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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 458 में से

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पृष्ठ 249

अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९७
मुत्पादविनाशयोरनुयायित्वात् त्रिकालवर्ति यदेकं द्रव्यं स्थिरैकम् । एकशब्दोऽत्र साधारणवाची ।
उत्पादे विनाशे च तत्साधारणम्, अन्वयिद्रव्यत्वात् । यथा चैत्रमैत्रयोरेका जननी साधारणे-
त्यर्थः । इत्थमेव हि तयोरेकाधिकरणता पर्यायाणां, कथञ्चिदनेकत्वेऽपि तस्य कथञ्चिदेकत्वात् ।
एवं त्र्यात्मकं वस्तु अध्यक्षमपीक्षमाणः प्रत्यक्षमवलोकयन् अपि । हे जिन रागादिजैत्र ।
त्वदाज्ञाम् आ सामस्त्येनानन्तधर्मविशिष्टतया ज्ञायन्तेऽवबुद्ध्यन्ते जीवाजीवादयः पदार्था यया
सा आज्ञा आगमः ,शासनं तवाज्ञा त्वदाज्ञा । तां त्वदाज्ञां भवत्प्रणीतस्याद्वादमुद्राम् यः
कश्चिदविवेकी अवमन्यतेऽवजानाति । जात्यपेक्षमेकवचनमवज्ञया वा । स पुरुषपशुर्वातकी
पिशाचकी वा । वातो रोगविशेषोऽस्यास्तीति वातकी । वातकीव वातकी । वातूल इत्यर्थः । एवं
पिशाचकीव पिशाचकी । भूताविष्ट इत्यर्थः ॥
अत्र वाशब्दः समुच्चयार्थः उपमानार्थो वा । स पुरुषापसदो वातकिपिशाचकिभ्यामधि-
रोहति तुलामित्यर्थः । “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” १इत्यनेन मत्वर्थीयः कश्चान्तः । एवं
पिशाचकीत्यपि । यथा किल वातेन पिशाचेन वाक्रान्तवपुर्वस्तुतत्त्वं साक्षात्कुर्वन्नपि तदावेश-
वशात् अन्यथा प्रतिपद्यते एवमयमप्येकान्तवादापस्मारै२रपवश इति । अत्र च जिनेति साभि-
प्रायम् । रागादिजेतृत्वाद् हि जिनः । ततश्च यः किल विगलितदोषकालुष्यतयावधेयवचन-
स्यापि तत्रभवतः शासनमवमन्यते तस्य कथं नोन्मत्ततेति भावः । नाथ हे स्वामिन् । अलब्धस्य
सम्यग्दर्शनादेर्लम्भकतया लब्धस्य च तस्यैव निरतिचारपरिपालनोपदेशदायितया च योगक्षेम-
करत्वोपपत्तेर्नाथः । तस्यामन्त्रणम् ॥
एक माता है, उसी तरह उत्पाद और विनाश दोनोंका अधिकरण एक अन्वयी द्रव्य है, इसलिये उत्पाद और
विनाशके रहते हुए भी द्रव्य सदा स्थिर रहता है । क्योंकि उत्पाद और व्यय रूप पर्यायोंके कथंचित् अनेक
होने पर भी द्रव्य कथंचित् एक माना गया है । इस प्रकार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप पदार्थोंको प्रत्यक्षसे
देखकर भी वातरोग अथवा पिशाचसे ग्रस्त लोगोंकी तरह अविवेकी लोग आपकी अनेकान्त रूप आज्ञाका
उल्लंघन करते हैं ।
यहाँ 'वा' शब्द समुच्चय अथवा उपमान अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । इसलिये यह अर्थ होता है कि
आपकी आज्ञाको उल्लंघन करनेवाले अधम पुरुष वातकी ( वात रोगसे ग्रस्त ) अथवा पिशाचकी ( पिशाचसे
ग्रस्त ) की तरह हैं । यहाँ “वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः” सूत्रसे वात और पिशाच शब्दसे मत्वर्थमें इन्
प्रत्यय होकर अन्तमें 'क' लग जाता है । जिस प्रकार वात और पिशाचसे ग्रस्त पुरुष पदार्थोंको देखते हुए
भी उन्हें वात और पिशाचके आवेशमें अन्यथा रूपसे प्रतिपादन करता है, वैसे ही एकान्तवाद रूपी अपस्मार
( मृगी ) से पीड़ित मनुष्य प्रत्येक पदार्थमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य अवस्थायें देखकर भी उन्हें अन्यथा
रूपसे प्रतिपादन करता है । श्लोकमें 'जिन' शब्दका प्रयोग विशेष अर्थ बतानेके लिये किया गया है । जिसने
राग, द्वेष आदि दोषोंको जीत लिया है, उसे जिन कहते हैं । अतएव आपके वचनोंके निर्दोष होनेपर भी
जो लोग उनकी अवज्ञा करते हैं, उन्हें उन्मत्त ही कहना चाहिये । हे स्वामिन्, आप सम्यग्दर्शनको प्राप्त
करानेवाले और उसे निरतिचार पालन करनेका उपदेश देनेवाले होनेके कारण सुख और शांतिके दाता हैं,
इसलिये आप नाथ हैं ।
१. हैमसूत्रे ७-२-६१ ।
२. अपस्मर्यते पूर्ववृत्तं विस्मर्यतेऽनेन । रोगविशेषः ।
तमःप्रवेशो संरम्भो दोषोद्रेकहतस्मृतेः ।
अपस्मार इति ज्ञेयो गदो घोरश्चतुर्विधः ॥
शब्दकल्पद्रुमे ।