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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

६२ सूरसागर सार सटीक
------------। ऋषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ ।
प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ ।
यह सुनि कृपा करी नंद-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए ।
सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥३६॥
अर्थ-(काली नाग कहता है) गरुड के भय से जो यहां आ गया तभी प्रभु के
चरण-कमल को प्रत्येक फन से अपने सिर पर धारण कराया । वे ऋषि धन्य हैं जिन्होने
पक्षियो के स्वामी (गरुड) को शाप दिया था (कि गरुड़ कालीदह में नही आ सकता)
तभी (मै) यहाँ छिपा रहा । प्रभु की सवारी (गरुड) के डर से भाग कर बच गया
नही तो (वह मुझे) खा लेता । यह सुनकर नन्द के नन्दन (पुत्र) कृष्ण ने कृपा करके
(उसके मस्तक पर) चरण के चिह्न को प्रकट किया । सूरदास कहते है कि कृष्ण ने
उसे भयरहित करके नागो के द्वीप मे भेज दिया ॥३६॥
सहस सकट भरि कमल चलाए ।
अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौं साथ पठाए ।
और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधैं जोरि ।
नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, विनती कीजो मोरि ।
मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए ।
कोटि कमल आपुन नृप-मांगे, तीनि कोटि हैं पाए ।
नृपति हमहिं अपनौं करि जानी, तुम लायक हम नाहिं ।
सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ! ॥३७॥
अर्थ-हजारो गाड़ियो को कमल से भरकर चला दिया । अपनी समानता वाले
जो और गोप थे उनको साथ भेज दिया और अहीरो के कन्धे से जोडकर दही और
मक्खन से भरी बहँगियो को (भेजा) । (किसी गोप के हाथ मे पत्र देकर नन्द कहते
है) राजा (कस) के हाथ मे यह पत्र देकर मेरी (ओर से) विनती करना । नृपति से
मेरा नाम लेकर (कहना) कृष्ण कमल ले आये । हे राजा आपने एक करोड कमल
मांगे थे, तीन करोड पा गये है । राजा हम लोगो को अपना ही करके जानिए ।
(यद्यपि) आपके लायक हम नही है । सूरदास कहते हैं कि (नन्द ने कहा) कि राजा
के आगे कहना कि तुम्हे छोड़कर (हम लोग) कहां जायें ॥३७॥
मुरली
जब हरि मुरली अधर धरत ।
थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, जमुनाजल न बहत ।
खग मोहैं, मृग-जूथ भुलाहीँ, निरखि मदन-छवि छरत ।
पसु मोहैं सुरभी विथकित, तृन दंतनि टेकि रहत ।
सुक सनकादि सकल मुनि मोहैं, ध्यान न तनक गहत ।
सूरदास भाग हैं तिनके, जे या सुखहिं लहत ॥३८॥