’ इति । एतदुक्तं
भवति । कूटस्थनित्य एवायं विज्ञानघन आत्मा नास्योच्छेदप्रसंगोऽस्ति । मात्राभिस्त्वस्य भूतेन्द्रियलक्षणा-
भिरविद्याकृताभिरसंसर्गो विद्यया भवति । संसर्गाभावे च तत्कृतस्य विशेषज्ञानस्याभावान्न प्रेत्य संज्ञा-
स्तीत्युक्तमिति । ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्ये १-४-२२ । अत्र हेमचन्द्रकृतत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् ( १०-५-
७७, ७८ ) हरिभद्रीयावश्यकवृत्तिश्च विलोकनीया ।
२. मनुस्मृतौ ५-५६
२०८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
“आमोसु य पक्कासु य विपच्चमाणासु मंसपेसीसु।
आयंतिअमुववाओ भणिओ उ णिगोअजीवाणं ॥ १॥
मज्जे मधुम्मि मंसम्मि णवणीअम्मि चउत्थए।
उप्पज्जंति अणंता तन्वण्णा तत्थ जंतूणो ॥ २॥
मेहुणसण्णारूढो णवलक्ख हणेइ सुहुमजीवाणं।
केवलिणा पण्णत्ता सदहिअव्वा सया कालं ॥ ३ ॥”२
तथाहि—
“इत्थीजोणीए संभवंति बेइंदिया उ जे जीवा।
इक्को व दो व तिण्णि व लक्खपुहुत्तं उ उक्कोसं ॥ ४ ॥
पुरिसेण सह गयाए तेसिं जीवाण होइ उद्दवणं।
वेणुगदिट्ठंतेणं तत्तायसलागणाएणं ॥ ५॥”
संसक्तायां योनौ द्वींद्रिया एते। शुक्रशोणितसंभवास्तु गर्भजपञ्चेन्द्रिया इमे ।
“पंचिंदिया मणुस्सा एगनरभुत्तारिगब्भम्मि।
उक्कोसं णवलक्खा जायंति एगवेलाए ॥ ६ ॥
णवलक्खाणं मज्झे जायइ इक्कस्स दोण्ह य समत्ती।
सेसा पुण एमेव य विलयं वच्चंति तत्थेव ॥ ७॥”
“कच्चे, पक्के और अग्निमें पकाये हुए मांसकी प्रत्येक अवस्थाओंमें अनन्त निगोद जीवोंकी उत्पत्ति
होती रहती है ॥ १ ॥
मद्य, मधु, मांस और मक्खनमें मद्य, मधु, मांस और मक्खनके रंगके अनंत जीवोंकी उत्पत्ति
होती है ॥ २ ॥
केवली भगवान्ने मैथुनके सेवन करनेमें नौ लाख जीवोंका घात बताया है, इसमें सदा विश्वास
करना चाहिये ॥ ३ ॥”
तथा—
स्त्रियोंकी योनिमें दो इन्द्रिय जीव उत्पन्न होते हैं। इन जीवोंकी संख्या एक, दो, तीनसे लगा कर
लाखों तक पहुँच जाती है ॥ ४ ॥
जिस समय पुरुष स्त्रीके साथ संभोग करता है, उस समय जैसे अग्निसे तपाई हुई लोहेकी सलाईको
बाँसको नलीमें डालनेसे नलीमें रखे हुए तिल भस्म हो जाते हैं, वैसे ही पुरुषके संयोगसे योनिमें रहनेवाले
सम्पूर्ण जीवोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥”
अब रज और वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले गर्भज पंचेन्द्रिय जीवोंकी संख्या कहते हैं—
पुरुष और स्त्रीके एक बार संयोग करनेपर स्त्रीके गर्भमें अधिकसे अधिक नौ लाख पंचेन्द्रिय जीव .
उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥
इन नौ लाख जीवोंमें एक या दो जीव जीते हैं, बाकी सब जीव नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥”
१. रत्नशेखरसूरिकृतसम्बोधसप्ततिकायां ६६, ६५, ६३ ।
२. छाया-आमासु च पक्वासु च विपच्यमानासु मांसपेशोषु । आत्यन्तिकमुपपादो भणितस्तु निगोदजीवानाम् ॥
मद्ये मधुनि मांसे नवनीते चतुर्थके । उत्पद्यन्तेऽनन्ताः तद्वर्णास्तत्र जंतवः ।
मैथुनसंज्ञारूढो नवलक्षं हन्ति सूक्ष्मजीवानाम् । केवलिना प्रज्ञप्ताः श्रद्धातव्याः सदाकालम् ॥
स्त्रीयोनौ सम्भवन्ति द्वीन्द्रियास्तु ये जीवाः । एको वा द्वौ वा त्रयो वा लक्षपृथुत्वं चोत्कृष्टम् ॥
पुरुषेण सह गतायां तेषां जीवानां भवति उद्ध्रवणम् । वेणुकदृष्टान्तेन तप्तायसशलाकाज्ञातेन ॥
पंचेन्द्रिया मनुष्या एकनरभुक्तानारीगर्भे । उत्कृष्टं नवलक्षा जायन्ते एकवेलायाम् ॥
नवलक्षाणां मध्ये जायते एकस्य द्वयोर्वा समाप्तिः । शेषाः पुनरेवमेव च विलयं व्रजन्ति तत्रैव ॥
[अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २०९
तदेवं जीवोपमर्दहेतुत्वाद् न मांसभक्षणादिकमदुष्टमिति प्रयोगः ॥
अथवा भूतानां पिशाचप्रायाणामेषा प्रवृत्तिः । त एवात्र मांसभक्षणादौ प्रवर्त्तन्ते न पुन-
र्विवेकिन इति भावः । तदेवं मांसभक्षणादेर्दुष्टतां स्पष्टीकृत्य यदुपदेष्टव्यं तदाह । “निवृत्तिस्तु
महाफला” । तुरेवकारार्थः । “तुः स्याद् भेदेऽवधारणे”¹ इति वचनात् । ततश्चैतेभ्यो मांस-
भक्षणादिभ्यो निवृत्तिरेव महाफला स्वर्गापवर्गफलप्रदा । न पुनः प्रवृत्तिरपीत्यर्थः । अतएव
स्थानान्तरे पठितम्—
“वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद् यस्तयोस्तुल्यं भवेत् फलम्² ॥ १ ॥
एकरात्रौषितस्यापि या गतिर्ब्रह्मचारिणः ।
न सा ऋतुसहस्रेण प्राप्तुं शक्या युधिष्ठिर” ॥ २ ॥
मद्यपाने तु कृतं सूत्रानुवादैः, तस्य सर्वविगर्हितत्वात् । तानेवं प्रकारानर्थान् कथमिव बुधा-
भासास्तीर्थिका वेदितुमर्हन्तीति कृतं प्रसङ्गेन ॥
अथ केऽमी सप्तभङ्गाः, कश्चायमादेशभेद इति ? उच्यते । एकत्र जीवादौ वस्तुनि एकै-
कसत्त्वादिधर्मविषयप्रश्नवशाद् अविरोधेन प्रत्यक्षादिबाधापरिहारेण पृथग्भूतयोः समुदितयोश्च
विधिनिषेधयोः पर्यालोचनया कृत्वा स्याच्छब्दलाञ्छितो वक्ष्यमाणैः सप्तभिः प्रकारैर्वचन-
विन्यासः सप्तभङ्गीति गीयते । तद्यथा । १ स्यादस्त्येव सर्वमिति विधिकल्पनया प्रथमो भङ्गः ।
इस प्रकार मांस, मैथुन आदिके सेवन करनेसे अनन्त जीवोंका नाश होता है, अतएव इनका सेवन करना
दोषपूर्ण है ।
अथवा, मांस-भक्षण आदिमें भूत-पिशाचोंकी ही प्रवृत्ति होती है। भूत-पिशाच जैसे ही मांस खानेमें
प्रवृत्त होते हैं, विवेकी लोग नहीं। अतएव “मांस आदिसे निवृत्त होना ही महान् फल है ।” ‘“तु’ शब्दका
प्रयोग निश्चय अर्थमें होता है”। इसलिये मांस आदिके त्याग करनेसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है ।
कहा भी है—
“प्रत्येक वर्ष सौ बार यज्ञ करनेवाले और मांस भक्षण न करनेवाले दोनों पुरुषोंको बराबर फल
मिलता है ॥ १ ॥
हे युधिष्ठिर ! एक रात ब्रह्मचर्यसे रहनेवाले पुरुषको जो उत्तम गति मिलती है, वह गति हजारों
यज्ञ करनेसे भी नहीं होती ॥ २ ॥
मद्यपानके विषयमें विशेष कहनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह सब जगह लोकमें निंदनीय है ।
स प्रकारके अर्थोंको अपनेको पंडित समझनेवाले कुवादी लोग नहीं समझ सकते ।
सप्तभंगी—जीव आदि पदार्थोंमें अस्तित्व आदि धर्मोंके विषयमें प्रश्न उठानेपर, विरोधरहित प्रत्यक्ष
आदिसे अविरुद्ध, अलग अलग अथवा सम्मिलित विधि और निषेध धर्मोंके विचारपूर्वक 'स्यात्' शब्दसे युक्त
सात प्रकारकी वचनरचनाको सप्तभंगी कहते हैं । १ प्रत्येक वस्तु विधि धर्मसे कथंचित् अस्तित्व रूप ही
१. अमरकोशे ३–२३६ ।
२. मनुस्मृतौ ५–५३ ।
२७
२ स्यान्नास्त्येव सर्वमिति निषेधकल्पनया द्वितीयः । ३ स्यादस्त्येव स्यान्नास्त्येवेति क्रमतो
विधिनिषेधकल्पनया तृतीयः । ४ स्यादवक्तव्यमेवेति युगपद्विधिनिषेधकल्पनया चतुर्थः । ५
स्यादस्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति विधिकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च पञ्चमः । ६ स्यान्ना-
स्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति निषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च षष्ठः । ७ स्यादस्त्येव
स्यान्नास्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति क्रमतो विधिनिषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च
सप्तमः ॥
तत्र स्यात्कथंचित् स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावरूपेणास्त्येव सर्वं कुम्भादि, न पुनः परद्रव्यक्षेत्र-
कालभावरूपेण । तथाहि—कुम्भो द्रव्यतः पार्थिवत्वेनास्ति, नाप्यादिरूपत्वेन । क्षेत्रतः पाटलिपुत्र-
कत्वेन, न कान्यकुब्जादित्वेन । कालतः शैशिरत्वेन । न वासन्तिकादित्वेन । भावतः श्याम-
त्वेन, न रक्तादित्वेन । अन्यथेतररूपापत्त्या स्वरूपहानिप्रसङ्ग इति । अवधारणं चात्र भङ्गेऽ-
नभिमतान्र्थव्यावृत्त्यर्थमुपात्तम् इतरथानभिहिततुल्यतैवास्य वाक्यस्य प्रसज्येत, प्रतिनियतस्वार्था-
नभिधानात् । तदुक्तम्—
“वाक्येऽवधारणं तावदनिष्टार्थनिवृत्तये ।
कर्तव्यमन्यथानुक्तसमत्वात् तस्य कुत्रचित्” ॥
तथाप्यस्त्येव कुम्भ इत्येतावन्मात्रोपादाने कुम्भस्य स्तम्भाद्यस्तित्वेनापि सर्वप्रकारेणास्तित्वप्राप्तेः
है ( स्यादस्ति ) ; २ प्रत्येक वस्तु निषेध धर्मसे कथंचित् नास्तित्व रूप ही है ( स्यान्नास्ति ) ; ३ प्रत्येक
वस्तु क्रमसे विधि, निषेध दोनों धर्मोंसे कथंचित् अस्तित्व और नास्तित्व दोनों रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति ) ;
४ प्रत्येक वस्तु एक साथ विधि, निषेध धर्मोंसे कथंचित् अवक्तव्य ही है ( स्यादवक्तव्य ) ; ५ प्रत्येक वस्तु
विधि तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्ति अवक्तव्य ) ;
६ प्रत्येक वस्तु निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है
( स्यान्नास्ति अवक्तव्य ) ; ७ प्रत्येक वस्तु क्रमसे विधि, निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित्
अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य ) ।
( १ ) प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् अस्तित्व रूप ही है,
और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् नास्तित्व रूप ही है । जैसे, घड़ा द्रव्यकी अपेक्षा
पार्थिव रूपसे विद्यमान है, जल रूपसे नहीं; क्षेत्र ( स्थान ) की अपेक्षा पटना नगरकी अपेक्षा मौजूद है,
कन्नोज आदिकी अपेक्षासे नहीं; काल ( समय ) की अपेक्षा शीत ऋतुकी दृष्टिसे है, वसन्त ऋतु आदिकी
दृष्टिसे नहीं; तथा भाव ( स्वभाव ) की अपेक्षा काले रूपसे मौजूद हैं, लाल आदि रूपसे नहीं । यदि पदार्थोंका
अस्तित्व स्व चतुष्टय ( द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव ) की अपेक्षाके बिना ही स्वीकार किया जाय, तो पदार्थोंका
स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि जब तक वस्तुके एक स्वरूपकी दूसरे स्वरूपसे व्यावृत्ति न की जाय,
तब तक वस्तुका स्वरूप नहीं बन सकता । इसीलिए यहाँ अनिष्ट पदार्थोंका निराकरण करनेके लिए 'एव'
( अवधारण ) का प्रयोग किया है । यदि 'एव' का प्रयोग न किया जाय, तो अनिच्छित वस्तुका प्रसंग
मानना पड़े । कहा भी है—
“वाक्यमें अवधारणार्थक 'एव' का प्रयोग अनिष्ट अर्थ निराकरण करनेके लिए करना चाहिए; क्योंकि
अवधारणार्थक शब्दके प्रयोगके अभावमें वह उक्त वाक्य अनुक्त वाक्यके समान बन जाता है ।”
शंका—वाक्यमें अवधारणार्थक प्रयोग करने पर भी 'घट अस्तित्व रूप ही हैं' ( अस्त्येव कुम्भः ),
१. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके १-६-५३ ।