सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
८४ सूरसागर सार सटीक
जा रहे हैं। अंगारे अत्यन्त छिटक रहे हैं। फल फूटते जा रहे हैं। भयंकर लपट-झपटती
है। तथा बीच-बीच मे ज्वाला चमक रही है। पृथ्वी तथा आकाश के बीच धुएँ की धुंध
बढ गई है। हिरन, शूकर, मोर, चातक, कोयल जल रहे हैं तथा (समस्त) जीव
व्याकुल हो रहे हैं। नन्दलाल ने हँसकर कहा कि तुम लोग मन मे मत डरो केवल सब
लोग आंखे बन्द कर लो। सूरदास कहते हैं कि समस्त अग्नि (कृष्णजी के) मुख मे
समा गई। इस तरह ब्रज के बालको को भय रहित कर दिया ॥११०॥
वन तैं आवत धेनु चराए।
संध्या समय साँवरे मुख पर, गो-पद-रज लपटाए ।
बरह मुकुट कैं निकट लसति लट,मधुप मनौ रुचि पाए ।
बिलसत सुधा जलज-आनन पर, उड़त न जात उड़ाए ।
विधि बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए ।
एक वरन बपु नहिं बड़ छोटे, ग्वाल बने इक धाए ।
सूरदास बलि लीला प्रभु की जीवत जन जस गाए ॥१११॥
अर्थ—वन से गाय चराकर कृष्ण आ रहे हैं। संध्या के समय उनके श्यामल मुख
पर गायो के पैर की (उडायी गयी) धूल लगी है। मोर-मुकुट के निकट (बालो की)
लट ऐसी सुशोभित हो रही है मानो भौरे रुचिकर समझ कर एकत्रित हो गये हैं। कमल
पर अमृत लिपटा हुआ हो और इसीलिए भौरे उड़ते नही हैं। ब्रह्मा की सवारी (हंस) के
चुगने की वस्तु (मोती) की माला वक्षस्थल पर सुशोभित हो रही है। सभी ग्वाल एक
वर्ण तथा एक ही आयु के हैं कोई बड़ा छोटा नही है। सूरदास प्रभु की लीला पर
न्योछावर होते हैं और कहते हैं कि भक्तजन यश को गाते हुए जीते हैं ॥१११॥
मैया बहुत बुरो बलदाऊ ।
कहन लग्यौ बन बड़ी तमासौ, सब मौड़ा मिलि आंऊ ।
मोहूँ कौं चुचकारि गयो लै, जहाँ सघन वन झाऊ ।
भागि चलौ कहि गयो उहाँ तैं, काटि खाइ रे हाऊ ।
हौँ डरपौँ कापौं अरु रोवौँ कोउ नहिँ धीर धराऊ ।
थरसि गयौँ नहिँ भागि सकौँ, वै भागे जात अगाऊ ।
मोसौँ कहत मोल कौ लीनो, आपु कहावत साऊ ।
सूरदास गल बड़ी चबाई, तैसेहिं मिले सखाऊ ॥११२॥
अर्थ—(कृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हुए कहते हैं) हे माता बलभद्र
बड़ा दुष्ट है। वह वन में कहने लगा कि बड़ा सुन्दर तमाशा है, सब लोग मिलकर
आओ। मुझे भी पुचकार कर वही ले गया जहाँ झाऊ का सघन वन था। फिर वहाँ से
यह कह कर भाग गया कि 'हउआ' काट खायेगा। मै डर से कांप रहा था और रो रहा
था लेकिन कोई भी धीरज नही बंधाता था। मैं डर से स्तम्भित हो गया इसलिये भाग
वृन्दावन लीला ८५
भी नहीं सका। वे आगे-आगे भागते चले जा रहे थे। मुझसे कहते हैं कि तू मोल का
लिया हुआ है और अपने को साहु कहते हैं। बलदाऊ तो दुष्ट है ही, वैसे ही उसे मित्र
भी मिल गये हैं ॥१२॥
मैया हौं न चरैहौँ गाइ।
सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौँ, मेरे पाइ पिराइ।
जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिँ, अपनी सौंह दिवाइ।
यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ।
मैं पठवति अपने लरिका कौ, आवै मन बहराइ।
सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिगाइ ॥१३॥
अर्थ—(कृष्ण यशोदा से कहते हैं) माता मैं गाय नही चराऊँगा। सब लोग
मुझसे गाय इकट्ठा करवाते है जिससे मेरे पैर दर्द करने लगते हैं। यदि तुम्हे विश्वास
न हो तो बलदाऊ को अपनी सौगध दिलाकर पूँछ लो। यह सुनकर यशोदा ग्वाल
वालो पर क्रोधित होती हैं और उन्हे गाली देती है। मैं अपने पुत्र को मन बहलाने के
लिए भेजती हूँ, लेकिन मेरे अति छोटे बालक को ये घुमा-घुमाकर मारे डालते हैं
(परेशान कर देते हैं) ॥१३॥
धनि यह वृन्दावन की रेनु।
नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु।
मन-मोहन को ध्यान धरैं जिय, अति सुख पावत चैनु।
चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहाँ कछु लैन न दैनु।
इहाँ रहहु जहाँ जूठनि पावहु, व्रजवासिनि कै ऐनु।
सूरदास ह्यॉ की सरवरि नहि, कल्पवृच्छ सुर-धैनु ॥१४॥
अर्थ—वृन्दावन की धूलि धन्य है जहाँ कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते
हैं, जो मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख तथा चैन
प्राप्त करता है। यह मन अन्य पुरी की ओर कहां जा सकता हैं जहां न कुछ लेना है न
देना। यही रहो, जहां कृष्ण की जूठन (प्रसाद) प्राप्त होगी, क्योकि यही ब्रजवासियों
का घर है। सूरदास कहते हैं कि यहाँ की समता कल्पवृक्ष तथा कामधेनु नही प्राप्त
कर सकते ॥१४॥
सोवत नींद आइ गई स्यामहिँ।
महरि उठो पौढ़ाइ दुहुँनि कौँ, आपु लगी गृह कामहिँ।
बरजति है घर के लोगनि कौँ, हरुऐं लै-लै नामहिँ।
गाढ़ै बोलि न पावत कोऊ, डर मोहन बलरामहिँ।
सिव सनकादि अंत नहिँ पावत ध्यावत अह-निस जामहिँ।
सूरदास-प्रभु ब्रह्म सनातन, सो सोवत नंद धामहिँ ॥१५॥
८६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—लेटे हुए कृष्ण को नीद आ गई। महरि यशोदा (कृष्ण बलराम) दोनों
को सुलाकर अपने घर के कामो मे लग गईं। धीमे से घर के लोगो के नाम ले-लेकर
वर्जित करती हैं। मोहन और बलराम के डर से कोई जोर से बोलने नही पाता।
शिव, सनकादि जिसे दिन रात सब समय ध्यान करते हुए पार नही पाते वे ही सूर
के प्रभु सनातन ब्रह्म नन्द के घर मे सो रहे है ॥१५॥
देखत नंद कान्ह अति सोवत ।
भूखे भये आजु बन-भीतर, यह कहि कहि मुख जोवत ।
कह्यौ नहीं मानत काहू कौ, आपु हठी दोऊ बीर ।
बार-बार तनु पोंछत कर सौं, अतिहिं प्रेम की पीर ।
सेज मँगाइ लई तहँ अपनी, जहाँ स्याम-बलराम ।
सूरदास प्रभु कैं ढिग सोए, सँग पौढ़ी नँद-बाम ॥१६॥
अर्थ—नन्द अत्यधिक सोते हुए कृष्ण को देखते हैं। आज बन के भीतर (कृष्ण
को) भूख लगी थी, यह कहकर मुंह देखते है। (नंद कहते है) दोनो (बहुत) हठी हैं
और किसी का कहना नही मानते हैं। अत्यधिक प्रेम की पीडा से (नंद) हाथ से (कृष्ण
के) शरीर को बार-बार पोंछते है ! उन्होने अपनी चारपाई वहीं मँगा ली जहाँ कृष्ण
और बलराम (सो रहे) थे। सूरदास कहते हैं कि (नंद) प्रभु कृष्ण के पास सोये और
वही नन्दरानी सोयी ॥१६॥
जागि उठे तब कुँवर कन्हाई ।
मैया कहाँ गई मो ढिग तैं, सँग सोवति बल भाई ।
जागे नंद, जसोदा जागी, बोलि लिए हरि पास ।
सोवत झझकि उठे काहे तैं, दीपक कियौ प्रकास ।
सपनैं कूदि पर्यो जमुना दह, काहू दियो गिराइ ।
सूर स्याम सौं कहति जसोदा, जनि हो लाल डराइ ॥१७॥
अर्थ—तब कुँवर कृष्ण जाग उठे (और कहने लगे) मेरे पास से माता कहाँ
चली गयी और (मेरे) साथ भाई बलभद्र सो रहे हैं। (इतने मे) नन्द और यशोदा
जाग गये और कृष्ण को अपने पास बुला लिया। सोते हुए झझककर क्यो उठ गये
(इसे जानने के लिए) दीपक से प्रकाश किया। (कृष्ण कहते हैं) स्वप्न में यमुना के दह
मे कूद गया या किसी ने गिरा दिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा कृष्ण से कहती हैं,
हे मेरे लाल डरो मत ॥१७॥
मैं बरज्यौ जमुना-तट जात ।
सुधि रहि गई न्हात की तेरैं, जनि डरपौ मेरे तात ।
नंद उठाइ लियौ कोरा करि, अपने संग पौढ़ाइ ।
वृन्दावन मैं फिरत जहाँ तहँ, किहिं कारन तू जाइ ।
अब जनि जैहौ गाइ चरावन, कहँ को रहित बलाइ ।
सूर स्याम दम्पति बिच सोए, नीँद गई तब आइ ॥१९८॥
अर्थ—(नंद कहते है) मैंने तुम्हे यमुना के तट पर जाते हुए रोका था । तुम मे
नहाते समय की याद (शेष) रह गई है (इसलिए) हे मेरे तात डरो मत । नंद ने
(कृष्ण को) अपनी गोद में उठाकर अपने साथ सुला लिया । (तुम) वृन्दावन में जहां-
तहां घूमते रहते हो । वहां किसलिए जाते हो ? अब गाय चराने मत जाना, (तुम्हे)
कहां की बला पड़ी रहती है । सूरदास कहते है कि कृष्ण (जब) दम्पति के बीच मे सोये
तब उन्हें नींद आ गयी ॥१९८॥
काली दमन
नारद ऋषि नृप सौं यौँ भाषत ।
वे हैं काल तुम्हारे प्रगटे, काहैँ उनकौँ राखत ।
काली उरग रहै जमुना मैं, तहँ तैँ कमल मँगावहु ।
दूत पठाइ देहु ब्रज ऊपर, नंदहिं अति डरपावहु ।
यह सुनि कै ब्रज लोग डरैँगै, वै सुनिहैं यह बात ।
पुहुप लैन जैहैं नंद-ढोटा, उरग करै तहँ घात ।
यह सुनि कंस बहुत सुख पायौ, भली कही यह मोहि ।
सूरदास प्रभु कौँ मुनि जानत, ध्यान धरत मन जोहि ॥१९६॥
अर्थ—ऋषि नारद राजा (कंस) से इस प्रकार कहते हैं कि वे (कृष्ण) तुम्हारे
काल (मृत्यु के कारण) के रूप मे प्रकट हुए है उन्हे तुम जीवित क्यो रहने देते हो ।
काली नाम का सांप यमुना में रहता है वही से कमल मंगाओ । ब्रज मे दूत भेजकर
नंद को भयभीत कराओ । यह सुनकर ब्रज के लोग डर जायेगे । यह बात जब वे
(कृष्ण) सुनेगे तो नंद के पुत्र (कृष्ण) फूल लेने (यमुना) जायेगे और वहां सांप चोट
करेगा । यह सुनकर कस को बहुत सुख मिला (उन्होने कहा) आपने मुझे अच्छी बात
बतायी । सूरदास कहते है कि प्रभु कृष्ण को मुनि जानते हैं और मन से देखकर ध्यान
धरते है ॥१९६॥
कंस बुलाइ दूत इक लीन्हौ ।
कालीदह के फूल मँगाए, पत्र लिखाइ ताहि कर दीन्हौ ।
यह कहियो ब्रज जाइ नंद सौं, कंस राज अति काज मँग़ायो ।
तुरत पठाइ दिएँ ही बनिहै भली-भाँति कहि-कहि समुझायौ ।
यहि अंतरजामी जानी जिय, आपु रहे, बन ग्वालं पठाए ।
सूर स्याम, ब्रज-जन-सुखदायक, कंस-काल, जिय हरष बढ़ाए ॥२००॥
अर्थ – कंस ने एक दूत को बुला लिया । उसे एक पत्र लिखा कर दिया और
कालीदह के फूलो को मँगाया । (कंस ने दूत से कहा) ब्रज.जाकर नद से यह कहना कि
कंस ने राज्य के जरूरी काम के लिए (फूल) मँगा भेजा है । (फूल को) तुरंत भेजवा देने
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से ही कल्याण होगा । इस प्रकार भलीभांति कहकर समझाना । इसे हृदय की बात जानने
वाले कृष्ण जान गये । (वे) स्वयं (ब्रज मे) रुके रहे और ग्वालो को वन मे भेज दिया ।
सूरदास कहते हैं ब्रज को सुख देने वाले, कंस के काल कृष्ण अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥२०॥
पाती वाँचत नंद डराने ।
कालीदह के फूल पठावहु, सुनि सबही घवराने ।
जो मोकौं नहिं फूल पठावहु, तौ ब्रज देहुँ उजारि ।
महर, गोप, उपनंद न राखौं, सबहिनि डारौँ मारि ।
पुहुप देहु तौ बनै तुम्हारी, ना तरु गए विलाइ ।
सूर स्याम बलरामु तिहारे, मांगीं उनहिं धराइ ॥२१॥
अर्थ—पत्र पढते ही नन्द डर गये । 'कालीदह के फूल को भेजो' इसे सुनकर
सब लोग घबडा उठे । यदि मुझे फूल नही भेजते हो तो ब्रज को उजाड़ दूँगा । महर
(नंद) गोप, उपनंद (नंद के छोटे भाई) किसी को नही रहने दूँगा और सबको मार
डालूंगा । यदि फूल दो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है नही तो नष्ट हो जाओगे ।
तुम्हारे कृष्ण तथा बलराम (दो पुत्र) है उन्ही से मंगा लो ॥२१॥
पूछौ जाइ तात सौं बात ।
मैं बलि जाउँ मुखारविंद की, तुमहीं काज कंस अकुलात ।
आए स्याम नंद पै धाए, जान्यौ मातु-पिता बिलखात ।
अबहीं दूर करौँ दुख इनको, कंसहिं पठै देउँ जलजात ।
मोसौँ कहो बात बाबा यह, वहुत करत तुम सोच विचार ।
कहा कहौं तुमसौँ मैं प्यारे, कंस करत तुमसौँ कछु झार ।
जब तैं जनम भयौ है तुम्हरी, कैते करबर टरे कन्हाइ ।
सूर स्याम कुलदेवनि तुमकौं जहाँ तहाँ करि लियौ सहाइ ॥२२॥
अर्थ-यशोदा कृष्ण से कह रही हैं कि पिता जी के पास जाकर इस बात को
पूछो तुम्हारे कमल मुख पर वलिहारी जाती हूँ, तथा (हे पुत्र) तुम्हारे लिए (तुम्हारे
कारण) कंस व्याकुल है । श्याम नंद के पासे दौडे हुए आए और माता-पिता को बिल-
खते हुए देखा । (कृष्ण ने सोचा) अभी कंस के पास कमल भेजकर इनके दुख को दूर कर
दूँगा । (फिर उन्होंने नंद से कहा) हे बाबा मुझसे (उस) बात को कहो जिसके लिए तुम
बहुत सोच विचार कर रहे हो । (नंद ने कहा) हे प्यारे तुमसे क्या कहूँ, कंस तुमसे कुछ वैर
करता है । जब से तुम्हारा जन्म हुआ तब से (तुम्हारा अनिष्ट करने के लिए किये गये)
कितने यत्न टल गये । कुल के देवताओ ने जहाँ तहाँ तुम्हारी सहायता कर दी ॥२२॥
खेलत स्याम, सखा लिए सग ।
इक मारत, इक रोवत गेंदहिं, इक भागत करि नाना रंग ।
मार परसपर करत आपु मैं, अति आनंद भए मन माहिं ।
खेलत ही मैं स्याम सबनि कौं, जमुना तट कौं लीन्हें जाहिं ।
वृन्दावन लीला ८६
मारि भजत जो जाहि ताहि सो, मारत लेत आपनौ दाउ ।
सूर स्याम के गुन को जानै कहत और कछु और उपाउ ॥२३॥
अर्थ—मित्रों को साथ लेकर कृष्ण खेलते हैं । एक गेंद को मारता है, एक
रोकता है, एक अनेक प्रकार के खेल करके भागता है । आपस मे मार करते हुए वे
सब बहुत सुखी है । खेलते-खेलते ही कृष्ण सबको यमुना तट पर ले गये । मारकर जो
भागता था उसे मारकर (कृष्ण) अपना दांव लेते थे, । सूरदास कहते है कि कृष्ण के
गुणों को कौन जानता है, वे कुछ कहते हैं और कुछ अन्य उपाय करते हैं ॥२३॥
स्याम सखा कौं गेंद चलाई ।
श्रीदामा मुरि अंग बचायौ, गेंद परी कालीदह जाई ।
धाइ गही तब फेंट स्याम की, देहु न मेरी गेंद मँगाई ।
और सखा जनि मोकौ जानौ, मोसौँ तुम जनि करौ ढिठाई ।
जानि-बूझि तुम गेंद गिराई, अब दीन्हैं ही बनै कन्हाई ।
सूर सखा सब हँसत परस्पर, भली करी हरि गेंद गँवाई ॥२४॥
अर्थ—कृष्ण ने मित्र के ऊपर गेंद फेंका (चलाया) । श्रीदामा ने मुड़कर अङ्ग
बचाया जिससे गेंद जाकर कालीदह मे गिर गयी । तब (श्रीदामा) ने दौड़कर कृष्ण
की फेंट पकड़ ली (और कहा) मेरी गेंद (यदि) नहीं मँगा देते हो (तो ठीक न होगा)
मुझे अन्य सखाओं के समान मत समझो । तुम मुझसे ढीठपन मत करो । तुमने जान-
बूझकर गेंद को गिरा दिया अब हे कृष्ण गेंद देने से ही काम बनेगा । सूरदास कहते हैं
कि सब मित्र परस्पर हँसते हैं (और कहते हैं) अच्छा किया कृष्ण ने गेंद को गायब
कर दिया ॥२४॥
फेंट छांड़ि मेरी देहु श्रीदामा ।
काहै कौं तुम रारि बढ़ावत, तनक बात कैँ कामा ।
मेरी गेंद लेहु ता बदलैं, बाँह गहत हौ धाइ ।
छोटौ बड़ी न जानत काहूँ, करत बराबरी आइ ।
हम काहे कौँ तुमहिं बराबर, बड़े नंद के पूत ।
सूर स्याम दीन्है ही बनिहैं, बहुत कहावत धूत ॥२५॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे श्रीदामा मेरी फेंट छोड़ दो । तुम छोटी-सी बात
के लिए क्यों झगड़ा बढ़ाते हो । अपनी गेंद के बदले मेरी गेंद ले लो । तुम दौड़कर
बांह (क्यो) पकड़ते हो । किसी को छोटा बड़ा नही समझते हो । (बस) आकर
बराबरी करने लगते हो । (श्रीदामा कहते हैं) हम तुम्हारे बराबर कैसे हो सकते हैं
(क्योकि तुम) बड़े नंद के पुत्र हो । हे कृष्ण गेंद देने से ही बनेगा (भले ही) तुम बहुत
धूर्त कहे जाते हो ॥२५॥
रिस करि लीन्ही फेंट छुड़ाइ ।
सखा सबै देखत हैं ठाढ़े, आपुन चढ़े कदम पर धाइ ।
८० सूरसागर सार सटीक
तारी दै-दै हँसत सबै मिलि, स्याम गए तुम भाजि डराइ ।
रोवत चले श्रीदामा घर कौं, जसुमति आगैं कहिहौं जाइ ।
सखा सखा कहि स्याम पुकारयौ, गेंद आपनौ लेहु न आइ ।
सूर स्याम पीताम्बर काछे, कूद परे दह में भहराइ ॥२६॥
अर्थ-कृष्ण ने क्रोध मे आकर अपने कमर बन्द को छुड़ा लिया। सभी मित्र
खड़े होकर देखते रहे और वे स्वयं कदम्ब पर दौड़कर चढ गये । ताली दे-देकर सभी
हँसते हैं कि कृष्ण तुम डर कर भाग गये । (तब) श्रीदामा रोते हुए घर की तरफ चले
(यह कहते हुए) यशोदा जी के आगे जाकर कहूँगा । कृष्ण ने उन्हे 'सखा-सखा' कहकर
पुकारा (और कहा) कि आकर अपनी गेंद लेते क्यो नही । सूरदास कहते है कि कृष्ण
पीताम्बर को कसकर दह मे झोके के साथ कूद पडे ॥२६॥
चौंकि परी तन की सुध आई ।
आजु कहा ब्रज सोर मचायौ, तब जान्यौ दह गिर्यौ कन्हाई ।
पुत्र-पुत्र कहिकै उठि दौरी, व्याकुल जमुना-तीरहिं धाई ।
ब्रज-वनिता सब संगहिं लागीं आइ गए बल, अग्रज भाई ।
जननी व्याकुल देखि प्रबोधत धीरज करि नीकें जदुराई ।
सूर स्याम कौं नैंकुं नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई ॥२७॥
अर्थ-(यशोदा) कृष्ण के शरीर की याद करके चौक उठी । आज ब्रज मे
शोर क्यो मचा हुआ है । तब उन्हे पता चला कि कृष्ण दह मे गिर गये है (तब
यशोदा) पुत्र-पुत्र कहती हुई व्याकुल होकर यमुना के तट को उठकर दौड़ी । ब्रज की
सभी स्त्रियां साथ मे लग गयीं और (कृष्ण के) बडे भाई बलराम भी आ गये । माता
को व्याकुल देखकर (बलराम) समझाते है कि धीरज धरो, कृष्ण अच्छे सकुशल हैं ।
सूरदास कहते हैं, कृष्ण को कोई डर नही है, हे यशोदा मां तुम मत रोओ ॥२७॥
जसुमति टेरति कुँवर कन्हैया ।
आगैं देखि कहत बलरामहिं, कहाँ रह्यौ तुव भैया ।
मेरौ भैया आवत अबहीँ तोहिं दिखाऊँ मैया ।
धीरज करहु, नैंकु तुम देखहु, यह सुनि लेत बलैया ।
पुनि यह कहति मोहिं परमोधत, धरनि गिरी मुरझैया ।
सूर बिना सुत भइ अति व्याकुल, मेरौ बाल कन्हैया ॥२८॥
अर्थ-यशोदा कृष्ण को पुकारती हैं । बलराम को आगे देखकर कहती हैं कि
तुम्हारा भाई कहां है । (बलराम कहते है) मेरा भाई अभी आता है, और मां तुम्हे
(अभी) दिखाता हूँ । तुम धीरज धरो और थोडी देर देखो । यह सुनकर (यशोदा)
बलैया लेती हैं । फिर यह कहती हुई कि (तुम) मुझे (मात्र) समझा रहे हो धरती पर
मुरझाकर गिर गयी । सूरदास कहते हैं कि (यह सोचती हुई) मेरा कृष्ण बालक है,
बिना पुत्र के यशोदा अत्यधिक व्याकुल हो गयी ॥२८॥
वृन्दावन लीला
अति कोमल तनु धरचौ कन्हाई।
गए तहाँ जहँ काली सोवत, उरग-नारि देखत अकुलाई ।
कह्यौ कौन कौ बालक है तू, बार-बार कहि, भागि न जाई ।
छनकहि मैं जरि भस्म होइगौ, जब देखे उठि जाग जम्हाई ।
उरग-नारि की बानी सुनि कैं आपु हँसे मन मैं मुसुकाई ।
मोकौं कंस पठायौ देखन, तू याकौं अब देहि जगाई ।
कहा कंस दिखरावत इनकौ, एकहि फूँकहिं मैं जरि जाई ।
पुनि-पुनि कहत सूर के प्रभु कौ, तू अब काहे न जाइ पराई ॥२६॥
अर्थ--अत्यधिक कोमल शरीर धारण करके कृष्ण वहाँ गये जहाँ काली सो
रहा था। (कृष्ण को) देखते ही साँप की पत्नी आकुल हो गयी। (उसने) कहा कि
तुम किसके बालक हो । वार-वार कहती हूँ तुम भाग क्यो नही जाते। जब जागकर
(काली) जम्हाई लेगा तुम क्षण भर मे जलकर राख हो जाओगे । साँप की पत्नी की
वाणी सुनकर कृष्ण मन मे मुस्कराकर हँसे । (कृष्ण ने कहा) मुझे कंस ने देखने भेजा
है इसलिए तुम अब इसे जगा दो। कंस इनको कैसे दिखलाता है (क्योकि) एक ही
फूंक मे तो तुम (जीव) जल जाओगे। (नाग-पत्नी) वार-बार कहती है तू अब क्यों
नही भाग जाता ॥२६॥
झिरकि कै नारि, दै गारि गिरिधारि तब, पूँछ पर लात दै अहि जगायौ ।
उठ्यौ अकुलाइ, डर पाइ खग-राज कौं, देखि बालक गरब अति बढ़ायौ ।
पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि फुंकरयौ लटकि करि क्रोध फूले ।
पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले ।
करत फन घात, विष जात उतराति अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै ।
सूर के स्याम प्रभु लोक अभिराम, बिनु ज्ञान अहिराज विष ज्वाल बरसै ॥३०॥
अर्थ-(कृष्ण ने) नाग की पत्नी को झिड़ककर, गाली देकर पूँछ पर पैर रख
कर नाग को जगा दिया। वह व्याकुल होकर गरुड के भय से डर कर उठा । (किन्तु)
बालक को देखकर अत्यधिक गर्व (काली ने) पूँछ को झटक लिया और (पूँछ-
को) पृथ्वी पर पटक कर, क्रोध से फूँककर, तिरछा होकर फुंकार किया। (कृष्ण ने)
पूँछ को दबाये रखा । क्रोध से काली नाग कांप उठा । (उसे) देखकर सभी सांपिनिओं
की सुध-बुध भूल गयी । फण से चोट करने पर विष उतरा जाता है जिससे पानी जल
जाता है (लेकिन) (कृष्ण के) शरीर को छू (तक) नही जाता । सूरदास कहते हैं कि
लोक को सुन्दर लगने वाले (कृष्ण को बिना जाने नागों का राजा काली) विष की
ज्वाला बरसाता है ॥३०॥
उरग लियौ हरि कौ लपटाइ ।
गर्व-वचन कहि-कहि रुख भाषत, मोकौं नहिं जानत अहिराइ ।
लियौ लपेटि चरन तैं सिख लौं, अति इहिं मोसौ करत ढिठाइ ।
६२ सूरसागर सार सटीक
चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ ।
प्रभु अंतरजामी सब जानत, अब डारों इहिं सकुचि मिटाइ ।
सूरदास प्रभु तन बिस्तारचौ, काली बिकल भयौ तब जाइ ॥३१॥
अर्थ—नाग ने कृष्ण को लपेट किया । मुंह से गर्व की बातें करते हो (कृष्ण
कहते है) हे सर्पराज, तुम मुझे नही जानते हो । चरण से शिखा तक लपेट लिया है
इससे मुझसे अत्यधिक धृष्टता करते हो । दबी हुई अपनी पूँछ को छिपाते हो (क्योकि)
उसे तुम युवतियो को दिख। नही सकते । हृदय की बात जानने वाले प्रभु सब कुछ
जानते है (इसलिए) उन्होंने कहा अब इसके संकोच को मिटा डालूं । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण ने (जब) शरीर का विस्तार किया तब काली विफल हो गया ॥३१॥
जबहिं स्याम तन, अति बिस्तारचौ ।
पटपटात टूटत अंग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारचौ ।
यह बानी सुनतहिं करुनामय, तुरत गए सकुचाइ ।
यहै बचन सुनि द्रुपद-सुता दीन्हौ बसन बढ़ाइ ।
यहै बचन गजराज सुनायौ, गरुड़ छोड़ि तहँ धाए ।
यहै बचन सुनि लाखा गृह मैं, पांडव जरत बचाए ।
यह बानी सहि जात न प्रभु सौं, ऐसे परम कृपाल ।
सूरदास प्रभु अंग सकोरचौ ब्याकुल देख्यौ ब्याल ॥३२॥
अर्थ—जब कृष्ण ने शरीर का अत्यधिक विस्तार कर लिया (तब) पटपटा
कर टूटते हुए शरीर को जानकर (काली ने) शरण-शरण (कहकर) पुकारा । यह
वाणी सुनते ही करुणा से भरे हुए कृष्ण तुरन्त सकुचा गये । द्रौपदी के मुख से यही
वचन सुनकर वस्त्र (चीर) बढ़ा दिया था । यही वचन (जब) हाथी ने सुनाया (तब)
गरुड़ को छोड़कर वहीं दौडे थे । यही वचन सुन कर लाख से बने घर (लाक्षागृह)
मे पांडवो को जलने से बचाया था । (शरणागत की दीन) वाणी प्रभु से सही नही
जाती । वे ऐसे परम कृपालु हैं । सूरदास कहते हैं सांप को व्याकुल देखकर कृष्ण
ने अपना अङ्ग सिकोड़ लिया ॥३२॥
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ ।
पग सौं चाँपि धींच बल तीरचौ, नाक फौरि गरि लीन्हौ ।
कूदि चढ़े ताके माथे पर काली करत बिचार ।
स्रवननि सुनी रही यह बानी, ब्रज ह्वै है अवतार ।
तेइ अवतरे आइ गोकुल मैं, मैं जानी यह बात ।
अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य-धन्य जग-तात ।
बार-बार कहि सरन पुकारचौ, राखि-राखि गोपाल ।
सूरदास प्रभु प्रगट भए जब, देख्यौ ब्याल बिहाल ॥३३॥
वृन्दावन लीला ६३
अर्थ—(कृष्ण ने) नाग को नाथते देर नही की। पैर से दबाकर, गरदन के
बल तोड़कर, नाक को फोड़कर पकड़ लिया। (फिर) कूदकर उसके मस्तक पर (कृष्ण)
चढ़ गये। (तब) काली विचार करता है कि कानों में यह वाणी सुनी थी कि ब्रज मे
अवतार होगा। उन्ही (भगवान् ने) गोकुल में आकर अवतार लिया है। मैं यह बात
जान गया। अपने हज़ार मुख से विनती करने लगा कि हे जग के पिता तुम धन्य हो।
बार-बार शरण, कहकर पुकार की कि हे गोपाल रक्षा करो। सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण ने जब नाग को व्याकुल देखा तो वे (विष्णु रूप में) प्रकट हुए ॥३३॥
आवत उरग नाथे स्याम।
नंद जसुदा गोपी, कहत हैं बलराम।
मोर-मुकुट, विसाल लोचन, स्रवन कुंडल लोल।
कोटि पितांबर, बेष नटवर, नृतत फन प्रति डोल।
देव दिवि दुंदुभि बजावत, सुमन गन बरषाइ।
सूर स्याम बिलोकि ब्रज-जन, मातु-पितु सुख पाइ ॥३४॥
अर्थ—नंद, यशोदा, गोप गोपी तथा बलराम सभी कह रहे हैं कि नाग को
नाथ कर कृष्ण आ रहे हैं। (उनके सिर पर) मोर का मुकुट है। (उनके) नेत्र विशाल
हैं। कानों मे चंचल कुंडल, कटि (कमर) मे पीताम्बर, नटवर का वेष धरे (कृष्ण
काली के) प्रति फण पर घूम-घूम कर नाच रहे है। देव आकाश में दुन्दुभी बजा रहे हैं
तथा अत्यधिक फूल बरसा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को देखकर ब्रजवासी तथा
माता-पिता सुखी हो गये ॥३४॥
गोपाल राइ निरतत फन-प्रति ऐसे।
गिरि पर आए बादर देखत, मोर अनंदित जैसे।
डोलत मुकुट सीस पर हरि के, कुडल-मडित-गड।
पीत बसन, दामिन मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड।
उरग-नारि आगैं, सब ठाढ़ी, मुख मुख अस्तुति गावैं।
सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम मागैं पति पावैं ॥३५॥
अर्थ —गोपालराज प्रति फण पर ऐसे नाच रहे हैं जैसे पर्वत पर आये हुए
बादल को देखते ही मोर आनंदित होकर (नाचने लगता है)। कृष्ण के सिर पर मुकुट
डोल रहा है। कनपटी कुंडल से सुशोभित है। पीताम्बर (ऐसा लग रहा है) मानो
बादलो के ऊपर बिजली और उस पर इन्द्रधनुष हो। नाग की सभी पत्नियां आगे
खडी होकर (अपने-अपने) मुख से स्तुति (गा) कर रही है। सूरदास कहते हैं कि (वे
कहती हैं) हे कृष्ण अब अपराध को क्षमा कर दीजिए। हम लोग यह मांगते हैं कि
हमारे पति फिर मिल जावे ॥३५॥
गरुड़-त्रास तैं जौ ह्वां आयीं।
तौ प्रभु चरन-कमल फन-फन प्रति, अपनें सीस धरायीं।
६२ सूरसागर सार सटीक
------------। ऋषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ ।
प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ ।
यह सुनि कृपा करी नंद-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए ।
सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥३६॥
अर्थ-(काली नाग कहता है) गरुड के भय से जो यहां आ गया तभी प्रभु के
चरण-कमल को प्रत्येक फन से अपने सिर पर धारण कराया । वे ऋषि धन्य हैं जिन्होने
पक्षियो के स्वामी (गरुड) को शाप दिया था (कि गरुड़ कालीदह में नही आ सकता)
तभी (मै) यहाँ छिपा रहा । प्रभु की सवारी (गरुड) के डर से भाग कर बच गया
नही तो (वह मुझे) खा लेता । यह सुनकर नन्द के नन्दन (पुत्र) कृष्ण ने कृपा करके
(उसके मस्तक पर) चरण के चिह्न को प्रकट किया । सूरदास कहते है कि कृष्ण ने
उसे भयरहित करके नागो के द्वीप मे भेज दिया ॥३६॥
सहस सकट भरि कमल चलाए ।
अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौं साथ पठाए ।
और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधैं जोरि ।
नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, विनती कीजो मोरि ।
मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए ।
कोटि कमल आपुन नृप-मांगे, तीनि कोटि हैं पाए ।
नृपति हमहिं अपनौं करि जानी, तुम लायक हम नाहिं ।
सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ! ॥३७॥
अर्थ-हजारो गाड़ियो को कमल से भरकर चला दिया । अपनी समानता वाले
जो और गोप थे उनको साथ भेज दिया और अहीरो के कन्धे से जोडकर दही और
मक्खन से भरी बहँगियो को (भेजा) । (किसी गोप के हाथ मे पत्र देकर नन्द कहते
है) राजा (कस) के हाथ मे यह पत्र देकर मेरी (ओर से) विनती करना । नृपति से
मेरा नाम लेकर (कहना) कृष्ण कमल ले आये । हे राजा आपने एक करोड कमल
मांगे थे, तीन करोड पा गये है । राजा हम लोगो को अपना ही करके जानिए ।
(यद्यपि) आपके लायक हम नही है । सूरदास कहते हैं कि (नन्द ने कहा) कि राजा
के आगे कहना कि तुम्हे छोड़कर (हम लोग) कहां जायें ॥३७॥
मुरली
जब हरि मुरली अधर धरत ।
थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, जमुनाजल न बहत ।
खग मोहैं, मृग-जूथ भुलाहीँ, निरखि मदन-छवि छरत ।
पसु मोहैं सुरभी विथकित, तृन दंतनि टेकि रहत ।
सुक सनकादि सकल मुनि मोहैं, ध्यान न तनक गहत ।
सूरदास भाग हैं तिनके, जे या सुखहिं लहत ॥३८॥
वृन्दावन लीला ६३
अर्थ-जब कृष्ण बांसुरी ओठ पर धरते हैं तब न चलने वाले चलकर, गरदन के
और चलने वाले स्थिर हो जाते हैं। पवन शिथिल (थका हुआ) रह जाता है। यमुना
के पानी का बहना बन्द हो जाता है। पक्षी मोहित हो जाते हैं। (इसे) देखकर काम-
देव की छवि अपहृत (क्षीण) हो जाती है। पशु मोह जाते हैं। गाये विशेष रूप से
थकित होकर तृण को दांतों से पकड़े रह जाती हैं। शुकदेव, सनक आदि मुनि मोह
मे पड़ जाते हैं और तनिक भी ध्यान नही धर पाते। सूरदास कहते है कि वे भाग्यवान
है जो इस सुख को पाते हैं ॥३८॥
(कहौं कहा) अंगनि की सुधि विसरि गईँ।
स्याम अधर मृदु सुनत मुरलिका, चकित नारि भईँ।
जो जैसे तौ तैसे रहि गई, सुख-दुख कह्यौ न जाई।
लिखी चित्र सी सूर ह्वै रहिं इकटक पत्र बिसराई ॥३६॥
अर्थ- (केसे कहूँ) (स्त्रियाँ) अंगो की याद ही (ज्ञान) भूल गईं। कृष्ण के
ओठो से वंशी की मीठी (ध्वनि) सुनते ही स्त्रियां चकित हो गयीं। जो जैसे थी वैसे
ही रह गयी। सुख-दुख (कुछ) कहा नही जाता। सूरदास कहते हैं कि वे सब विना
पलक मारे एकटक देखती हुई लिखे हुए चित्र की तरह हो गयी ॥३६॥
मुरली धुनि श्रवन सुनत, भवन रहि न परै।
ऐसी को चतुर नारि, धीरज मन धरै।
सुर नर मुनि सुनत सुधि न, सिव-समाधि टरै।
अपनी गति तजत पवन, सरिता नहिं ढरै।
मोहन मुख-मुरली, मन मोहिनि बस करै।
सूरदास सुनत श्रवन, सुधा-सिंधु भरै ॥४०॥
अर्थ-मुरली की आवाज कान से सुनते ही कोई (गोपी) भवन में रह नही
पाती। कौन ऐसी चतुर स्त्री है जो मन में धीरज धर सके। (वंशी की ध्वनि) सुनते
ही देवता, मनुष्य, मुनि सभी की स्मृति खो जाती है। शिव की समाधि डिग जाती
है। हवा अपनी चाल को छोड़ देता है। नदी का बहना रुक जाता है। मोहन के मुख
की वंशी मन को मोहने वाली नारियो को बस मे कर लेती है। सूरदास कहते हैं कि
कानों से सुनते ही (कानो मे) अमृत का सागर भर जाता है ॥४०॥
बाँसुरी बजाइ आछे रंग सौं मुरारी।
सुनि कै धुनि छूटि गई, संकर की तारी।
वेद पढ़न भूलि गए, ब्रह्मा ब्रह्मचारी।
रसना गुन कहि न सकै, ऐसी सुधि बिसारी।
इंद्र-सभा थकित भइ, लगी जय करारी।
रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृत कारी।
९६ सूरसागर सार सटीक
जमुना जू थकित भईँ, नहीं सँभारी।
सूरदास मुरली है, तीन-लोक प्यारी ॥४१॥
अर्थ - कृष्ण ने अच्छे राग (मोहक ढंग) से वंशी बजायी । (वंशी) की ध्वनि
को सुनकर शंकर का ध्यान टूट गया । ब्रह्मचारी (ब्रह्मा, वेद पढना भूल गये । इस
तरह से स्मृति) समाप्त हो गई कि वाणी गुण को कह ही नही सकती । जब तेजी से
(मुरली की ध्वनि) सुनाई पडी तब इन्द्र की सभा थकित हो गई । रंभा का गर्व मिट
गया (वह) नाचना भूल गयी । यमुना शिथिल हो गई । (वह) होश नही सँभाल
पायी । सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण की) वंशी तीनो लोक को प्रिय है ॥४१॥
मुरली तऊ गुपालहिं भावति ।
सुनि री सखी जदपि नंदलालहिं, नाना भाँति नचावति ।
राखति एक पाइ ठाढ़ौ करि, अति अधिकार जनावति ।
कोमल तन आज्ञा करवावति, कटि टेढ़ी ह्वै आवति ।
अति अधीन सुजान कनीड़े, गिरिधर नार नवावति ।
आपुन पौंढ़ि अधर सज्जा कर, पर पल्लव पलुटावति ।
भृकुटी कुटिल, नैन नासा-पुट, हम पर कोप करावति ।
सूर प्रसन्न जानि एकौ छिन, धर तैं सीस डुलावति ॥४२॥
अर्थ-(एक सखी दूसरी सखी से कहती है) मुरली तब भी कृष्ण को अच्छी
लगती है । सुनो सखी यद्यपि वह नन्दलाल को अनेक भाँति से नचाती है। (उन्हे) एक
ही पैर पर खड़ा करके रखती है और (अपना) अत्यधिक अधिकार जनाती है । (कृष्ण
के) कोमल तन से आज्ञा (का पालन) करवाती है (इसी से कृष्ण की) कमर टेढी हो
आती है । अत्यधिक आधीन तथा कृपा से दबे हुए सुजान कृष्ण की गरदन को झुक-
वाती है । स्वयं (कृष्ण के) ओठ रुपी सेज पर लेट कर पल्लव सदृश हाथ से पैर दबवाती
है। भौंहे, नेत्र, नथुने कुटिल करके हम पर क्रोध करवाती है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी
कहती हैं) कृष्ण को एक भी क्षण प्रसन्न जानकर धड से सिर हिलवाती है ॥४२॥
अधर-रस मुरली लूटन लागी ।
जा रस कौं षटरितु तप कीन्हीं, सो रस पियति सभागी ।
कहाँ रही, कहँ तैं यह आई, कौनैं याहि बुलाई ?
चक्रित भई कहतिं ब्रजबासिनि यह तौ भली न आई ।
सावधान क्यौं होतिं नहीं तुम, उपजी बुरी बलाई ।
सूरदास प्रभु हम पर ताकौं, कीन्हौ सौति बजाई ॥४३॥
अर्थ - मुरली (कृष्ण के) ओठो का रस लूटने लगी । जिस रस के लिए (हम
व्रज बालाओ ने) छहो ऋतुओं मे तप किया, उसी रस को भाग्यशाली (वंशी) पीती
है । (यह) कहाँ थी, कहाँ से आ गयी, इसे किसने बुलाया । (ऐसा) कहती हुई ब्रज-
वृन्दावन लीला ६७
वासिनियां चकित हो गई (और कहने लगी) कि इस (मुरली) का आना अच्छा नही
हुआ । तुम लोग सावधान क्यों नही हो जाती हो क्योकि (यह) एक बुरी बला पैदा
हो गयी है । सूरदास कहते है कि (हम ब्रज की नारियों के ऊपर कृष्ण ने) उसे सोत
के रूप में घोषित कर दिया है ॥४३॥
अबहीं तैं हम सबनि बिसारी ।
ऐसे बस्य भये हरि बाके, जाति न दसा बिचारी ।
कबहूँ कर पल्लव पर राखत, कबहूँ अधर लै धारी ।
कबहुँ लगाइ लेत हिरदै सौं, नैंकहुँ करत न न्यारी ।
मुरली स्याम किए बस अपनैं, जे कहियत गिरधारी ।
सूरदास प्रभु कैं तन-मन-धन, बाँस बँसुरिया प्यारी ॥४४॥
अर्थ—अब तो (वे कृष्ण) हम सब को भूल गये । कृष्ण ऐसे उसके वश मे हो
गये है कि उस दशा का विचार ही नही किया जा सकता । कभी उसे हाथ रूपी
पल्लवो पर रखते हैं कभी ओंठ पर धारण करते हैं। कभी (उसे) हृदय से लगा लेते
हैं, (इस तरह) तनिक समय के लिए भी (वंशी को) अपने से अलग नही करते ।
मुरली ने (ऐसे) कृष्ण को वश मे कर लिया है जो कि गिरधारी कहे जाते है ।
सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को तन, मन, धन सभी से बाँस की बाँसुरी प्रिय है ॥४४॥
मुरली की सरि कौन करै ।
नंद-नंदन त्रिभुवन-पति नागर सो जौ बस्य करै ।
जबहीं जब मन आवत तब तब अधरनि पान करै ।
रहत स्याम आधीन सदाई आयसु तिनहिं करै ।
ऐसी भई मोहिनी माई मोहन मोह करै ।
सुनहु सूर याके गुन ऐसे ऐसी करनि करै ॥४५॥
अर्थ—मुरली की समता कौन कर सकता है । जिस (मुरली ने) तीनों लोक
के स्वामी नन्द के पुत्र चतुर कृष्ण को अपने वश मे कर लिया है। जब-जब (उसके)
मन मे आता है तब-तब ओठ का पान करती है। कृष्ण सदा उसी के आधीन रहते हैं
और उसी की आज्ञा का पालन करते हैं। वह ऐसी मोहने वाली है कि मोहन को ही
मोह लेती है। सूरदास सुनो इसके गुण ऐसे ही है और ऐसी इसकी करनी है ॥४५॥
काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं ।
काहैं न अधरनि धरैं जु पुनि-पुनि मिली अचानक भीरैं ।
काहैं नहीं ताहि कर धारैं, क्यौं नहिं ग्रीव नवावैं ।
काहैं न तनु त्रिभंगा करि राखैं ताके मनहिं चुरावैं ।
काहैं न यौ आधीन रहैं ह्वैं, वै अहीर वह बेनु ।
सूर स्याम कर तैं नहिं टारत, बन-बन चारत धेनु ॥४६॥
७
६८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ-मुरली से कृष्ण क्यो न सम्बन्ध जोड़ें। उसे बार-बार ओठो से क्यो न
लगायें जो उन्हे अचानक सहज ही मिल गयी। उसे क्यों न हाथ में धारण करें और
क्यों न गरदन झुकाये। क्यों न शरीर को तीन जगह टेढ़ा करके, उसके मन को
चुरायें। क्यों न इस तरह से उसके अधीन रहें क्योकि (स्वयं) अहीर हैं और वह
(मुरली) बांस है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण उसे हाथ से नही टालते, (लेकर ही)
वन-वन गाय चराते हैं ॥४६॥
मुरलिया कपट चतुरई ठानी ।
कैसेँ मिलि गई नंद-नंदन कीँ, उन नाहिंँन पहिचानी ।
इक वह नारि, वचन मुख मीठे, सुनत स्याम ललचाने ।
जाँति-पांति की कौन चलावै, वाकैँ रंग भुलाने ।
जाकौ मन मानत है जासौँ, सौ तहँई सुख मानै ।
सूर स्याम वाके गुन गावत, वह हरि के गुन गानै ॥४७॥
अर्थ-मुरली ने कपटपूर्ण चतुरता ठान ली है। यह नन्द के पुत्र कृष्ण को
कैसे मिल गयी। उनकी यह (कोई) पहचानी भी तो नही है। एक तो वह स्त्री है
(दूसरे) उसके वचन मीठे हैं, सुनते ही कृष्ण ललचा गये। जाति-पांति की कौन चर्चा
करे (बस) उसी के रंग मे भूल गये। जिसका मन जिसे स्वीकार करता है उसे वही
सुख मिलता है। सूरदास कहते हैं कि वह कृष्ण का गुण गाती है, कृष्ण उसका गुण
गाते हैं ॥४७॥
स्यामहिँ दोप कहा कहि दीजै ।
कहा बात मुरली सौँ कहियै, सब अपनैहिँ सिर लीजै ।
हमहीँ कहति बजावहु मोहन, यह नहीँ तब जानी ।
हम जानी यह बाँस बँसुरिया, को जानै पटरानी ।
वारे तैँ मुँह लागत-लागत, अब ह्वैँ गई सयानी ।
सुनहु सूर हम भोरी-भारी, याकी अकथ कहानी ॥४८॥
अर्थ-कृष्ण को कैसे दोप दिया जाय। वंशी से क्या कहे, सब (दोप) अपने
ही सिर पर लीजिए। हमी तो कहते है कि मोहन इसे बजाओ। तब यह (सब) हमने
नही जाना था। हमने तो समझा था कि यह वांस की वाँसुरी (ही) है, (इसे)पटरानी
कौन समझ सकता है। वचपन से मुँह लगते-लगते अब सयानी हो गई है। सूरदास
सुनो हम सब भोली-भाली हैं, इसकी कहानी तो न कही जा सकने वाली है ॥४८॥
मुरली कहै सु स्याम करैँ री ।
वाही कैँ वस भये रहत हैं वाकैँ रग ठरैँ री ।
घर-वन, रैन-दिना सँग डोलत, कर तैँ करत न न्यारी ।
आई वन बलाइ यह हमकौँ, कहा दीजियै गारी ।
वृन्दावन लीला ६६
अब लौं रहें हमारे माई, इहिँ अपने अब कीन्हेँ ।
सूर स्याम नागर यह नागरि, दुहुँनि भलैं कर चीन्हेँ ॥४६॥
अर्थ—मुरली जो कहती है वही कृष्ण करते है। उसी के वश में हुए रहते हैं,
उसी के रङ्ग मे ढल गये हैं। घर, वन, रात-दिन साथ लिये घूमते है, हाथ से उसे
अलग नही करते । उनके पास आकर यह हम लोगो के लिए विपत्ति बन गयी । गाली
देने से ही क्या लाभ । अब तक तो कृष्ण हमारे थे, अब इसने अपना बना लिया ।
सूरदास कहते है कि कृष्ण चतुर नागर (छैला) है और यह नागरी बनी है दोनों ने
अच्छी पहचान कर ली है ॥४६॥
मेरे दुख कौ ओर नहीँ ।
षट रितु सीत उष्ण बरषा मैं, ठाढ़े पाइ रही ।
कसकी नहीं नैकहूँ काटत, घामैं राखी डारि ।
अगिनि सुलाक देत नहिँ मुरकी, बेध बनावत जारि ।
तुम जानति मोहिं बाँस बँसुरिया, अगिनि छाप दै आई ।
सूर स्याम ऐसैं तुम लेहु न, खिज्झति कहाँ हौ माई ॥५०॥
अर्थ—(मुरली गोपियों की खीझ का उत्तर देती हुई कहती है) मेरे दुख का
अन्त नही है। छहौ ऋतुओं, ठण्डी, गर्मी तथा वर्षा में एक पैर पर खड़ी रही । काटते
समय तनिक भी कसक नही हुई फिर (कृष्ण ने) मुझे धूप मे डालकर रखा । आग से
गरम की गयी शलाका देते समय हिली डुली नही । फिर जलाकर (कृष्ण) छेद बनाते
हैं । तुम मुझे बाँस की वांसुरी (मात्र) समझती हो । आग की छाप देकर (मैं कृष्ण के
पास) आई हूँ । सूरदास कहते है कि (मुरली कहती है) हे सखियो तुम लोग खीझती
क्यों हो। इस प्रकार तुम लोग भी (कृष्ण से आदर) क्यो नही ले लेती हो ॥५०॥
श्रम करिहौ जब मेरी सी ।
तब तुम अधर-सुधा-रस बिलसहु, मैं ह्वै रहिहौँ चेरी सी ।
बिना कष्ट यह फल न पाइहौ, जानति हौ अवडेरी सी ।
षटरितु सीत तपनि तन गारौ, बाँस बँसुरिया केरी सी ।
कहा मौन ह्वै ह्वै जु रही हौ, कहा करत अवसेरी सी ।
सुनहु सूर मैं न्यारी ह्वै हौँ, जब देखौँ तुम मेरी सी ॥५१॥
अर्थ— (मुरली गोपियो से कहती है) जब (तुम लोग) मेरे समान परिश्रम
करोगी तब तुम (कृष्ण) के ओठो के रस का भोग करोगी, मैं दासी बनकर ही
रहूँगी । बिना कष्ट के यह फल नही पाओगी (इसे तुम) झझट समझती हो । बाँस की
बांसुरी के समान छहो ऋतुओ मे ठंडी, गर्मी से शरीर गलाओ । अब कैसे मौन बनती
जा रही हो । चिन्ता क्यों करती हो । सूरदास कहते हैं कि (मुरली कहती है कि)
(गोपियो) जब मैं अपने समान (मेहनत) करते हुए तुम्हें देखूंगी तब मैं स्वयं शान्त हो
जाऊँगी ॥५१॥
१०० सूरसागर सार सटीक
मुरली स्याम बजावन दै री ।
स्रवननि सुधा पियति काहैँ नहिँ, इहिँ तू जनि बरजै री ।
सुनति नहीँ वह कहति कहा है, राधा राधा नाम ।
तू जानति हरि भूल गए मोहिँ, तुम एकै पति बाम ।
वाही कैँ मुख नाम धरावत, हमहिँ मिलावत ताहि ।
सूर स्याम हमकौँ नहिँ बिसरे, तुम डरपति हौ काहि ॥५२॥
अर्थ—(एक गोपी राधा से कहती है) श्याम को मुरली बजाने दे । कानो से
अमृत क्यों नही पीती । इसे तुम रोको मत । सुनतो नही हो कि वह क्या कह रही
है । (वह) राधा का नाम (ही) तो पुकार रही है । तुम जानती हो कि मुझे कृष्ण भूल
गये । तुम पति कृष्ण की एकमात्र पत्नी हो । वही (मुरली) (कृष्ण) के मुख पर नाम
धरातो है और हमे कृष्ण से मिलवाती है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है)
कृष्ण हमे भूल नही सकते तुम (अनायास) क्यों डरती हो ॥५२॥
मुरलिया मोकौँ लागति प्यारी ।
मिली अचानक आइ कहूँ तैँ, ऐसी रही कहाँ री ।
धनि याके पितु-मातु, धन्य यह, धन्य-धन्य मृदु बोलनि ।
धन्य स्याम गुन गुनि कै ल्याए, नागरि चतुर अमोलनि ।
यह निरमोल मोल नहिँ याकौ, भलो न यातैँ कोई ।
सूरदास याके पटतर कौ, तौ दीजै जौ होई ॥५३॥
अर्थ—मुरली मुझे बहुत प्रिय लगती है । यह अचानक (कही से) आकर (कृष्ण
को) मिल गयी । (इस तरह के गुणो से भरी) यह कहाँ थी । इसके माता-पिता धन्य
हैं; यह (स्वयं) धन्य है; इसकी मीठी बोली धन्य है । कृष्ण धन्य है जो इस चतुर
अनमोल नागरी (शिष्ट स्त्री) को ले आये । यह निरमोल है इसकी कोई कीमत नही
है । इससे अच्छा और कोई नही है । सूरदास कहते है कि इसके समान जो हो वही
इसकी समानता करे ॥५३॥
कमरी
धनि धनि यह कामरी मोहन स्याम की ।
यहै ओढ़ि जात बन, यहै सेज कौ बसन, यहै निवारिनि मेह-
बूँद छाँह घाम की ।
याही ओट सहत सिसिर-सीत, याही गहने हरत लै धरत
ओट कोटि बाम की ।
यहै जाति-पाँति, परिपाटी यहै सिखवत, सूरज प्रभु के यहै
सब बिसराम की ॥५४॥
अर्थ—यह कृष्ण की कमरी धन्य है । इसे ओढकर (कृष्ण) वन जाते हैं । यही
(उनके) सेज का वस्त्र है । यही बादल की बूँदो का निवारण करने वाली है तथा
वृन्दावन लीला १०१
धूप में छाया (करने वाली है)। इसी की ओट में (कृष्ण) शीत ऋतु की ठंडी सहते
हैं। (इसी की सहायता से) कृष्ण हजारों स्त्रियो के आभूषण चुराकर इसी की ओट मे
लाकर रखते हैं (अर्थात् छिपाते हैं)। यही जाति-पांति तथा परिपाटी सिखाती है। सूर
के प्रभु कृष्ण के सब विश्रामों का यह एक मात्र उपाय है ॥५४॥
यह कमरी कमरी करि जानति ।
जाके जितनी बुद्धि हृदय मैं, सौ तितनौ अनुमानति ।
या कमरी कैं एक रोम पर, वारौं चीर पटंबर ।
सो कमरी तुम निंदति गोपी, जो तिहुँ लोक अडंबर ।
कमरी कैं बल असुर संहारे, कमरिहिं तैं सब भोग ।
जाति-पाँति कमरी सब मेरी, सूर सबै यह जोग ॥५५॥
अर्थ- इस कमरी को (कुछ लोग) केवल कमरी ही करके जानते हैं। जिसके
हृदय में जितनी बुद्धि है वह उतना ही अनुमान लगाता है। इस कमरी के एक रोम
पर चीर तथा रेशमी वस्त्र न्योछावर कर दूँ। गोपी उसी कमरी की तुम निन्दा करती
हो जो तीनों लोकों का आच्छादन है। कमरी के बल से असुरों का नाश किया । कमरी
ही से सभी भोग हैं। मेरी जाति-पाँति सब कुछ कमरी ही है। सूरदास कहते हैं कि
यही सब प्रकार का योग है ॥५५॥
चीर-हरन
भवन रवन सबही बिसरायौ ।
नँद-नंदन जब तैं मन हरि लियौ, बिरथा जनम गँवायौ ।
जप, तप, व्रत, संजम, साधन तैं, द्रवनि होत पाषान ।
जैसे मिलै स्याम सुंदर बर, सोइ कीजै, नहिं आन ।
यहै मंत्र दृढ़ कियौ सबनि मिलि, यातैं होइ सुहोइ ।
वृथा जनम जग मैं जिनि खोवहु, ह्याँ अपनी नहिं कोइ ।
तब प्रतीत सबहिनि कौं आइ, कीन्हौ दृढ़ बिस्वास ।
सूर स्यामसुंदर पति पावैं, यहै हमारी आस ॥५६॥
अर्थ- सभी गोपियो ने घर और पति को भुला दिया। जब से नन्द के पुत्र
कृष्ण ने मन हर लिया (तब से लगता है कि) सारा जीवन व्यर्थ है। जप, तप, व्रत
संयम तथा (अन्य) साधनो से पत्थर पिघल जाता है। जैसे कृष्ण वर (पति) के रूप
मे मिले, वही कीजिए, दूसरा कुछ नही। सब गोपियो ने मिलकर यही मन्त्र दृढ किया
इसी से जो होगा, सो होगा । संसार मे व्यर्थ में जन्म मत खोओ, यहाँ पर अपन
कोई नही है। तब सभी को ज्ञान आया तथा सब ने दृढ विश्वास कर लिया। सूरदास
कहते हैं श्यामसुन्दर हमे (गोपियो को) पति रूप मे मिलें यही हमारी आशा है ॥५६॥
जमुना तट देखे नंद नदन ।
मोर-मुकुट मकराकृत-कुंडल, पीत-बसन तन चंदन ।
१०२ सूरसागर सार सटीक
लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपनि बुझानी ।
प्रेम-मगन तब भईं सुंदरी, उर गदगद, मुख-बानी ।
कमल-नयन तट पर हैं ठाढे, सकुचहिं मिलि ब्रज नारी ।
सूरदास-प्रभु अंतरजामी, व्रत-पूरन पगधारी ॥५७॥
अर्थ-(गोपियो ने) कृष्ण को यमुना के तट पर देखा । (सिर पर) मोर का
मुकुट, (कान मे) मकर के आकार का कुण्डल, शरीर मे पीताम्बर तथा चन्दन धारण
करने वाले (कृष्ण) के दर्शन से आंखे तृप्त हो गयी तथा हृदय की तपन बुझ गयी ।
तब सुन्दरियां प्रेम मे डूब गईं तथा उनके हृदय गद्गद् हो गये । वाणी, मुख मे ही रह
गयी । कमल के समान नेत्र वाले कृष्ण तट पर खडे हैं, मिलने से ब्रज की स्त्रियो में
संकोच हो रहा है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तर की बात जानने वाले हैं, उन्होने
व्रत पूरा करने के लिए कदम बढाया ॥५७॥
बनत नहिं जमुना कौ ऐबौ ।
सुंदर स्याम घाट पर ठाढे, कहौ कौन विधि जैबौ ।
कैसेँ बसन उतारि धरैँ हम, कैसेँ जलहिं समैबौ ।
नंद नंदन हमकौँ देखैंगै, कैसेँ करि जु अन्हैबौ ।
चोली, चीर, हार लै भाजत, सो कैसेँ करि पैबौ ।
अकन भरि-भरि लेत सूर प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ ॥५८॥
अर्थ-यमुना का आना (हम गोपियों के लिए) ठीक नही लगता है । सुन्दर
कृष्ण घाट पर खडे हैं, कहो किस तरह जाना होगा । हम लोग वस्त्रों को उतारकर
कैसे रखे और जल मे कैसे पैठे । कृष्ण हम लोगों को देखेगे (इस दशा मे) स्नान कैसे
होगा । चोली, चीर, हार लेकर (कृष्ण) भागते हैं । इन सब को कैसे पायेगे । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण (सब गोपियो) को गोद मे भर लेते हैं (आलिंगन कर लेते हैं) कल
इस रास्ते से आना नही होगा ॥५८॥
नीकैं तप कियौ तनु गारि ।
आपु देखत कदम पर चढि, मानि लियौ मुरारि ।
वर्ष भर व्रत-नेम-संजम, श्रम कियौ मोहिं काज ।
कैसे हूँ मोहिं भजै कोऊ, मोहिं विरद को लाज ।
धन्य व्रत इन कियौ पूरन, सीत तपति निवारि ।
काम-आतुर भजीँ मोकौँ, नव तरुनि ब्रज-नारि ।
कृपा-नाथ कृपाल भए तब, जानि-जन की पीर ।
सूर-प्रभु अनुमान कीन्हौँ, हरौँ इनके चीर ॥५६॥
अर्थ-शरीर को गलाकर (गोपियो) ने बहुत तप किया । (कृष्ण ने) कदम पर
चढ़कर (जब) देखा तब उनकी (तपस्या) को मान लिया । (कृष्ण कहते है) पूरे साल
(तुम लोगो ने) मेरे लिए व्रत, नियम तथा संयम किया । मुझे किसी भी तरह कोई
वृन्दावन लीला १०३
भजे मुझे तो अपने विरद को चिन्ता है ही। शीत तथा गर्मी का त्याग करके इन्होने
अपना व्रत पूरा कर लिया इसलिये ये धन्य हैं। ब्रज की नवयुवती स्त्रियो ने मुझे
कामातुर होकर भजा है। कृपा के नाथ तथा कृपा के पालन करने वाले कृष्ण ने जनों
(भक्त जनो) की पीड़ा को जानकर यह निश्चय किया कि इनके (गोपियो के) चीर
को हरूँ ॥५९॥
बसन हरे सब कदम चढ़ाए।
सोरह सहस गोप-कन्यनि के, अंग आभूषन सहित चुराए।
नीलांवर, पाटंवर, सारी, सेत पीत चुनरी, अरुनाए।
अति बिस्तार नीप तरु तामैँ, लै-लै जहाँ तहाँ लटकाए।
मनि आभरन डार-डारनि प्रति, देखत छवि मनहीँ अँटकाए।
सूर, स्याम जु तिनि व्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए ॥६०॥
अर्थ—सब वस्त्रो को हरकर (कृष्ण ने) कदम पर चढा दिया। सोलह हजार
कन्याओं के अङ्ग आभूषणो को एक साथ चुरा लिया। नीले वस्त्र, रेशमी वस्त्र, साडी,
सफेद, पीली तथा लाल चुनरी (सभी प्रकार के वस्त्रों को) ले लेकर अत्यधिक फैले
हुए कदम्ब के वृक्ष पर जहाँ तहाँ लटका दिया। मणि से बने गहनों को प्रत्येक डार
पर अँटका कर मन से उसी की छवि देखते हैं। सूरदास कहते हैं कि उन गोपियों के
व्रत को पूर्ण करने के लिये (व्रत) फल कदम्ब की डालों में फला दिया ॥६०॥
हमारे अम्बर देहु मुरारी।
लै सब चीर कदम चढ़ि बैठे, हम जल-माँझ उघारी।
तट पर बिना बसन क्यौँ आवैँ, लाज लगति है भारी।
चोली हार तुम्हिं कौँ दीन्हौँ, चीर हमहिँ यौँ डारी।
तुम यह बात अचम्भौ भाषत, नाँगी आवहु नारी।
सूर स्याम कछु छोह करौ जू, सीत गई तनु मारी ॥६१॥
अर्थ—(गोपियाँ कृष्ण से विनती करती हैं) मुरारी हम लोगो के वस्त्रों को दे
दो। सब वस्त्रों को चुराकर (तुम) कदम्ब पर चढ़कर बैठे हो, हम लोग जल के बीच
बिना वस्त्र के (उघारी) हैं। तट पर बिना वस्त्र के कैसे आवे, क्योकि हमें बहुत लाज
लग रही है। चोली, हार तुम्ही को दे दिया लेकिन चीर तो हमें दे डालो। तुम यह
आश्चर्य से भरी बात कह रहे हो कि नारियां नङ्गी ही बाहर आओ। सूरदास कहते
हैं कि (गोपियाँ विनय करती हैं) कृष्ण कुछ दया करो, हमारे शरीर में ठण्डी लग
गयी है ॥६१॥
लाज ओट यह दूरि करौ।
जोइ मैं कहौँ करौ तुम सोई, सकुच बापुरिहि कहा करौ।
जल तैँ तीर आइ कर जोरहु, मैं देखौँ तुम बिनय करौ।
पूरन व्रत अब भयौ तुम्हारौ, गुरुजन सका दूरि करौ।