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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४५
च्छेदरूपमेव ज्ञानमुत्पद्यते । न च परिच्छेदादृतेऽन्यद् ज्ञानफलम्, भिन्नाधिकरणत्वात्१ । इति
सर्वथा न प्रत्यक्षाक्षानुमानाभ्यां भिन्नं फलमस्तीति२ ॥"
एतच्च न समीचीनम् । यतो यद्यस्मादेकान्तेनाभिन्नं, तत्तेन सहैवोत्पद्यते । यथा घटेन
घटत्वम् । तैश्च प्रमाणफलयोः कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यते । प्रमाणं कारणं फलं कार्यमिति ।
स चैकान्ताभेदे न घटते । न हि युगपदुत्पद्यमानयोस्तयोः सव्येतरगोविषाणयोरिव कार्यकारण-
भावो युक्तः । नियतप्राक्कालभावित्वात् कारणस्य । नियतोत्तरकालभावित्वात् कार्यस्य । एतद्दे-
वाह न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । फलं कार्यं हेतुः कारणम् तयोर्भावः स्वरूपम्, कार्य-
कारणभावः । स तुल्यकालः समानकालो न युज्यत इत्यर्थः ॥
अथ क्षणान्तरितत्वात् तयोः क्रमभावित्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह । हेतौ विलीने न
फलस्य भाव इति । हेतौ कारणे प्रमाणलक्षणे विलीने क्षणिकत्वादुत्पत्त्यनन्तरमेव निरन्वयं
विनष्टे फलस्य प्रमाणकार्यस्य न भावः सत्ता, निर्मूलत्वात् । विद्यमाने हि फलहेतावस्येदं
फलमिति प्रतीयते नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । किञ्च, हेतुफलभावः सम्बन्धः स च द्विष्ठ एव
स्यात् । न चानयोः क्षणक्षयैकदीक्षितो भवान् सम्बन्धं क्षमते । ततः कथम् 'अयं हेतुरिदं
ज्ञानका फल—कार्य—नहीं है; क्योंकि ज्ञानफलका आश्रय ज्ञान होता है और हानोपादानका अधिकरण ज्ञानसे
भिन्न पुरुष होता है) । इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका फल प्रत्यक्ष और अनुमान रूप ज्ञानसे
सर्वथा भिन्न नहीं होता ।"
( १ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । क्योंकि जो जिससे एकान्तरूपसे अर्थात् सर्वथा अभिन्न होता है
वह उसीके साथ उत्पन्न होता है । जैसे, घटसे घटत्व सर्वथा अभिन्न होता है, इसलिये घटके साथ घटत्व,
उत्पत्ति होती है । तथा, बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्यकारण सम्बन्ध मानते हैं—प्रमाणको
कारण और प्रमाणके फलको उसका कार्य कहते हैं । यह कार्य-कारण भाव प्रमाण और उसके फलको सर्वथा
अभिन्न माननेमें नहीं बनता । जैसे एक साथ उत्पन्न होनेवाले गायके बांये और दाहिने सींगोंमें कार्य-कारण
सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक साथ उत्पन्न होनेवाले प्रमाण और फलमें कार्य-कारणभाव उचित
नहीं । क्योंकि कारण नियतरूपसे पहिले, और कार्य नियतरूपसे कारणके उत्तरकालमें होता है । कार्य-कारण-
भाव समान काल वाला नहीं होता । अतएव प्रमाण और प्रमाणका फल सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकते ।
शंका—प्रमाण और प्रमाणके फलमें क्षणमात्रका अन्तर पड़ता है, अतएव प्रमाण और प्रमाणका
फल क्रमसे होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि बौद्ध लोगोंके क्षणिकवादमें प्रत्येक वस्तु एक
क्षणके लिये ठहर कर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतएव प्रमाणके क्षणिक होनेके कारण प्रमाण ( कारण )
के उत्पन्न होते ही सर्वथा नष्ट हो जानेसे प्रमाणके फल ( कार्य ) की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कारण
रूप प्रमाणका सर्वथा (निरन्वय) विनाश हो जाता है । कार्यकी उत्पत्ति उसके कारणके रहने पर ही होती
है, अन्यथा नहीं । यदि कारणके विना कार्य उत्पन्न होने लगे, तो अतिप्रसंग हो जायेगा—बीजके विना वृक्षकी
उत्पत्ति माननी होगी । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रमाण
और उसके फलका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहता है । किन्तु क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले प्रमाण और प्रमाणके
फलमें कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव 'यह हेतु है, और यह उसका फल है' यह निश्चयात्मक ज्ञान
१. हरिभद्रसूरिकृता न्यायप्रवेशवृत्तिः पृ० ३६ ।
२. पार्श्वदेवकृतन्यायप्रवेशवृत्तिपञ्जिकायां—भिन्नमधिकरणमाश्रयो यस्य फलस्य तत्तथा''''अयम्अर्थः ।
ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं यद्युच्यते फलं हानोपानादिकं तदा तत्फलं प्रमातुरेव स्यान्न ज्ञानस्य । तथाहि ज्ञानेन प्रदर्शितेऽर्थे
हानादिकं तद्विषये पुरुषस्यैवोपजायते अतो हानादिकस्य भिन्नाश्रयत्वान्न फलत्वं मन्तव्यं ।
१९

१४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
फलम्' इति प्रतिनियता प्रतीतिः । एकस्य ग्रहणेऽप्यन्यस्याग्रहणे तदसम्भवात् ।
“द्विष्ठसंबन्धसंवित्तिर्नैकस्योपप्रवेदनात् ।
द्वयोः स्वरूपग्रहणे सति संबन्धवेदनम् ॥”१
इति वचनात् ॥
यद्यपि धर्मोत्तरेण “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”२ इति न्याय-
बिन्दुसूत्रं विवृण्वता भणितम्— “नीलनिर्भासं हि विज्ञानं, यतस्तस्माद् नीलस्य प्रतीतिरवसीयते ।
येभ्यो हि चक्षुरादिभ्यो ज्ञानमुत्पद्यते, न तद्वशात् तज्ज्ञानं नीलस्य संवेदनं शक्यतेऽवस्थापयितुं
नीलसदृशं त्वनुभूयमानं नीलस्य संवेदनमवस्थाप्यते । न चात्र जन्यजनकभावनिबन्धनः
साध्यसाधनभावः । येनैकस्मिन् वस्तुनि विरोधः स्यात् । अपि तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापक-
भावेन तत एकस्य वस्तुनः किञ्चिद्रूपं प्रमाणं किञ्चित् प्रमाणफलं न विरुध्यते । व्यवस्थापनहेतु-
र्हिं सारूप्यं तस्य ज्ञानस्य व्यवस्थाप्यं च नीलसंवेदनरूपम्”३ इत्यादि ॥
नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों क्षणिक होनेसे एक साथ नहीं रहते । इसलिये
प्रमाणके फल, और फलके होनेसे प्रमाणका ज्ञान नहीं हो सकता । कहा भी है—
“दो वस्तुओंमें रहनेवाले सम्बन्धका ज्ञान दोनों वस्तुओंके ज्ञान होने पर ही हो सकता है । यदि दोनों
वस्तुओंमेंसे एक वस्तु रहे, तो उस सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता ।”
बौद्ध— “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”—अर्थके साथ होनेवाली समानरूपताके
कारण अर्थनिर्णयकी सिद्धि हो जानेसे अर्थके साथ होनेवाली समानरूपता प्रमाण है—इस न्यायबिन्दुके
सूत्रका विवरण करनेवाले धर्मोत्तरने कहा है— “जिस कारण विज्ञानमें नील ( नील वर्ण पदार्थ ) का
प्रतिभास होता है, उस कारण नीलकी प्रतीति होती है । जिन चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती
है, उन इन्द्रियोंके अधीन होनेसे इन्द्रियजन्य वह ज्ञान 'नील पदार्थका यह ज्ञान है' इस प्रकार संवेदन नहीं
कर सकता, किन्तु अनुभूयमान नील ( पदार्थके ) सदृश ज्ञान ( नीलाकार ज्ञान ) नील पदार्थका ज्ञान है,
ऐसा संवेदन किया जाता है । यहाँ प्रमाण और प्रमाणके फलमें जन्य-जनकभाव ( कार्य-कारणभाव ) जिसका
कारण है ऐसा साध्य-साधनभाव नहीं है, जिससे एक वस्तुमें विरोध उत्पन्न हो; किन्तु यहाँ व्यवस्थाप्य-
व्यवस्थापक ( निश्चय-निश्चायक ) रूपसे साध्य-साधनभाव है । इसलिये एक वस्तुका किंचित् प्रमाणरूप होनेमें
और किंचित् प्रमाणफलरूप होनेमें विरोध नहीं आता । सारूप्य उस ज्ञान ( नील पदार्थका ज्ञान ) का निश्चय
करनेमें हेतु है और नील पदार्थका ज्ञान व्यवस्थाप्य ( निश्चेय ) ।” स्पष्टार्थ—बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमिति-
को अभिन्न मानते हैं । उनके मतमें जिस ज्ञानसे ( प्रत्यक्ष, अनुमान ) पदार्थ जाने जाते हैं, वही ज्ञान प्रमाण
और प्रमिति दोनों रूप होता है । बौद्ध लोगोंने पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेवाले संशय और विपर्यय रहित प्रापक
ज्ञानको प्रमाण माना है । जिस प्रापण शक्तिसे ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होनेपर भी प्रापक होता है, वही प्रमाणका
फल है । अतएव जिस ज्ञानसे अर्थकी प्रतीति होती है, उसी ज्ञानसे अर्थका दर्शन होता है, इसलिये ज्ञान
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप है ( तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ) । शंका—यदि
ज्ञान प्रमिति रूप होनेसे प्रमाणका फल है, तो प्रमाण किसे कहते हैं ? उत्तर—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है,
और पदार्थोंके आकार रूप होकर पदार्थोंको जानता है, इसलिये ज्ञान प्रमाण है। हमारे ( बौद्ध ) मतके अनुसार
ज्ञान इन्द्रिय आदिकी सहायतासे पदार्थोंको नहीं जानता । किन्तु नील घटको जानते समय नील घटसे उत्पन्न
१. कारिकेयं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके, पृ० ४२१ उद्धृता ।
२. न्यायबिन्दौ १-१९, २० ।
३. न्यायबिन्दौ १-२० स्वोपज्ञटीकायां ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४७
तदप्यसारम् । एकस्य निरंशस्य ज्ञानक्षणस्य व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकत्वलक्षणस्वभाव-
द्वयायोगात्, व्यवस्थाप्यव्यवस्थापकभावस्यापि च संबन्धत्वेन द्विष्ठत्वादेकस्मिन्नसंभवात् ।
किञ्च, अर्थसारूप्यमर्थाकारता । तच्च निश्चयरूपम्, अनिश्चयरूपं वा ? निश्चयरूपं चेत्, तदेव
व्यवस्थापकमस्तु, किमुभयकल्पनया ? अनिश्चितं चेत्, स्वयमव्यवस्थितं कथं नीलादिसंवेदन-
व्यवस्थापने समर्थम् ? अपि च केयमर्थाकारता ? किमर्थग्रहणपरिणामः ? अहोस्विदर्था-
कारधारित्वम् ? नाद्यः, सिद्धसाधनात् । द्वितीयस्तु ज्ञानस्य प्रमेयाकारानुकरणाज्जडत्वापत्त्या-
दिदोषाग्रातः । तन्न प्रमाणादेकान्तेन फलस्याभेदः साधीयान् । सर्वथातादात्म्ये हि प्रमाणफल-
योर्न व्यवस्था, तद्भावविरोधात् । न हि सारूप्यमस्य प्रमाणमधिगतिः फलमिति सर्वथा-
तादात्म्ये सिद्ध्यति, अतिप्रसङ्गात् ॥
ननु प्रमाणस्यासारूप्यव्यावृत्तिः सारूप्यम्, अनधिगतिव्यावृत्तिरधिगतिरिति व्यावृत्ति-
ज्ञान नील घटके आकार रूप होता है। नील घटके सदृश आकारको धारण करना ही ज्ञानका प्रामाण्य है
( अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणं ) । शंका—यदि ज्ञान सादृश्य ( नील सादृश्य ) से अभिन्न है, तो उसी ज्ञानको
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप कहना चाहिये । एक ही वस्तुमें साध्य और साधन दोनों नहीं रह सकते ।
अतएव ज्ञान ( प्रमाण ) पदार्थोंके सदृश नहीं हो सकता । उत्तर—सारूप्य ( सदृश आकार ) से ही
पदार्थोंकी प्रतीति होती है । क्योंकि पदार्थोंको जाननेवाला प्रत्यक्ष ज्ञान नील घटके आकारका हो कर ही नील
घटका ज्ञान करता है । चक्षु आदिकी सहायतासे नील घटका ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव हम ( बौद्ध ) लोग
प्रमाण और प्रमितिमें कार्य-कारण सम्बन्ध न स्वीकार करके व्यवस्थाप्य और व्यवस्थापक सम्बन्ध मानते हैं ।
सारूप्य व्यवस्थापक है, और नील ज्ञान व्यवस्थाप्य है । अतएव प्रमाण और प्रमितिको अभिन्न माननेसे कोई
विरोध नहीं आता ।
जैन—धर्मोत्तरका यह कथन ठीक नहीं । क्योंकि निरंश ज्ञान-क्षण ( बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
क्षणिक है, इसलिये वे लोग घटको घट न कहकर घट-क्षण कहते हैं । इसी प्रकार यहाँ भी ज्ञान-क्षणसे
क्षणिक ज्ञान समझना चाहिये ) में व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूप दो स्वभाव नहीं बन सकते, और
व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भावका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहनेवाला होनेसे एक निरंश ज्ञान-क्षणमें नहीं रह
सकता । तथा, ज्ञानका जो अर्थके साथ सारूप्य है वह ज्ञानकी अर्थाकारता है । यह ज्ञानका अर्थसारूप्य
निश्चयरूप है, या अनिश्चयरूप ? यदि यह अर्थसारूप्य निश्चयरूप है, तो इस अर्थसारूप्यको ही व्यवस्थापक
( निश्चयात्मक ) मानना चाहिये, उसे व्यवस्थाप्यरूप और व्यवस्थापकरूपसे अलग-अलग माननेकी आवश्यकता
नहीं । यदि ज्ञानका वह अर्थसारूप्य अनिश्चित है, तो स्वयं अनिश्चित अर्थसारूप्यसे नील आदि पदार्थका
ज्ञान निश्चित नहीं हो सकता । तथा, ज्ञानकी अर्थाकारतासे आपका क्या अभिप्राय है ? आप लोग ज्ञेय
पदार्थको जाननेवाले ज्ञानके परिणामको अर्थाकारता कहते हैं, अथवा ज्ञानके अर्थके आकाररूप होनेको अर्था-
कारता कहते हैं ? प्रथम पक्ष माननेमें सिद्धसाधन है, क्योंकि हम भी ज्ञानका स्वभाव पदार्थोंको जानना
मानते हैं । यदि आप लोग ज्ञानके पदार्थोंके आकार रूप होनेको अर्थाकारता कहते हैं, तो ज्ञानको जड़
प्रमेयके आकार माननेमें ज्ञानको भी जड़ मानना पड़ेगा । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलको एकान्त
अभिन्न नहीं मान सकते । क्योंकि प्रमाण और प्रमाणके फलका सर्वथा तादात्म्य सम्बन्ध माननेसे प्रमाण और
प्रमाणके फलकी व्यवस्था नहीं बनती; क्योंकि एक निरंश ज्ञान-क्षणमें व्यवस्थाप्य-व्यवस्थापक भाव होनेमें
विरोध आता है। प्रमाण और प्रमाणके फलमें सर्वथा तादात्म्य मानने पर ‘ज्ञानका अर्थके साथ
होनेवाला सारूप्य प्रमाण है और अर्थ ज्ञानका फल है’—यह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि इससे अतिप्रसंग उप-
स्थित हो जायेगा ।
शंका—सारूप्यके असारूप्यव्यावृत्ति रूप और अधिगतिके अनधिगतिव्यावृत्तिरूप होनेसे व्यावृत्तियोंमें

१४८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
भेदादेकस्यापि प्रमाणफलव्यवस्थेति चेत्, नैवम् । स्वभावभेदमन्तरेणान्यव्यावृत्तिभेदस्यानु-
पपत्तेः । कथं च प्रमाणस्य फलस्य चाप्रमाणाफलव्यावृत्त्या प्रमाणफलव्यवस्थावत् प्रमाणान्तर-
फलान्तरव्यावृत्त्याप्यप्रमाणत्वस्याफलत्वस्य च व्यवस्था न स्यात् ? विजातीयादिव सजातीया-
दपि व्यावृत्तत्वाद् वस्तुनः । तस्मात् प्रमाणात् फलं कथञ्चिद्भिन्नमेवैष्टव्यं । साध्यसाधनभावेन
प्रतीयमानत्वात् । ये हि साध्यसाधनभावेन प्रतीयते ते परस्परं भिद्यते यथा कुठारच्छिदि-
क्रिये इति ॥
एवं यौगाभिप्रेतः प्रमाणात् फलस्यैकान्तभेदोऽपि निराकर्त्तव्यः तस्यैकप्रमातृत्तादात्म्येन
प्रमाणात् कथञ्चिदभेदव्यवस्थितेः प्रमाणतया परिणतस्यैवात्मनः फलतया परिणतिप्रतीतेः यः
प्रमिमीते स एवोपादत्ते परित्यजति उपेक्षते चेति सर्वव्यवहारिभिरस्खलितमनुभवात् । इतरथा
स्वपरयोः प्रमाणफलव्यवस्थाविप्लवः प्रसज्यत इत्यलम् ॥
अथवा पूर्वार्द्धमिदमन्यथा व्याख्येयं । सौगताः किलेत्थं प्रमाणयन्ति । सर्वं सत् क्षणि-
कम् । यतः सर्वं तावद् घटादिकं वस्तु मुद्गरादिसंनिधौ नाशं गच्छद् दृश्यते । तत्र येन स्व-
रूपेणान्यावस्थायां घटादिकं विनश्यति तच्चैत्तत्स्वरूपमुत्पन्नमात्रस्य विद्यते तदानीमुत्पादानन्तर-
मेव तेन विनष्टव्यम् , इति व्यक्तमस्य क्षणिकत्वम् ॥
भेद होनेके कारण, प्रमाणके एक रूप होनेपर भी उसके प्रमाणरूप होनेका और फलरूप होनेका निश्चय होता
हैँ। समाधान—यह ठीक नहीं। क्योंकि भिन्न-भिन्न स्वभावोंके अभावमें व्यावृत्तियोंमें भेदका होना नहीं
बनता । तथा, जिस प्रकार अप्रमाणकी व्यावृत्तिसे प्रमाणकी प्रमाणरूपताका और अफलकी व्यावृत्तिसे फलकी
फलरूपताका निश्चय होता है, वैसे ही प्रमाणान्तरकी व्यावृत्तिसे प्रमाणके अप्रमाणत्वका और फलान्तरकी
व्यावृत्तिसे फलके अफलत्वका निश्चय मानना चाहिये। क्योंकि जैसे आप लोग विजातीय वस्तुसे व्यावृत्ति
मानते हैं, वैसे ही सजातीय वस्तुसे भी व्यावृत्ति माननी चाहिये। अतएव प्रमाण और उसका फल कथंचित्
भिन्न हैं, क्योंकि दोनों साध्य-साधन भावरूपसे प्रतीयमान होते हैं। जो साध्य-साधन भावसे प्रतीयमान होते
हैं, वे परस्पर भिन्न होते हैं, जैसे कुठार और छेदनक्रिया।
इससे प्रमाण और प्रमाणके फलका एकान्त भेद माननेवाले यौगोंका भी निराकरण हो जाता हैं। क्योंकि
जो आत्मा ज्ञेय पदार्थको यथार्थरूपसे जानती है वही आत्मा उस पदार्थको ग्रहण करती है, उसका त्याग
करती है और उसकी उपेक्षा करती है यह सबको दृढ़ अनुभव होता है। इससे प्रमाणरूपसे परिणत हुई
आत्माकी ही फलरूपसे जो परिणति होती है, उसका निर्णायक ज्ञान होनेके कारण, इस प्रमाणफलका एक
प्रमाताके साथ तादात्म्य होनेसे, प्रमाण द्वारा उसके कथंचित् अभेदकी सिद्धि होती है। यदि प्रमाण और
उसके फलमें कथंचित् अभेद न माना जाये—दोनोंमें सर्वथा अभेद माना जाये—तो अपना प्रमाण और अपना
फल, तथा दूसरेका प्रमाण और दूसरेका फल—इस व्यवस्थाके नाशका ही प्रसंग उपस्थित हो जाता है। (विज्ञा-
नाद्वैतमें स्व और पर दोनों विज्ञानरूप माने गये हैं, अतएव दोनोंमें भेदका अभाव होनेसे स्वप्रमाण और
स्वफल, तथा परप्रमाण और परफलकी व्यवस्थाका अभाव हो जाता है) ।
(२) पूर्वपक्ष—'सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं' (सर्वं सत् क्षणिकं) । क्योंकि सभी घट आदि
पदार्थ मुद्गर आदिका संयोग होने पर नष्ट होते हुए देखे जाते हैं। घट आदि पदार्थ अन्त्य अवस्थामें जिस
स्वरूपसे विनाशको प्राप्त होते हैं, वही स्वरूप उत्पन्नमात्र पदार्थोंका होता है। अतएव उत्पत्तिके बाद ही
घट आदि पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक हैं। स्पष्टार्थ—बौद्धोंके अनुसार, प्रत्येक
पदार्थ क्षणिक है, क्योंकि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव है। यदि नाश होना पदार्थोंका स्वभाव न हो, तो
पदार्थ दूसरी वस्तुके संयोगसे भी नष्ट नहीं हो सकते। पदार्थोंका यह क्षणिक स्वभाव पदार्थोंकी आरम्भ
और अन्त दोनों अवस्थाओंमें समान है। यदि पदार्थोंको उत्पन्न होनेके बाद नाशमान न माना जाय, तो

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४९
अथेदृश एव स्वभावस्तस्य हेतुतो जातो यत्कियन्तमपि कालं स्थित्वा विनश्यति । एवं
तर्हि मुद्गरादिसंनिधानेऽपि एष एव तस्य स्वभावः इति पुनरप्येतेन तावन्तमेव कालं स्था-
तव्यम् इति नैव विनश्येदिति । सोऽयं “अदित्सोर्वणिजः प्रतिदिनं पत्रलिखितश्वस्तनदिनभणन-
न्यायः”१ । तस्मात् क्षणद्वयस्थायित्वेनाप्युत्पत्तौ प्रथमक्षणवद् द्वितीयेऽपि क्षणे क्षणद्वयस्थायि-
त्वात् पुनरपरक्षणद्वयमवतिष्ठेत । एवं तृतीयेऽपि क्षणे तत्स्वभावत्वान्नैव विनश्येदिति ॥
स्यादेतत् । स्थावरमेव तत् स्वहेतोर्जातम् , परं बलेन विरोधकेन मुद्गरादिना विनाश्यत
इति । तदसत् । कथं पुनरेतद्घटिष्यते । न च तद् विनश्यति स्थावरत्वात् , विनाशश्च तस्य
विरोधिना बलेन क्रियते इति । न ह्येतत्सम्भवति जीवति देवदत्ते मरणं चास्य भवतीति । अथ
विनश्यति तर्हि कथमविनश्वरं तद् वस्तु स्वहेतोर्जातमिति । न हि म्रियते च अमरणधर्मा
चेति युज्यते वक्तुम् । तस्मादविनश्वरत्वे कदाचिदपि नाशाद्योगात् दृष्टत्वाच्च नाशस्य नश्वरमेव
तद्वस्तु स्वहेतोरुपजातमङ्गीकर्तव्यम् । तस्मादुत्पन्नमात्रमेव विनश्यति । तथा च क्षणक्षयित्वं
सिद्धं भवति ॥
पदार्थोंका किसी भी कारणसे नाश नहीं हो सकता । इसलिये प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होता है ।
शंका—यदि क्षण-क्षणमें नाशको प्राप्त होनेवाले परमाणु ही वास्तविक हैं, तो घट, पट आदि स्थूल पदार्थोंका
ज्ञान नहीं हो सकता । उत्तर—वास्तवमें स्थूल पदार्थोंका ज्ञान स्वप्न-ज्ञान अथवा आकाशमें केश-ज्ञानकी तरह
निर्विषय है । अनादि कालकी वासनाके कारण ही स्थूल पदार्थोंका प्रतिभास होता है । शंका—यदि सम्पूर्ण
पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं, तो पदार्थोंका प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता । उत्तर—जिस प्रकार
दीपककी लौमें परस्पर समानता रखनेवाले पहले और दूसरे क्षणोंमें, पहले क्षणके नष्ट होनेके समय ही पहले
क्षणके समान दूसरे क्षणके उत्पन्न होनेसे यह वही दीपक हैं, यह ज्ञान होता है, उसी प्रकार समान आकारकी
ज्ञान-परम्परासे पूर्व क्षणोंके अत्यन्त नष्ट हो जानेपर भी पदार्थोंमें प्रत्यभिज्ञान होता है ।
प्रतिवादी—अपनी उत्पत्तिके कारणभूत सहायकोंसे उत्पन्न हुए ( कार्यरूप ) पदार्थका कुछ समय
तक ठहर कर नष्ट हो जाना, यह प्रत्येक पदार्थका स्वभाव है । बौद्ध—यदि पदार्थका स्वभाव क्षण-
क्षणमें नाशमान न माना जाय, तो घड़ेके साथ मुद्गरका संयोग होनेपर भी घड़ा नष्ट नहीं होना चाहिये,
क्योंकि मुद्गरका संयोग होनेपर भी घड़ेका नाश नहीं होनेका स्वभाव मौजूद है । अतएव जिस प्रकार कोई
कर्जदार साहूकारके कर्जको न चुकानेकी इच्छासे कर्ज चुका देनेका प्रतिदिन वायदा करनेपर भी कभी अपने
कर्जको नहीं चुका पाता, उसी तरह मुद्गरका संयोग होनेपर भी प्रत्येक क्षणमें नष्ट न होनेवाला घट दूसरे,
तीसरे आदि क्षणमें नष्ट न हो कर सर्वदा नित्य ही रहना चाहिये । अतएव पदार्थोंका स्वभाव क्षण-क्षणमें
नष्ट होनेका है ।
प्रतिवादी—प्रत्येक पदार्थ अपने उत्पत्तिके कारणोंसे स्थिर रहनेके लिये ही उत्पन्न होता है, बादमें
अपने बलवान विरोधी मुद्गर आदिसे नष्ट हो जाता है । बौद्ध—यह ठीक नहीं । क्योंकि यदि पदार्थका
स्वभाव नष्ट नहीं होनेका है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि पदार्थ अपने बलवान विरोधीसे नष्ट हो जाता
है, क्योंकि जिस पदार्थका स्वभाव नष्ट होना नहीं है, वह पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता । अतएव जिस प्रकार
देवदत्तके जीते हुए उसको मरा हुआ नहीं कह सकते, वैसे ही यदि पदार्थ नष्ट हो जाता है, तो यह नहीं
कहा जा सकता कि पदार्थ अपने उत्पत्तिके कारणोंसे स्थिर रहनेके लिये उत्पन्न हुआ था । अतएव
जैसे नाशमान देवदत्तको अनाशमान नहीं कहा जा सकता, वैसे ही नष्ट होनेवाले पदार्थको अविनश्वर नहीं
कह सकते । तथा, पदार्थ नाशमान देखे जाते हैं, अतएव अपनी उत्पत्तिके कारणों द्वारा उत्पन्न वस्तुको
१. कश्चिद् वणिक् द्रव्यमदित्सुः पत्रद्वारा प्रत्यहमुत्तमर्णाय श्वस्तनदिनं दास्य इति बोधयति तद्वत् ।

१५० श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
प्रयोगस्त्वेवम् । यद्विनश्वरस्वरूपं तदुत्पत्तेरनन्तरानवस्थायि, यथान्त्यक्षणवर्तिघटस्य
स्वरूपम् । विनश्वरस्वरूपं च रूपादिकमुदयकाले, इति स्वभावहेतुः१। यदि क्षणक्षयिणो भावाः
कथं तर्हि स एवायमिति प्रत्यभिज्ञा स्यात् । उच्यते । निरन्तरसदृशापरोत्पादात्, अविद्या-
नुबन्धाच्च । पूर्वक्षणविनाशकाल एव तत्सदृशं क्षणन्तरमुदयते । तेनाकारविलक्षणत्वाभावाद-
व्यवधानाच्चात्यन्तोच्छेदेऽपि स एवायमित्यभेदाध्यवसायी प्रत्ययः प्रसूयते । अत्यन्तभिन्नेष्वपि
लूनपुनरुत्पन्नकुश२काशकेशादिषु दृष्ट एवायं स एवायम् इति प्रत्ययः, तथेहापि किं न संभाव्यते ।
तस्मात् सर्वं सत् क्षणिकमिति सिद्धम् । अत्र च पूर्वक्षण उपादानकारणम् उत्तरक्षण उपादेयम्
नश्वर ही मानना चाहिये। अतएव प्रत्येक पदार्थ उत्पन्न होनेके दूसरे क्षणमें ही नष्ट हो जाता है, इसलिये
प्रत्येक पदार्थ क्षणविध्वंसी है।
जिस प्रकार अन्त्यक्षणवर्ति घटका—विनाशको प्राप्त होनेवाले घटका—स्वरूप विनश्वर होनेसे, उसके
विनाशके अनन्तर घट स्वरूपसे ( अवस्थायी ) विद्यमान नहीं रहता, उसी प्रकार जिस पदार्थका स्वरूप
विनश्वर होता है, वह पदार्थ उत्पत्तिके बाद अवस्थायी—अक्षणिक—नहीं होता । ( जो स्वभाव स्वभाववानका
का नाश होने पर नष्ट हो जाता है, वह विनश्वर होता है। पदार्थका स्वभाव विनश्वर होने पर उसकी
अभिव्यक्ति होते ही उसका नाश हो जाता है। जिस पदार्थका स्वभाव विनश्वर होता है उसकी उत्पत्तिके
बाद उसका स्वभाव विनश्वर होनेसे वह अवस्थायी—अक्षणिक नहीं होता । ) पदार्थकी उत्पत्तिके कालमें
पदार्थके रूप आदिका स्वभाव विनश्वर होता है। इस प्रकार विनश्वरस्वरूपत्व रूप हेतु स्वभावहेतु रूप
है । ( बौद्ध लोगोंने स्वभावहेतु, कार्यहेतु और अनुपलब्धिहेतुके भेदसे हेतुके तीन भेद माने हैं। जैसे 'यह
वृक्ष है, शिंशपा ( सीसम ) होनेसे'—यहां वृक्षत्व और शिंशपात्वका कार्य-कारण संबंध न हो कर स्वभाव
सम्बन्ध है, अतएव यह स्वभावहेतु अनुमान है। 'यहाँ अग्नि है, धूम होनेसे'—यहाँ पर कार्य-कारण सम्बन्ध
है, इसलिये यह कार्यहेतु अनुमान है। पदार्थके न मिलनेको अनुपलब्धि कहते हैं। जैसे 'देवदत्त घरमें नहीं
है, क्योंकि वह वहाँ अनुपलब्ध है'। स्वभावहेतुमें एक स्वभावसे दूसरे स्वभावका, और कार्यहेतुमें कार्यसे
कारण अनुमान होता है। स्वभाव और कार्यहेतु वस्तुकी उपस्थितिको, और अनुपलब्धिहेतु वस्तुकी अनु-
पस्थितिको सिद्ध करते हैं)। शंका—यदि पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले हैं, तो प्रत्येक क्षणमें नष्ट
होनेवाले घटकी उत्पत्तिके प्रथम क्षणसे लगा कर अन्तिम समय तक घटके एकत्वका प्रत्यभिज्ञान—'यह वही
है' नहीं हो सकता। बौद्ध—समान रूप अपर-अपर क्रमवर्ती क्षणमात्र कालवर्ती पदार्थोंकी निरन्तर उत्पत्ति
होनेके कारण तथा आत्माका अविद्यासे सम्बन्ध होनेके कारण, 'यह वही है'—इस प्रकार एकत्वका प्रत्यभिज्ञान
होता है। ( प्रत्येक उत्तरक्षण पूर्वक्षणसे भिन्न होने पर भी, पूर्वक्षणोंमें होनेवाली सदृशताके कारण, आत्माके
साथ अविद्याका सम्बन्ध होनेसे, आत्मा उन क्षणोंको एक रूप समझती है जिससे आत्माको 'यह वही है'—
यह प्रत्यभिज्ञान होता है )। पूर्वकालवर्ती क्षणिक पदार्थका विनाश होनेके कालमें ही पूर्वक्षणवर्ती क्षणिक
पदार्थके सदृश उत्तरक्षणवर्ती क्षणिक पदार्थ उत्पन्न होता है। अतएव पूर्वक्षणवर्ती पदार्थके आकारसे उत्तर
क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थका आकार विलक्षण—विसदृश—न होनेसे, तथा पूर्वोत्तरकालवर्ती दोनों क्षणिक पदार्थोंमें
व्यवधान न होनेसे, पूर्वकालीन क्षणिक पदार्थका आत्यंतिकरूपसे विनाश होने पर भी, 'यह वही है'—इस
प्रकार पूर्वोत्तर क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थोंमें अभेदका—एकत्वका—निश्चय करनेवाला ज्ञान उत्पन्न होता है।
जिस प्रकार पहले काटे हुए और फिरसे उत्पन्न होनेवाले कुश ( घास ), काश और केश आदिके पूर्व और
१. त्रीण्येव च लिङ्गानि । अनुपलब्धिः स्वभावकार्ये चेति । तत्रानुपलब्धिर्यथा न प्रदेशविशेषे क्वचिद्
घटोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलब्धेरिति । स्वभावः स्वसत्तामात्रभाविनि साध्यधर्मे हेतुः । यथा वृक्षोऽयं शिंशिपा-
त्वादिति । कार्यं यथाग्निरत्र धूमादिति ।
२. पूर्वं लूनाश्छिन्नाः कुशादयः पुनरुत्पद्यन्ते ।

अन्य. यौ. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५१
इति पराभिप्रायमङ्गीकृत्याह न तुल्यकालः इत्यादि ॥
ते विशकलितमुक्तावलीकल्पा¹ निरन्वयविनाशिनः पूर्वक्षणा उत्तरक्षणान् जनयन्तः किं
स्वोत्पत्तिकाल एव जनयन्ति, उत क्षणान्तरे ? न तावदाद्यः । समकालभाविनोर्युवतिकुचयोरि-
वोपादानोपादेयभावाभावात् । अतः साधूक्तम् न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । न च द्वितीयः ।
तदानीं निरन्वयविनाशेन पूर्वक्षणस्य नष्टत्वादुत्तरक्षणजनने कुतः संभावनापि । न चानुपादान-
स्योत्पत्तिर्दृष्टा, अतिप्रसङ्गात् । इति सुष्ठु व्याहृतं हेतौ विलीने न फलस्य भाव इति । पदार्थस्त्व-
नयोः पादयोः प्रागेवोक्तः। केवलमत्र फलमुपादेयं हेतुरुपादानं तद्भाव उपादानोपादेयभाव इत्यर्थः ॥
यच्च क्षणिकत्वस्थापनाय मोक्षाकरगुप्तेनानन्तरमेव प्रलपितं तत् स्याद्वादवादे निरवकाश-
मेव । निरन्वयनाशवर्जं कथंचित्सिद्धसाधनात् । प्रतिक्षणं पर्यायानाशस्यानेकान्तवादिभिरभ्युप-
गमात् । यदप्यभिहितम् 'न ह्येतत् संभवति जीवति च देवदत्तो मरणं चास्य भवतीति,' तदपि
संभवादेव न स्याद्वादिनां क्षतिमावहति । यतो जीवनं प्राणधारणं, मरणं चायुर्द्लिकक्षयः ।
ततो जीवतोऽपि देवदत्तस्य प्रतिसमयमायुर्दलिकानामुदीर्णानां क्षयादुपपन्नमेव मरणम् । न
च वाच्यमन्त्यावस्थायामेव कृत्स्नायुर्दलिकक्षयात् तत्रैव मरणव्यपदेशो युक्त इति । तस्यामप्य-
उत्तर क्षणोंमें अत्यन्त भेद होनेपर भी 'यह वही घास है, 'यह वही काश हैं', और 'यह वही केश हैं', ऐसा
ज्ञान होता है, वैसे ही क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले प्रत्येक पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सर्वथा भेद होनेपर भी
उनमें एकत्वका प्रत्यभिज्ञान क्यों नहीं हो सकता है ? अतः यह सिद्ध हो जाता है कि समस्त पदार्थ क्षणिक
हैं । यहाँ पूर्वकालवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादानकारण और उत्तर क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादेय है । अतएव
दूसरेके अभिप्रायको मानकर 'न तुल्यकालः' इत्यादि कहा है ।
( २ ) उत्तरपक्ष—आपके मतमें स्खलित मोतियोंकी मालाके समान, सर्वथा नाश होनेवाले पूर्वक्षण
उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते समय अपनी उत्पत्तिके क्षणमें ही उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते हैं, अथवा दूसरे क्षणमें
उत्पन्न करते हैं ? अर्थात् पूर्व और उत्तरक्षण एक साथ उत्पन्न होते हैं, या क्रमसे ? पूर्वक्षण और उत्तरक्षण
एक साथ उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि जैसे एक हाथसे दूसरा हाथ पैदा नहीं होता, वैसे ही पूर्वक्षण उत्तर
क्षणको उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि एक ही कालमें होनेवाले दो पदार्थोंमें उपादान-उपादेय भाव नहीं बन
सकता । इसलिये कहा है, 'हेतु और उसका फल दोनों एक साथ नहीं हो सकते' ( न तुल्यकालः फलहेतु-
भावः । ) यदि कहो कि पूर्वक्षण उत्तरक्षणको दूसरे क्षणमें उत्पन्न करता है, तो यह भी नहीं बन सकता ।
क्योंकि पूर्वक्षण सर्वथा विनाशी है, उसका सर्वथा नाश हो जानेसे उससे उत्तरक्षण उत्पन्न नहीं हो सकता ।
अतएव दूसरे क्षणमें उपादानकारण रूप पूर्वक्षणका सर्वथा नाश होनेके पूर्वक्षणसे उत्तरक्षणकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती । यदि उपादानके विना भी उपादेयकी उत्पत्ति होने लगे, तो प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्ति माननी
चाहिये । अतएव 'हेतुके नष्ट हो जानेपर फलका भी अभाव हो जाता हैं' ( हेतौ विलीने न फलस्य भावः )—
यह हमने ठीक कहा है ।
तथा क्षणिकत्व सिद्ध करनेके लिये जो मोक्षाकरगुप्त नामक बौद्धाचार्यने नित्यत्वका खंडन किया है,
उसे स्याद्वादमें अवकाश नहीं है । क्योंकि स्याद्वादी लोग 'निरन्वय विनाशको' छोड़कर बौद्ध मतका ही
समर्थन करते हैं । क्योंकि अनेकान्तवादियोंने भी पर्यायोंकी अपेक्षा प्रतिक्षण नाश स्वीकार किया है । तथा,
आपने जो कहा कि 'जीते हुए देवदत्तको मरा हुआ नहीं कह सकते' उससे भी स्याद्वादियोंको कोई क्षति
नहीं होती । क्योंकि स्याद्वादियोंके अनुसार, प्राणोंके धारण करनेको जीवन, और आयुके अंशोंके नाश होनेको
मरण कहते हैं । अतएव देवदत्तके जीवित दशामें भी प्रत्येक समय उदय आनेवाले आयुके निषेकोंका क्षय
होनेसे मरण होता रहता है । यदि आप लोग कहें कि अन्त अवस्थामें सम्पूर्ण आयुके नाश हो जानेको ही
१. सूत्रविगलितमौक्तिकमालासदृशाः ।

१५२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
वस्थायां न्यक्षेणे तत्क्षयाभावात् । तत्रापि ह्यवशिष्टानामेव तेषां क्षयो न पुनस्तत्क्षण एव युगपत्-
सर्वेषाम् । इति सिद्धं गर्भादारभ्य प्रतिक्षणं मरणम् । इत्यलं प्रसङ्गेन ॥
अथवापरथा व्याख्या । सौगतानां किलार्थेन ज्ञानं जन्यते । तच्च ज्ञानं तमेव स्वोत्पाद-
कमर्थं गृह्णातीति । “नाकारणं विषयः” इति वचनात् । ततश्चार्थः कारणं ज्ञानं च कार्यमिति ॥
एतच्च न चारु । यतो यस्मिन् क्षणेऽर्थस्य स्वरूपसत्ता तस्मिन्नद्यापि ज्ञानं नोत्पद्यते,
तस्य तदा स्वोत्पत्तिमात्रव्यग्रत्वात् । यत्र च क्षणे ज्ञानं समुत्पन्नं तत्रार्थोऽतीतः । पूर्वापरकाल-
भावनियतश्च कार्यकारणभावः । क्षणातिरिक्तं चावस्थानं नास्ति । ततः कथं ज्ञानस्योत्पत्तिः,
कारणस्य विलीनत्वात् । तद्विलये च ज्ञानस्य निर्विषयतानुषज्यते, कारणस्यैव युष्मन्मते
तद्विषयत्वात् । निर्विषयं च ज्ञानमप्रमाणमेवाकाशकेशज्ञानवत् । ज्ञानसहभाविनश्चार्थक्षणस्य
न ग्राह्यत्वम्, तस्याकारणत्वात् । अत आह न तुल्यकाल इत्यादि । ज्ञानार्थयोः फलहेतुभावः
कार्यकारणभावस्तुल्यकालो न घटते, ज्ञानसहभाविनोऽर्थक्षणस्य ज्ञानानुत्पादकत्वात्, युग-
पद्धाविनोः कार्यकारणभावायोगात् । अथ प्राचोऽर्थक्षणस्य ज्ञानोत्पादकत्वं भविष्यति, तन्न ।
यत आह हेतौ इत्यादि । हेतावर्थरूपे ज्ञानकारणे विलीने क्षणिकत्वान्निरन्वयं विनष्टे न

मरण कहते हैं, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि अन्त अवस्थामें भी आयुके अवशिष्ट अंशोंका ही नाश होता
है, एक ही क्षणमें आयुके सम्पूर्ण भागोंका नाश नहीं होता। अतएव गर्भके धारण करनेसे लेकर मृत्यु पर्यंत
मनुष्यका मरण होता रहता है, यह निर्विवाद है।
( ३ ) पूर्वपक्ष—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होकर उसी पदार्थको जानता है। कहा भी है “जो पदार्थ
ज्ञानोत्पत्तिका कारण नहीं होता, वह ज्ञानका विषय भी नहीं होता।” अतएव पदार्थ कारण है और ज्ञान
कार्य है।
( ३ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस क्षणमें पदार्थ स्वरूपसे विद्यमान रहता
है, उस क्षणमें ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता; उस समय वह अपनी उत्पत्तिमें व्यग्र रहता है। बौद्धोंके
क्षणिकवादके अनुसार जब तक एक पदार्थ बनकर पूर्ण न हो जाय, उस समय तक वह ज्ञानकी
उत्पत्ति नहीं कर सकता। तथा जिस क्षणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, उस समय पदार्थ नष्ट हो जाता
है (क्योंकि प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाला है)। तथा क्रमसे पूर्व और उत्तर कालमें
होनेवाले पदार्थोंमें ही कार्य-कारण भाव होता है। परन्तु बौद्ध मतमें कोई भी वस्तु क्षणमात्रसे अधिक
नहीं ठहरती। अतएव ज्ञानकी उत्पत्तिके क्षणमें ज्ञानके कारण पदार्थके नाश हो जानेसे ज्ञानकी
उत्पत्ति होनेके पहले ही ज्ञानका कारण पदार्थ नष्ट हो जाता है, परन्तु आप लोगोंके मतमें कारणको ही
विषय माना है, इसलिये ज्ञानको निर्विषय मानना चाहिये । यह निर्विषय ज्ञान आकाशमें केश-ज्ञानकी तरह
प्रमाण नहीं हो सकता। तथा यदि ज्ञान और पदार्थको सहभावी माना जाय, तो पदार्थ ज्ञानका विषय नहीं
हो सकता, क्योंकि पदार्थ ज्ञानका कारण नहीं है; कारण कार्यसे पहले उत्पन्न होता है, अतः कारण
कार्यका सहभावी नहीं होता। अतएव आपके सिद्धान्तके अनुसार पदार्थ ज्ञानका विषय (कारण) नहीं
हो सकता। इसलिये हमने कहा है 'ज्ञान और पदार्थमें एक समयमें कार्य और कारण भाव नहीं बन सकता'
( न तुल्यकालः फलहेतुभावो ) । इसलिए ज्ञानके साथ उत्पन्न होनेवाला पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर
सकता। कारण कि एक साथ उत्पन्न होनेवाली दो वस्तुओंमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं होता। यदि कहो
कि ज्ञानके पहले उत्पन्न होनेवाला पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न करता है, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि हमने पहले कहा
है—'क्षणिक होनेसे पदार्थका निरन्वय विनाश होनेके कारण, नष्ट हुए पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो

१. साकल्येन ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५३
फलस्य ज्ञानलक्षणकार्यस्य भाव आत्मलाभः स्यात्। जनकस्यार्थक्षणस्यातीतत्वाद् निर्मूलमेव
ज्ञानोत्थानं स्यात्।
जनकस्यैव च ग्राह्यत्वे इन्द्रियाणामपि ग्राह्यत्वापत्तिः, तेषामपि ज्ञानजनकत्वात्। न
चान्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थस्य ज्ञानहेतुत्वं दृष्टं, मृगतृष्णादौ जलाभावेऽपि जलज्ञानोत्पादात्,
अन्यथा तत्प्रवृत्तेरसम्भवात्। भ्रान्तं तज्ज्ञानमिति चेत्, ननु भ्रान्ताभ्रान्तविचारः स्थिरीभूय
क्रियतां त्वया। सांप्रतं प्रतिपद्यस्व तावदनर्थजमपि ज्ञानम्। अन्वयेनार्थस्य ज्ञानहेतुत्वं दृष्ट-
मेवेति चेत्। न। न हि तद्भावे भाव लक्षणोऽन्वय एव हेतुफलभावनिश्चयनिमित्तम् अपि तु
तदभावेऽभावलक्षणो व्यतिरेकोऽपि। स चोक्तयुक्त्या नास्त्येव। योगिनां चातीतानागतार्थ-
ग्रहणे किमर्थस्य निमित्तत्वम्, तयोरसत्त्वात्।
“ण णिहाणगया भग्गा पुंजो णत्थि अणागए।
णिव्वुया णैव चिट्ठंति आरग्गे सरिसवोवमा ॥”१
इति वचनात्। निमित्तत्वे चार्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वादतीतानागतत्वक्षतिः॥
सकती' ( हेतौ विलीने न फलस्य भावः)। क्योंकि ज्ञानको उत्पन्न करनेवाले पदार्थके नष्ट होनेपर ज्ञान
निर्विषय रह जाता है।
तथा, ज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण भूत पदार्थको ज्ञानका विषय माननेसे इन्द्रियोंको भी ज्ञानका विषय
स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि इन्द्रियाँ भी ज्ञानको उत्पन्न करती हैं। परन्तु आप लोगोंने पदार्थकी तरह
इन्द्रियोंको ज्ञानका विषय नहीं माना है। शंका-पदार्थ ज्ञानका विषय (कारण) है, क्योंकि पदार्थका
ज्ञानके साथ अन्वय-व्यतिरेक सम्बन्ध है। जैसे अग्नि धूमका कारण है, क्योंकि 'जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-
वहाँ अग्नि होती है,' और 'जहाँ अग्नि नहीं होती, वहाँ धूम नहीं होता,' वैसे ही 'जहाँ ज्ञान होता है, वहाँ
पदार्थ होता है,' और 'जहाँ पदार्थ नहीं होता, वहाँ ज्ञान भी नहीं होता' इसलिये ज्ञान और पदार्थमें अन्वय-
व्यतिरेक सम्बन्ध होनेसे पदार्थ ज्ञानका कारण है। समाधान-यह ठीक नहीं। क्योंकि जिस प्रकार धूमका
होना अग्निके ऊपर अवलम्बित है, उस प्रकार ज्ञानका होना पदार्थके ऊपर अवलम्बित नहीं। कारण कि
मृगतृष्णामें जल (अर्थ) के अभाव होनेपर भी जलको पानेके लिये मनुष्यकी प्रवृत्ति देखी जाती है। शंका-
मृगतृष्णामें जलका ज्ञान होना अप्रपूर्ण है, अतएव यहाँ पदार्थके बिना भी ज्ञान हो जाता है। समाधान-
यहाँ ज्ञानके भ्रमरूप या अभ्रमरूप होनेका प्रश्न नहीं है, प्रश्न है कि ज्ञान पदार्थके बिना भी
उत्पन्न होता है। यदि कहो कि जहाँ ज्ञान होता है, वहीं पदार्थ होता है, इसलिये पदार्थ ज्ञानका कारण
है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि जब तक पदार्थोंमें अन्वय और व्यतिरेक दोनों सम्बन्ध न रहें, तब तक
उनमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं बन सकता। अतएव जब तक पदार्थ और ज्ञानमें 'जहाँ पदार्थ न हो, वहाँ
ज्ञान भी न हो' इस प्रकारका व्यतिरेक सम्बन्ध न बने, तब तक पदार्थको ज्ञानका हेतु नहीं कह सकते।
यह व्यतिरेक सम्बन्ध पदार्थ और ज्ञानमें नहीं है, क्योंकि मृगतृष्णामें जलका अभाव होनेपर भी जलका ज्ञान
होता है। तथा, अतीत और अनागत पदार्थोंको जाननेवाले योगियोंके ज्ञानमें पदार्थ कारण नहीं हो सकता।
क्योंकि अतीत और अनागत पदार्थोंको जानते समय अतीत और अनागत पदार्थोंका अभाव रहता है। अतएव
भूत, भविष्यत् पदार्थ ज्ञानमें कारण नहीं हो सकते। कहा भी है-
“जो पदार्थ नष्ट हो गये हैं, वे किसी खजानेमें जमा नहीं हैं, तथा जो पदार्थ आनेवाले हैं, उनका कहीं
ढेर नहीं लगा है। जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे सूईकी नोकपर रक्खी हुई सरसोंके समान स्थायी नहीं हैं।”
यदि अतीत और अनागत पदार्थोंको भी ज्ञानमें कारण माना जाय, तो अर्थक्रियाकारी होनेसे उनके
अतीतत्व, और अनागतत्वका अभाव हो जाता है।
१. छाया-न निधानगता भग्नाः पुंजो नास्त्यनागते। निर्वृत्ता नैव तिष्ठन्ति आराग्रे सर्षपोपमाः ॥
२०

१५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
न च प्रकाश्यादात्मलाभ एव प्रकाशकस्य प्रकाशकत्वं, प्रदीपादेर्घटादिभ्योऽनुत्पन्नस्यापि
तत्प्रकाशकत्वात् । जनकस्यैव च ग्राह्यत्वाभ्युपगमे स्मृत्यादेः प्रमाणस्याप्रामाण्यप्रसङ्गः तस्यार्था-
जन्यत्वात् । न च स्मृतिर्न प्रमाणम्, अनुमानप्रमाणप्राणभूतत्वात् साध्यसाधनसम्बन्धस्मरण-
पूर्वकत्वात् तस्य । जनकमेव च चेद् ग्राह्यम्, तदा स्वसंवेदनस्य कथं ग्राहकत्वम् । तस्य हि
ग्राह्यं स्वरूपमेव । न च तेन तज्जन्यते, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । तस्मात् स्वसामग्रीप्रभव-
योर्घटप्रदीपयोरिवार्थज्ञानयोः प्रकाश्यप्रकाशकभावसंभवाद् न ज्ञाननिमित्तत्वमर्थस्य ॥
नन्वर्थाजन्यत्वे ज्ञानस्य कथं प्रतिनियतकर्मव्यवस्था । तदुत्पत्तितदाकारताभ्यां हि
सोपपद्यते । तस्मादनुत्पन्नस्यातदाकारस्य च ज्ञानस्य सर्वार्थान् प्रत्यविशेषात् सर्वग्रहणं
प्रसज्येत । नैवम् । तदुत्पत्तिमन्तरेणाप्यावरणक्षयोपशमलक्षणया योग्यतयैव प्रतिनियतार्थ-
प्रकाशकत्वोपपत्तेः । तदुत्पत्तावपि च योग्यतावश्यमेष्टव्या । अन्यथाऽशेषार्थसान्निध्ये तत्तदर्था-
सांनिध्येऽपि कुतश्चिदेवार्थात् कस्यचिदेव ज्ञानस्य जन्मेति कौतस्कुतोऽयं विभागः ॥
तदाकारता त्वर्थाकारसंक्रान्त्या तावदनुपपन्ना, अर्थस्य निराकारत्वप्रसङ्गात् ज्ञानस्य
शंका—प्रकाश्य पदार्थ से उत्पन्न होकर पदार्थोंको प्रकाशित करना ही प्रकाशक ( ज्ञान )
का प्रकाशकपना है । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि घट आदिसे उत्पन्न न होनेवाले भी दीपक
आदि घटको प्रकाशित करते हैं । अतएव प्रकाश्य ( अर्थ ) और प्रकाशक ( ज्ञान ) में कार्य-कारण सम्बन्ध
नहीं हो सकता । तथा, यदि ज्ञानको पदार्थसे उत्पन्न हुआ मान कर, ज्ञानको उसी पदार्थका जाननेवाला
स्वीकार किया जाय, तो स्मृति आदिको अप्रमाणत्वका प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि स्मृति आदि
प्रमाण किसी पदार्थसे उत्पन्न नहीं होते । तथा, स्मृति प्रमाण नहीं, ऐसी बात नहीं; क्योंकि स्मृति प्रमाण,
साध्य-साधनके अविनाभाव रूप सम्बन्ध ( व्याप्ति ) के स्मरणपूर्वक होनेवाले अनुमान प्रमाणका प्राणभूत है ।
तथा, जो पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न करनेवाला है, वही ज्ञानका विषय होता हो तो स्वसंवेदन ज्ञानके ग्राहकत्व
की सिद्धि कैसे होगी ? स्वसंवेदन ज्ञानका जानने योग्य विषय उसका अपना स्वरूप ही होता है । स्वसंवेदनसे
स्वसंवेदन ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि स्वसंवेदन ज्ञानमें अपनी उत्पत्ति क्रिया होनेमें विरोध
आता है । अतएव जैसे अपनी-अपनी उपादान और सहकारीभूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले घट और प्रदीपमें
प्रकाश्य-प्रकाशक भाव होता है, वैसे ही अपनी-अपनी उपादान और सहकारी भूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले
अर्थ और ज्ञानमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव संभव होनेसे अर्थका ज्ञान निमित्तत्त्व अर्थात् अर्थके ज्ञान की उत्पत्तिमें
कारण होना संभव नहीं ।
बौद्ध—यदि ज्ञानकी उत्पत्ति पदार्थसे उत्पन्न नहीं होती, तो विवक्षित ज्ञेय पदार्थका निश्चित ज्ञान
कैसे होगा ? यह व्यवस्था ज्ञानको उस पदार्थसे उत्पन्न होनेवाला, और उस पदार्थके आकाररूप होकर उस
पदार्थको जाननेवाला माननेसे ही बन सकती है । अन्यथा पदार्थसे उत्पन्न न होनेवाले और ज्ञेयाकार रूप न
होनेवाले ज्ञानकी सभी पदार्थोंके विषयमें समानरूपता होनेसे एक पदार्थको जानते समय ज्ञानको प्रत्येक
पदार्थको जानना पड़ जायेगा । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि ज्ञानकी उत्पत्ति ज्ञेय पदार्थसे न होने पर भी
ज्ञेय पदार्थके ज्ञानको आवृत्त करनेवाले कर्मके क्षयोपशमसे अभिव्यक्त विशिष्ट क्षायोपशमिक ज्ञानसे
ही प्रतिनियत अर्थके विषयमें आत्माका प्रकाशकत्व घटित होता है । ज्ञेय पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति होनेमें
भी ज्ञानकी क्षयोपशम रूप योग्यताको अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि इस योग्यताको स्वीकार न किया
जाये तो अनेक पदार्थोंका सांनिध्य होनेपर उस-उस अर्थका सांनिध्य न होनेपर भी, किसी भी अर्थसे किसी
भी ज्ञानकी उत्पत्ति हो जाया करेगी, और फिर यह ज्ञान इसी पदार्थका है, यह विभाग नहीं बन सकेगा ।
ज्ञानको पदार्थके आकारका मानना भी संगत नहीं है, अन्यथा पदार्थको ज्ञानके आकारका होनेसे

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५५
साकारत्वप्रसङ्गाच्च । अर्थेन च मूर्तेनामूर्तस्य ज्ञानस्य कीदृशं सादृश्यम् । इत्यर्थविशेषग्रहण-
परिणाम एव साभ्युपेया । ततः—
“अर्थेन घटयत्येनां न हि मुक्त्वाऽर्थरूपताम् ।
तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता” ॥१
इति यत्किञ्चिदेतत् ॥
अपि च, व्यस्ते समस्ते वैते ग्रहणकारणं स्याताम् । यदि व्यस्ते, तदा कपालाद्यक्षणो
घटान्त्यक्षणस्य, जलचन्द्रो वा नभश्चन्द्रस्य ग्राहकः प्राप्नोति, यथासंख्यं तदुत्पत्तेः तदाकार-
त्वाच्च । अथ समस्ते, तर्हि घटोत्तरक्षणः पूर्वघटक्षणस्य ग्राहकः प्रसजति, तयोरुभयोरपि
सद्भावात् । ज्ञानरूपत्वे सत्येते ग्रहणकारणमिति चेत्, तर्हि समानजातीयज्ञानस्य समनन्तर-
ज्ञानग्राहकत्वं प्रसज्येत, तयोर्जन्यजनकभावसद्भावात् । तन्न योग्यतामन्तरेणान्यद् ग्रहणकारणं
पश्याम इति ॥
पदार्थोंको निराकार, और ज्ञानको पदार्थके आकारका होनेसे ज्ञानको साकार मानना होगा । परन्तु मूर्त
पदार्थोंके साथ अमूर्त ज्ञानकी समानता नहीं हो सकती । अतएव ज्ञानकी अर्थाकारताका कार्य प्रतिनियत
पदार्थोंका ज्ञान ही मानना चाहिये । इसलिये—
“ज्ञानकी अर्थाकारताको छोड़कर पदार्थ और ज्ञानका कोई सम्बन्ध नहीं होता, अतएव ज्ञानका
पदार्थोंके आकार होना ही ज्ञानकी प्रमाणता है,” यह आप लोगोंका कथन खण्डित हो जाता है।
तथा, आप लोगोंका जो कहना है कि ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है ( तदुत्पत्ति ), और पदार्थोंके
आकार होकर पदार्थका ज्ञान करता है ( तदाकार ), सो यह ज्ञानकी तदुत्पत्ति और तदाकारता पदार्थोंके
ज्ञानमें अलग-अलग रूपसे कारण हैं, अथवा मिलकर ? यदि कहो कि कहीं तदुत्पत्ति और कहीं तदाकारता
पदार्थोंके ज्ञानमें अलग-अलग कारण हैं, तो कपालके प्रथम क्षणको घटके अन्तिम क्षणका ज्ञान होता है,
ऐसा मानना चाहिये, क्योंकि घटके अन्तिम क्षणसे कपालका प्रथम क्षण उत्पन्न होता है ( तदुत्पत्ति );
तथा चन्द्रमाके जलमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बको आकाशके चन्द्रमाका ज्ञान होता है, ऐसा मानना चाहिये,
क्योंकि जल-चन्द्र आकाश-चन्द्रके आकारको धारण करता है ( तदाकार ) । परन्तु घटके अन्तिम क्षणसे
कपालके प्रथम क्षणके उत्पन्न होनेपर भी कपालके प्रथम क्षणको घटके अन्तिम क्षणका ज्ञान नहीं होता;
तथा जलमें पड़नेवाले चन्द्रमाके प्रतिबिम्बके आकाशके चन्द्रमाके आकारका होनेपर भी जल-चन्द्रको आकाश-
चन्द्रका ज्ञान नहीं होता । अतएव तदुत्पत्ति और तदाकारता अलग-अलग पदार्थके ज्ञानमें कारण नहीं हैं।
यदि कहो कि तदुत्पत्ति और तदाकारता दोनों मिलकर पदार्थोंके ज्ञानमें कारण हैं, तो यह ठीक नहीं;
क्योंकि घटका उत्तर-क्षण घटके पूर्व-क्षणसे उत्पन्न भी होता है ( तदुत्पत्ति ), और पूर्व-क्षणवर्ती घटाकार
भी है ( तदाकारता ), परन्तु उत्तर-क्षण घटको पूर्व-क्षणवर्ती घटका ज्ञान नहीं होता । शंका—जो ज्ञान
जिस पदार्थसे उत्पन्न हुआ है, और जिस पदार्थके आकारको धारण करता है, वह ज्ञान उसी पदार्थको
जानता है, इसलिये यह नियम नहीं है कि जो कोई वस्तु जिस किसी वस्तुसे उत्पन्न होती हो, और जिस
वस्तुका आकार रखती हो, वह उस वस्तुको जाने ( ज्ञानरूपत्वे सति तदुत्पत्ति तदाकारता ) । समाधान—
यह भी ठीक नहीं । क्योंकि पीछेसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञान ( समनन्तर ज्ञान ) के पूर्ववर्ती सजातीय ज्ञानसे
उत्पन्न होने, और उसके आकार रूप होनेके कारण पूर्ववर्ती समानजातीय ज्ञानके ग्राहक होनेका
प्रसंग उपस्थित हो जायगा । अतएव प्रत्येक ज्ञानके प्रतिनियत पदार्थोंको जाननेमें कर्मोंके आवरणकी क्षयोप-
शम रूप योग्यताको ही कारण मानना चाहिये ।
१. प्रमाणवार्तिके ३-३०५ ।

१५६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
अथोत्तराद्धं व्याख्यातुमुपक्रम्यते । तत्र च बाह्यार्थनिरपेक्षं ज्ञानाद्वैतमेव ये बौद्धविशेषा
मन्वते तेषां प्रतिक्षेपः । तन्मतं चेदम् । ग्राह्यग्राहकादिकल्पनारहितं निष्प्रपञ्चं ज्ञानमात्रं परमार्थ-
सत् । बाह्यार्थस्तु विचारमेव न क्षमते । तथाहि । कोऽयं बाह्योऽर्थः ? किं परमाणुरूपः स्थूला-
वयविरूपो वा ? न तावत् परमाणुरूपः, प्रमाणाभावात् । प्रमाणं हि प्रत्यक्षमनुमानं वा ?
न तावत्प्रत्यक्षं तत्साधनबद्धकक्षम् । तद्धि योगिनां¹ स्यात् अस्मदादीनां वा ? नाद्यम्,
अत्यन्तविप्रकृष्टतया श्रद्धामात्रगम्यत्वात् । न द्वितीयम्, अनुभवबाधितत्वात् । न हि वयमयं
परमाणुरयं परमाणुरिति स्वप्नेऽपि प्रतीमः, स्तम्भोऽयं कुम्भोऽयमित्येवमेव नः सदैव संवेदनो-
दयात् । नाप्यनुमानेन तत्सिद्धिः, अणूनामतीन्द्रियत्वेन तैः सहाविनाभावस्य क्वापि लिङ्गे
ग्रहीतुमशक्यत्वात् ॥
किञ्च, अमी नित्या अनित्या वा स्युः । नित्याश्चेत्, क्रमेणार्थक्रियाकारिणो युगपद्वा ?
न क्रमेण, स्वभावभेदेनानित्यत्वापत्तेः । न युगपत्, एकक्षण एव कृत्स्नार्थक्रियाकरणात् क्षणान्तरे
तदभावादसत्त्वापत्तिः । अनित्याश्चेत्, क्षणिकाः कालान्तरस्थायिनो वा ? क्षणिकाश्चेत्,
सहेतुका निर्हेतुका वा ? निर्हेतुकाश्चेत्, नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा स्यात्, निरपेक्षत्वात् ।
अपेक्षातो हि कादाचित्कत्वम् । सहेतुकाश्चेत्, किं तेषां स्थूलं किंचित् कारणं परमाणवो
( ४ ) ज्ञानाद्वैतवादी ( पूर्वपक्ष ) — ग्राह्य, ग्राहक आदिसे रहित निष्प्रपंच ज्ञान मात्र ही परमार्थसत्
है, क्योंकि बाह्य पदार्थोंका अभाव है । हम पूछते हैं कि परमाणुओंके समूहको बाह्य पदार्थ कहते हैं, अथवा
स्थूल अवयवीरूप एक पिंडको ? यदि परमाणुओंके समूहको बाह्य अर्थ कहते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि
प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाणसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता । योगिप्रत्यक्ष अत्यन्त परोक्ष
है, और वह केवल श्रद्धाका ही विषय है, इसलिये योगिप्रत्यक्षसे परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं
होता । इन्द्रियप्रत्यक्षसे भी बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि इन्द्रियप्रत्यक्षसे परमाणुरूप सूक्ष्म
पदार्थोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उससे केवल स्तंभ ( खंभा ) और कुंभ ( घड़ा ) रूप स्थूल पदार्थोंका ही
ज्ञान हो सकता है । अनुमानसे भी परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय
पदार्थ हैं, इसलिये परमाणुरूप साध्यका प्रत्यक्षसे ज्ञान न होनेके कारण, साध्यके अविनाभावी हेतुका भी
ज्ञान नहीं हो सकता ।
तथा, परमाणु नित्य हैं, या अनित्य ? यदि नित्य हैं तो क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, अथवा एक
साथ ? यदि परमाणु नित्य होकर क्रमसे अर्थक्रिया करते हैं, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि परमाणुओंमें क्रमसे
अर्थक्रिया माननेमें परमाणुओंमें स्वभावका भेद मानना पड़ेगा । तथा परमाणुओंमें स्वभाव-भेद माननेसे
परमाणुओंको नित्य नहीं कह सकते । परमाणु एक साथ भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते । क्योंकि यदि परमाणु
एक साथ समस्त अर्थक्रिया करने लगें, तो विश्वमें जो क्रम-क्रमसे परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है, वह नहीं
होना चाहिये । तथा समस्त अर्थक्रियाके एक ही समयमें समाप्त हो जानेसे दूसरे क्षणमें अर्थक्रियाका अभाव
होगा, इसलिये परमाणुओंका अस्तित्व ही नष्ट हो जायगा । यदि परमाणु अनित्य हैं, तो वे क्षणिक हैं,
अथवा एक क्षणके बाद भी रहते हैं ? यदि परमाणु क्षणिक हैं, तो वे किसी कारणसे उत्पन्न हुए हैं ? या
किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं ? यदि परमाणु किसी कारणसे उत्पन्न नहीं हुए हैं तो उन परमाणुओंका
या तो नित्यकाल अस्तित्व होगा ( विनश्वर न होनेसे वे क्षणिक नहीं होंगे ) ? अथवा नित्यकाल उनका
अभाव होगा ( उत्पादक, उपादान और निमित्त कारणोंका सदा अभाव होनेसे उन परमाणुओंका सभी
कालोंमें अभाव होगा ) ? क्योंकि निर्हेतुक पदार्थ उत्पत्तिके कारणोंकी अपेक्षा नहीं रखते । कादाचित्कत्व —
अनित्यत्व — उत्पादक कारणोंकी अपेक्षा रखने ही होता है । ( तात्पर्य यह है कि परमाणुओंको अनित्य भी
१. भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति—न्यायविन्दौ १-११.

वा ? न स्थूलं, परमाणुरूपस्यैव बाह्यार्थस्याङ्गीकृतत्वात् । न च परमाणवः ते हि सन्तोऽसन्तः
सद्सन्तो वा स्वकार्याणि कुर्युः । सन्तश्चेत्, किमुत्पत्तिक्षण एव क्षणान्तरे वा ? नोत्पत्तिक्षणे,
तदानीमुत्पत्तिमात्रव्यग्रत्वात् तेषाम् । अथ “भूतिर्येषां क्रिया सैव कारणं सैव चोच्यते” इति
वचनाद् भवनमेव तेषामपरोत्पत्तौ कारणमिति चेत्, एवं तर्हि रूपाणवो रसाणूनाम्, ते च
तेषामुपादानं स्युः, उभयत्रभवनाविशेषात् । न च क्षणान्तरे, विनष्टत्वात् । अथासन्तस्ते तदु-
त्पादकाः, तर्हि एकं स्वसत्ताक्षणमपहाय सदा तदुत्पत्तिप्रसङ्गः, तदसत्त्वस्य सर्वदाऽविशेषात् ।
सदसत्पक्षस्तु “प्रत्येकं यो भवेद्दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः” इति वचनाद्विरोधान्नात एव ।
तन्नाणवः क्षणिकाः ॥
नापि कालान्तरस्थायिनः । क्षणिकपक्षसदृक्षयोगक्षेमत्वात् । किञ्च, अमी कियत्काल-
स्थायिनोऽपि किमर्थक्रियापराङ्मुखाः तत्कारिणो वा ? आद्ये खपुष्पवदसत्त्वापत्तिः । उद्गद्वि-
कल्पे किमसद्रूपं सदरूपमुभयरूपं वा ते कार्यं कुर्युः ? असद्रूपं चेत्, शशविषाणादेरपि किं न
मानना और निरपेक्ष भी मानना उचित नहीं । क्योंकि अनित्य पदार्थ सापेक्ष होता है और नित्य पदार्थ
निरपेक्ष होता हैं, अर्थात् अपने उत्पादक कारणोंकी अपेक्षा वह नहीं रखता ) । यदि परमाणु सहेतुक हैं
तो कोई स्थूल कारण परमाणुओंका हेतु है, अथवा स्वयं परमाणु ही परमाणुओंमें हेतु है ? यदि स्थूल
पदार्थको परमाणुओंका कारण माना जाय, तो यह ठीक नहीं । क्योंकि आप स्थूल बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व
स्वीकार नहीं करते—आप लोगोंने बाह्य पदार्थोंको परमाणुरूप ही माना हैं । तथा स्वयं परमाणु
भी परमाणुओंमें कारण नहीं हैं। क्योंकि हम पूछते हैं कि ये परमाणु सत्, असत्, अथवा सत्-असत् होकर
अपने कार्यको करते हैं ? यदि परमाणु सत्रूप होकर अपने कार्यको करें तो परमाणु उत्पत्तिके समय ही
अपना कार्य करते हैं, अथवा उत्पत्तिके दूसरे क्षणमें ? परमाणु उत्पत्तिके समय अपना कार्य नहीं करते,
क्योंकि उस समय परमाणु अपनी उत्पत्तिमें ही व्यग्र रहते हैं। यदि कहो कि “उत्पन्न होना ही
क्रिया है, और क्रिया ही कारण है” इसलिये परमाणुओंकी उत्पत्ति होना ही दूसरोंकी उत्पत्ति होनेमें
कारण है; यह भी ठीक नहीं। क्योंकि यदि उत्पन्न होना ही उत्पत्तिमें कारण मान लिया जाय, तो
रूपके परमाणुओंको रसके परमाणुओंकी उत्पत्तिमें कारण मानना चाहिये, इसलिये रूपके परमाणुओंको
रस-परमाणुओंका उपादान कारण कहना चाहिये । क्योंकि जैसे एक परमाणु स्वयं उत्पन्न होकर दूसरे
परमाणुओंकी उत्पत्ति कर सकता है, वैसे ही रूप और रसके परमाणु भी साथ उत्पन्न होते हुए एक दूसरेकी
उत्पत्तिमें सहायक हो सकते हैं। अतएव रूप-परमाणु और रस-परमाणुओंको अपनी-अपनी उत्पत्तिमें पृथक्
कारण न मानकर रूपके परमाणुओंकी रसके परमाणुओंसे उत्पत्ति माननी चाहिये । यदि कहो कि परमाणु
सत्रूप होकर दूसरे क्षणमें अपना कार्य करते हैं, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि परमाणु उत्पत्तिके बाद
ही नष्ट हो जाते हैं। यदि कहो कि परमाणु असत्रूप होकर अपना कार्य करते हैं ( दूसरा पक्ष ) तो यह
भी ठीक नहीं । क्योंकि अपनी उत्पत्तिके समयको छोड़कर सदा ही इन परमाणुओंको अपना कार्य करते
रहना चाहिये; कारण कि असत् परमाणु सदा एकसे रहते हैं । तथा, सत्-असत्रूप होकर भी परमाणु
कार्य नहीं करते (तीसर पक्ष ), क्योंकि “जो दोष सत् और असत् एक-एक स्वभावके अलग-अलग
माननेमें कहे गये हैं, वे सब दोष सत्-असत् दोनों स्वभावोंको एक साथ माननेमें भी आते हैं।" इसलिये
परमाणु सत् और असत्रूप होकर भी अर्थक्रिया नहीं कर सकते । अतएव परमाणु क्षणिक नहीं हैं ।
तथा, अनित्य परमाणु एक क्षणके बाद दूसरे क्षणमें स्थित रह कर भी ( एक क्षणसे अधिक, परन्तु
परिमित समय तक रहनेवाले ) अर्थक्रिया नहीं कर सकते । क्योंकि परमाणुओंको क्षणिक मानकर अर्थ-
क्रियाकारी माननेमें जो दोष आते हैं, वे यहाँ भी आते हैं। तथा, एक क्षणके बाद रहनेवाले परमाणु अर्थ-
क्रिया करते हैं, अथवा नहीं ? यदि ये परमाणु अर्थक्रिया नहीं करते, तो आकाशके फूलकी तरह इन परमाणुओं-

१५८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
करणम्। सद्रूपं चेत्, सतोऽपि करणेऽनवस्था। तृतीयभेदस्तु प्रागवद्विरोधदुर्गन्धः। तन्नाणु-
रूपोऽर्थः सर्वथा घटते ॥
नापि स्थूलावयविरूपः। एकपरमाण्वसिद्धौ कथमनेकतत्सिद्धिः। तदभावे च तत्प्रचय-
रूपः स्थूलावयवी वाङ्मात्रम्। किञ्च, अयमनेकावयवाधार इष्यते। ते चावयवा यदि
विरोधिनः, तर्हि नैकः स्थूलावयवी, विरुद्धधर्माध्यासात्। अविरोधिनश्चेत्, प्रतीतिबाधः।
एकस्मिन्नेव स्थूलावयविनि चलाचलरक्तारक्तावृतानावृतादिविरुद्धावयवानामुपलब्धेः। अपि
च, असौ तेषु वर्तमानः कात्स्न्र्येन एकदेशेन वा वर्तते ? कात्स्न्र्येन वृत्तावेकस्मिन्नेवावयवे
परिसमाप्तत्वादनेकावयववृत्तित्वं न स्यात्। प्रत्यवयवं कात्स्न्र्येन वृत्तौ चावयविबहुत्वापत्तिः।
एकदेशेन वृत्तौ च तस्य निरंशत्वाभ्युपगमविरोधः। सांशत्वे वा तैऽशास्ततो भिन्नाः अभिन्ना
वा ? भिन्नत्वे पुनरप्यनेकांशवृत्तेरेकस्य कात्स्न्र्यैकदेशविकल्पानतिक्रमादनवस्था। अभिन्नत्वे
न केचिदंशाः स्युः ॥
इति नास्ति बाह्योऽर्थः कश्चित्। किन्तु ज्ञानमेवेदं सर्वं नीलाद्याकारेण प्रतिभाति।
बाह्यार्थस्य जडत्वेन प्रतिभासायोगात्। यथोक्तम् “स्वाकारबुद्धिजनका दृश्या नेन्द्रियगोचराः” ।
का अभाव मानना चाहिये। क्योंकि अर्थक्रियाकारित्व ही वस्तुका लक्षण है। यदि एक क्षणके बाद रहनेवाले
परमाणु अर्थक्रिया करते हैं, तो वह अर्थक्रिया सद्रूप है, असत्रूप, अथवा उभयरूप ? यदि परमाणुओंका
कार्य असद्रूप है, तो परमाणुओंको असद्रूप खरगोशके सींगोंकी उत्पत्तिमें भी कारण होना चाहिये।
यदि यह कार्य सद्रूप है, तो इसका यह अर्थ हुआ कि जो कार्य पहलेसे मौजूद था, उस कार्यको ही
परमाणुओंने किया है। अतएव इस मान्यतामें अनवस्था दोष आता है। अतएव सत् और असद्रूप कार्यके
न बननेसे सत्-असद्रूप कार्य भी नहीं बन सकता। अतएव परमाणु बाह्य पदार्थ नहीं हो सकते।
बाह्य पदार्थोंको स्थूल अवयवीरूप भी स्वीकार नहीं कर सकते। क्योंकि जब एक परमाणुरूप
बाह्य पदार्थोंकी सिद्धि नहीं होती, तो अनेक परमाणुरूप बाह्य पदार्थोंकी कैसे सिद्धि हो सकती है ? अतएव
परमाणुओंके अभावमें परमाणुप्रचयरूप स्थूल अवयवीका सद्भाव होता है, यह कहना केवल कथन मात्र है।
तथा, अवयवीके अनेक अवयव आधार माने गये हैं। ये अवयव परस्पर विरोधी हैं, या अविरोधी ? यदि
ये परस्पर विरोधी हैं, तो इनसे एक स्थूल अवयवी ही नहीं बन सकता, क्योंकि अवयवीमें विरोधी धर्मोका
अध्यारोप हो जाता है। यदि इन परमाणुओंको परस्पर अविरोधी मानो, तो यह अनुभवके विरुद्ध है, क्योंकि
हमें प्रत्यक्षसे एक ही स्थूल अवयवीमें चल, अचल, रक्त, अरक्त, आवृत्त, अनावृत्त आदि विरुद्ध धर्म देखनेमें
आते हैं। तथा, अवयवी अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहता है, अथवा एक देशसे ? यदि अवयवी अवयवोंमें
सम्पूर्ण रूपसे रहते हैं, तो सम्पूर्ण अवयवीके एक अवयवमें समाप्त हो जानेसे अवयवी अनेक अवयवोंमें नहीं
रह सकता। यदि अवयवी अनेक अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहे भी, तो अनेक अवयवी मानने पड़ेंगे। यदि
अवयवी अवयवोंमें एक देशसे रहे, तो अवयवमें अंशोंकी कल्पना होनेसे उसे निरंश एक अवयवी नहीं कह
सकते; परन्तु अवयवी निरंश होता है। यदि कहो कि अवयवी अंश सहित होकर अवयवोंमें रहता है, तो ये
अंश अवयवोंसे भिन्न हैं, या अभिन्न ? यदि अंश अवयवसे भिन्न हैं, तो प्रश्न होगा, कि अवयवी
अवयवोंमें सम्पूर्ण रूपसे रहते हैं, अथवा एक देशसे ? इस तरह अनवस्था माननी पड़ेगी। यदि अंश
अवयवसे अभिन्न हैं, तो अवयवोंको छोड़कर अवयवीके अंशोंका पृथक् अस्तित्व नहीं मान सकते।
इस प्रकार परमाणुरूप या स्थूलरूप बाह्य अर्थका सद्भाव नहीं है; किन्तु जो कुछ नील आदि
पदार्थोंके आकार रूपसे प्रतिभासित होता है, वह सब ज्ञान ही है। क्योंकि जड़ अर्थात् अचेतन या ज्ञानहीन
बाह्यार्थका अपने आपको जानना घटित नहीं होता। कहा भी है—“अपने आकाररूप बुद्धिको उत्पन्न करने-

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५६
अलङ्कारकारेणोप्युक्तम्—
“यदि संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ।
न चेत् संवेद्यते नीलं कथं बाह्यं तदुच्यते ॥”
यदि बाह्योऽर्थो नास्ति, किंविषयस्तर्ह्ययं घटपटादिप्रतिभासः इति चेत्, ननु निरालम्बन
एवायमनादिवितथवासनाप्रवर्तितः, निर्विषयत्वात्, आकाशकेशज्ञानवत्, स्वप्नज्ञानवद् वेति ।
अत एवोक्तम्—
“नान्योऽनुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः ।
ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात् स्वयं सैव प्रकाशते ॥²
बाह्यो न विद्यते ह्यर्थो यथा बालैर्विकल्प्यते ।
वासनालुठितं चित्तमर्थाभासे प्रवर्तते” ॥ इति ॥
तदेतत्सर्वमवद्यम् । ज्ञानमिति हि क्रियाशब्दः । ततो ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं, ज्ञप्तिर्वा
ज्ञानमिति । अस्य च कर्मणा भाव्यं, निर्विषयाया ज्ञप्तेरघटनात् । न चाकाशकेशादौ निर्विष-
यमपि दृष्टं ज्ञानमिति वाच्यम्, तस्याप्येकान्तेन निर्विषयत्वाभावात् । न हि सर्वथागृहीत-
वाले इन्द्रियगोचर दृश्य पदार्थ अस्तिरूप नहीं हैं ।”
अलंकारकार ( प्रज्ञाकरगुप्त ) ने भी कहा है—
“यदि नील पदार्थका अनुभव किया जाता है तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे कह
सकते हैं ? यदि नील पदार्थका अनुभव नहीं किया जाता तो वह नील पदार्थ बाह्य पदार्थ है, ऐसा कैसे
कह सकते हैं ।” ( जो जिसका होता है वह उसका अनुभव कर सकता है । नील पदार्थका अनुभव ज्ञानके
द्वारा किया जाता है तो वह नील पदार्थ ज्ञानका—ज्ञानरूप—होना चाहिये । नील पदार्थका ज्ञान नहीं
होता तो उसे बाह्य पदार्थ नहीं कह सकते । जिस पदार्थका किसी भी हालतमें ज्ञान होता ही नहीं, उसका
बाह्य अस्तित्व नहीं हो सकता, और जिसका अस्तित्व होता है उसका किसी न किसी प्रकारसे ज्ञान
होता ही है ) ।
शंका—यदि बाह्य पदार्थका अस्तित्व नहीं है तो घट, पट आदिका ज्ञान किस प्रकार होता है ?
समाधान—जिस प्रकार आकाशकेशरूप बाह्य पदार्थके अभावमें आकाशकेशका ज्ञान होता है, अथवा
जिसप्रकार स्वप्नज्ञानका विषय बने हुए पदार्थका वस्तुतः सद्भाव न होनेपर भी स्वप्नमें उसका ज्ञान होता
है, उसी तरह घट, पट आदि बाह्य पदार्थोंका अभाव होनेसे, आलंबनरहित होनेपर भी, अनादि मिथ्या-
वासनाके कारण घट, पट आदिका ज्ञान होता है । इसलिए कहा है—
“जिसका बुद्धिके द्वारा अनुभव किया जाता है, वह बुद्धिसे भिन्न नहीं होता । अनुभव बुद्धिसे भिन्न
नहीं है । ग्राह्य-ग्राहक ( अनुभाव्य-अनुभावक ) भावसे रहित होनेसे बुद्धि स्वयं प्रकाशित होती है । मूर्खो
द्वारा कल्पित बाह्य अर्थ विद्यमान नहीं है । ( अनादि ) वासनासे प्रतिहत चित्त ( बुद्धि ) अर्थाभास ( अयथार्थ
अर्थ ) में प्रवृत्त होता है ।”
( ४ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । ज्ञान शब्द क्रियाका द्योतक है । जिसके द्वारा जाना जाय, अथवा
जानने मात्रको ज्ञान कहते हैं । ज्ञान ( क्रिया ) के कोई कर्म अवश्य होना चाहिये, क्योंकि ज्ञान निर्विषय नहीं
होता । यदि आकाशमें निर्विषय केशज्ञानकी तरह मिथ्या ज्ञानको ही ज्ञानका विषय मानो, तो यह भी ठीक
नहीं । क्योंकि आकाशमें केशज्ञान भी एकान्त रूपसे निर्विषय नहीं है । कारण कि जिसने कभी वास्तविक
१. प्रज्ञाकरगुप्तकृतः प्रमाणवार्तिकालङ्काराख्यो बौद्धग्रन्थः ।
२. प्रमाणवार्तिके ३-३२७ ।

१६० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
सत्यकेशज्ञानस्य तत्प्रतीतिः। स्वप्नज्ञानमप्यनुभूतदृष्टाद्यर्थविषयत्वान्न निरालम्बनम्। तथा च
महाभाष्यकारः—
"अणुहूयदिट्ठचिंतिय सुयपयइवियारदेवयाणूवा।
सुमिणस्स निमित्ताई पुण्णं पावं च णाभावो"¹
यश्च ज्ञानविषयः स बाह्योऽर्थः। भ्रान्तिरियमिति चेत् चिरं जीव। भ्रान्तिर्हि मुख्येऽर्थे
क्वचिद् दृष्टे सति करणापाटवादिनान्यत्र विपर्यस्तग्रहणे प्रसिद्धा, यथा शुक्तौ रजतभ्रान्तिः।
अर्थक्रियासमर्थेऽपि वस्तुनि यदि भ्रान्तिरुच्यते तर्हि प्रलीना भ्रान्ताभ्रान्तव्यवस्था। तथा च
सत्यमेतद्वचः—
"आशामोदकतृप्ता ये ये चास्वादितमोदकाः।
रसवीर्यविपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥”
न चामून्यर्थदूषणानि स्याद्वादिनां बाधां विदधते, परमाणुरूपस्य स्थूलावयविरूपस्य
चार्थस्याङ्गीकृतत्वात्। यच्च परमाणुपक्षखण्डनेऽभिहितं प्रमाणाभावादिति, तदसत् तत्कार्याणां
केशोंका ज्ञान नहीं किया है, उसे आकाशमें मिथ्या केशज्ञान नहीं हो सकता। इसी प्रकार स्वप्नमें भी जाग्रत्
दशामें अनुभूत पदार्थोंका ही ज्ञान होता है, इसलिये स्वप्नज्ञान भी सर्वथा निर्विषय नहीं है। महाभाष्य-
कार ( जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण ) ने भी कहा है—
"अनुभव किये हुए, देखे हुए, विचारे हुए, सुने हुए पदार्थ, वात, पित्त आदि प्रकृतिके विकार, दैविक
और जलप्रधान देश स्वप्नमें कारण होते हैं। सुख-निद्रा आनेसे पुण्य रूप, और सुख-निद्रा न आनेसे पाप
रूप स्वप्न दिखाई देते हैं। वास्तवमें स्वप्नके निमित्तोंका अभाव नहीं है, अर्थात् स्वप्न निर्विषय नहीं होता।"
तथा, ज्ञानका विषय हो बाह्य अर्थ है। यदि कहो कि ज्ञानका विषय बाह्य पदार्थ है, यह कथन
भ्रान्तिरूप है, तो यह बहुत ठीक है। क्योंकि मुख्य पदार्थके कहीं देखे जानेपर इन्द्रियोंके रुग्ण आदि होनेसे
कहीं किसी अन्य पदार्थमें, उस मुख्य पदार्थको विपर्यास रूपसे जाननेपर भ्रान्तिकी सिद्धि होती है; सीपीमें
चाँदीकी भ्रान्तिकी भाँति । (चाँदीको देखनेसे उसके शुभ्रत्वका ज्ञान होनेपर, सीपीके शुभ्रत्वको देखनेसे
जिस प्रकार सीपीके विषयमें चाँदीका होनेवाला ज्ञान भ्रान्तिरूप होता है, उसी प्रकार कहीं मुख्य पदार्थको
देखनेपर, इन्द्रियोंके रुग्ण आदि होनेसे अन्य पदार्थमें विपर्यस्त अर्थात् अन्यत्र देखे हुए मुख्य पदार्थका जो
ज्ञान होता है, वह भ्रान्तिरूप होता है, यह सिद्ध हो जाता है। इस भ्रान्त ज्ञानसे भी बाह्यार्थके सद्भावकी
ही सिद्धि होती है)। प्रयोजन भूत कार्यकी उत्पत्ति करनेमें समर्थ होनेवाले पदार्थके विषयमें भी इस
पदार्थका अस्तित्व भ्रान्तरूप है—यह जो कहा गया है तो इससे यह ज्ञान भ्रांत है, और यह ज्ञान अभ्रान्त,
यह व्यवस्था ही नष्ट हो जायेगी। अतएव—
"जो मनके लड्डू खाकर तृप्त हुए हैं और जिन्होंने वास्तवमें लड्डुओंका स्वाद चखा है, उन
दोनोंके रस, वीर्य और विपाक आदिके समान होनेका प्रसंग उपस्थित हो जाता है"—यह वचन सत्य है।
तथा, आप लोगोंने ज्ञानाद्वैतका प्रतिपादन करते हुए जो परमाणुरूप और स्थूल अवयवीरूप बाह्य
पदार्थोंका खण्डन किया, उससे स्याद्वादियोंके सिद्धान्तमें कोई बाधा नहीं आती। क्योंकि जैन लोगोंने परमाणु
और स्थूल अवयवी दोनों रूप बाह्य पदार्थोंको स्वीकार किया है। तथा, परमाणुपक्षका खण्डन करते हुए
'परमाणु रूप बाह्य पदार्थ नहीं है, क्योंकि उसके साधक प्रमाणोंका अभाव है'—यह जो कथन है, वह भी
१. छाया—अनुभूतदृष्टचिन्तितश्रुतप्रकृतिविकारदैविकानूपाः वा ।
स्वप्नस्य निमित्तानि पुण्यं पापं च नाभावः ॥
—जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणः विशेषावश्यकभाष्ये १७०३।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६१
घटादीनां प्रत्यक्षत्वे तेषामपि कथञ्चित् प्रत्यक्षत्वं योगिप्रत्यक्षेण च साक्षात्प्रत्यक्षत्वमव-
सेयम् । अनुपलब्धिस्तु सौक्ष्म्यात् । अनुमानादपि तत्सिद्धिः, यथा-सन्ति परमाणवः, स्थूला-
वयविनिष्पत्तेरन्यथानुपपत्तेः, इत्यन्तर्व्याप्तिः । न चाणुभ्यः स्थूलोत्पाद इत्येकान्तः, स्थूलादपि
सूत्रपटलादेः स्थूलस्य पटादेः प्रादुर्भावविभावनात्, आत्माकाशादेरपुद्गलत्वकक्षीकाराच्च ।
यत्र पुनरणुभ्यस्तदुत्पत्तिस्तत्र तत् कालादिसामग्रीसंव्यपेक्षक्रियावशात् प्रादुर्भूतं संयोगातिशय-
मपेक्षेयमवितथैव ॥
यदपि किञ्चायमनेकावयवाधार इत्यादि न्यगादि, तत्रापि कथञ्चिद्विरोध्यनेकावयवा-
विश्वग्भूतवृत्तिरवयव्यभिधीयते । तत्र च यद्विरोध्यनेकावयवाधारतायां विरुद्धधर्माध्यासनम-
भिहितं तत्कथञ्चिदुपयेत एव तावत्, अवयवात्मकस्य तस्यापि कथञ्चिदनेकरूपत्वात् । यच्चो-
पन्यस्तम्, अपि च असौ तेषु वर्तमानः कात्स्न्येनैकदेशेन वा वर्तेतेत्यादि, तत्रापि विकल्प-
द्वयानभ्युपगम एवोत्तरम्, अविश्वग्भावेनावयविनोऽवयवेषु वृत्तेः स्वीकारात् ॥
किञ्च, यदि बाह्योऽर्थो नास्ति, किमिदानीं नियताकारं प्रतीयते । नीलमेतत् इति
विज्ञानकारोऽयमिति चेत्, न । ज्ञानाद् बहिर्भूतस्य संवेदनात् । ज्ञानाकारत्वे तु अहं नीलम्
इति प्रतीतिः स्यान्न तु इदं नीलम् इति । ज्ञानानां प्रत्येकमाकारभेदात् कस्यचित् 'अहम्' इति
प्रतिभासः, कस्यचित् 'नीलमेतत्' इति चेत्, न । नीलाद्याकारवदहमित्याकारस्य व्यवस्थितत्वा-
ठीक नहीं। क्योंकि परमाणुओंके कार्यरूप घट आदिका प्रत्यक्षसे ज्ञान होनेपर उन परमाणुओंका भी कथंचित्
प्रत्यक्षसे ज्ञान होता है, तथा योगिप्रत्यक्षसे उनका साक्षात् प्रत्यक्ष होता है। उन परमाणुओंके अत्यन्त सूक्ष्म
होनेसे उनकी उपलब्धि नहीं होती । अनुमान प्रमाणसे भी उन परमाणुओंकी सिद्धि होती है। अनुमान-
परमाणु अस्तिरूप है क्योंकि परमाणुओंके अभावमें स्थूल अवयवीकी निष्पत्ति नहीं हो सकती; यह अन्तर्व्याप्ति
है। (परमाणुरूप उपादानका उपादेयभूत कार्यमें स्व-स्वरूपसे अन्वय होनेसे, परमाणु और स्थूल अवयवीमें
अन्तर्व्याप्य-व्यापक भावका सद्भाव होनेसे इनमें अन्तर्व्याप्ति सिद्ध होती है)। परमाणुओंसे स्थूल अवयवीका

१६२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
भावात् । तथा च यदेकेनाहमिति प्रतीयते तदेवापरेण त्वमिति प्रतीयते । नीलाद्याकारस्तु
व्यवस्थितः, सर्वैरप्येकरूपतया ग्रहणात् । भक्षितहत्पूरादिभिस्तु¹ यद्यपि नीलादिकं पीतादि-
तया गृह्यते, तथापि तेन न व्यभिचारः तस्य भ्रान्तत्वात् । स्वयं स्वस्य संवेदनेऽहमिति प्रति-
भास इति चेत्, ननु किं परस्यापि संवेदनमस्ति । कथमन्थथा स्वशब्दस्य प्रयोगः । प्रतियोगी-
शब्दो ह्ययं परमपेक्षमाण एव प्रवर्तते । स्वरूपस्यापि भ्रान्त्या भेदप्रतीतिरिति चेत्, हन्त
प्रत्यक्षेण प्रतीतो भेदः कथं न वास्तवः ॥
भ्रान्त प्रत्यक्षमिति चेत्, ननु कुत एतत् । अनुमानेन ज्ञानार्थयोरभेदसिद्धेरिति चेत्,
किं तदनुमानमिति पृच्छामः । यद्येन सह नियमेनोपलभ्यते तत् ततो न भिद्यते, यथा सचन्द्राद्-
सचन्द्रः । नियमेनोपलभ्यते च ज्ञानेन सहार्थ इति व्यापक्यानुपलब्धिः । प्रतिषेध्यस्य ज्ञानार्थयो-
र्भेदस्य व्यापकः सहोपलम्भानियमस्तस्यानुपलब्धिः । भिन्नयोर्नीलपीतयोर्युगपदुपलम्भनियमा-
भावात् । इत्यनुमानेन तयोरभेदसिद्धिरिति चेत् ॥
न । संदिग्धserviceानैकान्तिकत्वेनास्यानुमानाभासत्वात् । ज्ञानं हि स्वपरसंवेदनम् । तत्पर-
दोनों पदार्थ ज्ञानाकार होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि जिस प्रकार नील आकार निश्चित है,
वैसे 'अहम्' आकार निश्चित नहीं है । कारण कि जो मेरे लिये 'अहं' है वह दूसरेके लिये 'त्वं' है । परन्तु
नील आकार व्यवस्थित है, क्योंकि वह सब लोगोंके अनुभवमें एकरूपसे ही आता है । यदि कहो कि पित्त
उत्पन्न करनेवाले धतूरेको खा लेनेसे नील पदार्थ भी पीतरूप प्रतिभासित होता है, इसलिये नील आकार
सब लोगोंके अनुभवमें एकसा नहीं आता । यह भी ठीक नहीं । क्योंकि नीलका पीतरूप प्रतिभासित होना
भ्रान्त है । रोग रहित मनुष्योंको नील सदा नील रूप ही प्रतिभासित होता है । स्वयंको अपने आपका ज्ञान
होनेसे 'अहं' का प्रतिभास होता है, यह आपका कथन तभी सत्य माना जा सकता है, जब आप अपने अति-
रिक्त दूसरेका भी संवेदन मानते हों । 'स्व' शब्द प्रतियोगी शब्द है । अतएव स्व शब्दसे पर शब्दका भी ज्ञान
होता है । यदि कहो कि स्व शब्दमें पर स्वरूप भेदका ज्ञान होता है, वास्तवमें स्व और परमें कोई भेद
नहीं है, तो खेद है कि आप लोग प्रत्यक्षसे दिखाई देनेवाले स्व और पर, तथा अंतर और बाह्यके भेदको भी
वास्तविक नहीं मानना चाहते ।
बौद्ध—स्व और परके भेदको बतानेवाला प्रत्यक्ष भ्रान्त है । क्योंकि अनुमानसे ज्ञान और पदार्थका
अभेद सिद्ध होता है । 'जो जिसके साथ नियमसे उपलब्ध होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता । जैसे असत् या
भ्रान्त चन्द्रमा यथार्थ चन्द्रमा के साथ उपलब्ध होता है, अतएव भ्रान्त चन्द्रमा यथार्थ चन्द्रमासे भिन्न नहीं है !
इसी प्रकार ज्ञान और पदार्थ नियमसे एक साथ पाये जाते हैं । अतएव पदार्थ ज्ञानसे भिन्न नहीं है ।
( व्यापकका अभाव होने पर व्याप्यका अभाव होना व्यापकानुपलब्धि है । यहाँ व्याप्य-शिंशिपाका अभाव
है, क्योंकि यहाँ शिंशिपाव्यापक वृक्ष की अनुपलब्धि है । वृक्ष व्यापक है और वृक्ष होनेसे शिंशिपा व्याप्य
है । अतः वृक्षमात्रका अभाव शिंशिपा वृक्षके अभाव की सिद्धि करता है । प्रस्तुत प्रसंगमें अभेदव्यवस्थापक
सहोपलंभ नियम का अभाव व्यापक है तथा अर्थ और ज्ञानमें होनेवाला भेद व्याप्य । अर्थात् जहाँ सहोपलंभ
नियम का अभाव होता है, वहाँ अभेद का अभाव—भेदका सद्भाव—होता है । ) जिस प्रकार परस्पर भिन्न
नील और पीत पदार्थों का एक साथ ज्ञान होनेके नियम का अभाव होता है, उसी प्रकार ज्ञानके साथ अर्थ की
उपलब्धि नियमसे होती है, अतएव सहोपलंभ रूप नियमके अभावरूप व्यापक की उपलब्धि न होनेसे ज्ञानके
और अर्थके अभेदके अभावरूप व्याप्य की उपलब्धि नहीं होती—ज्ञान और अर्थमें भेद की सिद्धि नहीं होती ।
इस अनुमानसे ज्ञान और अर्थ का अभेद सिद्ध होता है ।
जैन—बौद्धों का यह कथन ठीक नहीं है । ( क ) बौद्धोंके द्वारा उपस्थित किये गये अनुमानमें दिया
१. हत्पूरः पित्तरोगकरः फलविशेषस्तद्भक्षणेन पित्तपीतिम्ना सर्वे पदार्थाः पीता इव भासन्ते ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १६३
संवेदनतामात्रेणैव नीलं गृह्णाति, स्वसंवेदनतामात्रेणैव च नीलबुद्धिम् । तदेवमनयोर्युगपद्
ग्रहणात्सहोलम्भनियमोऽस्ति अभेदश्च नास्ति । इति सहोपलम्भनियमरूपस्य हेतोर्विपक्षाद्
व्यावृत्तेः संदिग्धत्वात् संदिग्धानैकान्तिकत्वम् । असिद्धश्च सहोपलम्भनियमः, नीलमेतत् इति
बहिर्मुखतयाऽर्थेनुभूयमाने तदानीमेवान्तरस्य नीलाद्नुभवस्याननुभवात्, इति कथं प्रत्यक्ष-
स्यानुमानेन ज्ञानार्थयोरभेदसिद्ध्या भ्रान्तत्वम् । अपि च, प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वेनावाधितविषय-
त्वादन्नुमानस्यात्मलाभः, लब्धात्मके चानुमाने प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वम्, इत्यन्योन्याश्रयदोषोऽपि
दुर्निवारः । अर्थाभावे च नियतदेशाधिकरणा प्रतीतिः कुतः । न हि तत्र विवक्षितदेशेऽय-
मारोपयितव्यो नान्यत्रेत्यस्ति नियमहेतुः ॥
वासनानियमात्तदारोपनियम इति चेत् । न । तस्या अपि तद्देशनियमकारणत्वाभावात् ।
सति ह्यर्थसद्भावे यद्देशोऽर्थस्तद्देशोऽनुभवः तद्देशा च तत्पूर्विका वासना । बाह्यार्थाभावे तु तस्याः
किंकृतो देशनियमः ॥
गया सहोपलंभरूप हेतु संदिग्धानैकांतिक होनेसे अनुमानाभास है । ( जिस हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध
होती है, उस हेतु को संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभास कहा जाता है ) । ज्ञान परमार्थतः स्व और पर को जानने-
वाला होता है । परसंवेदन स्वभावके कारण ही ज्ञान नील पदार्थ को जानता है, तथा स्वसंवेदन स्वभावके
कारण नीलके ज्ञान को ग्रहण करता है । इस प्रकार नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान, इन दोनों को
एक साथ ग्रहण करनेसे सहोपलंभ नियम का सद्भाव है । तथा नील पदार्थ और नील पदार्थ का ज्ञान; इन
दोनोंमें अभेद नहीं है । इस प्रकार सहोपलंभ नियम रूप हेतु की विपक्षसे व्यावृत्ति संदिग्ध होनेके कारण
उस हेतु का संदिग्धानैकांतिक हेत्वाभासत्व सिद्ध हो जाता है । ( ख ) ज्ञान और अर्थ की एक साथ उप-
लब्धि होने का नियम असिद्ध है—उसकी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि ‘यह नील है,’ इस प्रकार वहिर्मुख रूपसे
जब पदार्थ का ज्ञान होता है, उसी समय अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव नहीं होता । इस प्रकार नील पदार्थ
का ज्ञान तथा अंतरंग नील ज्ञान का अनुभव एक साथ न होनेसे, सहोपलंभ नियमके स्वरूप की सिद्धि नहीं
होती । इससे सहोपलंभ नियमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास ठहरता है और अनुमान नहीं बनता । ऐसी हालत-
में असिद्ध अनुमानद्वारा सिद्ध किये जानेवाले ज्ञान और अर्थके अभेद द्वारा प्रत्यक्ष का भ्रान्तत्व कैसे सिद्ध हो
सकता है ? ( ग ) तथा, यदि प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो, तो अनुमानका विषय अबाधित सिद्ध होनेसे अनु-
मान की उत्पत्ति हो, तथा अनुमान की उत्पत्ति होने पर प्रत्यक्षका भ्रान्तपना सिद्ध हो—इस प्रकार अनुमान
और प्रत्यक्षके परस्पर अन्योन्याश्रित होनेसे अन्योन्याश्रय दोष दुर्निवार हो जाता है । इसलिये प्रत्यक्ष अथवा
अनुमानसे भी ज्ञान और पदार्थमें अभेद सिद्ध नहीं होता । तथा, यथार्थ का अभाव होने पर पदार्थोंके निश्चित
स्थानकी प्रतीति नहीं होनी चाहिए । इसलिये विवक्षित स्थानमें ही अमुक पदार्थ का आरोप करना चाहिये,
अन्यत्र नहीं, इस नियम का कारण नहीं बन सकता ।
विज्ञानवादी बौद्ध—हम लोग वासनाद्वारा प्रतिनियत स्थानमें रहनेवाले पदार्थोंका ज्ञान करते हैं ।
( घटके प्रतिनियत स्थानमें रहनेसे उस स्थानका स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, परन्तु हम वासनाके द्वारा
अमुक पदार्थके अमुक स्थानमें स्थित रहनेका ज्ञान करते हैं । अतएव बाह्य पदार्थोंका ज्ञान हमारी वासनाके
कारण होता है, वास्तवमें बाह्य पदार्थ स्वतन्त्र वस्तु नहीं है ) । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि हम वासना-
से पदार्थके प्रतिनियत स्थानका ज्ञान नहीं कर सकते । पदार्थके होनेपर ही जिस स्थानमें पदार्थका अस्तित्व
होता है, उसी स्थानमें पदार्थका ज्ञान होता है, और उसी स्थानमें पदार्थज्ञानपूर्वक वासना उत्पन्न होती हैं ।
बाह्य पदार्थका अभाव होनेपर केवल उस वासना द्वारा पदार्थके प्रतिनियत स्थानका निश्चय कौन कर
सकता है ? अतएव यदि बाह्य पदार्थ कोई वस्तु नहीं है, तो प्रतिनियत स्थानके निश्चयका कोई नियम नहीं
बन सकता ।

१६४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
अथास्ति तावदारोपनियमः । न च कारणविशेषमन्तरेण कार्यविशेषो घटते । बाह्यार्थो
नास्ति । तेन वासनानामेव वैचित्र्यं तत्र हेतुरिति चेत्, तद्वासनावैचित्र्यं बोधाकारादन्यत्,
अनन्यद्वा ? अनन्यच्चेत्, बोधाकारस्यैकत्वात्कस्तासां परस्परतो विशेषः । अन्यच्चेत्, अर्थे कः
प्रद्वेषः, येन सर्वलोकप्रतीतिरपहूयते ? तदेवं सिद्धो ज्ञानार्थयोर्भेदः ॥
तथा च प्रयोगः । विवादाध्यासितं नीलादि ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं, विरुद्धधर्माध्यस्तत्वात् ।
विरुद्धधर्माध्यासश्च ज्ञानस्य शरीरान्तः, अर्थस्य च बहिः; ज्ञानस्यापरकाले, अर्थस्य च पूर्व-
काले वृत्तिमत्त्वात्; ज्ञानस्यात्मनः सकाशात्, अर्थस्य च स्वकारणेभ्य उत्पत्तेः । ज्ञानस्य
प्रकाशरूपत्वात्, अर्थस्य च जडरूपत्वादिति । अतो न ज्ञानाद्वैतेऽभ्युपगम्यमाने बहिरनुभूय