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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 458 में से

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पृष्ठ 169

अन्य. यो. व्य. श्लोक १३ ] स्याद्वादमञ्जरी ११७
आबालगोपालं तथैव प्रतिभासनात् । यच्च निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं तद्भावेदकम् इत्युक्तम् । तदपि
न सम्यक् । तस्य प्रामाण्यानभ्युपगमात् । सर्वस्यापि प्रमाणतत्त्वस्य व्यवसायात्मकस्यैवावि-
संवदाकत्वेन प्रामाण्योपपत्तेः । सविकल्पकेन तु प्रत्यक्षेण प्रमाणभूतेनैकस्यैव विधिरूपस्य
परब्रह्मणः स्वप्नेऽप्यप्रतिभासनात् । यदप्युक्तं “आहुर्विधातृ प्रत्यक्षम्” इत्यादि । तदपि न
पेशलम् । प्रत्यक्षेण ह्यनुवृत्तव्यावृत्ताकारात्मकवस्तुन एव प्रकाशनात् । एतच्च प्रागेव क्षुण्णम् ।
न ह्यनुस्यूतमेकमखण्डं सत्तामात्रं विशेषनिरपेक्षं सामान्यं प्रतिभासते । येन “यदद्वैतं तद्ब्रह्मणो
रूपम्” इत्याद्युक्तं शोभेत । विशेषनिरपेक्षस्य सामान्यस्य खरविषाणवदप्रतिभासनात् । तदुक्तम्-
“निर्विशेषं हि सामान्यं भवेत् खरविषाणवत् ।
सामान्यरहितत्वेन विशेषास्तद्वदेव हि” ॥
ततः सिद्धे सामान्यविशेषात्मन्यर्थे प्रमाणविषये कुत एवैकस्य परब्रह्मणः प्रमाणविषय-
त्वम् । यच्च प्रमेयत्वादित्यनुमानमुक्तम्, तदप्येतेनैवापास्तं बोद्धव्यम् । पक्षस्य प्रत्यक्षबाधित-
त्वेन हेतोः कालात्ययापदिष्टत्वात् । यच्च तत्सिद्धौ प्रतिभासमानत्वसाधनमुक्तम्, तदपि
साधनाभासत्वेन न प्रकृतसाध्यसाधनायालम् । प्रतिभासमानत्वं हि निखिलभावानां स्वतः
परतो वा ? न तावत् स्वतः, घटपटमुकुटशकटादीनां स्वतः प्रतिभासमानत्वेनासिद्धेः । परतः
प्रतिभासमानत्वं च परं विना नोपपद्यते इति । यच्च परब्रह्मविवर्तवर्तित्वमखिलभेदानामित्यु-
क्तम् । तदप्यन्वेत्रन्वीयमानद्वयाविनाभावित्वेन पुरुषाद्वैतं प्रतिबध्नात्येव । न च घटादीनां
प्रत्यक्षसे अद्वैत की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि वह संपूर्ण वस्तुसमूहमें विद्यमान होनेवाले भेदको ही
अर्थात् व्यावर्तक विशेषको ही प्रकाशित करता है । इसी प्रकारसे सभी लोगोंको प्रत्यक्षका ज्ञान होता है ।
निर्विकल्पक प्रत्यक्ष अद्वैत रूप ब्रह्मका ज्ञान कराता है, ऐसा जो कहा है, वह भी ठीक नहीं । क्योंकि निर्वि-
कल्पक प्रत्यक्षको प्रमाण रूपसे स्वीकार ही नहीं किया गया । कारण कि व्यवसायात्मक ( स्वपरको जाननेमें
साधकतम होनेवाले ) सभी प्रमाण अविसंवादी होनेसे प्रामाण्य माने जाते हैं ( और निर्विकल्पक प्रत्यक्ष
स्वपरको जाननेमें साधकतम नहीं है ) । प्रमाणभूत सविकल्पक प्रत्यक्षके द्वारा भी केवल एकरूप विधिरूप
परब्रह्म स्वप्नमें भी प्रतिभासित नहीं हो सकता । तथा, “प्रत्यक्ष विधायक (सन्मात्रका ग्राहक) है”—ऐसा जो
कहा है, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि प्रत्यक्षके द्वारा सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ ही प्रकाशित किया जाता है—
इसका पहले ही खण्डन किया जा चुका है । पदार्थोंमें अनुस्यूत, एकमात्र रूप, अखण्ड और सत्तामात्र रूप
विशेषकी अपेक्षा न रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता जिससे यह कहा जा सके कि “जो अद्वैत
है वह ब्रह्मका स्वरूप है ।” जिस प्रकार खरविषाण प्रतिभासित नहीं होता उसी तरह विशेष की अपेक्षा न
रखनेवाला सामान्य प्रतिभासित नहीं होता । कहा भी है—
“विशेष रहित सामान्य खरविषाणकी तरह है, और सामान्य रहित होनेसे विशेष भी वैसा ही है ।”
इस प्रकार यह सिद्ध हो जाने पर कि सामान्य-विशेषात्मक पदार्थ प्रमाणका विषय होता है, केवल
एकरूप परब्रह्म प्रमाणका विषय कैसे बन सकता है ? तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं प्रमेयत्वात्' यह अनुमान भी
इसीसे खंडित हो जाता है । क्योंकि ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षके प्रत्यक्षसे बाधित होनेके कारण प्रमेयत्व हेतु
कालात्ययापदिष्ट है । तथा, ‘विधिरेव तत्त्वं' इस पक्षकी सिद्धिके लिए जो 'प्रतिभासमानत्व' हेतु दिया गया था,
वह साधनाभास होनेसे प्रकृत साध्यकी सिद्धि करनेमें असमर्थ है । हम पूछते हैं कि सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रतिभास
स्वयं होता है, या दूसरेसे ? सम्पूर्ण पदार्थ स्वयं प्रतिभासित नहीं हो सकते, क्योंकि घट, पट, मुकुट, शकट
आदि पदार्थोंकी स्वतः प्रतिभासमानत्वके रूपसे सिद्धि नहीं होती । पदार्थोंका दूसरेसे प्रतिभासित होना भी
नहीं बन सकता क्योंकि दूसरेसे प्रतिभासित होना दो पदार्थों (द्वैत) के बिना संभव नहीं । तथा, ‘संपूर्ण पदार्थ
१. मीमांसाश्लोकवार्तिक ५ आकृतिवादे १० ।