सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—लेटे हुए कृष्ण को नीद आ गई। महरि यशोदा (कृष्ण बलराम) दोनों
को सुलाकर अपने घर के कामो मे लग गईं। धीमे से घर के लोगो के नाम ले-लेकर
वर्जित करती हैं। मोहन और बलराम के डर से कोई जोर से बोलने नही पाता।
शिव, सनकादि जिसे दिन रात सब समय ध्यान करते हुए पार नही पाते वे ही सूर
के प्रभु सनातन ब्रह्म नन्द के घर मे सो रहे है ॥१५॥
देखत नंद कान्ह अति सोवत ।
भूखे भये आजु बन-भीतर, यह कहि कहि मुख जोवत ।
कह्यौ नहीं मानत काहू कौ, आपु हठी दोऊ बीर ।
बार-बार तनु पोंछत कर सौं, अतिहिं प्रेम की पीर ।
सेज मँगाइ लई तहँ अपनी, जहाँ स्याम-बलराम ।
सूरदास प्रभु कैं ढिग सोए, सँग पौढ़ी नँद-बाम ॥१६॥
अर्थ—नन्द अत्यधिक सोते हुए कृष्ण को देखते हैं। आज बन के भीतर (कृष्ण
को) भूख लगी थी, यह कहकर मुंह देखते है। (नंद कहते है) दोनो (बहुत) हठी हैं
और किसी का कहना नही मानते हैं। अत्यधिक प्रेम की पीडा से (नंद) हाथ से (कृष्ण
के) शरीर को बार-बार पोंछते है ! उन्होने अपनी चारपाई वहीं मँगा ली जहाँ कृष्ण
और बलराम (सो रहे) थे। सूरदास कहते हैं कि (नंद) प्रभु कृष्ण के पास सोये और
वही नन्दरानी सोयी ॥१६॥
जागि उठे तब कुँवर कन्हाई ।
मैया कहाँ गई मो ढिग तैं, सँग सोवति बल भाई ।
जागे नंद, जसोदा जागी, बोलि लिए हरि पास ।
सोवत झझकि उठे काहे तैं, दीपक कियौ प्रकास ।
सपनैं कूदि पर्यो जमुना दह, काहू दियो गिराइ ।
सूर स्याम सौं कहति जसोदा, जनि हो लाल डराइ ॥१७॥
अर्थ—तब कुँवर कृष्ण जाग उठे (और कहने लगे) मेरे पास से माता कहाँ
चली गयी और (मेरे) साथ भाई बलभद्र सो रहे हैं। (इतने मे) नन्द और यशोदा
जाग गये और कृष्ण को अपने पास बुला लिया। सोते हुए झझककर क्यो उठ गये
(इसे जानने के लिए) दीपक से प्रकाश किया। (कृष्ण कहते हैं) स्वप्न में यमुना के दह
मे कूद गया या किसी ने गिरा दिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा कृष्ण से कहती हैं,
हे मेरे लाल डरो मत ॥१७॥
मैं बरज्यौ जमुना-तट जात ।
सुधि रहि गई न्हात की तेरैं, जनि डरपौ मेरे तात ।
नंद उठाइ लियौ कोरा करि, अपने संग पौढ़ाइ ।
वृन्दावन मैं फिरत जहाँ तहँ, किहिं कारन तू जाइ ।