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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 458 में से

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पृष्ठ 197

अन्य. यो. व्य. श्लोक १६ ] स्याद्वादमञ्जरी १४५
च्छेदरूपमेव ज्ञानमुत्पद्यते । न च परिच्छेदादृतेऽन्यद् ज्ञानफलम्, भिन्नाधिकरणत्वात्१ । इति
सर्वथा न प्रत्यक्षाक्षानुमानाभ्यां भिन्नं फलमस्तीति२ ॥"
एतच्च न समीचीनम् । यतो यद्यस्मादेकान्तेनाभिन्नं, तत्तेन सहैवोत्पद्यते । यथा घटेन
घटत्वम् । तैश्च प्रमाणफलयोः कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यते । प्रमाणं कारणं फलं कार्यमिति ।
स चैकान्ताभेदे न घटते । न हि युगपदुत्पद्यमानयोस्तयोः सव्येतरगोविषाणयोरिव कार्यकारण-
भावो युक्तः । नियतप्राक्कालभावित्वात् कारणस्य । नियतोत्तरकालभावित्वात् कार्यस्य । एतद्दे-
वाह न तुल्यकालः फलहेतुभाव इति । फलं कार्यं हेतुः कारणम् तयोर्भावः स्वरूपम्, कार्य-
कारणभावः । स तुल्यकालः समानकालो न युज्यत इत्यर्थः ॥
अथ क्षणान्तरितत्वात् तयोः क्रमभावित्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह । हेतौ विलीने न
फलस्य भाव इति । हेतौ कारणे प्रमाणलक्षणे विलीने क्षणिकत्वादुत्पत्त्यनन्तरमेव निरन्वयं
विनष्टे फलस्य प्रमाणकार्यस्य न भावः सत्ता, निर्मूलत्वात् । विद्यमाने हि फलहेतावस्येदं
फलमिति प्रतीयते नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । किञ्च, हेतुफलभावः सम्बन्धः स च द्विष्ठ एव
स्यात् । न चानयोः क्षणक्षयैकदीक्षितो भवान् सम्बन्धं क्षमते । ततः कथम् 'अयं हेतुरिदं
ज्ञानका फल—कार्य—नहीं है; क्योंकि ज्ञानफलका आश्रय ज्ञान होता है और हानोपादानका अधिकरण ज्ञानसे
भिन्न पुरुष होता है) । इस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणका फल प्रत्यक्ष और अनुमान रूप ज्ञानसे
सर्वथा भिन्न नहीं होता ।"
( १ ) उत्तरपक्ष—यह ठीक नहीं है । क्योंकि जो जिससे एकान्तरूपसे अर्थात् सर्वथा अभिन्न होता है
वह उसीके साथ उत्पन्न होता है । जैसे, घटसे घटत्व सर्वथा अभिन्न होता है, इसलिये घटके साथ घटत्व,
उत्पत्ति होती है । तथा, बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्यकारण सम्बन्ध मानते हैं—प्रमाणको
कारण और प्रमाणके फलको उसका कार्य कहते हैं । यह कार्य-कारण भाव प्रमाण और उसके फलको सर्वथा
अभिन्न माननेमें नहीं बनता । जैसे एक साथ उत्पन्न होनेवाले गायके बांये और दाहिने सींगोंमें कार्य-कारण
सम्बन्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार एक साथ उत्पन्न होनेवाले प्रमाण और फलमें कार्य-कारणभाव उचित
नहीं । क्योंकि कारण नियतरूपसे पहिले, और कार्य नियतरूपसे कारणके उत्तरकालमें होता है । कार्य-कारण-
भाव समान काल वाला नहीं होता । अतएव प्रमाण और प्रमाणका फल सर्वथा अभिन्न नहीं हो सकते ।
शंका—प्रमाण और प्रमाणके फलमें क्षणमात्रका अन्तर पड़ता है, अतएव प्रमाण और प्रमाणका
फल क्रमसे होते हैं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि बौद्ध लोगोंके क्षणिकवादमें प्रत्येक वस्तु एक
क्षणके लिये ठहर कर दूसरे क्षणमें नष्ट हो जाती है, अतएव प्रमाणके क्षणिक होनेके कारण प्रमाण ( कारण )
के उत्पन्न होते ही सर्वथा नष्ट हो जानेसे प्रमाणके फल ( कार्य ) की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कारण
रूप प्रमाणका सर्वथा (निरन्वय) विनाश हो जाता है । कार्यकी उत्पत्ति उसके कारणके रहने पर ही होती
है, अन्यथा नहीं । यदि कारणके विना कार्य उत्पन्न होने लगे, तो अतिप्रसंग हो जायेगा—बीजके विना वृक्षकी
उत्पत्ति माननी होगी । अतएव प्रमाण और प्रमाणके फलमें कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं हो सकता । तथा, प्रमाण
और उसके फलका सम्बन्ध दो पदार्थोंमें ही रहता है । किन्तु क्षण-क्षणमें नाश होनेवाले प्रमाण और प्रमाणके
फलमें कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता । अतएव 'यह हेतु है, और यह उसका फल है' यह निश्चयात्मक ज्ञान
१. हरिभद्रसूरिकृता न्यायप्रवेशवृत्तिः पृ० ३६ ।
२. पार्श्वदेवकृतन्यायप्रवेशवृत्तिपञ्जिकायां—भिन्नमधिकरणमाश्रयो यस्य फलस्य तत्तथा''''अयम्अर्थः ।
ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं यद्युच्यते फलं हानोपानादिकं तदा तत्फलं प्रमातुरेव स्यान्न ज्ञानस्य । तथाहि ज्ञानेन प्रदर्शितेऽर्थे
हानादिकं तद्विषये पुरुषस्यैवोपजायते अतो हानादिकस्य भिन्नाश्रयत्वान्न फलत्वं मन्तव्यं ।
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