स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 458 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रत्यनुमानसे बाधित है । इसलिये ज्ञानको स्वसंवेदक ही मानना चाहिये ।`
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(२) यह अनुमान व्यर्थविशेष्य भी है, क्योंकि यहां 'ईश्वरज्ञानान्यत्व' हेतुके विशेष्य 'प्रमेयत्व' हेतुके कहनेसे
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कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । (३) उक्त हेतु अप्रयोजक होनेसे सोपाधिक भी है । क्योंकि 'स्वान्य-
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प्रकाश्यं ईश्वरज्ञानान्यत्वे सति, प्रमेयत्वात्' यह तर्क ज्ञानके साथ व्याप्त न हो कर जड़ पदार्थोंके साथ व्याप्त
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है, क्योंकि ईश्वरज्ञानसे भिन्न हो कर प्रमेय होनेपर भी स्तंभ वगैरह जड़ पदार्थ ही अपनेको छोड़ कर
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दूसरेसे प्रकाशित होते हैं ।
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अब अविद्या अथवा मायाके कारण तीनों लोकोंके वस्तु-प्रपंचको अपारमार्थिक स्वीकार करनेवाले
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ब्रह्माद्वैतवादियोंका उपहास करते हुए कहते हैं—
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श्लोकार्थ—यदि माया सत् रूप है, तो ब्रह्म और माया दो पदार्थोंका सद्भाव होनेसे अद्वैतकी सिद्धि
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