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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ६६
अब लौं रहें हमारे माई, इहिँ अपने अब कीन्हेँ ।
सूर स्याम नागर यह नागरि, दुहुँनि भलैं कर चीन्हेँ ॥४६॥
अर्थ—मुरली जो कहती है वही कृष्ण करते है। उसी के वश में हुए रहते हैं,
उसी के रङ्ग मे ढल गये हैं। घर, वन, रात-दिन साथ लिये घूमते है, हाथ से उसे
अलग नही करते । उनके पास आकर यह हम लोगो के लिए विपत्ति बन गयी । गाली
देने से ही क्या लाभ । अब तक तो कृष्ण हमारे थे, अब इसने अपना बना लिया ।
सूरदास कहते है कि कृष्ण चतुर नागर (छैला) है और यह नागरी बनी है दोनों ने
अच्छी पहचान कर ली है ॥४६॥
मेरे दुख कौ ओर नहीँ ।
षट रितु सीत उष्ण बरषा मैं, ठाढ़े पाइ रही ।
कसकी नहीं नैकहूँ काटत, घामैं राखी डारि ।
अगिनि सुलाक देत नहिँ मुरकी, बेध बनावत जारि ।
तुम जानति मोहिं बाँस बँसुरिया, अगिनि छाप दै आई ।
सूर स्याम ऐसैं तुम लेहु न, खिज्झति कहाँ हौ माई ॥५०॥
अर्थ—(मुरली गोपियों की खीझ का उत्तर देती हुई कहती है) मेरे दुख का
अन्त नही है। छहौ ऋतुओं, ठण्डी, गर्मी तथा वर्षा में एक पैर पर खड़ी रही । काटते
समय तनिक भी कसक नही हुई फिर (कृष्ण ने) मुझे धूप मे डालकर रखा । आग से
गरम की गयी शलाका देते समय हिली डुली नही । फिर जलाकर (कृष्ण) छेद बनाते
हैं । तुम मुझे बाँस की वांसुरी (मात्र) समझती हो । आग की छाप देकर (मैं कृष्ण के
पास) आई हूँ । सूरदास कहते है कि (मुरली कहती है) हे सखियो तुम लोग खीझती
क्यों हो। इस प्रकार तुम लोग भी (कृष्ण से आदर) क्यो नही ले लेती हो ॥५०॥
श्रम करिहौ जब मेरी सी ।
तब तुम अधर-सुधा-रस बिलसहु, मैं ह्वै रहिहौँ चेरी सी ।
बिना कष्ट यह फल न पाइहौ, जानति हौ अवडेरी सी ।
षटरितु सीत तपनि तन गारौ, बाँस बँसुरिया केरी सी ।
कहा मौन ह्वै ह्वै जु रही हौ, कहा करत अवसेरी सी ।
सुनहु सूर मैं न्यारी ह्वै हौँ, जब देखौँ तुम मेरी सी ॥५१॥
अर्थ— (मुरली गोपियो से कहती है) जब (तुम लोग) मेरे समान परिश्रम
करोगी तब तुम (कृष्ण) के ओठो के रस का भोग करोगी, मैं दासी बनकर ही
रहूँगी । बिना कष्ट के यह फल नही पाओगी (इसे तुम) झझट समझती हो । बाँस की
बांसुरी के समान छहो ऋतुओ मे ठंडी, गर्मी से शरीर गलाओ । अब कैसे मौन बनती
जा रही हो । चिन्ता क्यों करती हो । सूरदास कहते हैं कि (मुरली कहती है कि)
(गोपियो) जब मैं अपने समान (मेहनत) करते हुए तुम्हें देखूंगी तब मैं स्वयं शान्त हो
जाऊँगी ॥५१॥