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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला १०३

भजे मुझे तो अपने विरद को चिन्ता है ही। शीत तथा गर्मी का त्याग करके इन्होने
अपना व्रत पूरा कर लिया इसलिये ये धन्य हैं। ब्रज की नवयुवती स्त्रियो ने मुझे
कामातुर होकर भजा है। कृपा के नाथ तथा कृपा के पालन करने वाले कृष्ण ने जनों
(भक्त जनो) की पीड़ा को जानकर यह निश्चय किया कि इनके (गोपियो के) चीर
को हरूँ ॥५९॥
बसन हरे सब कदम चढ़ाए।
सोरह सहस गोप-कन्यनि के, अंग आभूषन सहित चुराए।
नीलांवर, पाटंवर, सारी, सेत पीत चुनरी, अरुनाए।
अति बिस्तार नीप तरु तामैँ, लै-लै जहाँ तहाँ लटकाए।
मनि आभरन डार-डारनि प्रति, देखत छवि मनहीँ अँटकाए।
सूर, स्याम जु तिनि व्रत पूरन, कौ फल डारनि कदम फराए ॥६०॥
अर्थ—सब वस्त्रो को हरकर (कृष्ण ने) कदम पर चढा दिया। सोलह हजार
कन्याओं के अङ्ग आभूषणो को एक साथ चुरा लिया। नीले वस्त्र, रेशमी वस्त्र, साडी,
सफेद, पीली तथा लाल चुनरी (सभी प्रकार के वस्त्रों को) ले लेकर अत्यधिक फैले
हुए कदम्ब के वृक्ष पर जहाँ तहाँ लटका दिया। मणि से बने गहनों को प्रत्येक डार
पर अँटका कर मन से उसी की छवि देखते हैं। सूरदास कहते हैं कि उन गोपियों के
व्रत को पूर्ण करने के लिये (व्रत) फल कदम्ब की डालों में फला दिया ॥६०॥
हमारे अम्बर देहु मुरारी।
लै सब चीर कदम चढ़ि बैठे, हम जल-माँझ उघारी।
तट पर बिना बसन क्यौँ आवैँ, लाज लगति है भारी।
चोली हार तुम्हिं कौँ दीन्हौँ, चीर हमहिँ यौँ डारी।
तुम यह बात अचम्भौ भाषत, नाँगी आवहु नारी।
सूर स्याम कछु छोह करौ जू, सीत गई तनु मारी ॥६१॥
अर्थ—(गोपियाँ कृष्ण से विनती करती हैं) मुरारी हम लोगो के वस्त्रों को दे
दो। सब वस्त्रों को चुराकर (तुम) कदम्ब पर चढ़कर बैठे हो, हम लोग जल के बीच
बिना वस्त्र के (उघारी) हैं। तट पर बिना वस्त्र के कैसे आवे, क्योकि हमें बहुत लाज
लग रही है। चोली, हार तुम्ही को दे दिया लेकिन चीर तो हमें दे डालो। तुम यह
आश्चर्य से भरी बात कह रहे हो कि नारियां नङ्गी ही बाहर आओ। सूरदास कहते
हैं कि (गोपियाँ विनय करती हैं) कृष्ण कुछ दया करो, हमारे शरीर में ठण्डी लग
गयी है ॥६१॥
लाज ओट यह दूरि करौ।
जोइ मैं कहौँ करौ तुम सोई, सकुच बापुरिहि कहा करौ।
जल तैँ तीर आइ कर जोरहु, मैं देखौँ तुम बिनय करौ।
पूरन व्रत अब भयौ तुम्हारौ, गुरुजन सका दूरि करौ।