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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 458 में से

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पृष्ठ 203

अन्य. यौ. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १५१
इति पराभिप्रायमङ्गीकृत्याह न तुल्यकालः इत्यादि ॥
ते विशकलितमुक्तावलीकल्पा¹ निरन्वयविनाशिनः पूर्वक्षणा उत्तरक्षणान् जनयन्तः किं
स्वोत्पत्तिकाल एव जनयन्ति, उत क्षणान्तरे ? न तावदाद्यः । समकालभाविनोर्युवतिकुचयोरि-
वोपादानोपादेयभावाभावात् । अतः साधूक्तम् न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । न च द्वितीयः ।
तदानीं निरन्वयविनाशेन पूर्वक्षणस्य नष्टत्वादुत्तरक्षणजनने कुतः संभावनापि । न चानुपादान-
स्योत्पत्तिर्दृष्टा, अतिप्रसङ्गात् । इति सुष्ठु व्याहृतं हेतौ विलीने न फलस्य भाव इति । पदार्थस्त्व-
नयोः पादयोः प्रागेवोक्तः। केवलमत्र फलमुपादेयं हेतुरुपादानं तद्भाव उपादानोपादेयभाव इत्यर्थः ॥
यच्च क्षणिकत्वस्थापनाय मोक्षाकरगुप्तेनानन्तरमेव प्रलपितं तत् स्याद्वादवादे निरवकाश-
मेव । निरन्वयनाशवर्जं कथंचित्सिद्धसाधनात् । प्रतिक्षणं पर्यायानाशस्यानेकान्तवादिभिरभ्युप-
गमात् । यदप्यभिहितम् 'न ह्येतत् संभवति जीवति च देवदत्तो मरणं चास्य भवतीति,' तदपि
संभवादेव न स्याद्वादिनां क्षतिमावहति । यतो जीवनं प्राणधारणं, मरणं चायुर्द्लिकक्षयः ।
ततो जीवतोऽपि देवदत्तस्य प्रतिसमयमायुर्दलिकानामुदीर्णानां क्षयादुपपन्नमेव मरणम् । न
च वाच्यमन्त्यावस्थायामेव कृत्स्नायुर्दलिकक्षयात् तत्रैव मरणव्यपदेशो युक्त इति । तस्यामप्य-
उत्तर क्षणोंमें अत्यन्त भेद होनेपर भी 'यह वही घास है, 'यह वही काश हैं', और 'यह वही केश हैं', ऐसा
ज्ञान होता है, वैसे ही क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले प्रत्येक पदार्थोंके पूर्व और उत्तर क्षणोंमें सर्वथा भेद होनेपर भी
उनमें एकत्वका प्रत्यभिज्ञान क्यों नहीं हो सकता है ? अतः यह सिद्ध हो जाता है कि समस्त पदार्थ क्षणिक
हैं । यहाँ पूर्वकालवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादानकारण और उत्तर क्षणवर्ती क्षणिक पदार्थ उपादेय है । अतएव
दूसरेके अभिप्रायको मानकर 'न तुल्यकालः' इत्यादि कहा है ।
( २ ) उत्तरपक्ष—आपके मतमें स्खलित मोतियोंकी मालाके समान, सर्वथा नाश होनेवाले पूर्वक्षण
उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते समय अपनी उत्पत्तिके क्षणमें ही उत्तरक्षणोंको उत्पन्न करते हैं, अथवा दूसरे क्षणमें
उत्पन्न करते हैं ? अर्थात् पूर्व और उत्तरक्षण एक साथ उत्पन्न होते हैं, या क्रमसे ? पूर्वक्षण और उत्तरक्षण
एक साथ उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि जैसे एक हाथसे दूसरा हाथ पैदा नहीं होता, वैसे ही पूर्वक्षण उत्तर
क्षणको उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि एक ही कालमें होनेवाले दो पदार्थोंमें उपादान-उपादेय भाव नहीं बन
सकता । इसलिये कहा है, 'हेतु और उसका फल दोनों एक साथ नहीं हो सकते' ( न तुल्यकालः फलहेतु-
भावः । ) यदि कहो कि पूर्वक्षण उत्तरक्षणको दूसरे क्षणमें उत्पन्न करता है, तो यह भी नहीं बन सकता ।
क्योंकि पूर्वक्षण सर्वथा विनाशी है, उसका सर्वथा नाश हो जानेसे उससे उत्तरक्षण उत्पन्न नहीं हो सकता ।
अतएव दूसरे क्षणमें उपादानकारण रूप पूर्वक्षणका सर्वथा नाश होनेके पूर्वक्षणसे उत्तरक्षणकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती । यदि उपादानके विना भी उपादेयकी उत्पत्ति होने लगे, तो प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्ति माननी
चाहिये । अतएव 'हेतुके नष्ट हो जानेपर फलका भी अभाव हो जाता हैं' ( हेतौ विलीने न फलस्य भावः )—
यह हमने ठीक कहा है ।
तथा क्षणिकत्व सिद्ध करनेके लिये जो मोक्षाकरगुप्त नामक बौद्धाचार्यने नित्यत्वका खंडन किया है,
उसे स्याद्वादमें अवकाश नहीं है । क्योंकि स्याद्वादी लोग 'निरन्वय विनाशको' छोड़कर बौद्ध मतका ही
समर्थन करते हैं । क्योंकि अनेकान्तवादियोंने भी पर्यायोंकी अपेक्षा प्रतिक्षण नाश स्वीकार किया है । तथा,
आपने जो कहा कि 'जीते हुए देवदत्तको मरा हुआ नहीं कह सकते' उससे भी स्याद्वादियोंको कोई क्षति
नहीं होती । क्योंकि स्याद्वादियोंके अनुसार, प्राणोंके धारण करनेको जीवन, और आयुके अंशोंके नाश होनेको
मरण कहते हैं । अतएव देवदत्तके जीवित दशामें भी प्रत्येक समय उदय आनेवाले आयुके निषेकोंका क्षय
होनेसे मरण होता रहता है । यदि आप लोग कहें कि अन्त अवस्थामें सम्पूर्ण आयुके नाश हो जानेको ही
१. सूत्रविगलितमौक्तिकमालासदृशाः ।