स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
न च प्रकाश्यादात्मलाभ एव प्रकाशकस्य प्रकाशकत्वं, प्रदीपादेर्घटादिभ्योऽनुत्पन्नस्यापि
तत्प्रकाशकत्वात् । जनकस्यैव च ग्राह्यत्वाभ्युपगमे स्मृत्यादेः प्रमाणस्याप्रामाण्यप्रसङ्गः तस्यार्था-
जन्यत्वात् । न च स्मृतिर्न प्रमाणम्, अनुमानप्रमाणप्राणभूतत्वात् साध्यसाधनसम्बन्धस्मरण-
पूर्वकत्वात् तस्य । जनकमेव च चेद् ग्राह्यम्, तदा स्वसंवेदनस्य कथं ग्राहकत्वम् । तस्य हि
ग्राह्यं स्वरूपमेव । न च तेन तज्जन्यते, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् । तस्मात् स्वसामग्रीप्रभव-
योर्घटप्रदीपयोरिवार्थज्ञानयोः प्रकाश्यप्रकाशकभावसंभवाद् न ज्ञाननिमित्तत्वमर्थस्य ॥
नन्वर्थाजन्यत्वे ज्ञानस्य कथं प्रतिनियतकर्मव्यवस्था । तदुत्पत्तितदाकारताभ्यां हि
सोपपद्यते । तस्मादनुत्पन्नस्यातदाकारस्य च ज्ञानस्य सर्वार्थान् प्रत्यविशेषात् सर्वग्रहणं
प्रसज्येत । नैवम् । तदुत्पत्तिमन्तरेणाप्यावरणक्षयोपशमलक्षणया योग्यतयैव प्रतिनियतार्थ-
प्रकाशकत्वोपपत्तेः । तदुत्पत्तावपि च योग्यतावश्यमेष्टव्या । अन्यथाऽशेषार्थसान्निध्ये तत्तदर्था-
सांनिध्येऽपि कुतश्चिदेवार्थात् कस्यचिदेव ज्ञानस्य जन्मेति कौतस्कुतोऽयं विभागः ॥
तदाकारता त्वर्थाकारसंक्रान्त्या तावदनुपपन्ना, अर्थस्य निराकारत्वप्रसङ्गात् ज्ञानस्य
शंका—प्रकाश्य पदार्थ से उत्पन्न होकर पदार्थोंको प्रकाशित करना ही प्रकाशक ( ज्ञान )
का प्रकाशकपना है । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि घट आदिसे उत्पन्न न होनेवाले भी दीपक
आदि घटको प्रकाशित करते हैं । अतएव प्रकाश्य ( अर्थ ) और प्रकाशक ( ज्ञान ) में कार्य-कारण सम्बन्ध
नहीं हो सकता । तथा, यदि ज्ञानको पदार्थसे उत्पन्न हुआ मान कर, ज्ञानको उसी पदार्थका जाननेवाला
स्वीकार किया जाय, तो स्मृति आदिको अप्रमाणत्वका प्रसंग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि स्मृति आदि
प्रमाण किसी पदार्थसे उत्पन्न नहीं होते । तथा, स्मृति प्रमाण नहीं, ऐसी बात नहीं; क्योंकि स्मृति प्रमाण,
साध्य-साधनके अविनाभाव रूप सम्बन्ध ( व्याप्ति ) के स्मरणपूर्वक होनेवाले अनुमान प्रमाणका प्राणभूत है ।
तथा, जो पदार्थ ज्ञानको उत्पन्न करनेवाला है, वही ज्ञानका विषय होता हो तो स्वसंवेदन ज्ञानके ग्राहकत्व
की सिद्धि कैसे होगी ? स्वसंवेदन ज्ञानका जानने योग्य विषय उसका अपना स्वरूप ही होता है । स्वसंवेदनसे
स्वसंवेदन ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि स्वसंवेदन ज्ञानमें अपनी उत्पत्ति क्रिया होनेमें विरोध
आता है । अतएव जैसे अपनी-अपनी उपादान और सहकारीभूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले घट और प्रदीपमें
प्रकाश्य-प्रकाशक भाव होता है, वैसे ही अपनी-अपनी उपादान और सहकारी भूत सामग्रीसे उत्पन्न होनेवाले
अर्थ और ज्ञानमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव संभव होनेसे अर्थका ज्ञान निमित्तत्त्व अर्थात् अर्थके ज्ञान की उत्पत्तिमें
कारण होना संभव नहीं ।
बौद्ध—यदि ज्ञानकी उत्पत्ति पदार्थसे उत्पन्न नहीं होती, तो विवक्षित ज्ञेय पदार्थका निश्चित ज्ञान
कैसे होगा ? यह व्यवस्था ज्ञानको उस पदार्थसे उत्पन्न होनेवाला, और उस पदार्थके आकाररूप होकर उस
पदार्थको जाननेवाला माननेसे ही बन सकती है । अन्यथा पदार्थसे उत्पन्न न होनेवाले और ज्ञेयाकार रूप न
होनेवाले ज्ञानकी सभी पदार्थोंके विषयमें समानरूपता होनेसे एक पदार्थको जानते समय ज्ञानको प्रत्येक
पदार्थको जानना पड़ जायेगा । जैन—यह ठीक नहीं । क्योंकि ज्ञानकी उत्पत्ति ज्ञेय पदार्थसे न होने पर भी
ज्ञेय पदार्थके ज्ञानको आवृत्त करनेवाले कर्मके क्षयोपशमसे अभिव्यक्त विशिष्ट क्षायोपशमिक ज्ञानसे
ही प्रतिनियत अर्थके विषयमें आत्माका प्रकाशकत्व घटित होता है । ज्ञेय पदार्थसे ज्ञानकी उत्पत्ति होनेमें
भी ज्ञानकी क्षयोपशम रूप योग्यताको अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि इस योग्यताको स्वीकार न किया
जाये तो अनेक पदार्थोंका सांनिध्य होनेपर उस-उस अर्थका सांनिध्य न होनेपर भी, किसी भी अर्थसे किसी
भी ज्ञानकी उत्पत्ति हो जाया करेगी, और फिर यह ज्ञान इसी पदार्थका है, यह विभाग नहीं बन सकेगा ।
ज्ञानको पदार्थके आकारका मानना भी संगत नहीं है, अन्यथा पदार्थको ज्ञानके आकारका होनेसे