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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

हमारे सपनों का भारत ?
हमारे सपने 1947 के दिनों में व 1942 के करीब क्या थे, यह सोचना
आज शायद आसान है। उन दिनों तो एक तीव्र भावना थी, अच्छे-अच्छे ख्याल
थे कि स्वाधीन होना है, और स्वाधीन होंगे तो सबको सम्मान से भोजन, कपड़ा,
मकान मिलेगा, सामुदायिक जीवन होगा, शांति से रहेंगे और विश्व में भी शांति
का ही सन्देश देंगे इत्यादि।
लेकिन किसी भी स्वप्न या लक्ष्य का स्वरूप, आत्मबोध तथा आत्मचित्र
के आधार पर ही निर्धारित होता है। उस दृष्टि से देखें तो लगता है कि हमारा
आत्मचित्र तो बहुत समय से हमारा अपना नहीं है। उन दिनों भी यही स्थिति
थी। हमें अंग्रेजों ने और अंग्रेजी शिक्षा ने जो-जो सिखा दिया था, उसे ही हम
अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगे थे। जैसे, अंग्रेजों या उनकी शिक्षा का
कहना था या उनकी शिक्षा थी कि 'भारत के ऊपर तो सदैव दूसरों ने ही राज
किया है, भारत कभी स्वाधीन रहा नहीं।'' वे यह भी कहते थे कि – उन्होंने हमें
बचा रखा है, नहीं तो इस्लाम व पश्चिम के इस्लामी देश भारत को खा जायेंगे।
हमारे इतिहास तथा शास्त्रों के बारे में भी वे जो कहते थे, उसे ही हम पढ़े-लिखे
लोगों ने सत्य मान लिया था। बहुत से सुधार-आन्दोलन भी उसी मान्यता में से
उपजे थे। अपने इतिहास के प्रति ग्लानि तथा हीनता का भाव शिक्षित भारतीयों
में गहराई तक घर कर गया था। यह अवश्य है कि हम में से जो स्वाधीनता की
तीव्र भावना से भरे थे, वे भारतीय अतीत को इस तरह से हीन दिखाने के प्रयासों
को अस्वीकार करते थे।
यह भी था कि गांधी जी ने "हिन्द स्वराज" में पूर्व और पश्चिम की दो
भिन्न-भिन्न सभ्यताओं की बात उठाई और यहां के जनमानस में पहले से ही बैठी
अपनी सभ्यता की विशेषताएं दिखाई। उसका भी कुछ प्रभाव हमारे ऊपर था;
लेकिन आधुनिक शिक्षित वर्ग में ज्यादातर तो हवा एक ही थी कि पश्चिम बहुत
आगे बढ़ गया है, हमें भी उसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ना है। ज्ञान और प्रेरणा,
दोनों के लिए हम पश्चिम की ओर ही देखते थे। अपने वृहत् समाज के लोगों की
उन्नति करनी है, कल्याण करना है, विकास करना है, यह भाव तो था; पर अपने
समाज से कुछ सीखना भी है, वह स्वयं भी रास्ते की रुकावटें हट जाने पर कुछ
कर सकता है, यह भाव बहुत कम था।
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विश्व के बारे में हमारी जो धारणा थी, उसमें पश्चिम की शक्ति और
सफलताएं ही प्रमुख थीं, उसकी विकृतियां, ऐतिहासिक क्रूरताएं, बर्बरताएं हमारे
ध्यान में नहीं थीं। वे संसार के बारे में क्या विचार और धारणाएं रखते हैं, यह
हमारी जानकारी में नहीं था। इस प्रकार न तो हमें स्वतंत्र आत्मबोध था, न ही
सही विश्व-बोध। अपने बारे में भी हमारा आत्मचित्र उनके द्वारा गढ़ा हुआ था
और उनके बारे में भी हमारी मान्यताएं किसी अध्ययन या स्वयं की सोच-समझ
पर आधारित नहीं थी।
इसका कोई मामूली असर नहीं हुआ। अधिकांश सुधार-आंदोलन
भारतीय इतिहास के प्रति ग्लानि का भाव जगाने वाले बन गए। और तो और,
"स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" का उद्घोष करने वाले लोकमान्य
बाल गंगाधर तिलक ने भी 'ओरायन' में "आर्कटिक होम इन द वेदाज" में इतिहास
की पश्चिम वालों की ही दृष्टि अपनाई।
ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र विवेक में यह कमी ब्रिटिश-काल में ही आई।
वस्तुतः समाज पर पड़ने वाले दबावों का प्रभाव साहित्य आदि में भी होता है।
इसलिए हमारे जो महान ग्रन्थ हैं, महाकाव्य हैं, उनको भी उनकी रचना के समय
और परिवेश के सन्दर्भ में ही देखना चाहिए। यह नहीं मानना चाहिए कि सभी
कुछ प्राचीन काल से एक-सा ही है। वाल्मीकि रामायण और तुलसी की रामायण
(रामचरित मानस) में जो अंतर है, वह अधिकांश समय के भेद से ही है। भिन्न-भिन्न
स्मृतियों में भी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, इसका कारण भी यही समय का
अंतर है। अगर हम विवेक-बुद्धि से उन सबको नहीं देखेंगे तो भ्रांतियां स्वाभाविक
हैं।
संसार के बारे में हमें आज अधिक जानकारी प्राप्त है। उसके प्रकाश
में हमें संसार को और स्वयं को समझना चाहिए। लेकिन अभी तो दिखता यह है
कि हमारा जो सबल वर्ग है, वह अपने समाज से बौद्धिक और भावनात्मक स्तर
पर बहुत समय से दूर होता चला गया है। ब्रिटिश काल में इसने अंग्रेजों के
आचार-व्यवहार और बोली तथा अभिव्यक्ति की विधियों को अंगीकार कर
लिया। इससे ऐसी दृष्टि बनी कि हमारे एक अभिजन राजनेता ने 1945 में गांधी
जी से कहा कि कोई यह कैसे कबूल कर सकता है कि गांव के लोगों में भी कोई
सद्गुण और सामर्थ्य है, वे तो पूर्णतया मूर्ख ही हैं।
फलतः समाज के विकास के लिए हमने वे ही तरीके अपनाने शुरू
किए जो पश्चिम के थे। 1938 ई. में श्री सुभाषचन्द्र बोस ने एक राष्ट्रीय योजना
समिति बनाई थी, जिसके संयोजक वे स्वयं थे और अध्यक्ष थे श्री जवाहरलाल
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नेहरू। उस समिति ने भी योजना का जो रूप सोचा, वह पश्चिमी ढंग का ही
था।
इस तरह स्वतंत्र भारत में हम जिस रास्ते पर चले, उसकी नींव तो
बहुत पहले पड़ गई थी। अब हमें यह समझना होगा कि हर सभ्यता और
संस्कृति की अपनी-अपनी परम्पराएं होती हैं, उसके अनुसार ही वे सभ्यताएं
विकास किया करती हैं। जैसे 1850 के यूरोप में जो विज्ञान व तकनीकी विकसित
थी वह चीन में 2000 वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुकी थी। लेकिन चीन ने बारूद
बनाने की विधियों से उत्सवों आदि में काम आने वाली आतिशबाजियां व पटाखे
बनाए, जबकि यूरोप ने अब से पांच-छः सौ वर्ष पहले वही विधि जानकर युद्ध
और हिंसा के लिए हथियार बनाये। यह सभ्यताओं की दिशा की भिन्नता के
कारण ही हुआ। ऐसा नहीं है कि दक्षिणी या पूर्वी एशिया के लोग विज्ञान और
तकनीकी में उन्नत नहीं थे; लेकिन उनकी सभ्यता उन्हें मर्यादा सिखाती थी और
हिंसक दिशाओं में बढ़ने से रोकती थी। यह उनकी अक्षमता नहीं, उनका विवेक
था। भारत में भी इस्पात तथा लोहे के निर्माण की अपनी विकसित विधि थी।
सन के पौधे के उपयोग से कागज बनाने तथा इसी तरह अलग-अलग
वनस्पतियों, आदि से रंगाई के विविध रसायन बनाने की प्रौद्योगिकी भी विकसित
थी। हर्षवर्धन के समय में और 18 वीं सदी में भी, उत्तर प्रदेश, बिहार इत्यादि में
पानी से बर्फ बनायी जाती रही है। खेती और सिंचाई तथा जल-प्रबंध की
अत्यंत विकसित प्रौद्योगिकी तो थी ही। लेकिन हमने उसमें से कोई विशालकाय
और थोड़े से लोगों के पूर्ण नियंत्रण में चलने वाले ठाट नहीं खड़े किए।
यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा लगता है। विशेषकर
इंग्लैंड और अमेरिका तो पिछले पांच सौ बरसों से पूरी तरह हिंसक स्वभाव के
रहे हैं; वे दूसरों के अस्तित्व का आगे बढ़ना सह नहीं पाते, सबको अपने अधीन
ही रखना चाहते हैं। पिछले सप्ताह यहीं दिल्ली में अमरीकी विद्वान चोम्स्की ने
तो कहा ही है; पर यह केवल उनकी बात नहीं है, बल्कि यह सर्वमान्य ही है कि
यूरोप और अमेरिका स्वभाव से ही हिंसक हैं। और देशों में भी समय-समय पर
हिंसा तो रही ही है, लेकिन वे अधिकांशतः हिंसा को मर्यादित करते रहे हैं।
दक्षिण व पूर्वी एशिया के लोग स्वभाव से मुख्यतः अहिंसक ही रहे हैं, ऐसा कहा
जा सकता है। फिर भी, हमने तो यूरोप की ही शिक्षा-दीक्षा, विकास-दृष्टि तथा
जीवन-दृष्टि अपना ली।
स्वतंत्रता मिली, हमें लगा कि चमत्कार हो गया। पर आगे क्या करना
है, इसका कोई स्पष्ट चित्र नहीं था। 18 वीं शताब्दी के इस यूरोपीय विचार से
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ही हम भी भरे हुए थे कि यदि अवसर उचित रहे तो हम लोग भी उनके रास्ते पर
चलते हुए उनके बीसवीं सदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे। हमने मान लिया था कि
पश्चिमी चिंतन ही सारे संसार को जीत लेगा, इसलिए जल्दी-जल्दी उसी राह
पर हम बढ़ चले। लेकिन एकदम से पराई राह पर, अनचीन्ही, अपरिचित राह
पर चलना सबको तो नहीं आता। जिन्हें आता था, वे आगे बढ़ गए; पश्चिमीकृत
हो गए; बाकी यों ही पड़े रहे। इस तरह समाज के शक्तिशाली व सम्पन्न लोगों
की साधारण समाज से, वृहत् समाज से, दूरी बढ़ी, विलगाव बढ़ा, आत्मीयता
घटी।
फलतः समाज में कई स्तरों पर विभेद उभरे। पहले पुरुषों को अधिक
आधुनिक शिक्षा दी गई, तो वे कुछ पश्चिमी उपकरणों, वस्तुओं, साहित्य, मनोरंजन,
आदि का उपयोग करने और आनन्द लेने में समर्थ बने। पर भारतीय स्त्रियां ऐसी
शिक्षा में नहीं पड़ीं, उनकी भारतीय मानसिकता और सोच टिकी रही। इसलिए
घर के भीतर ही विखंडन हो गया; बाहर के कार्यक्षेत्र की बात घर पर कर
सकना सम्भव नहीं रहा और स्त्रियों और पुरुषों के संसार अलग-अलग होते
चले गये। मेरी मां पूछती - बेटा, क्या पढ़ रहा है, तो मैं उन्हें बता नहीं पाता;
कहता - तुम समझोगी नहीं। पहले जो लोग रामायण, भागवत्, रघुवंश, गीता,
महाभारत, पुराण, गणित-ज्योतिष, पंचतंत्र, हितोपदेश, व्याकरण आदि पढ़ते
थे, तो सरलता से मां को व परिवार की दूसरी स्त्रियों, बहनों व बेटियों को उनके
विषय में बता सकते थे, क्योंकि वे भी उन्हें समझ सकती थीं। पर अब यह
सम्भव नहीं रहा। खेती या पुराने हुनर, शिल्प, कला-कौशल, उद्योग आदि के
बारे में तो घर की स्त्रियां भी उतना ही जानती थीं, जितना पुरुष; बल्कि प्रायः
स्त्रियां कुछ अधिक ही जानती थीं। तो, पहले ऐसा विखंडन नहीं था, कार्यक्षेत्र के
बारे में घर पर बात की जा सकती थी; अब वह नहीं रहा।
इसी प्रकार, सम्पन्न लोगों और वृहत् समाज के बीच संवाद घटता
गया। मेटकाफ (अंग्रेज अधिकारी) ने जब 1930 के करीब कलकत्ते में कहा कि
इन भारतीयों का कुछ ठिकाना नहीं है, ये तो हवा के साथ चलते हैं, जाने कब
हमारे विरुद्ध हो जाएं, तो ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेण्टिक ने कहा कि -
नहीं, कलकत्ते के समाज के बड़े लोग तो बदल रहे हैं, हमारे अनुकूल हो रहे हैं,
अब वे गौपालन, गोसेवा, ब्राह्मण-भोजन, भिक्षा, आदि में खर्च करना बंद कर
रहे हैं, हमारे मनोरंजन में, हमारे सेवा-सत्कार में ज्यादा से ज्यादा खर्च कर रहे
हैं; इसलिए हमारे अनुकूल वर्ग बढ़ रहा है।
यह विभेद, यह विलगाव तो शायद 1830 के करीब से बढ़ता ही गया।
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अभी कुछ वर्ष पहले मैं हरिद्वार गया था तो वहां हमारे पांडे की बही में हमारे ही
कस्बे के एक व्यक्ति की लिखत थी- 1885 की; जो अंग्रेजी में थी। जब इतने वर्ष
पहले उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में एक व्यक्ति अंग्रेजी को प्रभुत्व की, प्रतिष्ठा की
भाषा मान रहा था, तो स्पष्ट है कि भेद तो बढ़ रहा था। वह बाद में गहरा ही
होता चला गया।
इस तरह अंग्रेजों की योजना ही सफल हुई। जो उन्होंने चाहा था,
अधिकांशतः वही हुआ। वे हमारी अपनी विद्या-बुद्धि तो नष्ट करना ही चाहते
थे। मैकाले के सामने कुछ अंग्रेज अफसरों ने यह तर्क रखा था कि यहां बंगाल
में तो एक लाख देशी स्कूल पहले से हैं, उन्हें हम दस-दस रुपया भी प्रति वर्ष दें
तो उनका काम चलता रहेगा। उसी में से अपने काम के लोग भी निकल आएंगे
या हम उनमें से छांट लेंगे। उस पर मैकाले ने कहा कि नहीं, उन्हें कुछ भी देने
का कोई औचित्य नहीं है, वह तो व्यर्थ होगा। पहले हम अपने प्रशिक्षकों को
प्रशिक्षित करें, फिर वे शिक्षण-संस्थाओं को बनायें और उनके माध्यम से काम
करें; तभी हमारी विश्व-दृष्टि का ज्ञान इन भारतीयों को होगा। तो इस तरह
हिन्दुस्तान को उन्होंने कोरी स्लेट मान लिया था और हमारे भी कुछ लोग तभी
से यही मान बैठे थे। उनकी विश्व-दृष्टि, शिक्षण-संस्थाओं वगैरह के द्वारा हम
तक पहुंची और हमने उसे ही अपना लिया, बिना मनन किए। पिछले 40-50
वर्षों में तो यह विचार मानस पर छा ही गया। जो लोग 1950 के करीब से ग्राम
पुनर्रचना, सामुदायिक विकास (कम्यूनिटी डिवेलपमेंट) इत्यादि चला रहे थे,
उन पर तो और भी अधिक।
अभी कुछ दिन पहले प्रख्यात दार्शनिक विद्वान दयाकृष्ण यहां दिल्ली
में बतला रहे थे कि 1850 के करीब से, जब अंग्रेजों ने भारत में विश्वविद्यालय
स्थापित करने शुरू किये, हमारा आत्मचित्र और आत्मस्मृति बिगड़नी शुरू हुई।
हम तबसे स्वयं को और अपने समाज व इतिहास को अंग्रेजों की दृष्टि से देखने
लगे। यह कुछ दुर्भाग्य ही है कि हमें यह समझ इतनी देर से आयी। मेरे विद्वान
मित्र श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज' का तो यह भी मानना है कि यह समझ भी हमारे
काम की तभी होगी जब हम अब तक की नासमझी और गलतियों व मूर्खताओं
के लिए प्रायश्चित्त कर लेंगे। गलती के लिए प्रायश्चित्त करना ही धर्म है, यह तो
हमारी पुरानी मान्यता है। रूस के प्रसिद्ध लेखक एलेक्जैंडर सोल्झेनित्सिन भी,
अपनी सभ्यताओं की मान्यताओं के आधार पर, प्रायश्चित को इसी तरह प्रतिष्ठा
देते हैं।
यह तो हमने सोचा ही नहीं कि यह हमारी अपनी विचार-परम्परा में
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से आने वाला अथवा उससे पुष्ट होने वाला विचार नहीं है, बल्कि यह तो पश्चिम
का ही विचार है। शायद प्लेटो का भी यही विचार रहा हो, पूंजीवाद और
मार्क्सवाद का तो है ही कि - लोग कुछ नहीं हैं, वे तो हमारे द्वारा सुधारे जाएंगे,
पीटे-डाले जाएंगे, फिर जिधर हम चाहेंगे, उधर वे चलते चले जाएंगे, हम बढ़ते
चले जाएंगे। जब, यह उनका विचार है तो उनमें इतनी शक्ति भी होती है कि
एक समय तक वे पूरे समाज को एक दिशा-विशेष में हांककर ले जाते हैं। जैसे,
सोवियत संघ ही था; मारपीट, वगैरह जो भी की, पर सत्तर साल तक मार्क्सवाद
वहां चला, शायद कुछ बनाया भी, हो सकता है रूस के लोगों को शक्ति भी
मिली हो, और उनका सामाजिक आत्मविश्वास तो बढ़ा ही है।
लेकिन वैसी कठोरता हमारे वश की नहीं। और अपनी शक्ति के उदात्त
रूपों की, परम्पराओं की हमारी स्मृति जैसे-जैसे धुंधली होती गई, वैसे-वैसे
कोई काम हम शक्तिवान लोगों की तरह कर पाने में असमर्थ होते गये। भारत में,
जहां लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूर्ण होना तो कुछ कठिन नहीं
था; हमसे वह भी नहीं हो पा रहा है। न ही हम सोच पाए कि यह हमसे हो
सकता है। हमारे मन में तो केवल सबको काम देने की बात थी वह भी ऐसे नए
काम, जो हम चाहते थे कि वे सीखें; उनका अपना हुनर, अपनी बुद्धि, अपनी
विद्या, अपनी सृजनशीलता भी सम्माननीय है, यह तो कभी हमें लगा नहीं। न ही
उनकी श्रेष्ठ परम्पराओं को प्रोत्साहन देकर और आत्माभिव्यक्ति के अवसर
देकर, हमने उन्हें कोई श्रेयष्कर काम करने दिए।
नतीजा यह हुआ कि हमने कुछ उत्पादन, वगैरह तो बढ़ाया, पर वह
सब निष्प्राण सा रहा। उसमें समाज का मन, बुद्धि, पुरुषार्थ, प्राणशक्ति खिलकर
नहीं लगी। नई चीजों की समझ भी पूरी तरह नहीं बनी और सम्बन्ध भी विकसित
नहीं हुए। इससे जो कुछ काम हुआ भी, उससे कबाड़ ही बढ़ा। 50 वर्षों में हमने
बहुत नया कबाड़ इकट्ठा कर लिया। पुराना कबाड़ भी बहुत सारा था ही।
छांटने का विवेक खोकर, हम बस संग्रह करते गये। अलग-अलग चीजें कबाड़
जैसी पड़ी रहीं; उनका आपस में कोई रचनात्मक सम्बन्ध बनाना तो हमने सीखा
नहीं। विचार के क्षेत्र में, मान्यताओं के क्षेत्र में, रुचियों के क्षेत्र में, भाषा, वेश-भूषा,
भवन और भोजन के क्षेत्र में, जो भी नवनिर्माण इधर हमने किया, वह तो कबाड़
जैसा ही है; उससे कोई राष्ट्रीय उत्कर्ष तो सम्भव नहीं है। इस कबाड़ को तो
हटाना ही होगा; नया ही सृजन करना होगा। क्या करना है, यह मुख्यतः अपने
ही लोगों से सीखना होगा, उनसे जिनमें अपनी शक्ति के उदात्त रूपों की और
परंपराओं की स्मृति अभी बची है।
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अपनी संस्थाओं, मान्यताओं को बिना किसी कुंठा के समझना होगा।
अपनी 'पालिटी' को, अपने राजनीति-तंत्र को, सही-सही समझना होगा। हमारे
बारे में जो-जो सिखाया-पढ़ाया गया है, उसके बारे में सन्देह करना भी सीखें,
सबको निर्दोष मानकर स्वीकार न करते चलें, यह बहुत जरूरी है।
यूरोप ने हमें जिस तरह से देखना सिखाया, उसे पुष्ट करने वाले तंत्र
भी उन्होंने रचे; उनका यह स्वभाव ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में रेडइंडियनों
(वहाँ के मूल निवासियों) की गणना पुरानी जनगणनाओं में कभी की ही नहीं
जाती थी, क्योंकि यूरोप से आए लोग रेडइंडियनों को मनुष्य नहीं मानते थे।
इसी दृष्टि के फलस्वरूप करोड़ों की संख्या वाले रेडइंडियनों का वंशनाश ही
कर डाला। अफ्रीका से लाये गये 'ब्लैक्स' को भी वे पूर्ण मानव नहीं मानते थे।
1850 के करीब शायद 5 'ब्लैक्स' को मिलाकर एक मनुष्य मानते रहे। मनुष्य
पूरी तरह तो वे केवल खुद को मानते हैं, बाकी उनके लिए आदिम, पिछड़े, बर्बर,
अविकसित मनुष्य, कमतर मनुष्य हैं।
भारत में भी ब्रिटिश जनगणना उनकी ही दृष्टि के हिसाब से की जाती
रही। हमारे यहां जाति तो कभी समाज की उस रूप में इकाई रही नहीं; 'जात'
शब्द का प्रयोग कुल-विशेष में जन्मे व्यक्तियों के अर्थ में ही किया जाता रहा है।
जाति व वर्ण कोई सामाजिक वर्ग कभी नहीं रहा। पर अंग्रेजों ने उसे इसी तरह
से दिखाया। 1881 व 1891 की जनगणना में अनेक जातियों में कई-कई हजार
उपजातियां दिखाई गई; यह तब के 'कुल' रहे होंगे, ऐसा लगता है। पंजाब में
1881 में जाटों में 10 हजार के करीब उपजातियां दिखाई गई थीं। वे सम्भवतः
आज कही जाने वाली खाप थीं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में 1881 की जनगणना
में अनेक जातियों में दो-दो चार-चार हजार उपजातियां दिखाई गई। ऐसा ही
तमिलनाडु में रहा। स्पष्ट है कि यह 'कुल-समूह' ही थे, जिन्हें उपजाति कहा
जा रहा था। बाद में कई उपजातियों को एकजुट करके दर्ज किया जाने लगा।
फिर जाति ही मूल इकाई बताई जाने लगी। फलतः हमारा शिक्षित वर्ग भी उसे
ही प्राचीन और स्वाभाविक मौलिक इकाई मानने लगा।
इस तरह हर क्षेत्र में हमने समाज की अपनी स्वाभाविक
आत्माभिव्यक्ति को अवरुद्ध किया, बाधित किया। दूसरी ओर, बाहर से भी जो
लिया, उसे ठीक से आत्मसात् नहीं कर पाये, अपना नहीं बना पाये। संसार में
सभी समाज और सभ्यताएं एक दूसरे से सीखते रहते हैं, पर वे सीखी हुई विद्या,
जानकारी और हुनर को अपना बना लेते हैं। आत्मसात् करने का यह काम भी
हम नहीं कर पाए। इससे केवल कबाड़ और बोझ बढ़ता रहा।
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1940 में महात्मा गांधी, राष्ट्रीय योजना समिति (नेशनल प्लानिंग
कमेटी) की ग्रामोद्योग उप-समिति (विलेज इंडस्ट्रीज सब-कमिटी) की वर्धा की
बैठक में मौजूद थे। निर्मल कुमार बोस के अनुसार उस समय गांधी जी की
सलाह थी कि परंपरागत (ट्रेडिशनल) और आधुनिक (मार्डेन), दोनों आस्थाओं व
विचारों के लोग अपनी-अपनी समयबद्ध विस्तृत योजना बना लें, और बतलायें
कि उनमें से क्या निकलेगा और काम शुरू करें। इस सुझाव में गांधी जी की शर्त
थी कि यह दोनों योजनाएं विदेशों से किसी तरह से धन व साधन नहीं लेंगी और
जो भी धन व साधन जरूरी होंगे, वे भारत के अन्दर से ही लिए जाएंगे। मुझे
लगता है कि गांधी जी के इस सुझाव पर, आज फिर विचार और खुली चर्चा
होनी आवश्यक है।
पिछले 150-200 वर्षों में यूरोप की सभ्यता ने भीमकाय और चमकीले
ढांचे तो अवश्य बनाये। उन्हें अधिक उत्पादक भी माना जाता है और कहा जाता
है कि वे मनुष्य की मेहनत को हल्का और आसान करते हैं। यूरोप का स्वचालन
(आटोमेशन) का विचार तो 2300 वर्ष पहले अरस्तू ने भी उठाया था। परन्तु, यह
यूरोप के बनाये तंत्र व ढांचे कुल मिलाकर विश्व को व मनुष्य समाजों को
कितना अधिक देते हैं, इस पर विचार करना आवश्यक है। 40-50 वर्ष पहले
हमारे मित्र रामस्वरूप ने अपनी पुस्तक 'कम्युनिज्म एंड द पीजैण्ट्री' में आधुनिक
उत्पादन (मॉडर्न प्रोडक्शन) के विषय में कुछ प्रश्न उठाये थे। उनका कहना था
कि इसका भीमकाय रूप, तेज रफ्तार और चमक्रीलापन एक भ्रम पैदा करता है
और इसकी जड़ें इसी भ्रम पर टिकी हैं! उनका मानना था कि कुल मिलाकर
मॉडर्निज्म से अधिक उत्पादन नहीं होता, उसका भ्रम ही रहता है। रामस्वरूप ने
इसको 'साइक्लिक प्रोडक्शन' का नाम दिया था। हमें इस तरह के मूलभूत
प्रश्नों पर भी सोचना शुरू करना चाहिये।
प्रश्न उठता है कि आगे क्या करें? आज के संसार से हमारे पश्चिमीकृत
वर्ग ने जो ज्यादा ही सम्बन्ध बना लिया है, वह अभी टूटता दिखता नहीं। अतः
कुछ समय तक तो पश्चिमीकृत समुदाय या वर्ग भी रहेगा और वृहत् समाज भी
रहेगा। भारतीय मान्यताओं में तो संसार ने सभी तरह के जीवों को, लोगों को
और समाजों को रहना ही है। हिंसकों के लिए भी यहां जगह है; हिंसा पूरी तरह
समाप्त हो, यह सम्भव नहीं है; लेकिन हिंसा मर्यादित रहे, यह आवश्यक है।
आज की स्थिति में यह विचारणीय एवं आवश्यक लगता है कि भारत
में वृहत् समाज को समुचित साधन व स्वतंत्रता मिले, जिससे वृहत् समाज की
इकाइयां अपनी मान्यताओं, व्यवस्था की अपनी प्रणालियों और अपने तकनीकी
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ज्ञान के आधार पर चल सकें! भारत में कृषि व उद्योग या ऐसे अन्य क्षेत्रों में 80
प्रतिशत उत्पादन तो आज भी परम्परागत भारतीय प्रतिभा के लोग ही करते हैं।
आवश्यक साधन व स्वतंत्रता रहेगी तो यह प्रतिभा फूले-फलेगी; परिष्कृत होगी
और इसके परिष्कृत होने पर यह भी सम्भव हो पायेगा कि पश्चिम के ज्ञान और
भारतीय बृहत् समाज के ज्ञान में कुछ संवाद और लेन-देन कायम हो सके।
बृहत् समाज के पास आवश्यक साधन व स्वतंत्रता आ जाये, पर्याप्त खुली जगह
(स्पेस) मिल जाये, तो वह आत्माभिव्यक्ति करने लगेगा। उसकी आत्माभिव्यक्तियां
ही समाज को स्वस्थ, सबल और समृद्ध बनाएंगी।
अभी के आधुनिकृत समूहों ने तो समस्त राजनैतिक सत्ता और बल का
प्रयोग इन आत्माभिव्यक्तियों को बाधित करने के लिए ही किया है। परिणाम
यह है कि भारत दो भागों में बंटा है, पर यह बंटवारा हमें सामाजिक विनाश की
ओर ही ले जाता है। एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का जो अपने सहायक
तथा सेवक वर्ग के सहारे, जो कि लगभग 15-20 प्रतिशत बैठता है, भारत के
तंत्र और साधन क्षेत्रों को नियंत्रित करते हैं। दूसरा भाग उन 80-85 प्रतिशत
लोगों का है, जो अपने अति सीमित साधनों और अवशिष्ट बल से ही जी रहे हैं।
यह सही है कि पश्चिम को इसका अभ्यास रहा है कि 90 क्या, 99
प्रतिशत तक की आबादी को एक प्रतिशत प्रभुवर्ग दासत्व में बांधकर रखे और
उन्हें मशीन जैसा मानकर काम ले। समय-समय पर पश्चिम के औजार इत्यादि
बदलते रहे हैं, लेकिन रिश्ता स्वामी और दास का ही बना रहा है। हमारे यहां तो
यह संस्कार ही नहीं रहा; इसलिए यहां के लोग जो स्वाधीनता-संग्राम के
कारण, उसके संस्कारों के प्रभाव से, सम्पन्न वर्ग के प्रति अब तक आत्मीयता
और सहनशीलता रखे हुए थे, वे अधिक समय इसे रख और सह नहीं सकेंगे।
अतः मनमाने टकराव तथा हिंसा का रास्ता खुला छोड़े रखने से अच्छा है कि
दोनों का स्पष्ट न्यायसंगत विभाजन हो जाए। पश्चिमीकृत लोग अपने पश्चिमी
किस्म के ढांचों के साथ महानगरों, आदि में रहें; परन्तु उनके साधन-स्रोत जरूर
घटाने होंगे; अभी की तरह 85-90 प्रतिशत साधनों का उपयोग केवल उन्हें ही
तो नहीं करने दिया जा सकता। लेकिन उन्हें न्यायपूर्ण साधन-स्रोतों के आधार
पर अपना जीवन चलाने की पूरी स्वतंत्रता रहे। दूसरी ओर, 80-85 प्रतिशत
लोगों को अपने साधन-स्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग
करने दिया जाए। उनसे गलतियां भी होंगी; पर गलतियां आधुनिक वर्ग से भी तो
कम नहीं हुई हैं।
इस तरह के न्यायसंगत बंटवारे में यह आवश्यक है कि इन लगभग
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48-50 वर्षों में हमने सरकारी और स्वैच्छिक स्तर पर जो नयी योजनाएं बनाई
हैं, संयंत्र, बांध, बिजली के प्रतिष्ठान, मकानों और वास्तुकला, आदि की विधियां
अपनाई हैं, उनकी पूरी तरह से समीक्षा हो। भारत की कृषि-व्यवस्था,
भवन-निर्माण, वन व्यवस्था, पशुपालन-व्यवस्था, वस्त्र-निर्माण व्यवस्था,
भवन-निर्माण एवं प्रबन्ध जैसे कार्य तो वृहत् समाज की ही जिम्मेदारी रहे।
उनकी शिक्षा भी उनके ही अधीन चलनी चाहिए; आधुनिकतावादियों की शिक्षा
का उन पर नियंत्रण तथा बोझ न रहे।
जितना वृहत् समाज के लोगों को बाहर का या आधुनिकीकृत वर्ग का
लेना तथा आत्मसात् करना होगा, वे कर लेंगे। आत्माभिव्यक्ति के स्वतंत्र अवसर
मिलें, तो वे आवश्यकतानुसार वाह्य ज्ञान को आत्मसात् भी करते रहेंगे। अपनी
सभ्यता, संस्कृति, विद्या-केन्द्रों का नवनिर्माण वे अपने विवेक से कर लेंगे।
आपस में स्वतंत्र तथा सम्मानजनक संवाद तथा सम्प्रेषण रहेगा ही। लेकिन
वृहत् समाज को हीन मानकर, उनका उद्धार और कल्याण करने की युक्तियां
देते हुए, राष्ट्रीय साधनों-स्रोतों पर नियंत्रण रखना हो तो हमें छोड़ना ही होगा।
ऐसे न्यायपूर्ण विभाजन, संयोजन और समन्वय द्वारा राष्ट्र में 20-30 वर्षों के
लिये दोनों हिस्सों का शक्ति पूर्ण सह अस्तित्व रह सकना संभव है, ऐसे सहअस्तित्व
की अवधि में, हमें कुछ अधिक साहस और शक्ति मिली तो हम मिलकर आगे का
भी सोच सकेंगे और ऐसे रास्ते व व्यवस्थायें बना सकेंगे जिनके द्वारा हमारा यह
टूटा-बिखरा समाज फिर से एक होकर आगे बढ़ सकेगा।
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अंग्रेजी शासन और तंत्र व्यवस्था
सन् 1750 से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही, अंग्रेजों ने
यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था। उसमें
सबसे पहला काम तो अंग्रेज अफसरों व सैनिकों के मातहत बढ़ती हुई अंग्रेजी
सेना में भारतीयों को भर्ती करना था। दूसरा, और इससे भी अधिक महत्व का
काम था भारत के खुशहाल खेतिहरों व कारीगरों को अलग-अलग तरीकों से
अपने अधीन करना और यहां की खेती की उपज के आधे से अधिक भाग कर
(टैक्स) के रूप में बन्दूक व तलवार के जोर पर वसूल करना। इसी तरह से
कारीगरों से जबरदस्ती काम करवाना और उनके उद्योगों से बनी वस्तुओं की
कम से कम कीमत देना। आरम्भ में तो ऐसी कार्यवाही मद्रास व बंगाल के क्षेत्र
में ही रही, लेकिन सन् 1800 के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे सारे भारत में ऐसा
करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार के बदलाव अंग्रेजों के मातहत आये हुए
भारतीय क्षेत्रों में भी होने लगे – वहां भी नये तंत्र स्थापित होने लगे।
भारतीय व्यवस्थाओं के अनुसार हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय सैनिक
व्यवस्थाएं थीं और हर ग्राम व नगर में अपनी स्थानीय पुलिस व्यवस्था भी थी।
सेना और पुलिस स्थानीय व्यवस्थाओं के अधीन होती थी। इसी तरह से, जमीन
का हिसाब-किताब, उसकी रजिस्ट्री या उनमें आवश्यक तब्दीली करने वाले
लोग भी स्थानीय व्यवस्थाओं के मातहत रहते थे। जमीन के हिसाब-किताब से
संबंधित लोगों को दक्षिण भारत में कनकपिल्ले और उत्तर में लेखपाल, पटवारी
इत्यादि कहा जाता था। इसी तरह से गांव के स्तर पर बढ़ई, लोहार, धोबी,
कुम्हार, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व व्यवस्था करने वाले, पंचांग और तिथि,
शुभ दिन इत्यादि बताने वाले, मंदिरों के पुजारी, देवदासी, गायक और दूसरे
कर्मचारी गांव और नगर के मोहल्लों से संबंधित होते थे। गांव में इन सब का
कृषि की उपज में हिस्सा होता था। अंग्रेजी शासन ने आते ही सेना, पुलिस,
कनकपिल्ले, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व काम करने वालों इत्यादि को इस
व्यवस्था से पूरी तरह से अलग कर दिया। पुरानी व्यवस्था में इन लोगों को जो
मिलता था वह अब मिलना बन्द हो गया क्योंकि ब्रिटिश सरकार अब उसे कर
के रूप में लेने लगी। इनमें से कुछ लोगों को तो ब्रिटिश सरकार ने अपना नौकर
बना दिया परन्तु बाकी बेकार हो गये। अंग्रेजों से पहले भारत में, दक्षिण और
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उत्तर दोनों में, यह प्रथा थी कि किसी का अगर कुछ खो जाता था और पुलिस
अगर खोई हुई चीज को तलाश करने में सफल नहीं होती थी, तो पुलिस को
जिस व्यक्ति का सामान खोया होता था उसे हर्जाना देना पड़ता था। अंग्रेजी
व्यवस्था ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को खत्म कर दिया और उसकी जगह नई
केन्द्रीकृत व्यवस्था लागू की। ऐसा करते ही हर्जाने की बात तो पूरी तरह से
समाप्त ही हो गयी। उल्टे कुछ दिनों के बाद ऐसा होने लगा कि अंग्रेजी पुलिस,
जिनका कुछ खो जाता था और जो शिकायत दर्ज करवाते थे, उन्हीं के साथ
मारपीट करने लगती थी। इसके साथ-साथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी
व्यवस्था ने तिगुना-चौगुना बढ़ा दिया और सन् 1790 के आसपास जमीन की
मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी, जिन्हें जमींदार कहा गया। वैसे इंग्लैंड
में 700 वर्षों से जमींदार होते रहे थे, लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल
का 50-80 प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे, सरकार को कुल फसल का
लगभग 10 प्रतिशत देते थे। शेष अपने पास रखते थे। लेकिन बंगाल इत्यादि में
जो जमींदार अंग्रेजों ने बनाये वे किसानों से उनकी उपज का करीब 50 प्रतिशत
वसूल करते थे और उसमें से 90 प्रतिशत ब्रिटिश सरकार को कर के रूप में देते
थे। उनके अपने पास किसान से वसूल किये गए लगान का 10 प्रतिशत ही
बचता था।
किसान से लगान वसूली की दर में तिगुनी-चौगुनी वृद्धि अंग्रेजों के
जमाने में हुई। इसलिए इतना ऊँचा कर वसूल करना असंभव सा हो गया।
इसका एक और कारण भी था। भारतीय व्यवस्था में लगान, जिसकी दर वैसे
भी काफी कम थी, अनाज के रूप में ही लिया जाता था। परन्तु अंग्रेजों ने बढ़ते
हुए लगान को, अनाज के बजाय पैसे में लेना शुरू किया। पिछले 10 वर्षों की
फसल का दाम इत्यादि निकाल कर भूमिकर पैसे के रूप में निर्धारित किया
गया। अंग्रेजी व्यवस्था के आने से गरीबी में जो भारी बढ़ोत्तरी हुई और उसकी
फसल के दाम गिर गये। इसका असर भी किसान पर दोतरफा हुआ क्योंकि
उसे लगान अब फसल के बजाय पैसे में देना होता था। मन्दी के कारण फसल
की कीमत कम होने की वजह से वास्तविक लगान की दर 80 से 90 प्रतिशत
तक होने लगी, यानी किसान के पास सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही बचता था।
इस वजह से लगान वसूली में मुश्किलें आने लगीं। इसलिए अंग्रेजी तंत्र ने सन्
1792 में फैसला किया और जमींदार को यह हक दिया कि वह जब चाहे
खेतिहर को जमीन से बेदखल कर सकता है। इससे पहले भारत में कभी भी
खेतिहर को इस तरह से उनकी जमीन से बेदखल करने का रिवाज नहीं था।
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यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति अनुलेखन प्रस्तुत है:

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लेकिन अंग्रेजी अधिकारियों का तर्क था कि अगर इंग्लैंड में खेतिहर को वहां
का जमींदार निकाल सकता है तो भारत में ऐसा अधिकार और भी जरूरी है,
क्योंकि यहां लगान की दर इंग्लैंड से कई गुना ज्यादा है।
क्योंकि इतना बड़ा लगान वसूल करना आसान नहीं रहा होगा इसलिए
सेना की टुकड़ियों को, जिन्हें रेवेन्यू बटालियन कहा गया, उन्हें कर वसूल करने
के काम में लगाया गया। इसका परिणाम यह भी हुआ कि सन् 1805-1806
तक बंगाल-बिहार के अधिकांश जमींदार दिवालिया हो गये। इसके बाद इन
जमींदारियों की नीलामियाँ शुरू हुईं और साहूकार, फौजी ठेकेदार, राजा इत्यादि
नये जमींदार बने। यह सिलसिला अगले 40-50 वर्ष तक चलता रहा और इस
दौरान भारत की जनता की एक बड़ी संख्या भुखमरी, अकाल इत्यादि से सन्
1900 और उसके बाद तक मरती रही। कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार,
"कुल दुनिया की लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर (सन् 1793 से सन् 1900
तक) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल
दस वर्ष में (सन् 1891 से सन् 1901 तक), भूख, अकाल के मारे एक
करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये"- (हिन्दी ग्रन्थमाला, मई सन्
1908 पृष्ठ 9 और 'भारत भारती', संवत् 1969, पृष्ठ 87)। तब मैथिलीशरण जी
26 वर्ष के थे। वे शायद राजेन्द्र प्रसाद व जवाहरलाल नेहरू की उम्र के तब रहे
होंगे, हो सकता है कि एक-दो वर्ष बड़े भी हों। इससे पहले, सन् 1870 के
आसपास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि अंग्रेजों ने भारतवासियों से सब
कुछ ले लिया, लेकिन उन्हें भीख मांगना अवश्य सिखा दिया है। महात्मा गांधी
जनवरी सन् 1915 में भारत लौटे थे। ऐसा लगता है कि मैथिलीशरण जी की
तरह बहुत से भारतीय गांधीजी के आने की तीव्र प्रतीक्षा कर रहे थे। जब
महात्मा गांधी 9 जनवरी, 1915 को जहाज से बम्बई पहुंचे तब उनका बहुत भव्य
स्वागत हुआ। लेकिन ऐसा स्वागत गांधीजी को कुछ अच्छा नहीं लगा। उनके
आने के तीन-चार दिनों के अन्दर भारत के कई प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में
गांधीजी के आने को लेकर लम्बे-लम्बे संपादकीय लिखे गये - मद्रास के
'हिन्दू' में, और इलाहाबाद के 'लीडर' में भी। उन्हें पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे
कि किसी अवतार की प्रतीक्षा हो रही थी। यह वर्णन कुछ उसी तरह का है जैसा
कि गौतम बुद्ध के जन्म का वर्णन अश्वघोष के 'बुद्ध चरित' में किया गया है, कुछ
ललित विस्तार से।
अगर यह सही है कि सन् 1891 से सन् 1901 तक भारत में भुखमरी
के कारण एक करोड़ नब्बे लाख लोग मर गये तो, अंग्रेजी शासन के शुरू से
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उसके अंत तक भारत में 20-25 करोड़ जन भुखमरी से मरे होंगे, ऐसा माना जा
सकता है। इसी तरह करोड़ों की संख्या में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ और
दूसरे जीव-जन्तु भी मरे होंगे। वन और पेड़-पौधे तो बहुत बड़ी तादाद में नष्ट
हुए ही।
इस तरह के शोषण और अत्याचार के कारण भारतीयों में अंग्रेजों से
लड़ने की शक्ति नहीं रह गयी। वैसे तो भारत के लोग कभी भी खूँखार व लड़ाकू
नहीं रहे, न ही उन्हें न्यायालयों में जाने का चाव ही था। अंग्रेजी राज्य ने उनके
खेतों को छीन कर, उद्योगों व घरों को उजाड़ कर, उन्हें न्यायालयों की शरण
लेने के लिए एक तरह से बाध्य किया। इन न्यायालयों में असत्य का सहारा
लेना आवश्यक-सा हो गया। अंग्रेजों ने जो न्यायालय स्थापित किये उनमें अब
तक भी यह बात ज्यादा चलती रही कि भारतीय असत्य ही बोलते हैं। उन्हें
असत्य बोलना उनके वकीलों और कर्मचारियों एवं न्यायालयों ने ही सिखाया।
जैसे-जैसे न्यायालय स्थापित हुए वैसे-वैसे ही अंग्रेजी राज्य में जिलों
को चलाने के लिए दूसरे तंत्र भी स्थापित हुए। ताल्लुकों को चलाने के लिए तंत्र
बने। प्रदेशों को चलाने के लिए तंत्र बने। भारत को चलाने के लए तंत्र बने।
जितना अंग्रेजों से हो सका उतना उन्होंने भारत को कस कर रख दिया। लोगों
को हिलने-डुलने, सांस लेने तक का मौका नहीं रहा। भय और उसके साथ-साथ
गरीबी और मुफलिसी का राज्य छा गया।
फिर भी अंग्रेज कुछ भयभीत ही रहे, विशेषकर भारतीय सैनिकों से।
साधारणतः तो अंग्रेज यही मानते थे कि भारतीय सैनिक, जिनकी संख्या सन्
1820-30 में दो-तीन लाख रही होगी, उनके प्रति वफादार हैं। लेकिन उन्हें यह
भी लगता था कि कहीं अगर हवा का बहाव बदल गया और भारतीय सैनिकों
को यह लगने लगा कि अंग्रेजों का राज्य उखड़ने वाला है, तो फिर वे अंग्रेजों के
खिलाफ हो जायेंगे। इसी बीच में सन् 1829-30 के वर्षों में यह भी तय किया
गया कि अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीय लोगों को भारत में जहाँ-तहाँ, विशेषतः
पर्वतों पर, ठंडी जगहों पर बसाया जाये। धीरे-धीरे ऐसी बसावट शुरू भी हुई।
इससे पहले भी भारत में सैकड़ों जगह अंग्रेजी सेना की छावनियां बनी थीं। सेना
के साथ, सेना की सेवा के लिए, उनकी तुलना में पांच-दस गुना ज्यादा लोग,
सेना की सवारी और सामान ढोने के लिए एकत्रित किये जाते रहे। इनमें से,
आधे से अधिक को, उस समय की अंग्रेजों द्वारा घटाई गयी मजदूरी भी नहीं दी
जाती थी और कुछ लोगों को तो एकदम 'बेगार' में ही रखा जाता था। अफसरों
व सैनिकों के लिए वेश्यालय भी तभी बने और जैसे-जैसे छावनियों की संख्या
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बढ़ने लगी वैसे-वैसे यह सब ठिकाने भी बढ़ने लगे। सन् 1857-58 की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद, जिसमें अन्ततः भारतीय हार ही गये, उनके सैकड़ों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर, अलग-अलग तरीकों से, मार दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों को यह आवश्यक लगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों और यूरोपियों को बसाने का काम तेजी से आरम्भ किया जाना चाहिये। आज जो यह पहाड़ी शहर देशभर में हैं और काफी चाय व काफी के बगीचे या दूसरे बड़े व्यापारिक खेती के मैदान असम, बिहार और दक्षिण भारत इत्यादि में बने हैं, ये अधिकांशतः सन् 1860 के इसी अंग्रेजी फैसले के बाद स्थापित हुए।

इसी तरह सैनिकों की छावनियाँ भी और बढ़ाई गयी होंगी। आज शायद यह मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने भारत में जो यह विस्तृत तंत्र खड़ा किया है वह सारे देश से जल्दी जाने वाला नहीं है। यह तंत्र कैसे यहाँ से उखड़े, इसके लिए तो हमें काफी सोचना होगा। ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिससे हम अपना तंत्र खड़ा कर सकें, जिससे कि भारत की राज्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, कृषि, वन, जल के साधन, बड़े और छोटे उद्योग और भारतीयों का सार्वजनिक जीवन, देश के लोगों के मन के अनुसार चल सके। इस तरह के सवाल स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में और पिछले 53 वर्षों में निश्चय ही हमारे विचारकों व राजनैतिकों के मन में उठे होंगे। सन् 1946 से सन् 1949 तक जो संवैधानिक सभा हमारे यहां बैठी, और जिसमें संविधान के बारे में काफी सोच-विचार और बातचीत हुई, उसमें भी इस तरह के प्रश्न उठे होंगे। उसके बाद भी देश की स्थिति को सामने रखकर ऐसे प्रश्न उठते ही दिखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस में भी इस तरह के प्रश्न जब तब, गांधीजी के बाद भी, उठते रहे। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने स्वयं शायद कहा था कि उनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी गलती की कि अंग्रेजों के बनाये तंत्र को जैसा का तैसा रहने दिया। साधारण लोग और काफी सारे समाजवादी नेता और भारतीय जनता दल के कुछ नेता भी ऐसा कहते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्री नरसिंह राव ने, जो पांच वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, इस तरह के प्रश्नों को फिर से उठाया है, वह भी लंदन में। हम लोग इस पर सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेंगे तो, दस-बीस वर्ष में भारत में, अंग्रेजों के बनाये तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं। जब ऐसा होगा तभी भारतीय शिक्षा, कृषि-उद्योग, पुलिस, सेवा आदि क्षेत्रों के स्वरूप को भी आज के समय के अनुरूप और प्राणवान भारतीय रूप में बनाना सम्भव होगा।

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कहाँ हैं पश्चिमीकरण की जड़ें ?

वैसे तो भारत पिछले 20-30 वर्षों से विश्वशक्तियों के बढ़ते दबाव में है। भारत के गांव के प्राथमिक स्कूल भी उनके आदेश व सहायता से चलने लगे हैं। बसों का किराया बढ़े यह भी उनके आदेश से होने लगा है। सड़कें कैसी हों, कितनी चौड़ी हों इसके आदेश भी बाहर से आने लगे हैं। यहाँ तक कि सेवाग्राम आश्रम जैसे स्थान भी चौड़ी-चौड़ी सड़कों से घिरने लगे हैं। जबकि ऐसे स्थानों और स्थलों की शांति व पवित्रता के लिये यह आवश्यक था कि उनके आसपास अधिक मोटर गाड़ियां व दूसरे वाहन न चलें। विदेशों में हमारा सामान ज्यादा से ज्यादा जाये इसमें फँस कर पिछले पचास बरसों में हम अपनी हस्तकला उद्योग का विनाश ही कर चुके हैं। और कुछ महीनों से खादी ग्रामोद्योग आयोग इसमें लगा है कि हम खादी से अमरीकी जीन्स कपड़ा डैनिम और उससे जीन्स बनवायें और उन्हें विदेशों में भेजें।

हमारी खेती में तो बड़े पैमाने पर बगैर सोचे समझे विदेशीकरण हो चुका है। हमारे गांवों के कृषि व ग्रामोद्योग के उजड़ने का एक बड़ा कारण यह हमारी बेसमझी की नकल है। ये ही बेसमझी हमें आधुनिकता को समझने से भी दूर रखती है --- चाहे वो तकनीकी के प्रश्न हों, व्यवस्था के या हमारी अपनी दिशा के। भारत की मानसिकता, उसकी प्राथमिकतायें, उसकी प्राकृतिक उपलब्धियां हमारे आज के देश चलाने वाले लोग समझ नहीं सके हैं। जैसे दो हजार बरस से यूरोप, व उसके बाद अरब लोग मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय व्यापार व लूटमार पर जीवन चलाते थे। उसे ही हमने बेसमझी में मान लिया है कि बाकी विश्व का भी वही तरीका है। लेकिन हमारे यहाँ तो हमारी आवश्यकताओं की सभी वस्तुएं साधारणतः प्रचुर मात्रा में पैदा होती थी, बनती थी, हमें उनका व्यवस्थित उपयोग आता था, उनमें से मुख्य खाना, कपड़ा, रहने की जगह, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जीवन हमारे यहाँ के सब लोगों को उपलब्ध रहा है, यह हम भूल गये दिखते हैं। इस तरह की भूलें तो हमारे यहाँ पिछले पचास बरस से शुरू हुई, और अब तो हम सब पढ़े लिखे, अच्छे खाते पीते, किसी भी दल व सम्प्रदाय व वाद के हों, इन भूलों को सत्य वाक्य जैसे मानने लगे हैं। हममें वैसे पराये के लिये कोई प्रेम व निष्ठा नहीं पैदा हुई लेकिन यह जरूर हो गया है कि हमें अपने और पराये (व्यक्ति, व्यवस्था, तकनीक, विज्ञान) में जो भेद होते हैं वह

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समझ में नहीं आते। स्वदेशी के प्रचार में जो लोग आज लगे हैं उनमें से अधिकांश
को भी नहीं।
यह ऊपर जो कहा गया है वह अधिकांशतः तो हमारे 200-250 बरस
की दासता का परिणाम है, और पिछले 50 बरस में हमारे ऊपर जो बाहर का
बढ़ता दबाव है उससे इसका भारतव्यापी विस्तार हुआ है। हम समझ कर और
लगकर प्रयत्न करते तो उसमें से निकल आते। लेकिन इन 30-40-50 बरसों
की हमारी सोच और कार्य हमारे पर और एक नई विपत्ति ले आये हैं। देखने में
जो विपत्ति आई है वह वैसे तो 12-14 बरस पुरानी ही है लेकिन उसका आरंभ
व जड़ें तो यह जो हमारा संविधान है जिसको हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से
सीखा और उधार लिया, उसमें है।
अंग्रेजों ने 300-400 बरस पहले क्रोमवेल के मध्य सत्रहवीं शती के
समय से अपने यहां दो दलों को लेकर राज्यव्यवस्था बनानी शुरू की। वह
कमोबेश अभी भी अंग्रेजों के यहाँ चलती है। समय चलते चलते कोई और नया
दल बनता है – जैसे कि 18 वीं सदी के अन्त में ब्रिटिश लेबर पार्टी बनी, तो
पुरानों में से एक दल क्षीण पड़ जाता है जैसे कि विग व लिबरल क्षीण हुए।
लेकिन ब्रिटेन एक छोटा देश है, उत्तर प्रदेश से भी क्षेत्रफल में छोटा और आबादी
में तो आधा ही। दूसरे, राजनैतिक दल ही ब्रिटेन के लोगों के मुख्य संरक्षक व
सहारा नहीं हैं। ब्रिटेन में पचासों ईसाई सम्प्रदाय हैं जिनसे अलग अलग लोग,
पूरे मुहल्ले व गाँव भी सम्बंधित हैं। फिर वहाँ के पुराने धनवान और शक्तिशाली
लोगों की क्लबें हैं, जहाँ देश की स्थिति पर विचार होता रहता है और अक्सर
बड़े-बड़े फैसले भी ऐसे स्थानों पर होते हैं। यह जरूर है कि यह दो व तीन
राजनैतिक दलों का बारी बारी से सरकार चलाने का तरीका ब्रिटेन से अमरीका,
यूरोप व जापान तक गया है। लेकिन अमरीका इत्यादि में इस तरीके को अपनी
तरह से समझा गया है, खपाया गया है, और जहाँ वह नहीं खप पाया जैसे
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों में, वहाँ जब तब डिक्टेटरशिप चलती ही है।
पिछले पचास बरस में हमारी राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक स्थिति
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों जैसी होने लगी है। भारत की लोक सभा व
राज्यसभा, और प्रदेशों की विधानसभायें भी कंकाल जैसे होती जा रही हैं।
हमारा 'स्टील फ्रेम' कहा जाने वाला अंग्रेजों का दिया तंत्र व ढांचा भी अब
शक्तिहीन ही है, उसके बस का अब लोगों को बराबर भयभीत कर लेना नहीं है
जो कि ब्रिटिश समय में उसका मुख्य काम था, लेकिन लोगों के रास्ते में बाधायें
कायम करना तो अभी तक जारी है ही। इस राजनीतिक व्यवस्था और शासन
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तंत्र की एक बड़ी देन है कि उसने देश के लोगों को बांट दिया है, परिवार-परिवार
में व्यक्तियों को बांट दिया है, मोहल्लों-मोहल्लों में, गांव-गांव में। जिससे
भारत के 10 से 15 प्रतिशत लोग तो सरकारी व्यवस्था के खंबे बन गये हैं, और
बाकी 85 से 90 प्रतिशत निरूत्साहित, कंगाल और साधनहीन। देश का
मुहल्ला-मुहल्ला, गाँव-गाँव, नगर-नगर बंट चुका दिखता है। बंटना तो अंग्रेजों
के समय में ही आरंभ हो गया था, लेकिन हम उसे अब पूरा करने में लगे दिखते
हैं।
इस तरह के टूटने की एक भयंकर शुरूआत दिल्ली के सांसदों और
विधान सभा के सदस्यों को लेकर ही शुरू हुई। बहाना रहा कि दो, चार, छः
सदस्य जिन्हें आयाराम-गयाराम नाम दिया गया, एक राजनैतिक दल छोड़कर
दूसरे दल में जाते रहते हैं, और दलबदल होता रहता है, और इसमें धन व पद
का लालच भी काम करता है। यह दलबदल कोई नई बात नहीं है। हजारों वर्षों
से यह जहाँ तहाँ होता ही रहता है। इसके अलग-अलग इलाज भी होंगे। ब्रिटेन
में तो जो पार्लियामेंट के सदस्य अपने दल के साथ मत नहीं देते, उन्हें दल से
नहीं निकाला जाता, लेकिन उनका सामाजिक बहिष्कार जैसा होता है, लेकिन
हमारे विद्वान राजनितिकों व उनके सलाहकारों ने तय किया कि जो सदस्य हर
तरह से साथ नहीं देता, उसको न केवल दल से ही निकाल दिया जाये बल्कि
उसका फौरन ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी समाप्त कर दिया जाये। वैसे जो
सदस्य सांसद या विधायक बनता है वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, न कि
किसी दल का भृत्य। उसको डांट – फटकार व हुक्म देने का अगर किसी को
अधिकार है तो उसके क्षेत्र को न कि किसी राजनीतिक दल को। दल में वो
स्वायत्त ही आया है, और दल ठीक-ठाक चलता है, न्याय करता है तो वो
साधारणतः उसमें रहेगा ही। उसका किसी कारणवश विचार या ध्येय बदलता
है तो वो तो उसका क्षेत्र ही संभाल सकता है।
लेकिन हमने तो ब्रिटिश राज्य के शुरू से ही यहां के समाज और लोगों
के रास्ते में रुकावटें डालना ही सीखा है, या कानूनों के छिद्र बंद करना।
रुकावटें डालने या छिद्र बंद करने का परिणाम यह हुआ कि यह देश फिर से
क्रमशः आलस्य से भर गया और यहाँ की परस्परिकता ओझल – सी हो गयी।
वैसे तो आज का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ढांचा
इन 200–150 वर्षों में, या और पहले से ही, जर्जर होता गया है, लेकिन पिछले
8–10 बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को
दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है। वैसे भारत का संविधान और उसकी
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संसद, विधान सभायें इत्यादि तो मूलतः दोबारा बनानी ही होंगी, लेकिन जब तक
यह सब नया ढांचा बने तब तक कुछ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। उनमें एक कदम
तो सांसद इत्यादि को स्वतंत्र कर देना और उनको उनके क्षेत्रों से जोड़ देना
होगा। दूसरा कदम, यह आवश्यक है कि संसद, विधानसभा इत्यादि जितने
वर्षों के लिये चुनी जाये, उतने वर्ष अवश्य चले। सरकार की किसी विषय पर
बात नहीं मानी जाय तो ऐसा होना हर समय उसकी हार नहीं मानी जानी
चाहिये। बात नहीं माने जाने का मतलब है कि वह अपना रास्ता बदले। उससे
फिर भी काम न चले तो उसी संसद व विधानसभा में से दूसरी व तीसरी सरकार
बन जाय। देश को साधारणतः व्यवस्थित रखना और प्रजा को अभय जैसा रहे,
यह संविधान का, संसद का, विधानसभाओं का और राजनीतिक गिरोहों का
प्रथम काम है।
अखिल भारतीय राजनीतिक गिरोहों का या दूसरे वैज्ञानिक, आर्थिक,
व्यावसायिक गिरोहों का दबदबा व झूठी प्रतिष्ठा जितनी भी कम हो उतना देश
के लिये अच्छा है। क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर
ही भारत को संभाल सकेंगे, सुव्यवस्थित रख सकेंगे, समृद्धि दे सकेंगे और विश्व
के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे। भारतीय केंद्र व्यवस्था
से यह कभी होने का नहीं है, यह तो एक प्रवंचना है। केंद्र तो प्रदेशों का संघ ही
चला सकेगा, और ऐसा संघ ही तय कर सकेगा कि केन्द्र को कौन - कौन काम
सौंपे जायें, क्या-क्या साधन उसे उपलब्ध कराये जायें।
प्रदेशों में भी आज की राजनीतिक व अन्य संस्कृति उसे दिशा देती है
व और दूसरी सभ्यताओं से कैसा संबंध बनाये, यह बताती है। यह अवश्य है कि
हमें शक्तिशाली होने की आवश्यकता है। लेकिन शक्ति तो कई तरह से बनती
है, केवल हावी व लुटेरे लोगों के रास्ते से ही नहीं। इस पर ध्यान देना हमारे
विद्वानों व मनीषियों का काम है।

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