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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

इस प्रत्यनुमानसे बाधित है । इसलिये ज्ञानको स्वसंवेदक ही मानना चाहिये ।`

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(२) यह अनुमान व्यर्थविशेष्य भी है, क्योंकि यहां 'ईश्वरज्ञानान्यत्व' हेतुके विशेष्य 'प्रमेयत्व' हेतुके कहनेसे

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कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । (३) उक्त हेतु अप्रयोजक होनेसे सोपाधिक भी है । क्योंकि 'स्वान्य-

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प्रकाश्यं ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति, प्रमेयत्वात्' यह तर्क ज्ञानके साथ व्याप्त न हो कर जड़ पदार्थोंके साथ व्याप्त

Line 34:
है, क्योंकि ईश्वरज्ञानसे भिन्न हो कर प्रमेय होनेपर भी स्तंभ वगैरह जड़ पदार्थ ही अपनेको छोड़ कर

Line 35:
दूसरेसे प्रकाशित होते हैं ।

Line 36:
अब अविद्या अथवा मायाके कारण तीनों लोकोंके वस्तु-प्रपंचको अपारमार्थिक स्वीकार करनेवाले

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ब्रह्माद्वैतवादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—

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श्लोकार्थ—यदि माया सत् रूप है, तो ब्रह्म और माया दो पदार्थोंका सद्भाव होनेसे अद्वैतकी सिद्धि

Everything is verified and matches

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी १११
तैर्वादिभिस्तात्त्विकात्मब्रह्मव्यतिरिक्ता या माया-अविद्या प्रपञ्चहेतुः परिकल्पिता, सा
सद्रूपा असद्रूपा वा द्वयी गतिः। सती-सद्रूपा चेत् तदा द्वयतत्त्वसिद्धिः—द्वाववयवौ यस्य तद्
द्वयं, तथाविधं यत् तत्त्वं परमार्थः, तस्य सिद्धिः। अयमर्थः। एकं तावत् त्वदभिमतं तात्त्वि-
कमात्मब्रह्म, द्वितीया च माया तत्त्वरूपा सद्रूपतयाऽङ्गीक्रियमाणत्वात्। तथा चाद्वैतवादस्य
मूले निहितः कुठारः। अथेति पक्षान्तरद्योतने। यदि असती-गगनाम्भोजवद्वस्तुरूपा सा
माया, ततः हन्त इत्युपदर्शने आश्चर्यं वा। कुतः प्रपञ्चः। अयं त्रिभुवनोदरविवरवर्तिपदार्थ-
सार्थरूपः प्रपञ्चः कुतः ? न कुतोऽपि संभवतीत्यर्थः। मायाया अवस्तुत्वेनाभ्युपगमात् अवस्तु-
नश्च तुरङ्गशृङ्गस्येव सर्वोपाख्याविरहितस्य साक्षात्क्रियमाणेद्दशविवर्तजननेऽसमर्थत्वात्।
किलेन्द्रजालादौ मृगतृष्णादौ वा मायोपदर्शितानामर्थक्रियायामसामर्थ्यं दृष्टम् अत्र तु तदु-
पलम्भात् कथं मायाव्यपदेशः श्रद्धीयताम्। अथ मायापि भविष्यति, अर्थक्रियासमर्थपदार्थो-
पदर्शनक्षमा च भविष्यति इति चेत्, तर्हि स्ववचनविरोधः। न हि भवति माता च वन्ध्या
चेति। एनमेवार्थं हृदि निधायोत्तरार्धमाह। मायैव चेदित्यादि। अत्रैवकारोऽप्यर्थः। अपि च
समुच्चयार्थः। अग्रेतनचकारश्च तथा। उभयोश्च समुच्चयार्थयोर्योगपद्यद्योतकत्वं प्रतीतमेव।
यथा रघुवंशे “ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः”१। इति तदयं वाक्यार्थः माया च भवि-
ष्यति अर्थसहा च भविष्यति। अर्थसहा-अर्थक्रियासमर्थपदार्थोपदर्शनक्षमा। चेच्छब्दोऽत्र
योज्यते, इति चेत्, एवं परमाशङ्क्य तस्य स्ववचनविरोधमुद्भावयति। तत् किं भवत्परेषां
माता च वन्ध्या च। किमिति-संभावने। संभाव्यत एतत्-भवतो ये परे-प्रतिपक्षाः,
तेषां भवत्परेषां भवद्व्यतिरिक्तानां, भवदाज्ञापृष्ठग्भूतत्वेन तेषां वादिनां, यन्माता च
भविष्यति, वन्ध्या च भविष्यतीत्युपहासः। माता हि प्रसवधर्मिणी वनितोच्यते। वन्ध्या च
तद्विपरीता। ततश्च माता चेत्कथं वन्ध्या, वन्ध्या चेत्कथं माता तदेवं। मायाया अवास्तव्या
अप्यर्थसहत्वेऽङ्गीक्रियमाणे, प्रस्तुतवाक्यवत् स्पष्ट एव स्ववचनविरोधः। इति समासार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। ते वादिन इदं प्रणिगदन्ति। तात्त्विकमात्मब्रह्मैवास्ति—
नहीं हो सकती। यदि माया असत् है, तो तीनों लोकोंके पदार्थोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदि कहो कि
माया माया भी होकर अर्थक्रिया करती है, तो जैसे एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती,
वैसे ही मायामें भी एक साथ दो विरोधी गुण नहीं रह सकते।
व्याख्यार्थ—ब्रह्माद्वैतवादियोंने जो तत्त्वरूप ब्रह्मात्मसे भिन्न माया (अविद्या) को प्रपंचका
कारण स्वीकार किया है, वह माया सत् रूप है, या असत् रूप ? यदि माया सत् है, तो ब्रह्म और माया दो
पदार्थोंके अस्तित्व होनेसे अद्वैतकी सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि अद्वैतवादियोंने एक आत्मा (ब्रह्म) को
ही सत् पदार्थ स्वीकार किया है, इसलिये यदि माया भी सत् हो, तो अद्वैतके मूलमें ही कुठाराघात होता है।
यदि मायाको आकाशके पुष्प की तरह अवस्तु स्वीकार करो, तो संसारके किसी भी पदार्थकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती। क्योंकि मायाके अवस्तु होनेसे घोड़ेके सींगकी तरह वह प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर होनेवाले प्रपंचको
उत्पन्न नहीं कर सकती। इन्द्रजाल तथा मृगतृष्णा आदिमें मायाद्वारा दिखाये जानेवाले पदार्थ अर्थक्रिया नहीं
करते। परन्तु समस्त पदार्थोंमें अर्थक्रिया देखनेमें आती है, अतएव इन पदार्थोंमें मायाका व्यवहार नहीं हो
सकता। यदि आप कहें कि माया माया भी है, और वह अर्थक्रिया भी करती है, यह ठीक नहीं। क्योंकि
इसमें स्ववचन विरोध आता है। जिस प्रकार एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती, वैसे ही
माया भी माया (अवस्तु) होकर अर्थक्रिया (वस्तु) नहीं कर सकती। यह संक्षिप्त अर्थ है।
यहाँ विस्तृत अर्थ दिया जाता है।
वेदान्ती—हमारे मतसे तत्त्व रूप एक ब्रह्म ही सत् है। शास्त्रोंमें कहा भी है—
१ अव्याक्षेपो भविष्यन्त्याः कार्यसिद्धेर्हि लक्षणम्। इत्युत्तरार्धम्। रघुवंशे १०-६।

११२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
“सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तत्पश्यति कश्चन” ॥
इति समयात् । अयं तु प्रपञ्चो मिथ्यारूपः, प्रतीयमानत्वात् । यदेवं तदेवम् । यथा शुक्तिकशकले
कलधौतम् । तथा चायं, तस्मात् तथा ॥
तदेतद्वार्तम् । तथाहि । मिथ्यारूपत्वं तैः कीदृग् विवक्षितम् । किमत्यन्तासत्त्वम्,
उतान्यस्यान्याकारतया प्रतीतत्वम्, आहोस्विदनिर्वाच्यत्वम् ? प्रथमपक्षे ऽसत्ख्यातिप्रसङ्गः ।
द्वितीये विपरीतख्यातिस्वीकृतिः । तृतीये तु किमिद‌मनिर्वाच्यत्वम् ? निःस्वभावत्वं चेत्, निसः
प्रतिषेधार्थत्वे, स्वभावशब्दस्यापि भावाभावयोरन्यतरार्थत्वे, असत्ख्यातिसत्ख्यात्यभ्युपगम-
प्रसङ्गः । भावप्रतिषेधे असत्ख्यातिः, अभावप्रतिषेधे सत्ख्यातिरिति । प्रतीत्यगोचरत्वं निःस्व-
भावत्वमिति चेत् । अत्र विरोधः । स प्रपञ्चो हि न प्रतीयते चेत् कथं धर्मितयोपात्तः । कथं च
प्रतीयमानत्वं हेतुतयोपात्तम् । तथोपादाने वा कथं न प्रतीयते । यथा प्रतीयते न तथेति चेत्,
तर्हि विपरीतख्यातिरिय‌मभ्युपगता स्यात् ॥
“यह सब ब्रह्मका ही स्वरूप है, इसमें नाना रूप नहीं हैं । ब्रह्मके प्रपंचको सब लोग देखते है, परन्तु
ब्रह्मको कोई नहीं देखता ।”
तथा, ‘यह प्रपंच मिथ्या है, क्योंकि यह प्रतीतिका विषय है । जो प्रतीतिका विषय होता है, वह
मिथ्या रूप होता है । जैसे सीपके टुकड़ेमें प्रतीत होनेवाला चाँदी मिथ्या रूप होती है । उसी तरह यह प्रपंच
प्रतीत होता है, इसलिये यह मिथ्या रूप है ।’
जैन—यह ठीक नहीं है । आप लोगोंने जो दृश्यमान प्रपंचको मिथ्या कहा है, सो आपका मिथ्यात्वसे
क्या अभिप्राय है ? (१) यदि वंध्या के पुत्रकी तरह अत्यंत असत्त्वको मिथ्यात्व कहते हो तो असत्ख्याति दोष
आता है । ( शून्यवादी बौद्धोंके अनुसार समस्त पदार्थोंका ज्ञान मिथ्या है, क्योंकि समस्त पदार्थ असत्
हैं । अतएव जब हमें सीपमें चांदीका ज्ञान होता है, उस समय असत् रूप चांदी सत् रूपमें प्रतिभासित
होती है । अतएव विपरीत ज्ञानका विषय सर्वथा असत् है । क्योंकि असत् पदार्थोंको सत् रूप
देखना ही विपरीत ज्ञान है । असत्ख्याति-वादियोंके मतमें पदार्थ और पदार्थका ज्ञान दोनों ही असत्
हैं । परन्तु वेदान्तो शून्यवादियोंकी असत्ख्यातिको स्वीकार नहीं करते । ) (२) यदि एक पदार्थके
दूसरे रूपमें प्रतिभासित होनेको मिथ्या कहो तो विपरीतख्याति दोष आता है । ( नैयायिक आदि मतके
अनुसार जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय सीप चाँदीके रूपमें प्रतिभासित होती है,
इसलिये एक पदार्थको दूसरे पदार्थके रूपमें जानना ही मिथ्या है, वास्तवमें सीप अथवा चाँदीमें कोई मिथ्यापन
नहीं । इस विपरीत अथवा अन्यथाख्यातिमें दो पदार्थोंके सद्भाव ( द्वैत ) होनेके कारण वेदान्ती इसे भी
स्वीकार नहीं करते ) । (३) यदि अनिर्वचनीयत्व अर्थात् निस्स्वभावत्वको मिथ्यात्व कहो तो ‘निस्स्वभावत्व’
में स्वभाव शब्दका अर्थ क) ‘भाव’ लिया जाय तो असत्ख्याति दोष आता है ( परन्तु यह असत्ख्याति
वेदान्तियों को मान्य नहीं है ) । (ख) यदि स्वभावका अर्थ ‘अभाव’ किया जाय, तो सत्ख्याति दोष आता
है । ( रामानुजका सिद्धांत है कि जब सीपमें चांदीका मिथ्या ज्ञान होता है, उस समय इस मिथ्या ज्ञानका
विषय मिथ्या नहीं होता, क्योंकि सीपमें चाँदीके परमाणु मिले रहते हैं, इसीलिये सीपमें चाँदीका ज्ञान होता
है । परन्तु यह सत्ख्याति भी वेदान्तियोंको मान्य नहीं है ) । (ग) यदि दृश्यमान प्रपंचके ज्ञानके विषय न
होनेको निस्स्वभाव कहो तो ‘अर्थप्रपंचः मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्’ इस अनुमानमें जब प्रपंच प्रतीत ही नहीं
होता तो ‘प्रपंच’ को पक्ष नहीं बना सकते । तथा प्रपंचके ज्ञानका विषय न होनेसे ‘प्रतीयमानत्व’ हेतु भी
१. छांदोग्य उ. ३–१४ ।
२. आत्मख्यातिर‌सत्ख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनख्यातिरित्युक्तख्यातिपञ्चकम् ॥ षड्विधाः ख्यातिरित्त्यन्ये मन्यन्ते ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११३
किञ्च, इयमानर्वाच्यता प्रपञ्चस्य प्रत्यक्षबाधिता। घटोऽयमित्याद्याकारं हि प्रत्यक्षं
प्रपञ्चस्य सत्यतामेव व्यवस्यति, घटादिप्रतिनियतपदार्थपरिच्छेदात्मनस्तस्योत्पादात्। इतरेतर-
विविक्तवस्तूनामेव च प्रपञ्चशब्दवाच्यत्वात्। अथ प्रत्यक्षस्य विधायकत्वात् कथं प्रतिषेधे
सामर्थ्यम्। प्रत्यक्षं हि इदमिति वस्तुस्वरूपं गृह्णाति, नान्यत्स्वरूपं प्रतिषेधति।
“आहुर्विधातृ प्रत्यक्षं न निषेद्धृ विपश्चितः।
नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण प्रबाध्यते” ॥
इति वचनात्। इति चेत्। न। अन्यरूपनिषेधमन्तरेण तत्स्वरूपपरिच्छेदस्याप्यसंपत्तेः।
पीताद्यवच्छिन्नं हि नीलं नीलमिति गृहीतं भवति, नान्यथा। केवलवस्तुस्वरूपप्रतिपत्ते
रेवान्यप्रतिषेधप्रतिपत्तिरूपत्वात्, मुण्डभूतलग्रहणे घटाभावग्रहणवत्। तस्माद् यथा प्रत्यक्षं
विधायकं प्रतिपन्नं, तथा निषेधकमपि प्रतिपत्तव्यम्। अपि च, विधायकमेव प्रत्यक्षमित्यङ्गी-
कृते, यथा प्रत्यक्षेण विद्या विधीयते, तथा किं नाविद्यापीति। तथा च द्वैतापत्तिः। ततश्च
सुव्यवस्थितः प्रपञ्चः। तदमी वादिनोऽविद्याविवेकेन सन्मात्रं प्रत्यक्षात् प्रतियन्तोऽपि न
निषेधकं तदिति ब्रुवाणाः कथं नोन्मत्ताः। इति सिद्धं प्रत्यक्षबाधितः पक्ष इति॥
अनुमानबाधितश्च। प्रपञ्चो मिथ्या न भवति, असद्विलक्षणत्वात्, आत्मवत्। प्रतीय-
मानत्वं च हेतुर्ब्रह्मात्मना व्यभिचारी। स हि प्रतीयते, न च मिथ्या। अप्रतीयमानत्वे त्वस्य
नहीं बन सकता। तथा प्रतीयमानत्व हेतुके होनेसे प्रपंचको प्रतीयमान होना चाहिये। (घ) यदि कहो कि
प्रपंच जैसा है, वैसा प्रतीत नहीं होता-यही निस्स्वभावत्वका अर्थ है, तो इसे स्वीकार करनेमें विपरीत ख्याति
ही माननी पड़ेगी, जिसे मायावादी स्वीकार नहीं करते।
तथा प्रपंचकी यह अनिर्वाच्यता ( निस्स्वभावता ) प्रत्यक्षसे बाधित है। 'यह घट है' इत्यादि रूप
प्रत्यक्ष, प्रपंच की सत्यताका निश्चय करता है, क्योंकि घटादि रूप निश्चित पदार्थको जाननेवाले के रूपमें
उसकी उत्पत्ति होती है। तथा, इतरेतर भिन्न पदार्थ ही प्रपंच शब्दके वाच्य हैं। शंका-प्रत्यक्ष विधायक
है, अतएव प्रतिषेध करनेकी सामर्थ्य उसमें कैसे हो सकती है ? प्रत्यक्ष, 'यह है' इस प्रकार वस्तुके स्वरूप
को जानता है, दूसरे स्वरूपका प्रतिषेध वह नहीं करता। कहा भी है-
"प्रत्यक्ष विधायक है, निषेधक नहीं, अतएव एकत्वका प्रतिपादन करनेवाला आगम प्रत्यक्षसे बाधित
नहीं हो सकता।"
समाधान-यह ठीक नहीं है। क्योंकि अन्य स्वरूपके निषेधके बिना, वस्तु-स्वरूपका ज्ञान नहीं हो
सकता। जैसे, पीत आदि वर्णवाले पदार्थसे भिन्न नील वर्णवाला पदार्थ, 'यह नील वर्ण है' इस प्रकार जाना
जाता है, अन्य प्रकारसे नहीं। शून्य भूतलका ज्ञान होने पर जिस प्रकार घटके अभावका ज्ञान होता है, उसी
प्रकार केवल वस्तुस्वरूपका ग्रहण ही अन्यका प्रतिषेध रूप ग्रहण होता है। अतएव जिस प्रकार प्रत्यक्षको
विधायक माना है, उसी प्रकार उसे निषेधक भी मानना चाहिये। तथा, यदि प्रत्यक्षको केवल विधायक ही
माना जाय तो जिस प्रकार प्रत्यक्ष द्वारा विद्याका विधान किया जाता है, वैसे ही उसीके द्वारा अविद्याका
विधान भी क्यों नहीं माना जाता ? यदि प्रत्यक्षको अविद्याका भी विधायक माना जाय, तो विद्या और
अविद्या, ब्रह्म और जगत्-इन दो पदार्थोंके होनेसे द्वैतका प्रसंग उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार प्रपंच
सुव्यवस्थित है। अतएव जब ब्रह्माद्वैतवादी, प्रत्यक्षसे अविद्याका निषेध करके प्रत्यक्षको सन्मात्रग्राही मानने
पर भी, उसे निषेधक नहीं स्वीकार करते, तो उन्हें उन्मत्त क्यों न कहा जाये ? इस प्रकार 'प्रपंच मिथ्यारूप
है'-यह पक्ष प्रत्यक्षसे बाधित है, यह सिद्ध हो जाता है।
तथा, 'प्रपञ्चो मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्', यह पक्ष 'प्रपञ्चो मिथ्या न भवति असद्विलक्षणत्वात्
आत्मवत्' इस अनुमानसे बाधित है। (अर्थात् जिस प्रकार ब्रह्मरूप आत्मा असत् से भिन्न होने से मिथ्यारूप
नहीं है, उसी प्रकार प्रपंच भी असत् से भिन्न होने पर भी मिथ्यारूप नहीं)। यहाँ, प्रतीयमानत्व हेतु
१५

११४ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
तद्विषयवचसामप्रवृत्तेर्मूकतैव तेषां श्रेयसी । साध्यविकलश्च दृष्टान्तः । शुक्तिशकलकलधौतेऽपि
प्रपञ्चान्तर्गतत्वेन अनिर्वचनीयतायाः साध्यमानत्वात् । किञ्च, इदमनुमानं प्रपञ्चाद् भिन्नम्
अभिन्नं वा ? यदि भिन्नं, तर्हि सत्यमसत्यं वा ? यदि सत्यं, तर्हि तद्वदेव प्रपञ्चस्यापि सत्यत्वं
स्यात् । अद्वैतवादप्राकारे खण्डिपातात् । अथासत्यम् , तर्हि न किञ्चित् तेन साधयितुं शक्यम्,
अवस्तुत्वात् । अभिन्नं चेत्, प्रपञ्चस्वभावतया तस्यापि मिथ्यारूपत्वापत्तिः । मिथ्यारूपं च
तत् कथं स्वसाध्यसाधनायालम् । एवं प्रपञ्चस्यापि मिथ्यारूपत्वासिद्धेः कथं परब्रह्मणस्ता-
त्त्विकत्वं स्यात् यतो बाह्यार्थाभावो भवेदिति ।।
अथवा प्रकारान्तरेण सन्मात्रलक्षणस्य परब्रह्मणः साधनं दूषणं चोपन्यस्यते । ननु
परब्रह्मण एवैकस्य परमार्थसतो विधिरूपस्य विद्यमानत्वात् प्रमाणविषयत्वम् । अपरस्य
द्वितीयस्य कस्यचिदप्यभावात् । तथाहि । प्रत्यक्षं तदावेदकमस्ति । प्रत्यक्षं द्विधा भिद्यते
निर्विकल्पकसविकल्पकभेदात् । ततश्च निर्विकल्पकप्रत्यक्षात् सन्मात्रविषयात् तस्यैकस्यैव
सिद्धिः । तथा चोक्तम्—
“अस्ति ह्यालोचनाज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम् ।
बालमूकादिविज्ञानसदृशं शुद्धवस्तुजम्”॥¹
न च विधिवत् परस्परव्यावृत्तिरप्यध्यक्षत एव प्रतीयते इति द्वैतसिद्धिः । तस्य निषेधा-
ब्रह्मात्मरूप विपक्ष में रहता है, अतएव व्यभिचारी है । क्योंकि ब्रह्मात्मा प्रतीयमान है, परन्तु मिथ्या नहीं
है । यदि ब्रह्मको अप्रतीयमान मानो तो ब्रह्मके विषयमें वचनोंकी प्रवृत्ति न होनेसे मौन रहना ही श्रेयस्कर
होगा । तथा, ‘सीपमें चाँदी' (शुक्तिशकले कलधौतं) का जो दृष्टान्त दिया गया है, वह 'प्रपंच मिथ्यारूप'
साध्यमें नहीं रहता, इसलिये साध्यविकल है । क्योंकि सीप और चाँदी दोनों ही प्रपंचके अन्तर्भूत हैं, इसलिये
उनका अनिर्वचनीयत्व (मिथ्यारूपता) साध्यमान ही है—सिद्ध नहीं है (जो दृष्टान्त दिया जाता है, वह
सिद्ध होता है, असिद्ध नहीं। इसे अनुपसंहारी हेत्वाभास भी कहते हैं) । तथा, आपका अनुमान 'यह प्रपंच
मिथ्यारूप है प्रतीयमान होनेसे' प्रपंचसे भिन्न है, या अभिन्न ? यदि भिन्न है, तो सत्य है, या असत्य ? यदि
अनुमान प्रपंचसे भिन्न होकर सत्य है, तो अनुमानके समान प्रपंच भी सत्य होना चाहिये । तथा, प्रपंचकी
सत्यता स्वीकार करनेमें अद्वैतरूपी प्राकारपर कुठाराघात होता है । यदि अनुमान असत्य है, तो वह
अवस्तु होनेसे साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता । यदि अनुमान प्रपंचसे अभिन्न है, तो प्रपंचरूप होनेसे अनु-
मान भी मिथ्यारूप होना चाहिये, और मिथ्यारूप अनुमान साध्यकी सिद्धि नहीं कर सकता । इस प्रकार जब
प्रपंच मिथ्यारूप सिद्ध नहीं हो सकता, तो परब्रह्मकी तात्त्विकता भी सिद्ध नहीं हो सकती, जिससे बाह्य
पदार्थोंका अभाव सिद्ध हो सके ।
अथवा प्रकारान्तरसे सत्तामात्र रूप परब्रह्मके साधन और दूषणका उपन्यास किया जाता है ।
वेदान्ती—वास्तवमें एकमात्र परमार्थ सत् विधिरूप ब्रह्म विद्यमान होनेसे प्रमाणका विषय है, क्योंकि वह
परमार्थ सत् विधिरूप किसी भी दूसरे पदार्थका अभाव है । तथाहि—प्रत्यक्ष एक परमार्थ सत् विधिरूप
ब्रह्मको जानता है । यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक और सविकल्पकके भेदसे दो प्रकारका है । सन्मात्रको जाननेवाले
निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे एकमात्र ब्रह्मकी सिद्धि होती है । कहा भी है—
“चक्षुके सन्निपातके अनन्तरवर्ती और सविकल्पक ज्ञानके पूर्ववर्ती तथा शुद्ध वस्तु अर्थात् सामान्य-
विशेष रहित वस्तुको जाननेवाला बालक और गूँगेके ज्ञानके समान, ऐसे इन्द्रियज्ञान का सद्भाव है ।”
विधिके समान घट, पट पदार्थोंकी परस्पर व्यावृत्तिका ज्ञान भी प्रत्यक्षसे ही होता है, अतएव द्वैतकी
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ४ प्रत्यक्षसूत्रे ११२ ।

विषयत्वात् । “आहुर्विधातृ प्रत्यक्षं न निषेद्धृ” इत्यादिवचनात् । यच्च सविकल्पकप्रत्यक्षं
घटपटादिभेदसाधकं, तदपि सत्तारूपेणान्वितानामेव तेषां प्रकाशकत्वात् सत्ताऽद्वैतस्यैव
साधकम् । सत्तायाश्च परब्रह्मरूपत्वात् । तदुक्तम्- "यदद्वैतं तद् ब्रह्मणो रूपम्" इति ॥
अनुमानादपि तत्सद्भावो विभाव्यत एव । तथाहि । विधिरेव तत्त्वं, प्रमेयत्वात् । यतः
प्रमाणविषयभूतोऽर्थः प्रमेयः । प्रमाणानां च प्रत्यक्षानुमानागमोपमानार्थापत्तिसंज्ञकानां
भावविषयत्वेनैव प्रवृत्तेः । तथा चोक्तम्—
“प्रत्यक्षाद्यवतारः स्याद् भावांशो गृह्यते यदा ।
व्यापारस्तदनुत्पत्तेरभावांशे जिघृक्षिते” ॥
यच्चाभावाख्यं प्रमाणं तस्य प्रामाण्याभावाद् न तत् प्रमाणम् । तद्विषयस्य कस्यचिद-
प्यभावात् । यस्तु प्रमाणपञ्चकविषयः स विधिरेव । तेनैव च प्रमेयत्वस्य व्याप्तत्वात् । सिद्धं
प्रमेयत्वेन विधिरेव तत्त्वम्, यत्तु न विधिरूपं, तद् न प्रमेयम्, यथा खरविषाणम् । प्रमेयं चेदं
निखिलं वस्तुतत्त्वम्, तस्माद् विधिरूपमेव । अतो वा तत्सिद्धिः । ग्रामारामादयः पदार्थाः
प्रतिभासान्तःप्रविष्टाः, प्रतिभासमानत्वात्, यत्प्रतिभासते तत्प्रतिभासान्तःप्रविष्टम्, यथा
प्रतिभासस्वरूपम् । प्रतिभासन्ते च ग्रामारामादयः पदार्थाः, तस्मात् प्रतिभासान्तःप्रविष्टाः ॥
आगमोऽपि परब्रह्मरण एव प्रतिपादकः समुपलभ्यते— “पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं
सिद्धि नहीं होती । क्योंकि "प्रत्यक्षको विधायक कहते हैं, निषेधक नहीं"—इस वचनके अनुसार, निषेध
प्रत्यक्षका विषय नहीं होता । तथा, घट, पट आदिके विकल्प ( भेद ) को ग्रहण करनेवाला सविकल्पक
प्रत्यक्ष भी सत्तारूप से अन्वित घट, पट आदिको ही जानता है, इसलिये सविकल्पक प्रत्यक्ष भी सत्ता
अद्वैतका ही साधक है । क्योंकि सत्ता परब्रह्म रूप है । कहा भी है— “जो अद्वैत है वही ब्रह्मका स्वरूप है"
अनुमान प्रमाणसे भी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध होता ही है । तथाहि—'विधि ( अर्थात् परब्रह्म )
ही तत्त्व ( परमार्थभूत पदार्थ ) है, प्रमेय होनेसे' । प्रमाणके विषयभूत अर्थको प्रमेय कहते हैं । प्रत्यक्ष,
अनुमान, आगम, उपमान और अर्थापत्ति नामसे कहे जानेवाले प्रमाण पदार्थोंको अपना विषय बनाकर प्रवृत्त
होते हैं । कहा भी है—
“जब वस्तुके भावांशको ग्रहण किया जाता है, तब प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंकी उपस्थिति होती है, तथा
वस्तुके अभाव अंशको जाननेकी इच्छा होनेपर प्रत्यक्ष आदिके अभावकी प्रवृत्ति होती है ।” ( मीमांसक
वस्तुको सदसदात्मक मानते हैं, अर्थात् उनके अनुसार, वस्तु भावांश और अभाव-अंशसे युक्त होती है ) ।
तथा, अभाव नामक प्रमाणमें प्रामाण्यका अभाव होनेसे ( प्रमितिका साधकतम साधन न होनेके
कारण ), वह प्रमाण नहीं है, क्योंकि उसके विषयभूत किसी भी पदार्थका अस्तित्व नहीं है, अर्थात् उसका
कोई भी विषय नहीं है । प्रत्यक्ष आदि पांचों प्रमाणों का जो विषय है वह विधिरूप ही है । प्रमेयत्व उस
विधि से व्याप्त है । अतएव प्रमेयत्व होनेसे विधि ही तत्त्वरूपसे सिद्ध है । जो विधिरूप नहीं है, वह प्रमेय
भी नहीं है, जैसे गधेके सींग । यह सम्पूर्ण वस्तुतत्त्व प्रमेयरूप है, इसलिये वह विधिरूप ही है । अथवा,
'गांव, बगीचा आदि पदार्थ प्रतिभासमें गर्भित हो जाते हैं, प्रतिभासका विषय होनेसे । जो प्रतिभासका
विषय है, वह प्रतिभासमें गर्भित हो जाता है, जैसे प्रतिभासका स्वरूप । गांव, बगीचे आदि प्रतिभासित
होते हैं, इसलिये वे प्रतिभासके ही भीतर आ जाते हैं'—इस अनुमानसे भी ब्रह्मकी सिद्धि होती है ।
आगम भी ब्रह्मका प्रतिपादन करता है । जैसे, “जो हुआ है, जो होगा; जो अमृतका अधिष्ठाता है,
आहारसे वृद्धिको प्राप्त होता है ।” “जो गतिमान है, स्थिर है, दूर है, पास है, चेतन और अचेतन सबमें
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ५ अभावपरिच्छेदे १७ ।

११६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।" १ "तदेजति, तन्नैजति, यद् दूरे,
यदन्तिके। यदन्तरस्य सर्वस्य यदुत सर्वस्यास्य बाह्यतः"२ इत्यादिः । "श्रोतव्यो मन्तव्यो
निदिध्यासितव्यः अनुमन्तव्यः" ३ इत्यादिवेदवाक्यैरपि तत्सिद्धेः । कृत्रिमेणापि आगमेन
तस्यैव प्रतिपादनात् । उक्तं च—
“सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म४ नेह नानाऽस्ति किञ्चन ।
आरामं तस्य पश्यन्ति न तन् पश्यति कश्चन”६ ॥
इति प्रमाणतस्तस्यैव सिद्धेः । परमपुरुष एक एव तत्त्वम्, सकलभेदानां तद्विवर्तत्वात् ।
तथाहि । सर्वे भावा ब्रह्मविवर्ताः सत्त्वैकरूपेणान्वितत्वात् । यद् यद्रूपेणान्वितं तत् तदात्म-
कमेव । यथा घटघटीशरावोदञ्चनादयो मृद्रूपेणैकेनान्विता मृद्विवर्ताः । सत्त्वैकरूपेणान्वितं
च सकलं वस्तु । इति सिद्धं ब्रह्मविवर्तित्वं निखिलभेदानामिति ॥
तदेतत् सर्वं मदिरास्वादगद्गदोद्गदितमिवाभासते, विचारासहत्वात् । सर्वं हि
वस्तु प्रमाणसिद्धं न तु वाङ्मात्रेण । अद्वैतमते च प्रमाणमेव नास्ति, तत्सद्भावे द्वैतप्रसङ्गात् ।
अद्वैतसाधकस्य प्रमाणस्य द्वितीयस्य सद्भावात् । अथ मतम् लोकप्रत्यायनाय तदपेक्षया
प्रमाणमप्यभ्युपगम्यते । तदसत् । तन्मते लोकस्यैवासम्भवात्, एकस्यैव नित्यनिरंशस्य
परब्रह्मण एव सत्त्वात् ॥
अथास्तु यथाकथञ्चित् प्रमाणमपि तत्किं प्रत्यक्षमनुमानमागमो वा तत्साधकं
प्रमाणमुररीक्रियते । न तावत् प्रत्यक्षम् । तस्य समस्तवस्तुजातगतभेदस्यैव प्रकाशकत्वात् ।
व्याप्त है और सबके बाह्य है, वह सब ब्रह्म ही है" आदि । तथा, "अतएव ऐसे ब्रह्मको सुनना, मनन करना,
निरन्तर स्मरण करना, और पुनः पुनः मनन करना चाहिये," आदि वेदके वाक्योंसे ब्रह्मकी सिद्धि होती है।
स्मृति आदि पौरुषेय आगम भी ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं। कहा भी है—
यह सब ब्रह्मका ही स्वरूप है, ब्रह्मको छोड़ कर नाना रूप कुछ नहीं है। ब्रह्मकी पर्यायोंको सब देखते
हैं, परन्तु ब्रह्म किसीको दिखाई नहीं देता ।
इस प्रकार परब्रह्मके प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमसे सिद्ध होनेपर परब्रह्म ही एक तत्त्व सिद्ध होता
है; दृश्यमान सम्पूर्ण भेद इस ब्रह्मकी ही पर्याय हैं। अतएव 'सम्पूर्ण पदार्थ ब्रह्मकी पर्याय हैं, क्योंकि संपूर्ण
पदार्थ सत्तात्मक एक रूप से अन्वित हैं। जो जिस रूपसे अन्वित होता है, वह उसी रूप होता है जैसे घट,
घटी, शराव आदि मिट्टीके बर्तन मिट्टीके एक स्वरूपसे अन्वित हैं, इसलिये सब मिट्टी की पर्याय हैं। सम्पूर्ण
पदार्थ एक सत्ता स्वरूपसे अन्वित हैं, इसलिये सम्पूर्ण पदार्थ एक ब्रह्मकी ही पर्याय हैं' ।
जैन—यह कथन मद्यपायीके प्रलापके समान प्रतीत होता है, क्योंकि यह कथन विचार को सह्य
नहीं है। सभी वस्तुओं की सिद्धि प्रमाणसे होती है, केवल कथनमात्रसे नहीं । तथा, अद्वैतवादियोंके मतमें
कोई प्रमाण ही नहीं बन सकता, क्योंकि ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रमाणके माननेपर द्वैत मानना पड़ता है। अद्वैतका
साधक कोई अन्य प्रमाण नहीं है। यदि आप कहें कि लोगोंको समझानेके लिये उनकी अपेक्षासे प्रमाण
स्वीकार किया जाता है; वास्तवमें एक ब्रह्म ही सत्य है, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि अद्वैतवादियोंके
मतमें एक नित्य निरंश परब्रह्म ही सत्य है, इसलिये उनके मतमें लोक ही संभव नहीं।
यदि अद्वैत मत में किसी प्रकार प्रमाणका सद्भाव मान भी लिया जाय, तो अद्वैत के साधक जिस
प्रमाण को स्वीकार किया जाता है, वह प्रमाण प्रत्यक्ष रूप है, या अनुमान रूप है अथवा आगम रूप ?
१. ऋग्वेदपुरुषसूक्ते । २. ईशावास्योपनिषदि । ३. बृहदारण्यक० उ० । युक्तिभिरनुचिन्तनम् मननं ।
श्रुतस्यार्थस्य नैरन्तर्येण दीर्घकालमनुसंधानम् निदिध्यासनं । ४. मैत्र्युपनिषदि । ५. बृहदारण्यक उ० ४.४.१९;
कठोपनिषदि ४.११ । ६. बृहदारण्यक उ० ४.३.१४ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११७
आबालगोपालं तथैव प्रतिभासनात् । यच्च निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं तद्भावेदकम् इत्युक्तम् । तदपि
न सम्यक् । तस्य प्रामाण्यानभ्युपगमात् । सर्वस्यापि प्रमाणतत्त्वस्य व्यवसायात्मकस्यैवावि-
संवदाकत्वेन प्रामाण्योपपत्तेः । सविकल्पकेन तु प्रत्यक्षेण प्रमाणभूतेनैकस्यैव विधिरूपस्य
परब्रह्मणः स्वप्नेऽप्यप्रतिभासनात् । यदप्युक्तं “आहुर्विधातृ प्रत्यक्षम्” इत्यादि । तदपि न
पेशलम् । प्रत्यक्षेण ह्यनुवृत्तव्यावृत्ताकारात्मकवस्तुन एव प्रकाशनात् । एतच्च प्रागेव क्षुण्णम् ।
न ह्यनुस्यूतमेकमखण्डं सत्तामात्रं विशेषनिरपेक्षं सामान्यं प्रतिभासते । येन “यदद्वैतं तद्ब्रह्मणो
रूपम्” इत्याद्युक्तं शोभेत । विशेषनिरपेक्षस्य सामान्यस्य खरविषाणवदप्रतिभासनात् । तदुक्तम्-
“निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत् खरविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वेन विशेषास्तद्वदेव हि” ॥
ततः सिद्धे सामान्यविशेषात्मन्यर्थे प्रमाणविषये कुत एवैकस्य परब्रह्मणः प्रमाणविषय-
त्वम् । यच्च प्रमेयत्वादित्यनुमानमुक्तम्, तदप्येतेनैवापास्तं बोद्धव्यम् । पक्षस्य प्रत्यक्षबाधित-
त्वेन हेतोः कालात्ययापदिष्टत्वात् । यच्च तत्सिद्धौ प्रतिभासमानत्वसाधनमुक्तम्, तदपि
साधनाभासत्वेन न प्रकृतसाध्यसाधनायालम् । प्रतिभासमानत्वं हि निखिलभावानां स्वतः
परतो वा ? न तावत् स्वतः, घटपटमुकुटशकटादीनां स्वतः प्रतिभासमानत्वेनासिद्धेः । परतः
प्रतिभासमानत्वं च परं विना नोपपद्यते इति । यच्च परब्रह्मविवर्तवर्तित्वमखिलभेदानामित्यु-
क्तम् । तदप्यन्वेत्रन्वीयमानद्वयाविनाभावित्वेन पुरुषाद्वैतं प्रतिबध्नात्येव । न च घटादीनां
प्रत्यक्षसे अद्वैत की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वह संपूर्ण वस्तुसमूहमें विद्यमान होनेवाले भेदको ही
अर्थात् व्यावर्तक विशेषको ही प्रकाशित करता है । इसी प्रकारसे सभी लोगोंको प्रत्यक्षका ज्ञान होता है ।
निर्विकल्पक प्रत्यक्ष अद्वैत रूप ब्रह्मका ज्ञान कराता है, ऐसा जो कहा है, वह भी ठीक नहीं । क्योंकि निर्वि-
कल्पक प्रत्यक्षको प्रमाण रूपसे स्वीकार ही नहीं किया गया । कारण कि व्यवसायात्मक ( स्वपरको जाननेमें
साधकतम होनेवाले ) सभी प्रमाण अविसंवादी होनेसे प्रामाण्य माने जाते हैं ( और निर्विकल्पक प्रत्यक्ष
स्वपरको जाननेमें साधकतम नहीं है ) । प्रमाणभूत सविकल्पक प्रत्यक्षके द्वारा भी केवल एकरूप विधिरूप
परब्रह्म स्वप्नमें भी प्रतिभासित नहीं हो सकता । तथा, “प्रत्यक्ष विधायक (सन्मात्रका ग्राहक) है”—ऐसा जो
कहा है, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षके द्वारा सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ ही प्रकाशित किया जाता है—
इसका पहले ही खण्डन किया जा चुका है । पदार्थोंमें अनुस्यूत, एकमात्र रूप, अखण्ड और सत्तामात्र रूप
विशेषकी अपेक्षा न रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता जिससे यह कहा जा सके कि “जो अद्वैत
है वह ब्रह्मका स्वरूप है ।” जिस प्रकार खरविषाण प्रतिभासित नहीं होता उसी तरह विशेष की अपेक्षा न
रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता । कहा भी है—
“विशेष रहित सामान्य खरविषाणकी तरह है, और सामान्य रहित होनेसे विशेष भी वैसा ही है ।”
इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ प्रमाणका विषय होता है, केवल
एकरूप परब्रह्म प्रमाणका विषय कैसे बन सकता है ? तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं प्रमेयत्वात्' यह अनुमान भी
इसीसे खंडित हो जाता है । क्योंकि ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षके प्रत्यक्षसे बाधित होनेके कारण प्रमेयत्व हेतु
कालात्ययापदिष्ट है । तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षकी सिद्धिके लिए जो 'प्रतिभासमानत्व' हेतु दिया गया था,
वह साधनाभास होनेसे प्रकृत साध्यकी सिद्धि करनेमें असमर्थ है । हम पूछते हैं कि सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रतिभास
स्वयं होता है, या दूसरेसे ? सम्पूर्ण पदार्थ स्वयं प्रतिभासित नहीं हो सकते, क्योंकि घट, पट, मुकुट, शकट
आदि पदार्थोंकी स्वतः प्रतिभासमानत्वके रूपसे सिद्धि नहीं होती । पदार्थोंका दूसरेसे प्रतिभासित होना भी
नहीं बन सकता क्योंकि दूसरेसे प्रतिभासित होना दो पदार्थों (द्वैत) के बिना संभव नहीं । तथा, ‘संपूर्ण पदार्थ
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ५ आकृतिवादे १० ।

११८ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १३
चैतन्यान्वयोऽप्यस्ति मृदान्वयस्यैव तत्र दर्शनात् । ततो न किञ्चिदेतदपि । अतोऽनुमानादपि
न तत्सिद्धिः । किञ्च, पक्षहेतुदृष्टान्ता अनुमानोपायभूताः परस्परं भिन्नाः अभिन्ना वा ? भेदे
द्वैतसिद्धिः । अभेदे त्वेकरूपतापत्तिः । तत् कथमेतेभ्योऽनुमानमात्मानमासादयेत् । यदि च
हेतुमन्तरेणापि साध्यसिद्धिः स्यात्, तर्हि द्वैतस्यापि वाङ्मात्रतः कथं न सिद्धिः । तदुक्तम्—
“हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेद् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययोः ।
हेतुना चेद् विना सिद्धिर्द्वैतं वाङ्मात्रतो न किम्”१ ॥
“पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादेः, “सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म” इत्यादेश्चागमादपि न
तत्सिद्धिः । तस्यापि द्वैताविनाभावित्वेन अद्वैतं प्रति प्रामाण्यासम्भवात् । वाच्यवाचकभाव-
लक्षणस्य द्वैतस्यैव तत्रापि दर्शनात् । तदुक्तम्—
“कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं विरुध्यते ।
विद्याऽविद्याद्वयं न स्याद्बन्धमोक्षद्वयं तथा”२ ॥
ततः कथमागमादपि तत्सिद्धिः । ततो न पुरुषाद्वैतलक्षणमेकमेव प्रमाणस्य विषयः । इति
सुव्यवस्थितः प्रपञ्चः ॥ इति काव्यार्थः ॥१३॥
एक ब्रह्मकी ही पर्याय हैं' (सर्वे भावाः ब्रह्मविवर्ताः) इस अनुमानमें भी अन्वेतृ (अन्वित करनेवाला-ब्रह्म) और
अन्वीयमान ( जिसके साथ सम्बन्ध हो-पर्याय ) इन दोनोंका अविनाभाव संबंध होनेसे पुरुषाद्वैतका विरोध
उपस्थित होता है ( क्योंकि दो भिन्न भिन्न पदार्थोंका ही संबंध होता है ) । तथा, घट आदिमें ( परब्रह्मके )
चैतन्य का संबंध भी नहीं पाया जाता, क्योंकि घटका संबंध मिट्टी आदिके साथ है। इसलिये यह भी कुछ नहीं
है । अतः अनुमानसे भी ब्रह्म सिद्ध नहीं होता । तथा, पक्ष, हेतु और दृष्टांतसे अनुमान बनता है; ये पक्ष, हेतु
और दृष्टांत परस्पर भिन्न हैं, अथवा अभिन्न ? भेद माननेसे द्वैत मानना चाहिये, और अभेद माननेसे पक्ष, हेतु
और दृष्टांत एक हो जाते हैं, और पक्ष आदि तीनोंके एक होनेसे अनुमान अपने स्वरूपको कैसे प्राप्त कर सकता
है ( अनुमेय पदार्थको कैसे जान सकता है ) ? यदि आप अनुमानके बिना ही साध्यकी सिद्धि मानें तो
वचन मात्रसे भी द्वैतकी सिद्धि हो सकती है। कहा भी है—
“यदि अद्वैतकी सिद्धि हेतुसे होती हो तो हेतु और साध्यके होनेसे द्वैतकी सिद्धि हो जाती है । यदि
हेतुके बिना ही अद्वैतकी सिद्धि मानो तो वचन मात्रसे द्वैतकी सिद्धि क्यों नहीं हो जाती ?”
तथा, “पुरुष एवेदं सर्वं”, “सर्वं वै खल्विदं ब्रह्म” आदि आगमसे भी ब्रह्म सिद्ध नहीं होता । क्योंकि
आगममें वाच्य-वाचक संबंध होनेसे द्वैतकी ही सिद्धि होती है । कहा भी है—
“लौकिक और वैदिक अथवा शुभ और अशुभ अथवा पुण्य और पाप रूप कर्मद्वैत, प्रशस्त और
अप्रशस्त रूप फलद्वैत, इहलोक और परलोक रूप लोकद्वैत, विद्या और अविद्या तथा बंध और मोक्ष का अभाव
हो जायेगा ।”
अतएव आगमसे भी अद्वैत परब्रह्मकी सिद्धि नहीं होती । इसलिए पुरुषाद्वैतरूप केवल एक किसी
भी प्रमाणका विषय नहीं हो सकता । अतएव इस दृश्यमान प्रपंचको तात्त्विक ही मानना चाहिये । यह
श्लोकका अर्थ है ॥१३॥
भावार्थ—इस श्लोकमें अद्वैतवादियोंके मायावादकी समीक्षा की गयी है । जैन लोगोंका कहना है
कि यदि माया भावरूप है, तो ब्रह्म और माया दो वस्तुओंके होनेसे अद्वैतवादियोंका अद्वैत नहीं बनता ।
तथा, यदि माया अभावरूप है, तो मायासे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि अद्वैतवादी मायाको मिथ्या
रूप मान कर भी वस्तु ( अर्थक्रियाकारी ) स्वीकार करें तो स्ववचन विरोध आता है, क्योंकि मिथ्या रूप
और वस्तु दोनों एक साथ नहीं रह सकते ।
१. आप्तमीमांसा २-२६ । २. आप्तमीमांसा २-२५ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी ११५
अथ स्वाभिमतसामान्यविशेषोभयात्मकवाच्यवाचकभावसमर्थनपुरःसरं तीर्थान्तरी-
यप्रकल्पिततदेकान्तगोचरवाच्यवाचकभावनिरासद्वारेण तेषां प्रतिभावैभवाभावमाह—
वेदान्ती—'यह प्रपंच मिथ्या है, क्योंकि मिथ्या प्रतीत होता है, जैसे सीपमें चांदीका ज्ञान मिथ्या
प्रतीत होनेसे मिथ्या है' ( अयं प्रपञ्चो मिथ्यारूपः प्रतीयमानत्वात्, यदेवं तदेवं, यथा शुक्तिशकले कलधौतम्,
तथा चायं तस्मात्तथा )—इस अनुमानसे जगत् मिथ्या सिद्ध होता है। जैन—मिथ्या रूपसे आपका क्या
अभिप्राय है ? यदि ( १ ) अत्यन्त असत्त्वको मिथ्या कहते हो तो शून्यवादियोंकी असत्ख्याति; ( २ ) अन्य
वस्तुके अन्य रूपमें प्रतिभासित होनेको मिथ्या कहते हो तो नैयायिकोंकी विपरीतख्याति स्वीकार करनी
चाहिए। यदि ( ३ ) मिथ्या रूपका अर्थ अनिर्वाच्य, अर्थात् निस्स्वभावत्व, करते हो तो 'निस्स्वभाव' में
स्वभाव शब्दका अर्थ 'भाव' अथवा 'अभाव' करनेपर क्रमसे असत्ख्याति और सत्ख्याति स्वीकार करनी
पड़ेगी। यदि कहो कि ज्ञानके अगोचर होना ही निस्स्वभावत्व है, तो इस जगत्‌के प्रपंचका ज्ञान नहीं होना
चाहिये। तथा प्रपंचके ज्ञानका विषय न होनेसे प्रतीयमानत्व हेतु भी नहीं बन सकता। यदि अर्थप्रपंचके
जैसेके तैसे प्रतिभासित होनेको निस्स्वभावत्व कहो तो विपरीतख्याति माननी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त, यह
अनुमान प्रत्यक्षसे भी बाधित है। वेदान्ती—हमारा अनुमान प्रत्यक्षसे बाधित नहीं हो सकता, क्योंकि
प्रत्यक्ष प्रमाण केवल सामान्य रूप ही है, वह विधि रूप ही वस्तुओंका ज्ञान करता है, निषेध रूप नहीं ।
जैन—प्रत्यक्ष केवल सामान्य रूप नहीं हो सकता, क्योंकि किसी वस्तुका निषेध किये बिना उसका विधि
रूप ज्ञान होना असंभव है, इसलिये प्रत्यक्षको सामान्यविशेषात्मक स्वीकार करके विधायक और निषेधक
दोनों ही स्वीकार करना चाहिये। उक्त अनुमान 'प्रपञ्चो मिथ्या न भवति, असद्विलक्षणत्वात्, आत्मवत्'
इस प्रत्यनुमानसे बाधित भी है। तथा प्रतीयमानत्व हेतु ब्रह्मके साथ व्यभिचारी है।
वेदान्ती—निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे ब्रह्मकी सिद्धि होती है, क्योंकि निर्विकल्पक प्रत्यक्ष सत्ता मात्रको
जानता है। निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे ब्रह्मका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्ष विधि रूप ही होता
है, निषेध रूप नहीं। तथा पदार्थोंके भेदको ग्रहण करनेवाला सविकल्पक प्रत्यक्ष भी पदार्थोंको सत्ता रूपसे
जानता है, इसलिये सविकल्पक प्रत्यक्ष भी ब्रह्मका साधक है। क्योंकि सत्ता परब्रह्म रूप है। 'विधिरेव तत्त्वं
प्रमेयत्वात्' इस अनुमानसे भी ब्रह्मकी सिद्धि होती है। इसी तरह आगम आदि भी ब्रह्मके अस्तित्वके साधक
हैं। जैन—निश्चयात्मक और विसंवादसे रहित ज्ञान ही प्रमाण होता है, इसलिये निर्विकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण
नहीं कहा जा सकता। सविकल्पक प्रत्यक्ष भी समस्त भेदोंसे रहित केवल विधि रूप ब्रह्मको नहीं जान
सकता है। क्योंकि जिस प्रकार विशेष रहित सामान्य और सामान्य रहित विशेष वस्तुका ज्ञान असंभव है,
उसी तरह विधिके बिना प्रतिषेध और प्रतिषेधके बिना विधि रूप ज्ञान नहीं हो सकता । अतएव प्रत्यक्ष भी
सामान्य-विशेष रूप हो कर विधि और प्रतिषेध दोनों रूपसे ही पदार्थोंका ज्ञान करता है। 'विधिरेव तत्त्वं
प्रमेयत्वात्' अनुमानमें भी प्रमेयत्व हेतु प्रत्यक्षसे बाधित है, क्योंकि प्रत्यक्ष विधि और निषेध दोनों तरहसे
पदार्थोंका ज्ञान करता है, यह अनुभवगम्य है। तथा आगम प्रमाण माननेपर वाच्य-वाचक भाव माननेसे
द्वैतकी ही सिद्धि होती है।
अब कथंचित् सामान्य और कथंचित् विशेषरूप वाच्य-वाचक भावका समर्थन करके प्रतिवादियोंद्वारा
मान्य एकान्त सामान्य और एकान्त विशेष रूप वाच्य-वाचक भावका खंडन करते हुए उनके प्रतिभा वैभव के
अभाव को सिद्ध करते हैं—

१२० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
अनेकमेकात्मकमेव वाच्यं द्वयात्मकं वाचकमप्यवश्यम् ।
अतोऽन्यथा वाचकवाच्यकॢप्तावतावकानां प्रतिभाप्रमादः ॥१४॥
वाच्यम्—अभिधेयं, चेतनमचेतनं च वस्तु, एवकारस्याप्यर्थत्वात् । सामान्यरूपतया
एकात्मकमपि व्यक्तिभेदेनानेकम्—अनेकरूपम् । अथवानेकरूपमपि एकात्मकम् । अन्योऽन्यं
संवलितत्वात् । इत्थमपि व्याख्याने न दोषः । तथा च वाचकम्—अभिधायकं, शब्दरूपम् ।
तदप्यवश्यम्—निश्चितं । द्वयात्मकं—सामान्यविशेषोभयात्मकत्वाद् एकानेकात्मकमित्यर्थः ।
उभयत्र वाच्यलिङ्गत्वेऽप्यव्यक्तत्वाद् नपुंसकत्वम् । अवश्यमिति पदं वाच्यवाचकयोरुभयोर-
प्येकानेकात्मकत्वं निश्चिन्वत् तदेकान्तं व्यवच्छिनत्ति । अतः—उपदर्शितप्रकारात्, अन्यथा—
सामान्यविशेषैकान्तरूपेण प्रकारेण, वाचकवाच्यकॢप्तौ वाच्यवाचकभावकल्पनायाम्,
अतावकानाम्—अत्वदीयानाम्, अन्ययूथ्यानाम् । प्रतिभाप्रमादः—प्रज्ञास्खलितम् । इत्यक्ष-
रार्थः । अत्र चाल्पस्वरत्वेन वाच्यपदस्य प्रागूनिपाते प्राप्तेऽपि यदादौ वाचकग्रहणं, तत्प्रायोऽर्थ-
प्रतिपादनस्य शब्दाधीनत्वेन वाचकस्यार्च्यत्वज्ञापनाथँम् । तथा च शाब्दिकाः—
“न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते” ॥ इति ॥
भावार्थस्त्वेवम् । एके तीर्थिकाः सामान्यरूपमेव वाच्यतयाभ्युपगच्छन्ति । ते च
द्रव्यास्तिकनयानुपातिनो मीमांसकभेदा अद्वैतवादिनः सांख्याश्च । केचिच्च विशेषरूपमेव वाच्यं
निर्वचन्ति । ते च पर्यायास्तिकनयानुसारिणः सौगताः । अपरे च परस्परनिरपेक्षपदार्थपृथग्भूत-
सामान्यविशेषयुक्तं वस्तु वाच्यत्वेन निश्चिन्वते । ते च नैगमनयानुरोधिनः काणादाः,
आक्षपादाश्च ॥
श्लोकार्थ—जिस प्रकार समस्त पदार्थ ( वाच्य ) अनेक हो कर भी एक हैं, और एक होकर भी
अनेक हैं उसी तरह उन पदार्थोंको कहनेवाले शब्द ( वाचक ) भी एक होकर भी अनेक और अनेक होकर
भी एक हैं। इससे भिन्न प्रकारसे आपको न माननेवालों की, वाच्य-वाचक विषयकल्पना में प्रज्ञाका दोष
स्पष्ट हो जाता है।
व्याख्यार्थ—जैसे चेतन-अचेतन वस्तु ( वाच्य ) सामान्यसे एक हो कर भी व्यक्तिरूप से अनेक,
और विशेषरूप से अनेक हो कर भी सामान्य से एक हैं, वैसे ही चेतन और अचेतन वस्तु का वाचक भी
सामान्य और विशेष होनेसे एक रूप और अनेक रूप है। वाच्य-वाचकको सामान्य-विशेष रूप न स्वीकार
करनेवाले अन्यमतावलम्बी प्रज्ञासे स्खलित होते हैं। वाच्य शब्द में अल्प स्वर होनेसे वाच्यका वाचक शब्दसे
पहले निपात होना चाहिये था, परन्तु अर्थका प्रतिपादन करना शब्दके आधीन है, यह बतानेके लिये वाचक
शब्दको ही पहले रखा है। वैयाकरणोंने कहा भी है—
“शब्दके सम्बन्धके बिना लोकमें कोई ज्ञान नहीं होता, सम्पूर्ण ज्ञान शब्दके साथ ही सम्बद्ध है ।”
( १ ) केवल द्रव्यास्तिक नयको माननेवाले अद्वैतवादी, मीमांसक और सांख्य सामान्यको ही
सत् ( वाच्य ) स्वीकार करते हैं। ( २ ) केवल पर्यायास्तिक नयको माननेवाले बौद्ध लोग विशेषको ही
सत् मानते हैं। ( ३ ) केवल नैगम नयका अनुकरण करनेवाले न्याय-वैशेषिक परस्पर भिन्न और निरपेक्ष
सामान्य और विशेष दोनोंको स्वीकार करते हैं।
१. भर्तृहरिकृतवाक्यपदीये १-१२४।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२१
एतच्च पक्षत्रयमपि किञ्चित् चर्च्यते । तथाहि । संग्रहनयावलम्बिनो वादिनः प्रति-
पादयन्ति । सामान्यमेव तत्त्वम् । ततः पृथग्भूतानां विशेषाणामदर्शनात् । तथा सर्वमेकम् ।
अविशेषेण सदितिज्ञानाभिधानानुवृत्तिल्लिङ्गानुमितसत्ताकत्वात् । तथा द्रव्यत्वमेव तत्त्वम् ।
ततोऽर्थान्तरभूतानां धर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवद्रव्याणामनुपलब्धेः । किञ्च, ये सामान्यात्
पृथग्भूता अन्योऽन्यव्यावृत्त्यात्मका विशेषाः कल्प्यन्ते, तेषु विशेषत्वं विद्यते न वा ? नो चेद्
निःस्वभावताप्रसङ्गः । स्वरूपस्यैवाभावात् । अस्ति चेत् तर्हि तदेव सामान्यम् । यतः समानानां
भावः सामान्यम् । विशेषरूपतया च सर्वेषां तेषामविशेषेण प्रतीतिः सिद्धैव ॥
अपि च विशेषाणां व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वं लक्षणम् । व्यावृत्तिप्रत्यय एव विचार्यमाणे
न घटते । व्यावृत्तिर्हि विवक्षितपदार्थे इतरपदार्थप्रतिषेधः । विवक्षितपदार्थश्च स्वस्वरूपन्यव-
स्थापनमात्रपर्यवसायी, कथं पदार्थान्तरप्रतिषेधे प्रगल्भते । न च स्वरूपसत्त्वादन्यत् तत्र
किमपि, येन तन्निषेधः प्रवर्त्तेत । न च व्यावृत्तौ क्रियमाणायां स्वात्मव्यतिरिक्ता विश्वत्रय-
वर्तिनोऽतीतवर्तमानानागताः पदार्थास्तस्माद् व्यावर्तनीयाः । ते च नाज्ञातस्वरूपा व्यावर्तयितुं
शक्याः । ततश्चैकस्यापि विशेषस्य परिज्ञाने प्रमातुः सर्वज्ञत्वं स्यात् । न चैतत्प्रातीतिकं
यौक्तिकं वा । व्यावृत्तिस्तु निषेधः । स चाभावरूपत्वात् तुच्छः कथं प्रतीतिगोचरमञ्चति
खपुष्पवत् ॥
तथा येभ्यो व्यावृत्तिः ते सद्रूपा असद्रूपा वा ? असद्रूपाश्चेत् तर्हि खरविषाणात् किं न
व्यावृत्तिः । सद्रूपाश्चेत् सामान्यमेव । या चेयं व्यावृत्तिर्विशेषैः क्रियते सा सर्वासु

इन तीनों पक्षोंकी यहाँ कुछ चर्चा की जाती है : (१) संग्रहनयको स्वीकार करनेवाले अद्वैतवादी-
मीमांसक-सांख्य : सामान्य ही एक तत्त्व है, सामान्यसे भिन्न विशेष दृष्टिगोचर नहीं होते । सब पदार्थों-
का सामान्य रीतिसे ज्ञान होता है, और सब पदार्थ 'सत्' कहे जाते हैं, अतएव समस्त पदार्थ एक हैं ।
अतएव द्रव्यत्व ही एक तत्त्व है, क्योंकि द्रव्यत्वको छोड़ कर धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव
नहीं पाये जाते । तथा, सामान्यसे भिन्न और एक दूसरेकी व्यावृत्ति रूप 'विशेष' स्वीकार करनेवाले वादियोंसे
हम पूछते हैं कि विशेषोंमें विशेषत्व रहता है, या नहीं ? यदि विशेषोंमें विशेषत्व नहीं रहता तो इसका अर्थ यह
हुआ कि विशेष निःस्वभाव हैं, क्योंकि विशेषोंमें निजस्वरूप विशेषत्व नहीं रहता । यदि विशेषोंमें विशेषत्व
रहता है, तो इसी विशेषत्वको हम सामान्य कहते हैं । क्योंकि समानके भावको ही सामान्य कहा है, और
विशेषरूपत्वसे इन सभी भावोंकी समान रूपसे होनेवाली प्रतीति सिद्ध ही है ।
तथा, विवक्षित पदार्थमें दूसरे पदार्थके निषेध करनेको व्यावृत्ति कहते हैं, इसी व्यावृत्ति प्रत्ययके
हेतुको विशेष माना गया है ( जैसे घटमें पटके निषेध करनेसे घटकी पटसे व्यावृत्ति होती है ) । परन्तु यह
विवक्षित पदार्थ ( घट ) अपने स्वरूपको ही सिद्ध कर सकता है, दूसरे पदार्थोंका निषेध नहीं कर सकता ।
स्वरूपके अस्तित्वको छोड़कर और कोई भी चीज नहीं है जिससे कि अन्य पदार्थोंके निषेधकी आवश्यकता हो ।
यदि विवक्षित पदार्थ दूसरे पदार्थोंके निषेध करनेमें भी समर्थ हो, तो उसे आत्मस्वरूप से भिन्न तीनों लोकोंके
भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थोंसे भी अपनी व्यावृत्ति करनी चाहिये । और जब तक तीनों लोकोंके भूत, भविष्य,
और वर्तमान पदार्थोंका ज्ञान न हो, उस समय तक इन पदार्थोंकी व्यावृत्ति नहीं की जा सकती । इसलिये
एक विशेषके ज्ञान करनेमें तीनों लोकोंके समस्त पदार्थोंसे उसकी व्यावृत्ति करनेके लिये प्रमाताको सर्वज्ञ होना
पड़ेगा । यह न तो अनुभवसिद्ध है, और न युक्तिसे ही सिद्ध है । तथा, निषेधको ही व्यावृत्ति कहा गया है;
यह व्यावृत्ति अभाव रूप होनेसे तुच्छ है, इसलिये आकाश-कुसुमकी तरह विश्वास योग्य नहीं है ।
तथा, जिन पदार्थोंसे दूसरे पदार्थोंकी व्यावृत्ति की जाती है, वे पदार्थ सत् हैं, या असत् ? यदि असत्
हैं, तो असत् खरविषाणसे भी घटकी व्यावृत्ति की जानी चाहिये । यदि व्यावृत पदार्थोंको सत् मानो तो फिर
१६

१२२ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
विशेषव्यक्तिष्वेका अनेका वा ? अनेका चेत् तस्या अपि विशेषत्वापत्तिः, अनेकरूपत्वैक-
जीवितत्वाद् विशेषाणाम् । ततश्च तस्या अपि विशेषत्वान्यथानुपपत्तेर्व्यावृत्त्या भाव्यम् ।
व्यावृत्तेरपि च व्यावृत्तौ विशेषाणामभाव एव स्यात् । तत्स्वरूपभूताया व्यावृत्तेः प्रतिषिद्धत्वात्;
अनवस्थापाताच्च । एका चेत् सामान्यमेव संज्ञान्तरेण प्रतिपन्नं स्यात् । अनुवृत्तिप्रत्ययलक्षणाव्य-
भिचारात् । किञ्च, अमी विशेषाः सामान्याद् भिन्ना अभिन्ना वा ? भिन्नाश्चेद् मण्डूकजटा-
भारानुकाराः । अभिन्नाश्चेत् तदेव तत्स्वरूपवत् । इति सामान्यैकान्तवादः ॥
पर्यायनयान्वयिनस्तु भाषन्ते । विविक्ताः क्षणक्षयिणो विशेषा एव परमार्थः । ततो
विष्वग्भूतस्य सामान्यस्याप्रतीयमानत्वात् । न हि गवादिव्यक्त्यनुभवकाले वर्णसंस्थानात्मकं
व्यक्तिरूपमपहाय, अन्यत्किञ्चिदेकमनुयायि प्रत्यक्षे प्रतिभासते । तादृशस्यानुभवाभावात् ।
तथा च पठन्ति—
“एतासु पञ्चस्ववभासनीषु प्रत्यक्षबोधे स्फुटमङ्गुलीषु ।
साधारणं रूपमवेक्षते यः शृङ्गं शिरस्यात्मन ईक्षते सः”१ ॥
एकाकारपरामर्शप्रत्ययस्तु स्वहेतुदत्तशक्तिभ्यो व्यक्तिभ्य एवोत्पद्यते । इति न तेन सामान्य-
साधनं न्याय्यम् ॥
किञ्च, यदिदं सामान्यं परिकल्प्यते तदेकमनेकं वा ? एकमपि सर्वगतमसर्वगतं वा ?
सर्वगतं चेत्, किं न व्यक्त्यन्तरालेषूपलभ्यते । सर्वगतैकत्वाभ्युपगमे च तस्य यथा गोत्व-
उन पदार्थोंको सामान्य ही कहना चाहिये । तथा, विशेषोंके द्वारा की हुई व्यावृत्ति सब विशेषोंमें एक ही
व्यावृत्ति होती है, अथवा सबमें अलग-अलग ? यदि व्यावृत्ति अनेक हैं, तो व्यावृत्तिको भी विशेष मानना
चाहिये, क्योंकि अनेक रूपको ही विशेष कहते हैं । अतएव व्यावृत्तिके विशेष सिद्ध होने पर व्यावृत्तिमें
भी व्यावृत्ति होनी चाहिये, क्योंकि विशेषकी व्यावृत्तिके साथ अन्यथानुपपत्ति है । तथा, व्यावृत्तिमें व्यावृत्ति
माननेपर, व्यावृत्ति व्यावृत्ति रूप सिद्ध नहीं हो सकती, अतएव विशेषोंका अभाव मानना होगा, और इस
प्रकारकी व्यावृत्ति प्रतिषिद्ध है । तथा, एक व्यावृत्तिमें अनेक व्यावृत्ति माननेसे अनवस्था दोष आता है । यदि
सब विशेषोंमें एक ही व्यावृत्ति स्वीकार करो, तो उसे सामान्य ही मानना चाहिये; क्योंकि अनुवृत्ति प्रत्ययसे
विरोध नहीं आता । तथा, ये विशेष सामान्यसे भिन्न हैं, या अभिन्न ? विशेषोंको सामान्यसे भिन्न मानना
मण्डूकके जटाभारका ही अनुकरण करना है । यदि विशेष सामान्यसे अभिन्न हैं, तो उन्हें सामान्य ही कहना
होगा । अतएव सामान्य एकान्त वाद मानना ही उचित है ।
(२) पर्यायास्तिक नयको स्वीकार करने वाले बौद्ध : भिन्न और क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले विशेष
ही तत्त्व हैं, क्योंकि विशेषको छोड़ कर सामान्य कोई अलग वस्तु नहीं है । गौको जानते समय हमें गौके
वर्ण, आकार आदिके विशेष ज्ञानको छोड़ कर गौका केवल सामान्य ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि विशेष
ज्ञानको छोड़ कर किसी पदार्थका सामान्य ज्ञान हमारे अनुभवके बाह्य है। कहा भी है—
“जो पुरुष प्रत्यक्षसे स्पष्ट अलग-अलग दिखाई देनेवाली पाँच उँगलियोंमें केवल सामान्य रूपको
देखता है, वह पुरुष अपने सिरपर सींग ही देखता है, अतएव पदार्थोंके विशेष ज्ञानको छोड़ कर पदार्थोंका
केवल सामान्य ज्ञान होना असम्भव है ।”
तथा, एकरूप ज्ञान अपने कारणोंसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्तियोंसे ही उत्पन्न होता है । अतएव सामान्य
की सिद्धि न्यायसंगत नहीं ।
तथा, सामान्य एक है, या अनेक ? यदि सामान्य एक है तो वह व्यापक है, या अव्यापक ? यदि
सामान्य व्यापक है, तो वह दो व्यक्तियों ( गौओं ) के बीचमें क्यों नहीं रहता ? तथा, सामान्यको सर्वगत
१. अशोकविरचितसामान्यदूषणदिक्ग्रन्थे ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२३
सामान्यं गोव्यक्तीः क्रोडीकरोति, एवं किं न घटपटादिव्यक्तीरपि, अविशेषात्। असर्वगतं
चेद् विशेषरूपापत्तिः अभ्युपगमबाधश्च ॥
अथानेकं गोत्वाश्वत्वघटत्वपटत्वादिभेदाद्भिन्नत्वात् तर्हि विशेषा एव स्वीकृताः।
अन्योन्यव्यावृत्तिहेतुत्वात् । न हि यद्गोत्वं तदश्वत्वात्मकमिति । अर्थक्रियाकारित्वं च
वस्तुनो लक्षणम् । तच्च विशेषेष्वेव स्फुटं प्रतीयते । न हि सामान्येन काचिदर्थक्रिया क्रियते ।
तस्य निष्क्रियत्वात् । वाहदोहादिकास्वर्थक्रियासु विशेषाणामेवोपयोगात् । तथेदं सामान्यं
विशेषेभ्यो भिन्नमभिन्नं वा ? भिन्नं चेद् अवस्तु । विशेषविश्लेषेणार्थक्रियाकारित्वाभावात् ।
अभिन्नं चेद् विशेषा एव, तत्स्वरूपवत् । इति विशेषैकान्तवादः ॥
नैगमनयानुगामिनस्त्वाहुः । स्वतन्त्रौ सामान्यविशेषौ । तथैव प्रमाणेन प्रतीतत्वात् ।
तथाहि । सामान्यविशेषावत्यन्तभिन्नौ, विरुद्धधर्माध्यासितत्वात् । यावेवं तावेवं, यथा पाथः-
पावकौ, तथा चैतौ, तस्मात् तथा । सामान्यं हि गोत्वादि सर्वगतम् । तद्विपरीताश्च शबलशाव-
लेयादयो विशेषाः । ततः कथमेषामैक्यं युक्तम् ॥
न सामान्यात् पृथग्विशेषस्योपलम्भ इति चेत्, कथं तर्हि तस्योपलम्भ इति वाच्यम् ।
सामान्यव्याप्तस्येति चेद्, न तर्हि स विशेषोपलम्भः । सामान्यस्यापि तेन ग्रहणात् ततश्च तेन
बोधेन विविक्तविशेषग्रहणाभावात् तद्वाचकं ध्वनिं तत्साध्यं च व्यवहारं न प्रवर्तयेत् प्रमाता ।
न चैतदस्ति । विशेषाभिधानव्यवहारयोः प्रवृत्तिदर्शनात् । तस्माद् विशेषमभिलपता तस्य च
और एक माननेपर जैसे गोत्व सामान्य गौओंमें रहता है, वैसे ही वह घट, पट आदिमें भी रहना चाहिये;
क्योंकि सामान्य एक है। यदि सामान्यको अव्यापक मानो तो वह विशेषरूप हो जायेगा और आपकी
मान्यतामें बाधा उपस्थित होगी ।
यदि कहो कि सामान्य गोत्व, अश्वत्व, घटत्व, पटत्व आदिके भेदसे अनेक प्रकारका है, तो इससे
एक दूसरेकी व्यावृत्ति करनेवाला विशेष ही सिद्ध होता है । क्योंकि गोत्व और अश्वत्वके भिन्न-भिन्न होनेसे
गोत्वकी अश्वत्वसे व्यावृत्ति होती है । तथा, अर्थक्रियाकारित्व वस्तुका लक्षण है। यह लक्षण विशेषमें
ही स्पष्ट घटता है, क्योंकि सामान्य निष्क्रिय होनेसे अर्थक्रिया नहीं कर सकता । तथा, वाहन ( खेंचना )
दोहन ( दुहना ) आदि अर्थक्रियाओंमें भी अश्वत्व, गोत्व आदि सामान्य उपयोगी नहीं होते, बल्कि खींचने,
दुहने आदिके समय विशेषरूप अश्व और गोसे ही हमारा प्रयोजन सिद्ध होता है। तथा, यह सामान्य विशेषों-
से भिन्न है, या अभिन्न ? यदि सामान्य विशेषोंसे भिन्न है तो सामान्य कोई पदार्थ हो नहीं ठहरता; क्योंकि
विशेषसे भिन्न हो कर इसमें अर्थक्रिया नहीं हो सकती । यदि सामान्य विशेषसे अभिन्न है तो उसे विशेष
ही मानना चाहिये, क्योंकि वह इसीका रूप है । अतएव विशेष एकान्तवाद मानना ही उचित है ।
(३) नैगम नय को स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिक : सामान्य और विशेष स्वतन्त्र हैं, क्योंकि
प्रमाणके द्वारा वे ऐसे ही प्रतीत होते हैं । तथाहि : 'सामान्य और विशेष अत्यन्त भिन्न हैं, क्योंकि वे विरोधी
धर्मोंसे युक्त हैं; जो विरोधी धर्मोंसे युक्त होते हैं वे अत्यन्त भिन्न होते हैं, जैसे जल और अग्नि । ये
सामान्य और विशेष विरोधी धर्मोंसे युक्त हैं, अतः अत्यन्त भिन्न हैं'। गोत्व आदि सामान्य सर्वव्यापक है, और
शबल शावलेय आदि विशेष उसके विपरीत हैं, अतएव दोनोंका एकत्र कैसे सम्भव है ?
यदि कहो कि सामान्यसे पृथक् रूप में विशेषका ज्ञान नहीं होता तो कहिये कि विशेषका ज्ञान फिर
कैसे होता है ? यदि कहो कि सामान्यसे व्याप्त विशेषका ज्ञान होता है, तो इसका मतलब हुआ कि विशेषका
ज्ञान नहीं होता, क्योंकि उस सामान्यसे व्याप्त विशेषके ज्ञानसे सामान्यका भी ज्ञान होता है और इसलिए उस
सामान्यसे व्याप्त विशेषके ज्ञानसे सामान्यके कारण भिन्न विशेषका ज्ञान न होनेके कारण प्रमाता, विशेषके वाचक
शब्द तथा विशेषके द्वारा किये जानेवाला व्यवहार न कर सकेगा। किन्तु विशेष वाचक शब्दका और विशेषके

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१२४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
व्यवहारं प्रवर्तयता तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽभ्युपगन्तव्यः । एवं सामान्यस्थाने विशेष-
शब्दं, विशेषस्थाने च सामान्यशब्दं प्रयुञ्जानेन सामान्येऽपि तद्ग्राहको बोधो विविक्तोऽङ्गी-
कर्तव्यः । तस्मात् स्वस्वग्राहिणि ज्ञाने पृथक्प्रतिभासमानत्वाद् द्वावपीतरेतरविशकलितौ ।
ततो न सामान्यविशेषात्मकत्वं वस्तुनो घटते । इति स्वतन्त्रसामान्यविशेषवादः ॥
तदेतत् पक्षत्रयमपि न क्षमते क्षोदम् । प्रमाणबाधितत्वात् । सामान्यविशेपोभयात्म-
कस्यैव वस्तुनो निर्विगानमनुभूयमानत्वात् । वस्तुनो हि लक्षणम् अर्थक्रियाकारित्वम् ।
तच्चानेकान्तवादे एवाविकलं कलयन्ति परीक्षकाः । तथाहि । यथा गौरित्युक्ते खुरककुत्सा-
स्नालाङ्गूलविषाणाद्यवयवसम्पन्नं वस्तुरूपं सर्वव्यक्त्यनुयायि प्रतीयते, तथा महिष्यादि-
व्यावृत्तिरपि प्रतीयते ॥
यत्रापि च शबला गौरित्युच्यते, तत्रापि यथा विशेषप्रतिभासः तथा गोत्वप्रतिभासोऽपि
स्फुट एव । शबलेति केवलविशेषोच्चारणेऽपि, अर्थात् प्रकरणाद् वा गोत्वमनुवर्तते । अपि
च, शबलत्वमपि नानारूपम्, तथा दर्शनात् । ततो वक्त्रा शबलेत्युक्ते क्रोडीकृतसकलशवल-
सामान्यं विवक्षितगोव्यक्तिगतमेव शबलत्वं व्यवस्थाप्यते । तदेवमाबालगोपालं प्रतीति-
प्रसिद्धेऽपि वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वे तदुभयैकान्तवादः प्रलापमात्रम् । न हिं क्वचित्
कदाचित् केनचित् सामान्यं विशेषविनाकृतमनुभूयते, विशेषा वा तद्विनाकृताः । केवलं
द्वारा किये जानेवाले व्यवहारका अभाव तो है नहीं; क्योंकि विशेष शब्दकी और विशेषके द्वारा किये जानेवाले
व्यवहारकी प्रवृत्ति देखी जाती है । अतएव विशेषकी अभिलाषा करनेवालेको और विशेषसाध्य व्यवहारकी
प्रवृत्ति करनेवालेको सामान्य ज्ञानसे भिन्न विशेषको जाननेवाले ज्ञानको स्वीकार करना चाहिए । इस प्रकार
सामान्यके वाचक शब्दके स्थानमें विशेषके वाचक शब्दका, और विशेषके वाचक शब्दके स्थानमें सामान्यके
वाचक शब्दका प्रयोग करनेवालेको, सामान्यके विषयमें भी विशेषके ज्ञानसे भिन्न सामान्यके ज्ञानको स्वीकार
करना चाहिए । अतएव सामान्यको जाननेवाले ज्ञानमें और विशेषको जाननेवाले ज्ञानमें पृथक् रूपसे प्रति-
भासित होनेके कारण सामान्य और विशेष दोनों ही एक दूसरेसे भिन्न सिद्ध होते हैं । अतएव पदार्थका
सामान्य-विशेषात्मक रूप घटित नहीं होता । इसलिए स्वतन्त्र सामान्य और स्वतन्त्र विशेषवाद ही ठीक है।
जैन—(१) उक्त तीनों पक्ष प्रमाणसे बाधित होनेसे परीक्षाकी कसौटी पर ठीक नहीं उतरते ।
क्योंकि सामान्य-विशेष रूप पदार्थ ही निर्दोष रूपसे अनुभवमें आते हैं। वस्तुका लक्षण अर्थक्रियाकारित्व है और
यह लक्षण अनेकान्तवादमें ही ठीक-ठीक घटित हो सकता है। गौके कहनेपर जिस प्रकार खुर, ककुत्,
सास्ना, पूँछ, सींग आदि अवयवोंवाले गो पदार्थका स्वरूप सभी गो व्यक्तियोंमें पाया जाता है, उसी प्रकार
भैंस आदिकी व्यावृत्ति भी प्रतीत होतो है । अतएव एकान्त सामान्यको न मान कर पदार्थोंको सामान्य-विशेष
रूप ही मानना चाहिये ।
(२) जहाँ 'शबला गो' कहा जाता है, वहाँ जिस प्रकार विशेषका ज्ञान होता है, उसी प्रकार
गोत्व सामान्यका ज्ञान भी स्पष्ट ही है । 'शबला' केवल इस विशेषका उच्चारण करने पर भी अर्थ
या प्रकरणकी दृष्टिसे गोत्व सामान्यकी अनुवृत्ति होती है ( अर्थात् गोत्व सामान्यका ज्ञान होता है ) । तथा,
शबलत्व भी अनेक प्रकारका होता है, क्योंकि वैसा देखनेमें आता है । अतएव वक्ताके द्वारा 'शबला' कहा
जानेपर, अपनेमें सभी शबल-सामान्यका अन्तर्भाव करनेवाले विवक्षित गोव्यक्तिमें विद्यमान रहनेवाले ही
शबलत्वका निश्चय किया जाता है । इस प्रकार वस्तुका सामान्य-विशेषात्मकत्व सभी बाल-गोपालमें अनुभव-
सिद्ध है, फिर भी सामान्य ही सद्भूत है, विशेष नहीं, और विशेष ही सद्भूत है, सामान्य नहीं, इस प्रकारका
ऐकान्तिक कथन प्रलापमात्र है । विशेषोंसे पृथक् किये गये सामान्यक! और सामान्यसे पृथक् किये गये विशेषों-

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२५
दुर्नयप्रभावितमतियामोहवशादेकमपपल्यान्यतरद् व्यवस्थापयन्ति बालिशाः । सोऽय-
मन्धगजन्‍यायः१ ॥
येऽपि च तदेकान्तपक्षोपनिपातिनः प्रागुक्ता दोषास्तेऽप्यनेकान्तवादप्रचण्डमुद्गरप्रहार-
जर्जरितत्वाद् नोच्छ्वसितुमपि क्षमाः । स्वतन्त्रसामान्यविशेषवादिनस्त्वेवं प्रतिक्षेप्याः ।
सामान्यं प्रतिव्यक्ति कथञ्चिद्भिन्नं, कथञ्चिदभिन्नं, कथञ्चित् तदात्मकत्वाद्, विसदृशपरिणाम-
वत् । यथैव हि काचिद् व्यक्तिरुपलभ्यमानाद् व्यक्त्यन्तराद् विशिष्टा विसदृशपरिणाम-
दर्शनादवतिष्ठते, तथा सदृशपरिणामात्मकसामान्यदर्शनात् समानेति । तेन समानो गौरयम्,
सोऽनेन समान इति प्रतीतेः । न चास्य व्यक्तिस्वरूपादभिन्नत्वात् सामान्यरूपतान्याघातः ।
यतो रूपादीनामपि व्यक्तिस्वरूपादभिन्नत्वमस्ति, न च तेषां गुणरूपतान्याघातः । कथञ्चिद्
व्यतिरेकस्तु रूपादीनामिव सदृशपरिणामस्याप्यस्त्येव । पृथग्व्यपदेशादिभाक्तत्वात् ॥
विशेषा अपि नैकान्तेन सामान्यात् पृथग्भवितुमर्हन्ति । यतो यदि सामान्यं सर्वगतं
सिद्धं भवेत् तदा तेषामसर्वगतत्वेन ततो विरुद्धधर्माध्यासः स्यात् । न च तस्य तत् सिद्धम् ।
प्रागुक्तयुक्त्या निराकृतत्वात् । सामान्यस्य विशेषाणां च कथञ्चित् परस्पराव्यतिरेकेणैकानेक-
रूपतया व्यवस्थितत्वात् । विशेषेभ्योऽव्यतिरिक्तत्वाद्वि सामान्यमप्यनेकमिष्यते । सामान्यात्
तु विशेषाणामव्यतिरेकात्तेऽप्येकरूपा इति ।
का कहीं पर, किसी कालमें, किसीके द्वारा अनुभव नहीं किया जाता । अज्ञानी पुरुष केवल दुर्नयसे प्रभावित
मतिके व्यामोहके कारण सामान्य और विशेष इन दोनोंमेंसे एकका अपलाप दूसरेकी सिद्धि करते हैं । यह
अन्धगजन्‍याय ही है ।
(३) क—सामान्य-एकान्त और विशेष-एकान्त पक्षमें उपस्थित होने वाले पूर्वोक्त दोष भी अनेकान्त-
वाद रूप प्रचण्ड मुद्गरके प्रहारसे जर्जरित होनेके कारण श्वास लेनेमें भी समर्थ नहीं रह जाते । सामान्य
और विशेषको परस्पर भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ मानने वालों ( वैशेषिक और नैयायिक ) का निम्नलिखित रूपसे
निराकरण करना चाहिये, 'सामान्य प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है, कथंचित् तदात्मक
होनेसे, विसदृश परिणामकी तरह ।' ( विसदृश परिणामका जिस प्रकार अपने परिणामाभिभूत प्रत्येक व्यक्तिके
साथ कथंचित् तादात्म्य होनेसे, वह प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न है, उसी प्रकार सामान्यका
प्रत्येक व्यक्तिके साथ कथंचित् तादात्म्य होनेसे, वह प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न
है ) । जैसे किसी व्यक्तिका उपलभ्यमान अन्य व्यक्तिसे विसदृश परिणाम दिखाई देता है, उसी प्रकार वह
सदृश परिणामस्वरूप सामान्य दिखाई देनेसे उपलभ्यमान अन्य व्यक्तिके समान ( सदृश परिणाम ) होता
है; क्योंकि 'यह गाय उस गायके समान है', 'वह उसके समान है', इस प्रकारका ज्ञान होता है । व्यक्ति-
के स्वरूपसे अभिन्न होनेसे सामान्यकी सामान्यरूपतामें विरोध नहीं आता । क्योंकि रूप आदि अर्थ व्यक्ति
( विशेष ) के स्वरूपसे अभिन्न होने पर भी ( रूप आदिके घट आदिसे अभिन्न होने पर भी ) उनकी गुण-
रूपतामें विरोध नहीं आता । तथा, जिस प्रकार सामान्य व्यक्तिके स्वरूपसे कथंचित् भिन्न होता है, उसी
प्रकार सदृशपरिणाम व्यक्तिके स्वरूपसे कथंचित् भिन्न है, क्योंकि व्यक्तिस्वरूप और सदृश परिणाम की संज्ञा,
लक्षण, प्रयोजन आदि भिन्न-भिन्न हैं ।
ख—इसी प्रकार विशेष भी एकान्त रूपसे सामान्यसे भिन्न होने योग्य नहीं है । क्योंकि यदि सामान्य
सर्वव्यापक सिद्ध हो गया तो विशेषके सर्वव्यापक न होनेके कारण उनमें सामान्यसे विरुद्ध धर्मोंका अध्यारोप
उपस्थित होगा । और सामान्यका सर्वव्यापकत्व सिद्ध नहीं है; इसका हम पहले ही खण्डन कर आये हैं ।
१. जन्मान्धैर्दशभिर्यथाक्रमं पदचतुष्टयश्रोत्रद्वयशुण्डादन्तपुच्छरूपा गजावयवाः स्पृष्टाः । ततः तेऽन्धाः
स्वस्पृष्टरूपं स्तम्भाद्याकारकं पूर्णतया गजस्वरूपं प्रतिपद्यमानास्तथैव स्थापयन्ति तदितरन्निषेधयन्ति तद्वत् ।

१२६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
एकत्वं च सामान्यस्य संग्रहनयार्पणात् सर्वत्र विज्ञेयम् । प्रमाणार्पणात् तस्य कथ-
ञ्चिद्विरुद्धधर्माध्यासितत्वम् । सदृशपरिणामरूपस्य विसदृशपरिमाणवत् कथञ्चित् प्रतिव्यक्ति-
भेदात् । एवं चासिद्धं सामान्यविशेषयोः सर्वथाविरुद्धधर्माध्यासितत्वम् । कथञ्चिद्विरुद्धधर्मा-
ध्यासितत्वं चेद् विवक्षितम् तदास्मत्कक्षाप्रवेशः । कथञ्चिद्विरुद्धधर्माध्यासस्य कथञ्चिद्भेदा-
विनाभूतत्वात् । पाथःपावकदृष्टान्तोऽपि साध्यसाधनविकलः । तयोरपि कथञ्चिदेव विरुद्ध-
धर्माध्यासितत्वेन भिन्नत्वेन च स्वीकरणात् । पयस्त्वपावकत्वादिना हि तयोर्विरुद्धधर्माध्यासः,
भेदश्च । द्रव्यत्वादिना पुनस्तद्वैपरीत्यमिति । तथा च कथं न सामान्यविशेषात्मकत्वं वस्तुनो
घटते इति । ततः सुष्ठूक्तं वाच्यमेकमनेकरूपम् इति ॥
एवं वाचकमपि शब्दाख्यं द्वयात्मकम् सामान्यविशेषात्मकम् । सर्वशब्दव्यक्तिष्वनु-
यायि शब्दत्वमेकम् । शङ्खशाङ्गतीव्रमन्दोदात्तानुदात्तस्वरितादिविशेषभेदादनेकम् । शब्दस्य
हि सामान्यविशेषात्मकत्वं पौद्गलिकत्वाद् व्यक्तमेव । तथाहि । पौद्गलिकः शब्दः, इन्द्रि-
यार्थत्वात्, रूपादिवत् ॥
यच्चास्य पौद्गलिकत्वनिषेधाय स्पर्शशून्याश्रयत्वात्, अतिनिबिडप्रदेशे प्रवेशनिर्गम-
योरप्रतिघातात्, पूर्वं पश्चाच्चावयवानुपलब्धेः, सूक्ष्ममूर्तद्रव्यान्र्तराप्रेरकत्वाद्, गगनगुणत्वात्
चेति पञ्चहेतवो यौगैरुपन्यस्ताः, ते हेत्वाभासाः । तथाहि । शब्दपर्यायस्याश्रयो भाषावर्गरणा,
तथा, सामान्य और विशेषका परस्पर कथंचित् अभेद होनेके कारण सामान्य-विशेष एक रूपसे और अनेक रूप-
से व्यवस्थित हैं । विशेषोंसे भिन्न न होनेसे सामान्य भी अनेक रूपसे प्रतिव्यक्तिके भेदरूपसे इष्ट है और
सामान्यसे विशेषोंका भेद न होनेसे विशेष भी एक रूपसे इष्ट है ।
व्यक्तियोंमें पाया जाने वाला सामान्य संग्रह नयकी विवक्षासे एक रूप होता है । प्रमाणकी विवक्षा
(मुख्यता) से सामान्यका कथंचित् विरुद्ध धर्माध्यासितत्व समझना चाहिये । जिस प्रकार विसदृश परिणाम
(परिणामाभिभूत ) प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भिन्न होता है, उसी प्रकार सदृश परिणाम रूप सामान्यका भी
प्रत्येक व्यक्तिसे कथंचित् भेद होता है । इस प्रकार सामान्य और विशेषका सर्वथा विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना
असिद्ध है । यदि सामान्य विशेषका कथंचित् विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना प्रतिवादीको विवक्षित हो तो यह हमारे
ही मतकी स्वीकृति होगी । क्योंकि कथंचित् विरुद्ध धर्मोंसे युक्त होना कथंचित् भेदके साथ अविनाभाव रूप
होना है । तथा, जल और अग्निका दृष्टान्त भी साध्यविकल ( साध्यमें न रहनेवाला ) और साधन-विकल
( साधनमें न रहनेवाला ) है । क्योंकि उन दोनोंको भी हमने कथंचित् विरुद्ध धर्माध्यासित और कथंचित्
भिन्न रूपसे स्वीकार किया है । जलत्व और अग्नित्व आदिसे दोनों विरुद्ध धर्मोंसे युक्त हैं और दोनोंमें भेदका
सद्भाव है । तथा, द्रव्यत्व आदिकी अपेक्षा दोनों विरुद्ध धर्मोंसे युक्त नहीं हैं और उनमें भेद भी नहीं है ।
इस प्रकार वस्तुका सामान्य विशेषात्मकत्व कैसे नहीं सिद्ध होता ? अतएव हमने जो कहा है कि
वाच्य एक और अनेक दोनों रूप है, हमारा यह कथन बिलकुल ठीक है ।
इस प्रकार शब्दसंज्ञक वाचक भी सामान्य-विशेष दोनोंसे युक्त है । सभी शब्दरूप व्यक्तियोंमें
अन्वित होने वाला शब्दत्व (सामान्य) एक रूप है और वह शब्दत्व शंख, धनुष, तीव्र, मन्द, उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित आदिके शब्दभेदसे अनेक रूप है । तथा, शब्द पौद्गलिक होनेसे सामान्य और विशेष दोनों रूप है ।
तथाहि : 'शब्द पौद्गलिक है, क्योंकि रूप आदिकी तरह इन्द्रियका विषय है ।'
शब्द पुद्गलकी पर्याय नहीं है, इसका निषेध करनेके लिए नैयायिकों और वैशेषिकों ने जो
निम्नलिखित हेतु उपस्थित किये हैं, वे हेत्वाभास हैं : ( १ ) स्पर्शसे शून्य पदार्थ उसका आश्रय है;

न पुनराकाशम् । तत्र च स्पर्शो निर्णीयत एव । यथा शब्दाश्रयः स्पर्शवान्, अनुवातप्रतिवात-
योर्विप्रकृष्टनिकटशरीरिणोपलभ्यमानानुपलभ्यमानेन्द्रियार्थत्वात् तथाविधगन्धाधारद्रव्यपर-
माणुवत् । इति असिद्धः प्रथमः । द्वितीयस्तु गन्धद्रव्येण व्यभिचारार्दनैकान्तिकः । वर्त्यमान-
जात्यकस्तूरिकादि गन्धद्रव्यं हि पिहितद्वारापवरकस्यान्र्तविशति वहिश्च निर्याति, न चापौद्ग-
लिकम् । अथ तत्र सूक्ष्मरन्ध्रसंभवाद् नातिनिविडत्वम्, अतस्तत्र तत्प्रवेशनिष्क्रमौ । कथ-
मन्यथोद्घाटितद्वारावस्थायामिव न तदेकार्णवत्वम् । सर्वथा नीरन्ध्रे तु प्रदेशे न तयोः
संभवः इति चेत्, तर्हि शब्देऽप्येतत्समानम् इत्यसिद्धो हेतुः । तृतीयस्तु तडिल्लतोल्कादिभिर-
नैकान्तिकः । चतुर्थोऽपि तथैव । गन्धद्रव्यविशेषसूक्ष्मरजोधूमादिभिर्व्यभिचारात् । न हि
गन्धद्रव्यादिकमपि नासायां निविशमानं तद्विवरद्वारदेशोद्भिन्नश्मश्रुप्ररेकं दृश्यते । पञ्चमः पुनः
असिद्धः । तथाहि । न गगनगुणः शब्दः, अस्मदादिप्रत्यक्षत्वाद्, रूपादिवत् । इति सिद्धः
पौद्गलिकत्वात् सामान्यविशेषात्मकः शब्द इति ॥


( २ ) अत्यन्त सघन प्रदेशमें प्रवेश करते और निकलते हुए नहीं रुकता है; ( ३ ) शब्दके पूर्व और पश्चात्
उसके अवयव नहीं दिखाई देते; ( ४ ) वह सूक्ष्म मूर्त द्रव्योंका प्रेरक नहीं है; तथा ( ५ ) शब्द आकाशका
गुण है । ( १ ) उक्त हेतुओंमें प्रथम हेतु असिद्ध है । क्योंकि शब्द पर्यायका आश्रय भाषावर्गणा
है ( सजातीय वस्तुओंके समुदायको वर्गणा कहते हैं, जिन पुद्गल वर्गणाओंसे शब्द बनते हैं,
उन्हें भाषावर्गणा कहते हैं ), आकाश नहीं । तथा, शब्दका आश्रय यह भाषावर्गणा स्पर्श गुणसे निर्णीत
किया जाता है । जैसे, शब्दका आश्रय भाषावर्गणा स्पर्शसे युक्त है; क्योंकि जिस प्रकार गन्धके आश्रित द्रव्य-
परमाणु इन्द्रिय ( घ्राणेन्द्रिय ) का विषय होनेसे, वायुके अनुकूल होनेपर दूर खड़े हुए मनुष्यके पास पहुँच
जाते हैं, और वायुके प्रतिकूल होनेपर पास बैठे हुए मनुष्य तक भी नहीं पहुँचते; उसी प्रकार शब्दके आश्रित
द्रव्यपरमाणु भी इन्द्रिय ( कर्णेन्द्रिय ) का विषय होनेसे, वायुके अनुकूल होनेपर दूर देशमें „खड़े हुए श्रोताके
पास तक पहुँचते हैं, और वायुके प्रतिकूल होनेसे समीपमें बैठे हुए श्रोताके पास तक भी नहीं पहुँचते । अतएव
जैसे गन्ध इन्द्रियका विषय होनेसे पौद्गलिक है, वैसे ही शब्द भी इन्द्रियका विषय होनेसे पौद्गलिक है । इसलिए
वैशेषिकोंका प्रथम हेतु असिद्ध है । ( २ ) दूसरे हेतुमें गन्ध द्रव्यरूप विपक्षमें रहनेके कारण गन्ध द्रव्यसे व्यभि-
चार आता है, इसलिए यह हेतु अनैकान्तिक है । वर्तनशील उत्कृष्ट कस्तूरिका आदि गन्ध द्रव्य बन्द द्वारवाले
मकानमें प्रवेश करते और निकलते हुए नहीं रुकते फिर भी पौद्गलिक हैं । शंका—बन्द द्वारवाले मकानमें सूक्ष्म
रन्ध्रोंका सद्भाव होनेसे उसमें अत्यन्त सघनता नहीं होती, अतः उस मकानमें गन्ध द्रव्यका प्रवेश होता है और
उसमेंसे वह बाहर निकलता है। अन्यथा जिसका द्वार खुला हुआ है ऐसे मकानमें, जिस प्रकार गन्ध द्रव्य अखण्ड
प्रवाह रूपमें प्रवेश करता है और उसमेंसे बाहर निकलता है, उसी प्रकार उस मकानमें सूक्ष्म रन्ध्रोंका अभाव
होनेपर, गन्ध द्रव्य अखण्ड प्रवाहके रूपसे क्यों नहीं प्रवेश करता और बाहर निकल जाता ? सर्वथा रन्ध्र रहित
प्रदेशमें गन्ध द्रव्यका निर्गम और प्रवेश संभव नहीं । समाधान—यह ठीक नहीं । क्योंकि शब्दके
भी विषयमें भी यही सम्भव है, अतएव दूसरा हेतु भी असिद्ध है । ( ३ ) तीसरा हेतु विद्युत् और उल्कापात
आदिसे व्यभिचारी है । क्योंकि विद्युत् आदिके अवयव विद्युत्के पहले और पीछे नहीं पाये जाते, फिर भी
विद्युत् आदि पौद्गलिक माने जाते हैं । ( ४ ) इसी तरह चौथा हेतु भी व्यभिचारी है, क्योंकि विशिष्ट गन्ध
द्रव्य, सूक्ष्म रज व धूम आदिके साथ उसका व्यभिचार है—विपक्षभूत गन्धद्रव्य, रज और धूल आदिमें वह
रहता है । नासिकामें प्रवेश करनेवाला गन्ध द्रव्य आदि भी नासिकाके विवरद्वारमें फूटी हुई श्मश्रुका प्रेरक
वह नहीं देखा जाता । तथा ( ५ ) पाँचवाँ हेतु असिद्ध है । शब्द आकाशका गुण नहीं है, क्योंकि वह रूपादिकी
तरह हमारी इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष है । इसलिए पौद्गलिक होनेसे शब्दको सामान्य और विशेष रूप ही
मानना चाहिए ।

१२८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक १४
न च वाच्यम् आत्मन्यपौद्गलिकेऽपि कथं सामान्यविशेषात्मकत्वं निर्विवादमनुभूयत
इति । यतः संसार्यात्मनः प्रतिप्रदेशमनन्तानन्ताकर्मपरमाणुभिः सह वह्नितापितघनकुट्टि-
तनिर्विभागपिण्डीभूतसूचीकलापवल्लोलीभावमापन्नस्य कथञ्चित् पौद्गलिकत्वा१भ्यनुज्ञाना-
दिति । यद्यपि स्याद्वादिनां पौद्गलिकमपौद्गलिकं च सर्वं वस्तु सामान्यविशेषात्मकं, तथा-
प्यपौद्गलिकेषु धर्माधर्माकाशाकालेषु तदात्मत्वमर्वाग्दृशां न तथाप्रतीतिविषयमायाति ।
पौद्गलिकेषु पुनस्तत् साध्यमानं तेषां सुश्रद्धानम् । इत्यप्रस्तुतमपि शब्दस्य पौद्गलिकत्वमत्र
सामान्यविशेषात्मकत्वसाधनायोपन्यस्तमिति ॥
अत्रापि नित्यशब्दवादिसंमतः शब्दैकत्वैकान्तः, अनित्यशब्दवाद्यभिमतः शब्दानेकत्वै-
कान्तश्च प्राग्दर्शितदिशा प्रतिक्षेप्यः । अथवा वाच्यस्य घटादेरर्थस्य सामान्यविशेषात्मकत्वे
तद्वाचकस्य ध्वनेरपि तत्त्वम् । शब्दार्थयोः कथञ्चित् तादात्म्याभ्युपगमात् । यदाहुर्भद्रबाहु-
स्वामिपादाः—
“अभिहाणं अभिहेयाउ होइ भिण्णं अभिण्णं च ।
खुरअग्गिमोयगुच्चारणम्मि जम्हा उ वयणसवणाणं ॥ १ ॥
तथा, आत्माके अपौद्गलिक न होनेपर भी उसका सामान्य-विशेष रूपत्व निर्विवाद रूपसे अनुभवमें
नहीं आता—ऐसा नहीं कहना चाहिए । क्योंकि जिस प्रकार अग्निमें तपाया हुआ सुइयोंका समूह घनसे कूटा
जानेपर अविभागी एक पिण्डरूप बन जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक प्रदेशकी अपेक्षा, अनन्तानन्त कर्म पर-
माणुओंके साथ संश्लिष्ट एकीभावको प्राप्त संसारी आत्माको कथंचित् पौद्गलिक स्वीकार किया गया है ।
यद्यपि स्याद्वादको माननेवालोंके मतमें पौद्गलिक और अपौद्गलिक सभी वस्तु सामान्य-विशेष रूप हैं, फिर
भी अल्पज्ञानी धर्म, अधर्म, आकाश, काल इन अपौद्गलिक पदार्थोंके सामान्य-विशेषत्वको नहीं समझ
सकते; शब्द आदि पौद्गलिक पदार्थोंमें सामान्य-विशेषत्वको अच्छी तरह समझ सकते हैं । अतएव
यहाँ शब्दका पौद्गलिक प्रस्तुत न होनेपर भी उसके सामान्य-विशेष रूप सिद्ध करनेके लिये पुद्गलकी पर्याय
बताया गया है ।
नित्य शब्दवादी मीमांसकोंके मतके अनुसार शब्द सर्वथा एक है, और अनित्य शब्दवादी बौद्धोंके
अनुसार शब्द सर्वथा अनेक है—इन दोनों मतोंका उक्त पद्धतिसे खण्डन करना चाहिये । अथवा, वाच्य घटादि-
के सामान्य-विशेष रूप सिद्ध होनेपर, वाचक शब्दोंको भी सामान्य-विशेष मानना चाहिये । क्योंकि शब्द
( वाचक ) और अर्थ ( वाच्य ) का कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध माना गया है । भद्रबाहु स्वामीने भी
कहा है—
“वाचक वाच्यसे भिन्न भी है, और अभिन्न भी है । खुर ( छुरा ), अग्नि और मोदक शब्दोंका
उच्चारण करते समय बोलनेवालोंके मुख और सुननेवालोंके कान ‘खुर’ से नहीं छिदते, ‘अग्नि’ से नहीं
१—नायमेकान्तः अमूर्तिरेवात्मेति । कर्मबन्धपर्यायापेक्षया तदावेशात्स्यान्मूर्तः । यद्येवं कर्मबन्धावेशा-
दस्यैकत्वे सत्यविवेकः प्राप्नोति । नैष दोषः । बन्धं प्रत्येकत्वे सत्यपि लक्षणभेदादस्य नानात्वमवसीयते ।
उक्तं च—
बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवइ तस्स णाणत्तं । तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो होइ जीवस्स ॥
छाया—बन्धं प्रत्येकत्वे लक्षणतः भवति तस्य नानात्वं । तस्मात् अमूर्तभावः अनेकान्तं भवति जीवस्य ॥
सर्वार्थसिद्धौ पृ. ८८

द्वितीय भाग: बौद्ध शून्यवाद व क्षणिकवाद समीक्षा एवं स्याद्वाद सिद्धि

अन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२९
नवि छेओ नवि दाहो ण पूरणं तेण भिन्नं तु ।
जम्हा य मोयगुच्चारणम्मि तत्थेव पच्चओ होइ ॥ २ ॥
न य होइ स अन्नत्थे तेण अभिन्नं तदत्थाओ ।"¹
एतेन—"विकल्पयोनयः शब्दा विकल्पाः शब्दयोनयः
कार्यकारणता तेषां नार्थं शब्दाः स्पृशन्त्यपि ॥"
इति प्रत्युक्तम् । "अर्थाभिधानप्रत्ययास्तुल्यनामधेया"² इति वचनात् । शब्दस्य ह्येतदेव
तत्त्वं यदभिधेयं याथात्म्येनासौ प्रतिपादयति । स च तत् तथाप्रतिपादयन् वाच्यस्वरूपपरि-
णामपरिणत एव वक्तुं शक्यः, नान्यथा, अतिप्रसङ्गात् । घटाभिधानकाले पटाद्यभिधानस्यापि
प्राप्तेरिति ।
अथवा भङ्ग्यन्तरेण सकलं काव्यमिदं व्याख्यायते । वाच्यं वस्तु घटादिकम् । एका-
त्मकमेव एकस्वरूपमपि सत्, अनेकम् अनेकस्वरूपम् । अयमर्थः । प्रमाता तावत् प्रमेयस्वरूपं
लक्षणेन निश्चिनोति । तच्च सजातीयविजातीयव्यवच्छेदादात्मलाभं लभते । यथा घटस्य सजा-
तीया मृन्मयपदार्थाः, विजातीयाश्च पटादयः । तेषां व्यवच्छेदस्तल्लक्षणम् । पृथुबुध्नोदराद्या-
जलते, और 'मोदक' से नहीं भर आते, अतएव वाचकसे वाच्य भिन्न है। तथा 'मोदक' शब्दसे मोदकका ही
ज्ञान होता है, अग्निका नहीं, इसलिये वाचक ( शब्द ) और वाच्य ( अर्थ ) अभिन्न हैं ।"
इस कथनसे—
"विकल्पसे शब्द उत्पन्न होते हैं, और शब्दसे विकल्प उत्पन्न होते हैं, अतएव शब्द और विकल्प दोनों-
में कार्य-कारण संबंध हैं, परन्तु शब्द अपने अर्थसे भिन्न हैं ( अतएव दोनों एक दूसरेसे भिन्न हैं ) ।"—
यह कथन भी खंडित हो जाता है। क्योंकि "अर्थ, अभिधान और प्रत्यय ये पर्यायवाची शब्द हैं", ऐसा
कहा गया है। जब शब्द वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करता है, तब वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन
करना ही शब्दका स्वरूप है। वाच्यार्थका यथार्थरूपसे प्रतिपादन करनेवाले शब्दका, वाच्यका स्वरूप जिसमें
अन्तर्निहित है ऐसे अपने परिणामके स्वरूपसे परिणत होनेपर ही उच्चारण करना शक्य है ( जैसे घटके यथार्थ
स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाला शब्द वाच्यभूत घटके स्वरूपका ज्ञान होनेके अनन्तर वाच्यके स्वरूपसे युक्त
अपने घट स्वरूप शब्दके परिणामस्वरूपसे परिणत होनेपर ही घट शब्दका उच्चारण शक्य है ), अन्यथा नहीं।
क्योंकि घट शब्दके उच्चारण कालमें पट आदि शब्दोंका उच्चारण होनेसे अतिप्रसंग उपस्थित होता है।
अथवा, दूसरी तरहसे श्लोकका अर्थ किया जा सकता है। वाच्य घट आदि एक रूप होकर भी
अनेक रूप हैं। भाव यह है कि प्रमाता प्रमेयभूत पदार्थके स्वरूपका उसके लक्षण द्वारा उसका निश्चय करता
है। सजातीय और विजातीय पदार्थोंका व्यवच्छेद करनेसे लक्षण अस्तिरूपको प्राप्त करता है। उदाहरणके
लिए, मिट्टीसे बने पदार्थ घटके सजातीय और पट आदि पदार्थ विजातीय होते हैं। इन सजातीय और विजा-
१. छाया—अभिधानमभिधेयाद् भवति भिन्नमभिन्नं च ।
क्षुराग्निमोदकोच्चारणे यस्मात् तु वदनश्रवणयोः ॥
नाऽपि च्छेदो नापि दाहो न पूरणं तेन भिन्नं तु ।
यस्माच्च मोदकोच्चारणे तत्रैव प्रत्ययो भवति ॥
न च भवति अन्यार्थे तेनाऽभिन्नं तदर्थात् ।
२. बाह्यः पृथुबुध्नोदराकारोऽर्थोऽपि घट इति व्यपदिश्यते । तद्वाचकमभिधानं घट इति । तद्ज्ञानरूपः
प्रत्ययोऽपि घट इति । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति । किमिदं पुरो दृश्यते घटः । किमसौ वक्ति घटं । किमस्य
चेतसि स्फुरति घटः ।
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