सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

१०० सूरसागर सार सटीक
मुरली स्याम बजावन दै री ।
स्रवननि सुधा पियति काहैँ नहिँ, इहिँ तू जनि बरजै री ।
सुनति नहीँ वह कहति कहा है, राधा राधा नाम ।
तू जानति हरि भूल गए मोहिँ, तुम एकै पति बाम ।
वाही कैँ मुख नाम धरावत, हमहिँ मिलावत ताहि ।
सूर स्याम हमकौँ नहिँ बिसरे, तुम डरपति हौ काहि ॥५२॥
अर्थ—(एक गोपी राधा से कहती है) श्याम को मुरली बजाने दे । कानो से
अमृत क्यों नही पीती । इसे तुम रोको मत । सुनतो नही हो कि वह क्या कह रही
है । (वह) राधा का नाम (ही) तो पुकार रही है । तुम जानती हो कि मुझे कृष्ण भूल
गये । तुम पति कृष्ण की एकमात्र पत्नी हो । वही (मुरली) (कृष्ण) के मुख पर नाम
धरातो है और हमे कृष्ण से मिलवाती है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है)
कृष्ण हमे भूल नही सकते तुम (अनायास) क्यों डरती हो ॥५२॥
मुरलिया मोकौँ लागति प्यारी ।
मिली अचानक आइ कहूँ तैँ, ऐसी रही कहाँ री ।
धनि याके पितु-मातु, धन्य यह, धन्य-धन्य मृदु बोलनि ।
धन्य स्याम गुन गुनि कै ल्याए, नागरि चतुर अमोलनि ।
यह निरमोल मोल नहिँ याकौ, भलो न यातैँ कोई ।
सूरदास याके पटतर कौ, तौ दीजै जौ होई ॥५३॥
अर्थ—मुरली मुझे बहुत प्रिय लगती है । यह अचानक (कही से) आकर (कृष्ण
को) मिल गयी । (इस तरह के गुणो से भरी) यह कहाँ थी । इसके माता-पिता धन्य
हैं; यह (स्वयं) धन्य है; इसकी मीठी बोली धन्य है । कृष्ण धन्य है जो इस चतुर
अनमोल नागरी (शिष्ट स्त्री) को ले आये । यह निरमोल है इसकी कोई कीमत नही
है । इससे अच्छा और कोई नही है । सूरदास कहते है कि इसके समान जो हो वही
इसकी समानता करे ॥५३॥
कमरी
धनि धनि यह कामरी मोहन स्याम की ।
यहै ओढ़ि जात बन, यहै सेज कौ बसन, यहै निवारिनि मेह-
बूँद छाँह घाम की ।
याही ओट सहत सिसिर-सीत, याही गहने हरत लै धरत
ओट कोटि बाम की ।
यहै जाति-पाँति, परिपाटी यहै सिखवत, सूरज प्रभु के यहै
सब बिसराम की ॥५४॥
अर्थ—यह कृष्ण की कमरी धन्य है । इसे ओढकर (कृष्ण) वन जाते हैं । यही
(उनके) सेज का वस्त्र है । यही बादल की बूँदो का निवारण करने वाली है तथा