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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

६२ सूरसागर सार सटीक
चाँपी पूँछ लुकावत अपनी, जुवतिनि कौं नहिं सकत दिखाइ ।
प्रभु अंतरजामी सब जानत, अब डारों इहिं सकुचि मिटाइ ।
सूरदास प्रभु तन बिस्तारचौ, काली बिकल भयौ तब जाइ ॥३१॥
अर्थ—नाग ने कृष्ण को लपेट किया । मुंह से गर्व की बातें करते हो (कृष्ण
कहते है) हे सर्पराज, तुम मुझे नही जानते हो । चरण से शिखा तक लपेट लिया है
इससे मुझसे अत्यधिक धृष्टता करते हो । दबी हुई अपनी पूँछ को छिपाते हो (क्योकि)
उसे तुम युवतियो को दिख। नही सकते । हृदय की बात जानने वाले प्रभु सब कुछ
जानते है (इसलिए) उन्होंने कहा अब इसके संकोच को मिटा डालूं । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण ने (जब) शरीर का विस्तार किया तब काली विफल हो गया ॥३१॥
जबहिं स्याम तन, अति बिस्तारचौ ।
पटपटात टूटत अंग जान्यौ, सरन-सरन सु पुकारचौ ।
यह बानी सुनतहिं करुनामय, तुरत गए सकुचाइ ।
यहै बचन सुनि द्रुपद-सुता दीन्हौ बसन बढ़ाइ ।
यहै बचन गजराज सुनायौ, गरुड़ छोड़ि तहँ धाए ।
यहै बचन सुनि लाखा गृह मैं, पांडव जरत बचाए ।
यह बानी सहि जात न प्रभु सौं, ऐसे परम कृपाल ।
सूरदास प्रभु अंग सकोरचौ ब्याकुल देख्यौ ब्याल ॥३२॥
अर्थ—जब कृष्ण ने शरीर का अत्यधिक विस्तार कर लिया (तब) पटपटा
कर टूटते हुए शरीर को जानकर (काली ने) शरण-शरण (कहकर) पुकारा । यह
वाणी सुनते ही करुणा से भरे हुए कृष्ण तुरन्त सकुचा गये । द्रौपदी के मुख से यही
वचन सुनकर वस्त्र (चीर) बढ़ा दिया था । यही वचन (जब) हाथी ने सुनाया (तब)
गरुड़ को छोड़कर वहीं दौडे थे । यही वचन सुन कर लाख से बने घर (लाक्षागृह)
मे पांडवो को जलने से बचाया था । (शरणागत की दीन) वाणी प्रभु से सही नही
जाती । वे ऐसे परम कृपालु हैं । सूरदास कहते हैं सांप को व्याकुल देखकर कृष्ण
ने अपना अङ्ग सिकोड़ लिया ॥३२॥
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ ।
पग सौं चाँपि धींच बल तीरचौ, नाक फौरि गरि लीन्हौ ।
कूदि चढ़े ताके माथे पर काली करत बिचार ।
स्रवननि सुनी रही यह बानी, ब्रज ह्वै है अवतार ।
तेइ अवतरे आइ गोकुल मैं, मैं जानी यह बात ।
अस्तुति करन लग्यौ सहसौ मुख, धन्य-धन्य जग-तात ।
बार-बार कहि सरन पुकारचौ, राखि-राखि गोपाल ।
सूरदास प्रभु प्रगट भए जब, देख्यौ ब्याल बिहाल ॥३३॥