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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 458 में से

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पृष्ठ 163

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी १११
तैर्वादिभिस्तात्त्विकात्मब्रह्मव्यतिरिक्ता या माया-अविद्या प्रपञ्चहेतुः परिकल्पिता, सा
सद्रूपा असद्रूपा वा द्वयी गतिः। सती-सद्रूपा चेत् तदा द्वयतत्त्वसिद्धिः—द्वाववयवौ यस्य तद्
द्वयं, तथाविधं यत् तत्त्वं परमार्थः, तस्य सिद्धिः। अयमर्थः। एकं तावत् त्वदभिमतं तात्त्वि-
कमात्मब्रह्म, द्वितीया च माया तत्त्वरूपा सद्रूपतयाऽङ्गीक्रियमाणत्वात्। तथा चाद्वैतवादस्य
मूले निहितः कुठारः। अथेति पक्षान्तरद्योतने। यदि असती-गगनाम्भोजवद्वस्तुरूपा सा
माया, ततः हन्त इत्युपदर्शने आश्चर्यं वा। कुतः प्रपञ्चः। अयं त्रिभुवनोदरविवरवर्तिपदार्थ-
सार्थरूपः प्रपञ्चः कुतः ? न कुतोऽपि संभवतीत्यर्थः। मायाया अवस्तुत्वेनाभ्युपगमात् अवस्तु-
नश्च तुरङ्गशृङ्गस्येव सर्वोपाख्याविरहितस्य साक्षात्क्रियमाणेद्दशविवर्तजननेऽसमर्थत्वात्।
किलेन्द्रजालादौ मृगतृष्णादौ वा मायोपदर्शितानामर्थक्रियायामसामर्थ्यं दृष्टम् अत्र तु तदु-
पलम्भात् कथं मायाव्यपदेशः श्रद्धीयताम्। अथ मायापि भविष्यति, अर्थक्रियासमर्थपदार्थो-
पदर्शनक्षमा च भविष्यति इति चेत्, तर्हि स्ववचनविरोधः। न हि भवति माता च वन्ध्या
चेति। एनमेवार्थं हृदि निधायोत्तरार्धमाह। मायैव चेदित्यादि। अत्रैवकारोऽप्यर्थः। अपि च
समुच्चयार्थः। अग्रेतनचकारश्च तथा। उभयोश्च समुच्चयार्थयोर्योगपद्यद्योतकत्वं प्रतीतमेव।
यथा रघुवंशे “ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः”१। इति तदयं वाक्यार्थः माया च भवि-
ष्यति अर्थसहा च भविष्यति। अर्थसहा-अर्थक्रियासमर्थपदार्थोपदर्शनक्षमा। चेच्छब्दोऽत्र
योज्यते, इति चेत्, एवं परमाशङ्क्य तस्य स्ववचनविरोधमुद्भावयति। तत् किं भवत्परेषां
माता च वन्ध्या च। किमिति-संभावने। संभाव्यत एतत्-भवतो ये परे-प्रतिपक्षाः,
तेषां भवत्परेषां भवद्व्यतिरिक्तानां, भवदाज्ञापृष्ठग्भूतत्वेन तेषां वादिनां, यन्माता च
भविष्यति, वन्ध्या च भविष्यतीत्युपहासः। माता हि प्रसवधर्मिणी वनितोच्यते। वन्ध्या च
तद्विपरीता। ततश्च माता चेत्कथं वन्ध्या, वन्ध्या चेत्कथं माता तदेवं। मायाया अवास्तव्या
अप्यर्थसहत्वेऽङ्गीक्रियमाणे, प्रस्तुतवाक्यवत् स्पष्ट एव स्ववचनविरोधः। इति समासार्थः॥
व्यासार्थस्त्वयम्। ते वादिन इदं प्रणिगदन्ति। तात्त्विकमात्मब्रह्मैवास्ति—
नहीं हो सकती। यदि माया असत् है, तो तीनों लोकोंके पदार्थोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। यदि कहो कि
माया माया भी होकर अर्थक्रिया करती है, तो जैसे एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती,
वैसे ही मायामें भी एक साथ दो विरोधी गुण नहीं रह सकते।
व्याख्यार्थ—ब्रह्माद्वैतवादियोंने जो तत्त्वरूप ब्रह्मात्मसे भिन्न माया (अविद्या) को प्रपंचका
कारण स्वीकार किया है, वह माया सत् रूप है, या असत् रूप ? यदि माया सत् है, तो ब्रह्म और माया दो
पदार्थोंके अस्तित्व होनेसे अद्वैतकी सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि अद्वैतवादियोंने एक आत्मा (ब्रह्म) को
ही सत् पदार्थ स्वीकार किया है, इसलिये यदि माया भी सत् हो, तो अद्वैतके मूलमें ही कुठाराघात होता है।
यदि मायाको आकाशके पुष्प की तरह अवस्तु स्वीकार करो, तो संसारके किसी भी पदार्थकी उत्पत्ति नहीं
हो सकती। क्योंकि मायाके अवस्तु होनेसे घोड़ेके सींगकी तरह वह प्रत्यक्षसे दृष्टिगोचर होनेवाले प्रपंचको
उत्पन्न नहीं कर सकती। इन्द्रजाल तथा मृगतृष्णा आदिमें मायाद्वारा दिखाये जानेवाले पदार्थ अर्थक्रिया नहीं
करते। परन्तु समस्त पदार्थोंमें अर्थक्रिया देखनेमें आती है, अतएव इन पदार्थोंमें मायाका व्यवहार नहीं हो
सकता। यदि आप कहें कि माया माया भी है, और वह अर्थक्रिया भी करती है, यह ठीक नहीं। क्योंकि
इसमें स्ववचन विरोध आता है। जिस प्रकार एक ही स्त्री माता और वंध्या दोनों नहीं हो सकती, वैसे ही
माया भी माया (अवस्तु) होकर अर्थक्रिया (वस्तु) नहीं कर सकती। यह संक्षिप्त अर्थ है।
यहाँ विस्तृत अर्थ दिया जाता है।
वेदान्ती—हमारे मतसे तत्त्व रूप एक ब्रह्म ही सत् है। शास्त्रोंमें कहा भी है—
१ अव्याक्षेपो भविष्यन्त्याः कार्यसिद्धेर्हि लक्षणम्। इत्युत्तरार्धम्। रघुवंशे १०-६।