स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक १४ ] स्याद्वादमञ्जरी १२१
एतच्च पक्षत्रयमपि किञ्चित् चर्च्यते । तथाहि । संग्रहनयावलम्बिनो वादिनः प्रति-
पादयन्ति । सामान्यमेव तत्त्वम् । ततः पृथग्भूतानां विशेषाणामदर्शनात् । तथा सर्वमेकम् ।
अविशेषेण सदितिज्ञानाभिधानानुवृत्तिल्लिङ्गानुमितसत्ताकत्वात् । तथा द्रव्यत्वमेव तत्त्वम् ।
ततोऽर्थान्तरभूतानां धर्माधर्माकाशकालपुद्गलजीवद्रव्याणामनुपलब्धेः । किञ्च, ये सामान्यात्
पृथग्भूता अन्योऽन्यव्यावृत्त्यात्मका विशेषाः कल्प्यन्ते, तेषु विशेषत्वं विद्यते न वा ? नो चेद्
निःस्वभावताप्रसङ्गः । स्वरूपस्यैवाभावात् । अस्ति चेत् तर्हि तदेव सामान्यम् । यतः समानानां
भावः सामान्यम् । विशेषरूपतया च सर्वेषां तेषामविशेषेण प्रतीतिः सिद्धैव ॥
अपि च विशेषाणां व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वं लक्षणम् । व्यावृत्तिप्रत्यय एव विचार्यमाणे
न घटते । व्यावृत्तिर्हि विवक्षितपदार्थे इतरपदार्थप्रतिषेधः । विवक्षितपदार्थश्च स्वस्वरूपन्यव-
स्थापनमात्रपर्यवसायी, कथं पदार्थान्तरप्रतिषेधे प्रगल्भते । न च स्वरूपसत्त्वादन्यत् तत्र
किमपि, येन तन्निषेधः प्रवर्त्तेत । न च व्यावृत्तौ क्रियमाणायां स्वात्मव्यतिरिक्ता विश्वत्रय-
वर्तिनोऽतीतवर्तमानानागताः पदार्थास्तस्माद् व्यावर्तनीयाः । ते च नाज्ञातस्वरूपा व्यावर्तयितुं
शक्याः । ततश्चैकस्यापि विशेषस्य परिज्ञाने प्रमातुः सर्वज्ञत्वं स्यात् । न चैतत्प्रातीतिकं
यौक्तिकं वा । व्यावृत्तिस्तु निषेधः । स चाभावरूपत्वात् तुच्छः कथं प्रतीतिगोचरमञ्चति
खपुष्पवत् ॥
तथा येभ्यो व्यावृत्तिः ते सद्रूपा असद्रूपा वा ? असद्रूपाश्चेत् तर्हि खरविषाणात् किं न
व्यावृत्तिः । सद्रूपाश्चेत् सामान्यमेव । या चेयं व्यावृत्तिर्विशेषैः क्रियते सा सर्वासु
इन तीनों पक्षोंकी यहाँ कुछ चर्चा की जाती है : (१) संग्रहनयको स्वीकार करनेवाले अद्वैतवादी-
मीमांसक-सांख्य : सामान्य ही एक तत्त्व है, सामान्यसे भिन्न विशेष दृष्टिगोचर नहीं होते । सब पदार्थों-
का सामान्य रीतिसे ज्ञान होता है, और सब पदार्थ 'सत्' कहे जाते हैं, अतएव समस्त पदार्थ एक हैं ।
अतएव द्रव्यत्व ही एक तत्त्व है, क्योंकि द्रव्यत्वको छोड़ कर धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव
नहीं पाये जाते । तथा, सामान्यसे भिन्न और एक दूसरेकी व्यावृत्ति रूप 'विशेष' स्वीकार करनेवाले वादियोंसे
हम पूछते हैं कि विशेषोंमें विशेषत्व रहता है, या नहीं ? यदि विशेषोंमें विशेषत्व नहीं रहता तो इसका अर्थ यह
हुआ कि विशेष निःस्वभाव हैं, क्योंकि विशेषोंमें निजस्वरूप विशेषत्व नहीं रहता । यदि विशेषोंमें विशेषत्व
रहता है, तो इसी विशेषत्वको हम सामान्य कहते हैं । क्योंकि समानके भावको ही सामान्य कहा है, और
विशेषरूपत्वसे इन सभी भावोंकी समान रूपसे होनेवाली प्रतीति सिद्ध ही है ।
तथा, विवक्षित पदार्थमें दूसरे पदार्थके निषेध करनेको व्यावृत्ति कहते हैं, इसी व्यावृत्ति प्रत्ययके
हेतुको विशेष माना गया है ( जैसे घटमें पटके निषेध करनेसे घटकी पटसे व्यावृत्ति होती है ) । परन्तु यह
विवक्षित पदार्थ ( घट ) अपने स्वरूपको ही सिद्ध कर सकता है, दूसरे पदार्थोंका निषेध नहीं कर सकता ।
स्वरूपके अस्तित्वको छोड़कर और कोई भी चीज नहीं है जिससे कि अन्य पदार्थोंके निषेधकी आवश्यकता हो ।
यदि विवक्षित पदार्थ दूसरे पदार्थोंके निषेध करनेमें भी समर्थ हो, तो उसे आत्मस्वरूप से भिन्न तीनों लोकोंके
भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थोंसे भी अपनी व्यावृत्ति करनी चाहिये । और जब तक तीनों लोकोंके भूत, भविष्य,
और वर्तमान पदार्थोंका ज्ञान न हो, उस समय तक इन पदार्थोंकी व्यावृत्ति नहीं की जा सकती । इसलिये
एक विशेषके ज्ञान करनेमें तीनों लोकोंके समस्त पदार्थोंसे उसकी व्यावृत्ति करनेके लिये प्रमाताको सर्वज्ञ होना
पड़ेगा । यह न तो अनुभवसिद्ध है, और न युक्तिसे ही सिद्ध है । तथा, निषेधको ही व्यावृत्ति कहा गया है;
यह व्यावृत्ति अभाव रूप होनेसे तुच्छ है, इसलिये आकाश-कुसुमकी तरह विश्वास योग्य नहीं है ।
तथा, जिन पदार्थोंसे दूसरे पदार्थोंकी व्यावृत्ति की जाती है, वे पदार्थ सत् हैं, या असत् ? यदि असत्
हैं, तो असत् खरविषाणसे भी घटकी व्यावृत्ति की जानी चाहिये । यदि व्यावृत पदार्थोंको सत् मानो तो फिर
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