स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १६
फलम्' इति प्रतिनियता प्रतीतिः । एकस्य ग्रहणेऽप्यन्यस्याग्रहणे तदसम्भवात् ।
“द्विष्ठसंबन्धसंवित्तिर्नैकस्योपप्रवेदनात् ।
द्वयोः स्वरूपग्रहणे सति संबन्धवेदनम् ॥”१
इति वचनात् ॥
यद्यपि धर्मोत्तरेण “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”२ इति न्याय-
बिन्दुसूत्रं विवृण्वता भणितम्— “नीलनिर्भासं हि विज्ञानं, यतस्तस्माद् नीलस्य प्रतीतिरवसीयते ।
येभ्यो हि चक्षुरादिभ्यो ज्ञानमुत्पद्यते, न तद्वशात् तज्ज्ञानं नीलस्य संवेदनं शक्यतेऽवस्थापयितुं
नीलसदृशं त्वनुभूयमानं नीलस्य संवेदनमवस्थाप्यते । न चात्र जन्यजनकभावनिबन्धनः
साध्यसाधनभावः । येनैकस्मिन् वस्तुनि विरोधः स्यात् । अपि तु व्यवस्थाप्यव्यवस्थापक-
भावेन तत एकस्य वस्तुनः किञ्चिद्रूपं प्रमाणं किञ्चित् प्रमाणफलं न विरुध्यते । व्यवस्थापनहेतु-
र्हिं सारूप्यं तस्य ज्ञानस्य व्यवस्थाप्यं च नीलसंवेदनरूपम्”३ इत्यादि ॥
नहीं हो सकता, क्योंकि प्रमाण और प्रमाणका फल दोनों क्षणिक होनेसे एक साथ नहीं रहते । इसलिये
प्रमाणके फल, और फलके होनेसे प्रमाणका ज्ञान नहीं हो सकता । कहा भी है—
“दो वस्तुओंमें रहनेवाले सम्बन्धका ज्ञान दोनों वस्तुओंके ज्ञान होने पर ही हो सकता है । यदि दोनों
वस्तुओंमेंसे एक वस्तु रहे, तो उस सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता ।”
बौद्ध— “अर्थसारूप्यमस्य प्रमाणम् । तद्वशादर्थप्रतीतिसिद्धेः”—अर्थके साथ होनेवाली समानरूपताके
कारण अर्थनिर्णयकी सिद्धि हो जानेसे अर्थके साथ होनेवाली समानरूपता प्रमाण है—इस न्यायबिन्दुके
सूत्रका विवरण करनेवाले धर्मोत्तरने कहा है— “जिस कारण विज्ञानमें नील ( नील वर्ण पदार्थ ) का
प्रतिभास होता है, उस कारण नीलकी प्रतीति होती है । जिन चक्षु आदि इन्द्रियोंसे ज्ञानकी उत्पत्ति होती
है, उन इन्द्रियोंके अधीन होनेसे इन्द्रियजन्य वह ज्ञान 'नील पदार्थका यह ज्ञान है' इस प्रकार संवेदन नहीं
कर सकता, किन्तु अनुभूयमान नील ( पदार्थके ) सदृश ज्ञान ( नीलाकार ज्ञान ) नील पदार्थका ज्ञान है,
ऐसा संवेदन किया जाता है । यहाँ प्रमाण और प्रमाणके फलमें जन्य-जनकभाव ( कार्य-कारणभाव ) जिसका
कारण है ऐसा साध्य-साधनभाव नहीं है, जिससे एक वस्तुमें विरोध उत्पन्न हो; किन्तु यहाँ व्यवस्थाप्य-
व्यवस्थापक ( निश्चय-निश्चायक ) रूपसे साध्य-साधनभाव है । इसलिये एक वस्तुका किंचित् प्रमाणरूप होनेमें
और किंचित् प्रमाणफलरूप होनेमें विरोध नहीं आता । सारूप्य उस ज्ञान ( नील पदार्थका ज्ञान ) का निश्चय
करनेमें हेतु है और नील पदार्थका ज्ञान व्यवस्थाप्य ( निश्चेय ) ।” स्पष्टार्थ—बौद्ध लोग प्रमाण और प्रमिति-
को अभिन्न मानते हैं । उनके मतमें जिस ज्ञानसे ( प्रत्यक्ष, अनुमान ) पदार्थ जाने जाते हैं, वही ज्ञान प्रमाण
और प्रमिति दोनों रूप होता है । बौद्ध लोगोंने पदार्थोंमें प्रवृत्ति करनेवाले संशय और विपर्यय रहित प्रापक
ज्ञानको प्रमाण माना है । जिस प्रापण शक्तिसे ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होनेपर भी प्रापक होता है, वही प्रमाणका
फल है । अतएव जिस ज्ञानसे अर्थकी प्रतीति होती है, उसी ज्ञानसे अर्थका दर्शन होता है, इसलिये ज्ञान
प्रमाण और प्रमिति दोनों रूप है ( तदेव च प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रमाणफलमर्थप्रतीतिरूपत्वात् ) । शंका—यदि
ज्ञान प्रमिति रूप होनेसे प्रमाणका फल है, तो प्रमाण किसे कहते हैं ? उत्तर—ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होता है,
और पदार्थोंके आकार रूप होकर पदार्थोंको जानता है, इसलिये ज्ञान प्रमाण है। हमारे ( बौद्ध ) मतके अनुसार
ज्ञान इन्द्रिय आदिकी सहायतासे पदार्थोंको नहीं जानता । किन्तु नील घटको जानते समय नील घटसे उत्पन्न
१. कारिकेयं तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके, पृ० ४२१ उद्धृता ।
२. न्यायबिन्दौ १-१९, २० ।
३. न्यायबिन्दौ १-२० स्वोपज्ञटीकायां ।