सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
३५० सूरसागर सार सटीक
जब वह सुरति होति उर अंतर, लागत काम वान की भाली।
सूरदास प्रभु प्रीति पुरातन, सुमिरत दुसह सूर उर साली ॥२२॥
अर्थ-हे (पथिक) ! फिर (कृष्ण) ब्रज की बात नही चलायी। वही एक वार
कमल नेत्र (कृष्ण) ने उद्धव के हाथ पत्रिका देकर भेजी थी। हे पथिक ! तुम्हारे पैर
लगती हूँ; मथुरा जाओ जहां वनमाली (कृष्ण) हैं। द्वार पर से प्रत्यक्ष पुकार कर
कहना (कि) यमुना में (कालीदह मे) पुनः काली (नाग) आ गया ! उस समय (कृष्ण
की) वैसी (गहरी) कृपा थी, (उन) रसिक (कृष्ण ने) रुचि लेकर प्रेम का निर्वाह किया
था। (हे सखी !) ऊँचे वृक्ष मे लगे पुष्प को मांगने पर गोद मे उठाकर अपने उत्संग
(ऊपरी भाग, कंधो पर) बिठा लेते हैं (ताकि हम स्वयं अपने हाथ से तोड़ ले) ! जब
हृदय मे वह स्मृति होती है (वह घटना याद आती है) तो काम के बाण की नोक
(भाली) चुभती हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (कृष्ण) की प्रीति पुरानी (है)
स्मरण करते ही असह्य पीड़ा (शूल) हृदय मे सालती (चुभती) है ॥२२॥
तुम्हरे देस कागद मसि खूटी।
भूख प्यास अरु नीँद गई सब, विरह लरी तन लूटी।
दादुर मोर पपीहा बोले, अवधि भई सब झूठी।
पाछैं आइ तुम कहा करोगे, जब तन जैहै छूटी।
राधा कहति संदेश स्याम सौं, भई प्रीति की टूटी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, सखी करति है कूटी ॥२३॥
अर्थ- (जान पड़ता है) तुम्हारे देश में कागज (और) स्याही समाप्त हो गयी।
(हमारी) भूख, प्यास, नींद, सब चली गई, विरह ने शरीर को लूट लिया। दादुर,
मोर (तथा) पपीहा बोलने लगे; आने की अवधि सब झूठी हो गयी। बाद में आकर
तुम क्या करोगे, जब शरीर छूट जायेगा। राधा श्याम से संदेश कहती है (कि)
प्रेम खंडित हो रहा है। सूरदास के प्रभु ! तुम्हारे मिलन के विना सखियां (तुम्हारे
विषय मे) कूट करती हैं (उपहास करती हैं) ॥२३॥
पथिक कह्यौ ब्रज जाइ, सुने हरि जात सिंधु तट।
सुनि सब अँग भए सिथिल, गयौ नहिँ बज्र हियौ फट।
नर नारी घर-घरनि सबै, यह करति बिचारा।
मिलिहैं कैसी भाँति हमैं, अब नन्द कुमारा।
निकट वसत हुती आस, कियौ अब दूरि पयाना।
विना कृपा भगवान, उपाइ न सूरज आना ॥२४॥
अर्थ-(किसी) पथिक ने ब्रज जाकर कहा (कि), (उसने) सुना है (कि)
हरि सिंधु के तट (द्वारिका) जा रहे है। (यह) सुनकर (गोपियो के) सब अंग शिथिल
हो गये, (किन्तु) (उनका) वज्र (सा) (कठोर) हृदय फट नही गया। सभी घरों मे
नर (तथा) नारियां यहो विचार करती है (कि) अब नन्द-कुमार (कृष्ण) किस तरह
द्वारिका चरितं ३५३
मिलेंगे। (जब वे) निकट बसते थे तो मिलने की (कुछ) आशा थी, (किन्तु) अब तो
(उन्होंने) दूर प्रस्थान कर दिया। कृष्ण की कृपा के बिना सूर अब कोई दूसरा उपाय
नही ॥२४॥
नैना भए अनाथ हमारे ।
मदनगुपाल उहाँ तैं सजनी, सुनियत दूरि सिधारे ।
वै समुद्र हम मीन बापुरी, कैसेँ जीवैँ न्यारे ।
हम चातक वै जलद-स्याम-घन, पियतिँ सुधा-रस प्यारे ।
मधुरा बसत आस दरसन की, जोइ नैन मग हारे ।
सूरदास हमकौँ उलटी बिधि, मृतकहूँ, तैँ पुनि मारे ॥२५॥
अर्थ-गोपियां सोचती हैं कि हमारे नेत्र अनाथ हो गये। सुनती हूँ (कि)
मदन गोपाल वहाँ से (भी) (कही) दूर चले गये। वे (कृष्ण) समुद्र हैं, हम वेचारी
मछलियां हैं, (उनसे) अलग (होकर) कैसे जीवित रहे। हम चातक हैं, वे श्याम बादल
हैं, (हम) प्रिय का अमृत-रस पीती रहती हैं। मथुरां में बसते हुए दर्शन की आशा थी,
(किन्तु) रास्ता देखते नेत्र (अब) हार गये। सूरदास (कहते हैं) (कि) विधाता ने हमारे
लिए उल्टी (स्थिति) (पैदा कर दी), मरे हुए को पुनः मारा (कृष्ण बिरह) में हम
मरी सी थी ही, विधाता को इससे संतोष न हुआ, उसने हमें मार ही डाला ॥२५॥
उती दूर तैँ को आवै री ।
जासौँ कहि संदेस पठाऊँ, सो कहि कहन कहा पावै री ।
सिंधु कूल इक देस बसत है, देख्यौ सुन्यौ न मन धावै री ।
तहँ नव-नगर जु रच्यौ नंद-सुत, द्वारावति पुरी कहावै री ।
कंचन के बहु भवन मनोहर, रंक तहाँ नहिँ त्रन छावै री ।
ह्वाँ के बासी लोगनि कौँ क्यौं, ब्रज कौ बसिबौ मन भावै री ।
बहु बिधि करतिँ विलाप विरहिनी, बहुत उपायनि चित लावैँ री ।
कहा करौँ कहँ जाऊँ सूर प्रभु, को हरि पिय पै पहुँचावै री ॥२६॥
अर्थ - हे सखी ! उतनी दूर से (द्वारिका से) (भला) कौन आता है; जिससे
कह कर (हम) (कृष्ण के पास) संदेश भेजे, वह (विधि) कहो, (हम) (अपना संदेश)
कैसे कह पाये । समुद्र के किनारे एक देश बसता है । (उसे) न तो देखा है न सुना है
(और) न मन (वहाँ तक) दौड़ पाता है (मन द्वारिका की कल्पना ही नही कर पाता)
वहाँ नन्द के पुत्र (कृष्ण ने) नवीन नगर बसाया है जो द्वारिका पुरी कहलाता है।
वहाँ सोने के बहुत से मनोहर भवन हैं, (वहाँ) (कोई व्यक्ति) दरिद्र (ही) नही है
(जो) तृण से घर छाये । वहाँ के निवासी लोगो को ब्रज मे बसना क्यों अच्छा लगे ।
विरहिणियां बहुत प्रकार से विलाप करती हैं तथा बहुत (से) उपायों को (सोचने मे)
चित्त लगाती हैं। सूर के प्रभु (को पाने के लिए) क्या करें, कहाँ जाये; हरि प्रिय
(कृष्ण) के पास कौन पहुँचाए ॥२६॥
३५२ सूरसागर सार सटीक
हों कैसौँ के दरसन पाऊँ ।
सुनहु पथिक उहिँ देस द्वारिका, जौ तुम्हरैं सँग जाऊँ ।
बाहर भीर बहुत भूपनि की, बूझत वदन दुराऊँ ।
भीतर भीर भोग भामिनि की, तिहिँ ठाँ काहि पठाऊँ ।
बुधि बल जुक्ति जतन करि उहिं पुर, हरि पिय पै पहुँचाऊँ ।
अब वन वसि निसि कुंज रसिक बिनु, कौनैं दसा सुनाऊँ ।
श्रम कै सूर जाउँ प्रभु पासहिं, मन मैं भलैं मनाऊँ ।
नव-किसोर मुख मुरलि बिना, इन नैननि कहा दिखाऊँ ॥२७॥
अर्थ—मैं कैसे कृष्ण का दर्शन पाऊँ । हे पथिक ! सुनो, यदि तुम्हारे साथ उस
द्वारिका देश को चलूं (तो) (वहाँ) बाहर (कृष्ण के प्रासाद के बाहर) बहुत से राजाओ
की भीड (होगी); (उनके) पूछने पर (लज्जा से) मुख छिपा लूंगी (महल के) भीतर
स्त्री (पत्नी-रुक्मिणी) के सुख-विलास ("भोग") की प्रचुरता (है), उस स्थान पर
किसे भेजूँ । बुद्धि-बल (तथा) युक्तिपूर्ण यत्न करके उस नगर मे हरि प्रिय (कृष्ण) के
पास अपना (संदेश) (कैसे) भेजूँ । (राधिका !) अब रसिक (कृष्ण) के बिना वन मे
रहते हुए कुंज मे रात (के समय) अपनी दशा किसे सुनाऊँ । मुरली संयुक्त नव किशोर
(कृष्ण) के मुख के बिना इन नेत्रो को क्या दिखाऊँ ? ॥२७॥
तातैं अति मरियत अपसोसनि ।
मधुराहू तैं गए सखी री, अब हरि कारे कोसनि ।
यह अचरज सु वड़ौ मेरैं जिय, यह छाँड़नि, वह पोषनि ।
निपट निकाम जानि हम छाँड़ी, ज्यौं कमान बिन गोसनि ।
इक हरि के दरसन बिनु मरियत, अरु कुविजा के ठोसनि ।
सूर सु जरनि कहा उपजी जो, दूरि होति करि ओसनि ॥२८॥
अर्थ—हे सखी ! अब मथुरा से भी काले कोसो (बहुत दूर) चले गये हैं,
इसीलिए अफसोस (दुःख) से बहुत मर (बहुत कष्ट सह) रही हूँ। मेरे जी मे यह बड़ा
आश्चर्य है कि (कहाँ तो) (कृष्ण का) वह पालन-पोषण (करना), (और कहाँ) अब
इस प्रकार छोड़ देना ! बिना धनुपकोटि (दोनो नोको) के बिना जैसे धनुष कमान की
भाँति उन्होंने हमे बिल्कुल निकम्मी समझकर छोड दिया है, एक तो हरि के दर्शन विना
(मैं) मरती हूँ दूसरे कुब्जा के डाह (कुढन से) । सूरदास कहते हैं कि गोपियां कह रही
हैं कि जो जलन उत्पन्न हो गई क्या वह ओस से दूर हो सकती ? ॥२८॥
माई री कैसे बनै हरि कौ ब्रज आवन ।
कहियत है मधुबन तैं सजनी, कियौ स्याम कहुँ अनत गवन ।
अगम जु पंथ दूरि दच्छिन दिसि, तहँ सुनियत सखि सिंधु लवन ।
अब हरि ह्वाँ परिवार सहित गए, मग मै मार्यौ कालजवन ।
निकट बसत मतिहीन भईं हम, मिलिहुँ न आईँ सुत्यागि भवन ।
सूरदास तरसत मन निसि दिन, जदुपति लौं लै जाइ कवन ॥२९॥
अर्थ—हे सखी ! हरि का ब्रज लौटना कैसे संभव हो ? सखी, (लोग) कहते
हैं (कि) मधुबन से स्याम ने कही अन्यत्र गमन किया है। जो (जहाँ का) रास्ता अगम
(है), (जो) दूर दक्षिण दिशा मे (स्थित है), सखी ! सुनते हैं वहां लवण का समुद्र
है। अब हरि वहां परिवार सहित चले गये, (और) (वहां जाते समय) मार्ग मे
(उन्होने) काल यवन (राक्षस) को मारा। पास बसते समय (जब कृष्ण मथुरा मे ही
थे), (उस समय) हमारी अकल मारी गई (थी), (नही तो) भवन त्याग कर (उनसे)
मिल न आती । सूरदास (कहते हैं) (कि) रात-दिन मन तरसता है, यदुपति (कृष्ण)
के पास तक (अब) कौन ले जाय ॥२९॥
सुनियत कहुँ द्वारिका बसाई ।
दच्छिन दिशा तीर सागर कैं, कंचन कोट गोमती खाई ।
पंथ न चलै संदेस न आवै, इती दूर नर कोऊ न जाई ।
सत जोजन मथुरा तैं कहियत, यह सुधि एक पथिक पै पाई ।
सब ब्रज दुखी नंद जसुदा हू, इक टक स्याम राम लव लाई ।
सूरदास प्रभु के दरसन बिनु, भई विदित ब्रज काम दुहाई ॥३०॥
अर्थ—सुनती हूँ (कृष्ण ने) कही द्वारिका बसायी है। दक्षिण दिशा में सागर
के किनारे (वहाँ) सोने के किले (तथा), (किलों की सुरक्षा के लिए) गोमती की
नहर (बनी है), वह रास्ता नही चलता (उस तरफ पथिक नही जाते), (वहाँ से)
संदेश (भी) नही आता (तथा) इतनी दूर कोई मनुष्य नही जाता। मथुरा से (वह
नगरी) एक सौ योजन कही जाती है, यह खबर एक पथिक से (हमे) मिली। सब
ब्रज (वासी) (तथा) नंद-यशोदा (भी) दुखी हैं; (वे) एकटक श्याम और बलराम मे
ध्यान लगाये है। सूरदास कहते हैं (कि) प्रभु (कृष्ण) के दर्शन के बिना ब्रज मे
कामदेव की दुहाई विदित हुई (कामदेव के प्रताप का डंका बज गया) ॥३०॥
बीर बटाऊ पाती लीजौ ।
जब तुम जाहु द्वारिका नगरी, हमरे रसाल गुपालहिं दीजौ ।
रंगभूमि रमनीक मधुपुरी, रजधानी ब्रज को सुधि कीजौ ।
छार समुद्र छाँड़ि किन आवत, निर्मल जल जमुना कौ पीजौ ।
या गोकुल की सकल ग्वालिनी, देतिं असीस बहुत जुग जीजौ ।
सूरदास प्रभु हमरे कौतैं, नंद नंदन के पाईं परीजौ ॥३१॥
अर्थ—भाई पथिक ! (यह) पत्रिका लीजिए। जब तुम द्वारिका नगरी जाना
तो (इसे) हमारे रसिक गोपाल को देना। (कहना कि) ब्रज की राजधानी रमणीक
रंगभूमि मथुरा, की खबर (तो) लो। खारे समुद्र को छोड़कर क्यो नही आते; (यहाँ
आकर) यमुना के स्वच्छ जल को पिएं ! इस गोकुल की सभी ग्वालिनियां (तुम्हे)
२५
३५४ सूरसागर सार सटीक
आशीर्वाद देती हैं (कि) बहुत जुगो तक जियो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
(कि) (हे पथिक!) हमारी तरफ से नद के पुत्र (कृष्ण) के पैर पड़ना (प्रणाम
करना) ॥३१॥
रुक्मिणी कृष्ण संवाद
रुकमिनी बूझति हैं गोपालहिं ।
कहौ बात अपने गोकुल की, कितिक प्रीति ब्रजबालहिं ।
तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं ।
कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन विसालहिं ।
इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम विवस नँदलालहिं ।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥३२॥
अर्थ—रुक्मिणी कृष्ण से पूछती हैं (कि) (जरा) अपने गोकुल की बात (तो)
कहो (और बताओ) ब्रज-बालाओं से (तुम्हारा) कितना प्रेम था । तब तुम गाय
चराने जाते थे, हृदय पर वनमाल धारण करते थे । क्या देखकर (तुम) सुन्दर विशाल
नेत्रो वाली राधा पर रीझे थे (उसकी विशेषताएं तो बताओ) । इतना सुनकर प्रेम से
विवश कृष्ण के नेत्र भर आये । सूरदास (कहते है कि) प्रभु (कृष्ण) मौन हो रहे।
(सिर्फ यही कहा) अहीरो की वस्ती (ब्रज) की बात (चर्चा) मत चलाओ ! ॥३२॥
रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजवासी लोग ।
हम उनसौं कछु भली न कीन्हीं, निसि-दिन मरत वियोग ।
जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग ।
तद्यपि मन जु हरत बंसी-वट, ललिता कै संजोग ।
मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग ।
सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥३३॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे रुक्मिणी ! मुझे क्षण भर भी ब्रजवासी-जन नही
भूलते । हमने उनके साथ (अर्थात् उनकी) कुछ (भी) भलाई नही की; (वे) रात-दिन
(मेरे) वियोग मे मरते हैं (दुख सहते हैं) । यद्यपि कनक तथा मणियों से द्वारिकां बनी
है, सुख के सभी विषय (उपकरण) (वहाँ उपलब्ध हैं), तब भी वंशी-वट (के नीचे)
ललिता का संयोग (सुख) मन को हर लेता है । मैंने ऊधो को गोपियो के पास योग
का संदेश देने को भेजा था । सूरदास (कहते हैं कि) उन (गोपियों के प्रेम) की गति
देखते हुए कौन शोक (युक्त) (योग का) उपदेश दे ? ॥३३॥
रुकमिनी मोहिं ब्रज बिसरत नाहीँ ।
वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं ।
गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, विहरत कुंजनि माहीं ।
और विनोद कहाँ लगि वरनौं, वरनत वरनि न जाहीं ।
द्वारका चरित ३५५
जद्यपि सुख निधान द्वारावति, गोकुल कें सम नाहीं ।
सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिरि-सुमिरि पछिताहीं ॥३४॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! मुझे ब्रज भूलता नही। वह क्रीडा, यमुना तट की वह
केलि, (तथा) सघन कदंब (के नीचे) की (वह) छाया (हम कैसे भूल जायें)। गोप-
बन्धुओं की भुजाएँ कंधो पर रखकर कुंजों (के बीच) विहार करना-और विनोद
कहां तक वर्णित करूँ, वर्णन करने पर (भो) वर्णित नही हो पाते। यद्यपि द्वारिका
सुख का निधान (है), (फिर भी) गोकुल के समान नही (है)। सूरदास (कहते हैं
कि) मनोहर घनश्याम (उन्हें) स्मरण कर करके पछताते हैं ॥३४॥
रुकमिनि चलौ जन्म भूमि जाहिँ ।
जद्यपि तुम्ह्रौ विभव द्वारिका, मथुरा कैँ सम नाहिँ ।
जमुना कैँ तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिँ ।
कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहिँ ।
सरस सुगंध मंद मलयानल, बिहरत कुंजन माहिँ ।
जो क्रीड़ा श्री बृन्दावन मैँ, तिहूँ लोक मैँ नाहिँ ।
सुरभी ग्वाल नंद अरु जसुमति, मम चित तैँ न टराहिँ ।
सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिँ ॥३५॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! चलो, (हम) जन्म-भूमि चलें। यद्यपि द्वारिका में तुम्हारा
वैभव (है), (फिर भी) (वह) मथुरा की समता का नहीं (है)। (मथुरा में तो हम)
यमुना के तट पर गाय चराते थे (तथा) (यमुना के) अमृत (जैसे) जल का आचमन
(पान) करते थे। (वहाँ हम) कुंजो मे केलि (करते थे), (अपनी) भुजाओ को
(गोपियो के) कंधो पर रखकर वृक्षों की शीतल छाया मे (बिहार करते थे)। उत्तम
सुगन्ध-युक्त मंद मलयानल मे कुजो मे घूमते थे। जो क्रीड़ाएं वृन्दावन मे (की), (वे)
तीनो लोक मे (प्राप्त) नही (है)। गाये, ग्वाल, नद और यशोदा मेरे चित्त से नही
टलते; सूरदास के प्रभु चतुर शिरोमणि (हैं) उन (सब) की सेवा किया करते हैं ॥३५॥
कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट
ब्रज बासिनि कौ हेतु, हृदय मैँ राखि मुरारी ।
सब जादव सौँ कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी ।
बड़ी परब रवि-ग्रहन, कहा कहौँ तासु बड़ाई ।
चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयें जाई ।
तात, मात, निज नारि लिए, हरि जू सब संगा ।
चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा ।
कुरुच्छेत्र मैँ आइ, दियौ इक दूत पठाई ।
नद जसोमति गोप ग्वाल, सब सूर बुलाई ॥३६॥
३५६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—ब्रजवासियो के स्नेह को हृदय मे रखकर मुरारी ने सभा के मध्य बैठकर
सभी यादवों से कहा (कि) सूर्य-ग्रहण का बड़ा पर्व (है), उसकी बड़ाई मैं कहां तक
करूँ । सब लोग कुरुक्षेत्र चलो, वहां मिलकर नहाया जाय । हरि जी, पिता-माता,
अपनी पत्नी (तथा) सब (लोगो) के साथ (चले), घोडे सजाकर नगर के लोग (भी)
चल पडे । कुरुक्षेत्र आकर (कृष्ण ने) एक दूत भेज दिया । (सूरदास कहते हैं उन्होने)
नंद-यशोदा, गोपी, ग्वालो (तथा) सभी को बुला भेजा ॥३६॥
हौँ इहाँ तेरेहि कारन आयौ ।
तेरी सौं सुनि जननि जसोदा, मोहिँ गोपाल पठायौ ।
कहा भयौ जो लोग कहत हैं, देवकि माता जायौ ।
खान-पान परिधान सबै सुख, तैँ ही लाड़ लड़ायौ ।
इतौ हमारो राज द्वारिका, मोँ जी कछू न भायो ।
जब-जब सुरति होति उहिँ हितकी, विछुरि बच्छ ज्यौँ धायौ ।
अब हरि कुरुच्छेत्र मैँ आए, सो मैँ तुम्हें सुनायौ ।
सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु, हित करि उहाँ बुलायौ ॥३७॥
अर्थ—(पथिक ने कहा कि) मैं यहां तेरे ही कारण आया हूँ; हे माता यशोदा
सुनो ! तुम्हारी सौगन्ध, मुझे गोपाल ने (ही) भेजा है। (हरि ने यह कहा है) क्या
हुआ, जो लोग कहते हैं (कि) देवकी माता ने (मुझे) पैदा किया ? खान, पान, वस्त्र
(आदि) सभी सुखो को देकर तूने ही (मेरा) लालन-पालन किया । यहां द्वारिका मे
हमारा राज (है), (लेकिन) (वह) मेरे जी (को) कुछ भी अच्छा नही लगता । जब-
जब (तुम्हारे) उस स्नेह की याद आती है, (गाय से) बिछुड़े हुए बछड़े की तरह (मैं)
(तुम्हारे पास) दौड़ पड़ता हूँ । (पथिक ने यह भी कहा) अब हरि कुरुक्षेत्र आ गये हैं
वह (समाचार) मैंने तुम्हें .सुनाया । सूरज के प्रभु ने स्नेहपूर्वक समस्त कुल सहित
नन्द को वहाँ बुलाया है ॥३७॥
वायस गहगहात सुनि सुंदरि, बानी विमल पूर्व दिस बोली ।
आजु मिलावा होइ स्याम कौ, तू सुनि सखी राधिका भोली ।
कुच भुज नैन अधर फरकत् हैं, बिनहिँ बात अंचल ध्वज डोली ।
सोच निवारि करौ मन आनँद, मानौ भाग दसा बिधि खोली ।
सुनत बात सजनी के मुख की, पुलकित प्रेम तरकि गई चोली ।
सूरदास अभिलाष नंदसुत, हरषी सुभग नारि अनमोली ॥३८॥
अर्थ—हे सुन्दरी ! सुनो, कौआ प्रफुल्लित हो रहा है; (उसकी) विमल वाणी पूर्व
दिशा मे सुनाई पड़ी । हे भोली राधिका ! तू सुन, आज श्याम से तेरा मिलन होगा ।
कुच, भुजा, नेत्र, ओंठ फड़क रहे हैं; (तथा) हवा के (ही) ध्वज (के समान) अंचल
हिल रहा है । (अब) चिन्ता छोडकर मन मे आनंद करो, मानो ब्रह्मा ने (तेरी) भाग्य-
दशा खोल दी (तेरा भाग्योदय हो गया) । सखी के मुख की बात सुनते ही (राधा) प्रेम
द्वारका चरित ३५७
से पुलकित (हुई) (तथा) उसकी चोली के बंद टूट गये । सूरदास (कहते हैं कि) नंद के
पुत्र (से मिलने की) अभिलाषा से सुन्दर अनमोल स्त्री (राधा) हर्षित हो गयी ॥३८॥
राधा नैन नीर भरि आए ।
कब धौँ मिलैँ स्याम सुंदर सखि, जदपि निकट हैं आए ।
कहा करौँ किहिँ भाँति जाहुँ अब, पंख नहीं तन पाए ।
सूर स्याम सुन्दर घन दरसैँ, तन के ताप नसाए ॥३६॥
अर्थ—राधा के नेत्रों मे पानी भर आया। यद्यपि कृष्ण निकट आ गये हैं,
(किन्तु) हे सखि ! श्यामसुन्दर न जाने कब मिलें । क्या करूँ किस तरह जाऊँ, शरीर में
पंख (भी) (तो) नहीं हैं (कि उड़कर चली जाऊँ) । सूरदास (कहते है कि) श्याम
सुंदर घन (कृष्ण) के देखने से (ही) (राधा के) शरीर का ताप नष्ट होगा ॥३६॥
अब हरि आइहैँ जनि सोचै ।
सुनु बिधुमुखी बारि नैननि तैँ, अब तू काहैँ मोचै ।
लै लेखनि मसि लिखि अपने, संदेसहिँ छाँड़ि सँकोचै ।
सूर सु बिरह जनाउ करत कत, प्रबल मदन रिपु पोचै ॥४०॥
अर्थ—अब हरि आयेगे (तू) चिन्ता मत कर । हे चन्द्रमुखी सुनो, अब तू नेत्रो
से जल (आंसू) क्यो गिराती है ? लेखनी (तथा) स्याही लेकर अपने संदेश को संकोच
छोड़कर लिख । सूरदास (कहते हैं कि) (अब) विरह शरीर मे क्यो प्रभाव जमा रहा
है, (तथा) शत्रु, नीच कामदेव (क्यो) प्रबल (होता जा रहा है) ॥४०॥
पथिक, कहियौ हरि सौँ यह बात ।
भक्त बछल है बिरद तुम्हारौ, हम सब किए सनाथ ।
प्रान हमारे संग तिहारैँ, हमहूँ हैं अब आवत ।
सूर स्याम सौँ कहत संदेसौ, नैनन नीर बहावत ॥४१॥
अर्थ—हे पथिक ! हरि से यह बात कहना कि आपका यश भक्तवत्सलता का
है, (आपने) हम सबों को सनाथ कर दिया है। हमारे प्राण तुम्हारे साथ (हैं), अब
हम भी आती है। सूरदास (कहते है कि) श्याम से संदेश कहती हुई (गोपियाँ) नेत्रो
से नीर बहाती हैं ॥४१॥
नंद जसोदा सब ब्रजवासी ।
अपने-अपने सकट साजिकै, मिलन चले अबिनासी ।
कोउ गावत कोउ बेनु बजावत, कोउ उतावल धावत ।
हरि दरसन की आसा कारन, बिबिध मुदित सब आवत ।
दरसन कियौ आइ हरि जू कौँ, कहत स्वप्न कै साँचौ ।
प्रेम मगन कछु सुधि न रही अँग, रहे स्याम रँग राँचौ ।
३५८ सुरसागर सार सटीक
जासों जैसी भाँति चाहिये, ताहि मिले त्यों धाइ ।
देस-देस के नृपति देखि यह, प्रीति रहे थरगाइ ।
उमँग्यौ प्रेम समुद्र दुहूँ दिसि, परिमिति कही न जाइ ।
सूरदास यह सुख सो जानैँ, जाकैँ हृदय समाइ ॥४२॥
अर्थ—नंद, यशोदा और सब ब्रजवासी अपनी-अपनी गाड़ियां सजाकर अविनाशी
(कृष्ण) से मिलने चल पडे । कोई गाता है, कोई वंशी बजाता है (तथा) कोई उतावला
(मस्त) होकर दौडता है। हरि दर्शन की आशा के लिए सभी प्रसन्न (होकर) आते
हैं। (जब उन्होने) आकर हरि जी के दर्शन किये (तब वे) कहते हैं (कि) (यह) स्वप्न
(है) या वास्तविकता (है) । प्रेम मे मग्न (होने के कारण) अंग की कुछ स्मृति (शेष)
न रही; (वे सब) श्याम के रंग मे रंग गये । जिससे जिस तरह उचित था उससे उसी
तरह (कृष्ण) दौड़कर मिले । देश-देश के राजा यह प्रेम देखकर चुप हो गये (किकर्तव्य
हो गये) । दोनो दिशाओ से प्रेम का (ऐसा) समुद्र उमडा (कि) उसकी सीमा अकथ-
नीय है। सूरदास कहते है (कि) इस सुख को वही जान सकता है जिसके हृदय मे (यह
प्रेम) समा जाय (जो इसे मनोगत या समझ सके) ॥४२॥
तेरी जीवन मूरि मिलहि किन माई ।
महाराज जदुनाथ कहावत, तबहिँ हुते सिसु कुँवर कन्हाई ।
पानि परे भुज धरे कमल मुख, पेखत पूरव कथा चलाई ।
परम उदार पानि अवलोकत, हीन जानि कछु कहत न जाई ।
फिर-फिर अब सनमुखही चितवति, प्रीतिसकुच जानी जदुराई ।
अब हँसि भेंटहु कहि मोहिं निज-जन, बाल तिहारौ नंद दुहाई ।
रोम पुलक गदगद तन तीछन, जलधारा नैननि वरषाई ।
मिले सु तात, मात, बांधव सब, कुसल-कुसल करि प्रस्न चलाई ।
आसन देइ बहुत करी बिनती, सुत धोखै तब बुद्धि हिराई ।
सूरदास प्रभु कृपा करी अब, चितहिँ धरे पुनि करी बड़ाई ॥४३॥
अर्थ—(हे सखी !) तेरी जीवन बूटी (जिलाने वाली जडी : कृष्ण) क्यो नही
मिलती ? (कारण यह है कि) तब (गोकुल मे जब थे) तो (वे) शिशु (रूप मे) "कन्हाई"
(ही) थे, (किन्तु) (अब) (वे) महाराज यदुनाथ कहे जाते है ! (कृष्ण के) हाथ पडने
(मिलने) पर (सभी ब्रजवासियों ने) (उनकी) भुजाओं (तथा) कमल मुख का स्पर्श
किया; (उन्हें) देखते (ही) पूर्व-लीलाओं की चर्चा चलाई । (वे कृष्ण के) अत्यन्त श्रेष्ठ
हाथों को देखते है, (अपने को) हीन (छोटा) जानकर (उनसे) (संकोच वश) कुछ कहते
नही बनता । अब (वे) बार-बार (कृष्ण के) सम्मुख ही देखते हैं; (तब) यदुराय (कृष्ण)
ने (उनका) प्रेम (पूर्ण) संकोच जान लिया । (कृष्ण ने कहा) अब हंसकर मुझे अपना
जन कहकर भेंटो; नंद की दुहाई देकर (तुम से) कहता हूँ (कि) मैं तुम्हारा बालक (ही)
द्वारका चरित ३५८
हूँ । (कृष्ण के) रोम पुलकित (हो गये), शरीर गदगद (हो गया) तथा नेत्रों से जल
की तेज (तीक्ष्ण) धारा बरस पडी । (वे) पिता-माता, तथा सभी बंधुओं से मिले (तथा)
(सब से) कुशल प्रश्न की (चर्चा) की (सब से अलग अलग कुशलता की बात पूछी) ।
(उन्हे) आसन देकर (बिठाकर) (कृष्ण ने) बहुत विनती की (और कहा) उस समय-
जब हम (ब्रज में थे) तब पुत्र के भ्रम मे (अर्थात् मुझे पुत्र मान लेने के कारण)
(तुम्हारी) बुद्धि खो गई थी । सूरदास के प्रभु (कृष्ण) ने अब कृपा की, (नंद-यशोदा
को) चित्त मे धारण किया; पुनः (उनकी) प्रशंसा की ॥४३॥
माधव या लगि है जग जीजत ।
जातैं हरि सौं प्रेम पुरातन, बहुरि नयौ करि लीजत ।
कहँ ह्वौ तुम जदुनाथ सिंधु तट, कहँ हम गोकुल बासी ।
वह बियोग, यह मिलन कहाँ अब, काल चाल औरासी ।
कहँ रबि राहु कहाँ यह अवसर, बिधि संयोग बनायौ ।
उहिँ उपकार आजु इन नैननि, हरि दरसन सचुपायौ ।
तब अरु अब यह कठिन परम अति, निमिषहुँ पीर न जानी ।
सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी ॥४४॥
अर्थ—हे माधव ! इसीलिए संसार जीता है (संसार अभी तक स्थित है) ।
चूंकि हरि से (हमारा) प्रेम पुराना है (जन्म-जन्मान्तर का है), (इसलिए) (हम)
(उसे) फिर नया कर लेते हैं । कहां तुम सिंधु के किनारे (रहने वाले) (महाराजा)
यदुनाथ; (और) कहां हम गोकुल (गांव) के निवासी ! कहां वह (महान्) (दुखदायी)
वियोग, (और) कहां अब यह (अत्यन्त सुखदायक) मिलन ! (सचमुच) काल की गति
विलक्षण है। कहां सूर्य (और) राहु (दोनों) मे कोई सम्बन्ध नही (तथा) कहां (आज)
यह अवसर (जब सूर्य राहु द्वारा ग्रसित हो रहा है); ब्रह्मा ने (यह) संयोग (सूर्यग्रहण)
बनाया है। उसी (ब्रह्मा) की कृपा से आज (हमारे) इन नेत्रो ने कृष्ण के दर्शन पाकर
सुख पाया । तब और अब (दोनो अवसरों पर) यह अत्यधिक कठिन है (आसानी से
समझ में नही आता), (किन्तु अब तो) क्षण मात्र के लिए भी पीडा नही जान पड़ी ।
सूरदास के प्रभु ने (उन्हे) अपना जन (भक्त) जानकर सभी से रुचिकर व्यवहार किया
(प्रेम प्रदर्शित किया) ॥४४॥
राधा कृष्ण मिलन
हरि सौं बूझति रुकमिनी इनमैं, को बृषभानु किसोरी ।
बारक हमैं दिखावहु अपने, बालापन की जोरी ।
जाकौ हेत निरंतर लीन्हे, डोलत ब्रज की खोरी ।
अति आतुर ह्वै गाइ दुहावन, जाते पर-घर चोरी ।
रचते सेज स्वकर सुमननि की, नव-पल्लव पुट तोरी ।
बिन देखें ताके मन तरसैं, छिन बीतै जुग कोरी ।
सूर सोच सुख करि भरि लोचन, अंतर प्रीति न थोरी।
सिथिल गात मुख बचन फुरत नहिं, ह्वै जु गई मति भोरी ॥४५॥
अर्थ—हरि से रुक्मिणी पूछती हैं (कि) इनमें वृषभानु की पुत्री (राधा) कौन
है ? एक बार (तो) जरा हमे अपने बचपन की जोड़ी (संगिनी) दिखाओ; जिस (राधा)
के प्रेम को लिए (प्रेम में मग्न) (तुम) निरन्तर ब्रज की गलियो मे डोला करते थे।
दूसरों के घर चोरी (करने) (तथा) बहुत आतुर होकर (ग्वालों की) गाय दुहाने जाते
थे। नवीन पल्लव तोड़कर, (उनका) पुट (देकर) अपने हाथो से फूलो की सेज रचते
थे। बिना देखे (तुम्हारा) मन तरसता था तथा एक क्षण युग के समान बीतता था ।
सूरदास (कहते हैं) (कृष्ण ने) उस सुख को सोचकर नेत्रो मे आंसू भर लिए; उनके हृदय
मे (राधा के प्रति) कम प्रेम न था। उनका शरीर शिथिल (हो गया) मुख से बात
नही फूटती (निकलती) थी, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥४५॥
बूझति है रुकमिनी पिय इनमैं, को वृषभानु किसोरी ।
नैंकु हमैं दिखरावहु अपनी, बालापन की जोरी।
परम चतुर जिन कीन्हे मोहन, अल्प वैस ही थोरी।
बारे तैं जिहिं यहै पढ़ायौ, बुधि बल कल विधि चोरी।
जाके गुन गनि ग्रंथित माला, कबहुँ न उत तैं छोरी।
मनसा सुमिरन, रूप ध्यान उर, दृष्टि न इत उत मोरी।
वह लखि जुवति वृन्द मैं ठाढ़ी, नील वसन तन गोरी ।
सूरदास मेरौ मन बाकी, चितवनि बंक हरयौ री ॥४६॥
अर्थ—रुक्मिणी (कृष्ण से) पूछती हैं (कि) हे प्रिय ! इनमे वृषभानु की बेटी
(राधा) कौन है ? हमे थोड़ा अपने बचपन की जोड़ी (तो) दिखाओ ! जिसने अल्प-
आयु ही मे कृष्ण को परम चतुर बना दिया। बचपन से ही जिसने यही पढ़ाया कि
बुद्धि के बल से (तथा) फल (कौतुक) के बल से चोरी (कैसे की जाय) जिसके गुणो के
समूह से ग्रन्थित माला (तुमने) कभी भी हृदय से नही हटायी (जिसके गुण तुम कभी
नहीं भूले) एकाग्रचित्त होकर (तुमने) स्मरण किया तथा हृदय मे जिसके रूप का
ध्यान किया। (कृष्ण ने उत्तर दिया :) वह देखो, नीले वस्त्रो (से युक्त) गोरे शरीर
वाली (राधा) युवतियों के समूह मे खड़ी है। सूरदास (कृष्ण) (कहते हैं) उसी की
तिरछी नजर ने मेरे चित्त को हर लिया ॥४६॥
हरि जू इते दिन कहाँ लगाए।
तबहिं अवधि मैं कहत न समुझी, गनत अचानक आए।
भली करी जु बहुरि इन नैननि, सुदर दरस दिखाए।
जानी कृपा राज काजहु हम, निमिष नहीं बिसराए।
बिरहिनि बिकल बिलोकि सूर प्रभु, धाइ हृदै करि लाए।
कछु इक सारथि सौं कहि पठयौ, रथ के तुरँग छुड़ाए ॥४७॥
७. द्वारका लीला एवं पद संग्रह
द्वारका चरित ३६१
अर्थ—हरि जी ने इतना समय कहाँ लगा दिया ! उस समय (जब कृष्ण मथुरा
गए थे कि) अवधि बताने पर मैं समझी नही; गिनते-गिनते (अब अवधि का हिसाब
लगा रही थी कि) अचानक (हरि) आ गये । अच्छा ही किया जो (हरि ने) इन नेत्रों
को (अपने) सुन्दर दर्शन दिये । (हमने आपकी) कृपा जान ली, राज-काज में (राज-
काज करते हुए) भी क्षण-मात्र के लिए (भी) हमे (आपने) नही भुलाया । विरहिणी
को विकल देखकर सूर के प्रभु (कृष्ण ने) दौडकर (उसे) हृदय से लगा लिया । कुछ
कहकर सारथी (रथ चलाने वाले) को भेज दिया (तथा) घोड़ों को छुडा दिया (पांव-
पैदल ही जाने का निश्चय किया) ॥४७॥
हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ ।
जदपि नैन निरखत वह मूरति, फिरि मन जात तहाँ ।
मुख मुरली सिर मोर पखौवा, गर घुँघचिनि कौ हार ।
आगैं धेनु रेनु तन मंडित, तिरछी चितवनि चार ।
राति दिवस सब सखा लिए सँग, हँसि मिलि खेलत खात ।
सूरदास प्रभु इत उत चितवत, कहि न सकत कछु बात ॥४८॥
अर्थ—(किसी ने कहा;) हे हरि जी वे सुख फिर कहाँ (नसीब होंगे) । यद्यपि
नयनो से (तुम्हारी) वही मूर्ति देखते है, (किन्तु) मन फिर वही चला जाता है (ब्रज
की लीलाओ की ओर खिंच जाता है) । (जब आपके) मुख में मुरली, सिर पर मोर
के पंख (मोर मुकुट), (तथा) गले घुंघुचियों का हार (हम देखा करते थे) । आगे
गाये (चलती थी) (पीछे) धूल से शोभित (आपका) शरीर (ओर) सुन्दर तिरछी
चितवन से आपका देखना रात-दिन (आप) सब मित्रों को साथ लिए हँस-मिलकर
खेला-खाया करते थे । सूरदास के प्रभु (इन बातों को टालने या भूल जाने के लिए)
इधर-उधर देखने लगे; कुछ बात कह नही पाते (कोई जवाब न दे पाये !) ॥४८॥
रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी ।
जैसैं बहुत दिननि की बिछुरी, एक बाप की बेटी ।
एक सुभाव एक वय दोऊ, दोऊ हरि कौं प्यारी ।
एक प्रान मन एक दुहुनि कौ, तन करि दीसति न्यारी ।
निज मंदिर लै गई रुकमिनी, पहुनाई बिधि ठानी ।
सूरदास प्रभु तहँ पग धारे, जहाँ दोऊ ठकुरानी ॥४६॥
अर्थ—रुक्मिणी तथा राधा इस प्रकार मिली (मानो) बहुत दिनों के बिछुड़ने
के बाद एक बाप की दो बेटियां (हों) । दोनों का एक ही स्वभाव, एक ही आयु तथा
दोनों कृष्ण को प्यारी हैं । दोनों एक ही प्राण (तथा) एक ही मन है; (केवल) शरीर
से (ही) भिन्न दिखाई देती हैं । रुक्मिणी (राधा को) अपने भवन ले गयी (तथा)
विधिपूर्वक (राधा का) आतिथ्य किया । सूरदास (कहते हैं कि) प्रभु (कृष्ण) वहाँ गए
जहाँ दोनो ठकुराइने (रानियाँ) थी ॥४६॥
३६२ सूरसागर सार सटीक
राधा माधव, भेंट भई ।
राधा माधव, माधव राधा, कीट भृङ्ग गति ह्रै जु गई ।
माधव राधा के रँग रांचे, राधा माधव रंग रई ।
माधव राधा प्रीति निरन्तर, रसना करि जो कहि न गई ।
बिहंसि कह्यो हम तुम नहिं अन्तर, यह कहिकै उन ब्रज पठई ।
सूरदास प्रभु राधा माधव, ब्रज-बिहार नित नई नई ॥५०॥
अर्थ - राधा और माधव से भेट हुई। राधा-माधव और माधव-राधा हो गये;
भृङ्ग (नामक) कीडे (के समान उन) की दशा हो गई (अर्थात् दोनो एक ही हो गये) ।
माधव-राधा के रग मे रंग गये, राधा-माधव के रग मे रग गयी । माधव और राधा
का प्रेम स्थायी (है), वाणी से (उसे) कहा नही जा सकता (वह अवर्णनीय है)।
(कृष्ण ने) (राधा से) हँसकर कहा कि हममे तुममें अन्तर नही है यह कहकर उन्हे
(राधा को) ब्रज भेज दिया। सूरदास के प्रभु राधा-माधव का ब्रज मे नित्य नया
विहार (हुआ करता है) ॥५०॥
ब्रजबासिनि सौं कह्यो, सबनि तैं ब्रज-हित मेरौँ ।
तुमसोँ नाहीँ दूरि रहत हौँ, निपटहिं नेरौँ ।
भजै मोहिँ जो कोइ, भजौँ मैं तेहिँ ता भाई ।
मुकुर माहिँ, ज्यों रूप, आपनेँ सम दरसाई ।
यह कहि कै समदे सकल, नैन रहे जल छाइ ।
सूर स्याम कौ प्रेम कछु, मो पै कह्यो न जाइ ॥५१॥
अर्थ- (कृष्ण ने) सभी ब्रजवासियो से कहा (कि) ब्रज से मेरा प्रेम है। तुम
लोगो से (हम) कभी दूर नही रहते हैं, (मै) बिलकुल निकट (ही) हूँ । मुझे जो
(जिस भाव से) भजता है मैं उसे उसी भाव से भजता हूँ। जैसे शीशे मे (व्यक्ति का)
रूप अपने समान (ही) (अर्थात् जैसा वह रूप होता है) (वैसा ही) सब को दिखाई
देता है (वैसे ही घट-घट मे मैं अपना ही रूप देखता हूँ)। यह कहकर सब से (वे)
मिले, (उनके) नेत्रो मे जल छा गया। सूरदास (कहते हैं) (कि) श्याम का प्रेम मुझसे
कुछ (भी) नही कहा जाता ॥५१॥
सबहिनि तैँ हित है जन मेरौ । •
जनम जनम सुनि सुबल सुदामा, निवहौँ यह प्रन बेरौ ।
ब्रह्मादिक इन्द्रादिक तेऊ, जानत बल सब केरौ ।
एकहि साँस उसास त्रास उड़ि, चलते तजि निज खेरौ ।
कहा भयौ जो देस द्वारिका, कीन्हौ दूर बसेरौ ।
आपुन ही या ब्रज के कारन, करिहौँ फिरि-फिरि फेरौ ।
इहाँ-उहाँ हम फिरत साधु हित, करत असाधु अहेरौ ।
सूर हृदय तैं टरत न गोकुल, अंग छुअत हौँ तेरौ ॥५२॥
द्वारिका चरित ३६३
अर्थ—सभी लोगो से मेरा स्नेह है। हे सुवल, सुदामा ! सुनो जन्म-जन्म तक
इस प्रण के बेड़े (मर्यादा) का निर्वाह करता हूँ। (वे) ब्रह्मादि (तथा) इन्द्रादि (भी है),
मैं (उन) सभी का बल जानता हूँ। (वे) (मेरी) एक ही साँस या उच्छ्वास के भय से
अपने गांव को छोड़कर भाग जाते है, जो (मैने) दूर देश द्वारिका मे निवास किया
(तो) (इससे) क्या हुआ ? इस ब्रज के (हित के) लिए स्वयं ही (मैं) बार-बार इसका
फेरा करूँगा (अवतार लूँगा)। यहाँ वहां मैं साधुओ के हित (भलाई) के लिए फिरता
हूँ, (तथा) दुर्जनो का शिकार (नाश) करता हूँ। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं)
(कि) तुम्हारा अंग छूकर (तुम्हारी सौगन्ध खाकर) कहता हूँ (कि) (मेरे) हृदय से
गोकुल टलता नही (उसे मैं कभी नही भूलता) ॥५२॥
हम तौ इतनै ही सचु पायौ ।
सुंदर स्याम कमल दल-लोचन, बहुरौ दरस दिखायौ ।
कहा भयौ जो लोग कहत हैं, कान्ह द्वारिका छायौ ।
सुनिकै बिरह दसा गोकुल की, अति आतुर ह्वै धायौ ।
रजक धेनु गज कंस मारि कै, कीन्ही जन कौ भायौ ।
महाराज ह्वै मातु पिता मिलि, तऊ न ब्रज बिसरायौ ।
गोपि गोपऽरु नंद चले मिलि, प्रेम समुद्र बढ़ायौ ।
अपने बाल गुपाल निरखि मुख, नैननि नीर बहाद्यौ ।
जद्यपि हम सकुचे जिय अपनैं, हरि हित अधिक जनायौ ।
वैसेइ सूर बहुरि नँद-नंदन, घर-घर माखन खायौ ॥५३॥
अर्थ—हमने तो इतने (से) ही सुख पाया (कि) कमल-दल के समान नेत्र वाले
श्याम सुन्दर ने फिर से दर्शन दिये । (इससे) क्या हुआ जो लोग कहते हैं (कि) कृष्ण
द्वारिका चले गये । (लेकिन वे) गोकुल की विरह-दशा सुनकर अत्यधिक आतुर होकर
दौड पड़े (और) रजक, धेनु, हाथी तथा कंस को मारकर भक्तों को भाने वाले (काम)
किये । माता-पिता से मिलकर, महाराज होकर भी ब्रज को नही भुलाया । गोपी, गोप,
नन्द (जब) मिलकर चले (लौटे) (तब) प्रेम-समुद्र उमड़ आया । (उन्होंने) अपने बाल
गोपालो के मुख को देखकर आंखों से आंसू बहाये । यद्यपि हम (ब्रजवासियो) ने अपने
मन मे संकोच किया, लेकिन हरि ने अत्यधिक स्नेह दिखाया । वैसे ही (पहले के
समान) कृष्ण ने पुनः घर-घर मक्खन खाया ॥५३॥
परिशिष्ट (क)
रामचरित
रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर ।
देस-देस तैं टीकौ आयी, रतन कनक-मनि-हीर ।
घर-घर मंगल होत बधाई, अति पुरवासिनि भीर ।
आनँद-मगन भए सब डोलत, कछू न सोध सरीर ।
मागध-बंदी-सूत लुटाए, गो-गयन्द-हय-चीर ।
देत असीस सूर चिरजीवौ, रामचन्द्र रनधीर ॥१॥
अर्थ — रघुकुल मे राम प्रकट हुए हैं । देश-देश से उपहार आये (जिनमे) रत्न,
सोना, मणि तथा हीरे (आदि थे) । घर-घर मे मागलिक वधाइयाँ हो रही (गाई जा
रही) है; पुरवासियो की अत्यधिक भीड (है) । सभी (लोग) आनन्द से मग्न होकर
घूमते है, (किसी को) (अपने) शरीर का (कुछ भी) ख्याल नही । मागध, वन्दी तथा
सूतो को गाये, हाथी, घोड़े (तथा) वस्त्र लुटाये (जा रहे हैं) । सूरदास आशीर्वाद देते
है कि रणधीर राम (तुम) चिरकाल तक जीवित रहो ॥१॥
करतल-सोभित बान धनुहियाँ ।
खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहियाँ ।
दसरथ-कौसिल्या के आगैं, लसत सुमन की छहियाँ ।
मानौ चारि हंस सरवर तैं, बैठे आइ सदेहियाँ ।
रघुकुल-कुमुद-चंद चिंतामनि, प्रगटे भूतल महियाँ ।
आए ओप देन रघुकुल कौं, आनँद-निधि सब कहियाँ ।
यह सुख तीनि लोक मैं नाहीं, जो पाए प्रभु पहियाँ ।
सूरदास हरि बोल भक्त कौ, निरबाहत गहि बहियाँ ॥२॥
अर्थ—(राम के) हाथ मे बाण तथा नन्हा सा धनुष शोभित है । (छोटे-छोटे)
लाल जूते पहने (हुए) स्वर्णमय आंगन मे (राम) खेलते फिरते है । दशरथ तथा
कौशल्या के आगे फूलो की छाया में (वे) शोभित हो रहे है । (चारो बालक ऐसे जान
पड़ते है) मानो सरोवर से सदेह चार हंस अभी-अभी आ बैठे (हों) । रघुकुल रूपी
कुमुदनी के चन्द्र (की तरह) (तथा) चिंतामणि (रूप मे) (राम) पृथ्वी पर प्रकट
हुए । वे रघुकुल को प्रकाश (तथा) सबको आनंद की निधि देने आये हैं । यह सुख
तीनों लोक मे नही है जो प्रभु के पास है। सूरदास (कहते हैं कि) हरि भक्तों को
बुलाकर बांह पकड़कर (उनका) निर्वाह करते हैं ॥२॥
कर कंपै, कंपन नहिँ छूटै।
राम सिया-कर परस मगन भए, कौतुक निरखि सखी सुख लूटै।
गावत नारि गारि सब दै दै, तात-भ्रात का कौन चलावै।
तब कर-डोरि छूटै रघुपति जू, जब कौसिल्या माता आवै।
पूँगीफल-जुत जल निरमल धरि, आनी भरि कुँडि जो कनक की।
खेलत जूप सकल जुवतिनि मैं, हारे रघुपति, जिती जनक की।
धरे निसान अजिर गृह मंगल, बिप्र-वेद-अभिषेक करायौ।
सूर अमित आनंद जनकपुर, सोइ सुकदेव पुराननि गायौ ॥३॥
अर्थ—हाथ कंपता है (और) कंपन नही छूटता। राम सीता के हाथ को
स्पर्श करके आनंदित (पुलकित) हो गये ! इस कौतुक को देखकर सखियां सुख को
लूट रही है। नारियां सभी (को) गालियां दे-केर गाती हैं, पिता (तथा) भाई (की)
कौन चलाए ! (स्त्रियां व्यंग्य करती हैं) हे रघुनंदन ! ककन के हाथ की डोरी तभी
छूटेगी जब माता कौशल्या (स्वयं) आएं। सुपारी से युक्त निर्मल जल भर कर सोने
का छोटा कलश (कुंडी) लाया गया। समस्त युवतियो के बीच जुआ खेलते हुए राम
हार गये, जनकपुत्री सीताजी जीत गयीं ! (स्वस्तिक आदि) मंगल चिह्न (निशान)
आंगन में धरे (बनाये) गये। वेद विहित विधियो से विप्रो (ब्राह्मणों) ने अभिषेक
कराया। सूरदास (कहते है कि) जनकपुर मे अत्यधिक आनन्द है। उसे ही शुकदेव
(मुनि) ने पुराणो मे गाया है ॥३॥
परसुराम तेहिँ औसर आए।
कठिन पिनाक कहाँ किन तोर्यौ, क्रोधित बचन सुनाए।
विप्र जानि रघुबीर धीर दोउ, हाथ जोरि, सिर नायौ।
बहुत दिननि कौ हुतौ पुरातन, हाथ छुअत उठि आयौ।
तुम तौ द्विज, कुल-पूज्य हमारे, हम-तुम कौन लराई ?
क्रोधवंत कछु सुन्यौ नहीं, लियौ सायक धनुप चढ़ाई।
तबहूँ रघुपति क्रोध न कीन्हौ, धनुष न बान सँभार्यौ।
सूरदास प्रभु रूप समझि, बन परसुराम पग धार्यौ ॥४॥
अर्थ—उसी समय परशुराम आ गये। (बोले) मुझे "बताओ ! कठिन धनुष
को किसने तोड़ा ?" इस (प्रकार के) क्रोधित वचन (उन्होने) सुनाये। (परशुराम को)
ब्राह्मण जानकर धैर्यवान् राम ने दोनो हाथ जोड़कर सिर झुकाया (प्रणाम किया)।
(राम ने कहा) धनुष बहुत दिन का पुराना था, हाथ से छूते ही उठ आया। आप तो
ब्राह्मण (हैं), हमारे कुल के पूज्य; हमारे और तुम्हारे बीच लडाई कैसी ? क्रोध युक्त
(परशुराम न) कुछ सुना नही, (उन्होने) बाण को धनुष पर चढा लिया। तब भी राम
३६६ सूरसागर सार सटीक
ने क्रोध नही किया, धनुष वाण नही संभाला । सूरदास (कहते है कि) परशुराम
प्रभु के रूप को समझ कर वन को चले गए ॥४॥
कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ?
अद्भुत वधू लिये सँग डोलत, देखत त्रिभुवन मोहैँ ।
परम सुसील सुलच्छन जोरी, विधि की रची न होइ ।
काकी तिनकी उपमा दीजै, देह धरे धौँ कोइ ।
इनमें को पति आहिँ तिहारे, पुरजनि पूछैँ धाइ ।
राजिव नैन मैन की मूरति, सैननि दियौ बताइ ।
गईँ सकल मिलि संग दूरि लौँ, मन न फिरत पुर-वास ।
सूरदास स्वामी के बिछुरत, भरि-भरि लेति उसास ॥५॥
अर्थ— (वन जाते हुए रामादि को देखकर ग्रामीण स्त्रियां आपस मे पूछती हैं)
हे सखी ! बताओ ये राही कौन हैं ? साथ मे अद्भुत वधू लेकर घूमते है, (जिसे) देखते
ही तीनो लोक मोहित हो जाते हैं । (यह) जोडी परम सुशील (तथा) सुलक्षण है, ब्रह्मा
की बनाई हुई नही जान पडती । इनकी उपमा किससे दी जाय ! (लगता है) कोई
देहधारी (देवता) हैं, ग्रामवासिनी दौड़कर (सीता से) पूछती हैं इनमे तुम्हारा पति कौन
है ? (सीता ने) इशारे से बता दिया कि कमलवत् नेत्र कामदेव की मूर्ति (के समान)
(व्यक्ति) (हमारे पति है) । (सभी स्त्रियां) साथ मिलकर दूर तक गयी, (उनका) मन
ग्राम मे निवास की ओर नही फिरता था । सूरदास के स्वामी (राम) से बिछुडने (के
कारण) ग्राम वधुएं गम्भीर सांसें (लम्बी आहे) भरकर दौड़ती हैं ॥५॥
राम धनुष अरु सायक साँधे ।
सिय हित मृग पाछैँ उठि धाए, वलकल वसन, फेट दृढ़ बाँधे ।
नव-घन, नील-सरोज बरन बपु, विपुल, बाहु, केहरि-फल काँधे ।
इंदु बदन, राजीव नैन वर, सीस जटा सिव सम सिर बाँधे ।
पालत, सृजत, सँहारत, सैँतत, अंड अनेक अवधि पल आधे !
सूर भजन-महिमा दिखरावत, इमि अति सुगम चरन आराधे ॥६॥
अर्थ—राम धनुष और बाण को साधे, वल्कल वस्त्र (पहने) तथा कमरकस को
दृढ़ता से बांधे सीता के स्नेह-वश मृग के पीछे उठकर दौड पड़े । नवीन वादल (तथा)
नीले कमल (जैसे) (वर्ण) शरीर वाले, विशाल भुजाओं वाले (राम के) कंधे "केहरि-
फल''* (वृषभ ?) (जैसे हैं) । चन्द्रवत् मुख, कमलवत् श्रेष्ठ आंखो, (वाले राम) शिव के
समान सिर पर जटा बांधे है । आधे पल के समय में (ही) (वे) अनेक ब्रह्मांडो का पालन
- अनेक हस्तलिखित प्रतियों मे "फल" के स्थान पर "गुन" शब्द मिलता है,
जिसका अर्थ होगा जिन राम के स्कंधो के गुण जिनका सीना सिंह के सीने के समान
प्रशस्थ (चौडा) है । 'गुन' शब्द से युक्त एक अन्य पाठ भी पाडुलिपियो मे प्राप्त है—
विपुल बाहू छत्री गुन काधे ।
परिशिष्ट (क) ३६७
सृजन, विनाश (तथा उन्हें समेट लेते) (मिटा देते) हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि)
(वे) भजन की महिमा दिखाते हैं; इस प्रकार (उनके) चरणो की आराधना करने
पर (संसार से छुटकारा पाना) अत्यन्त सरल है ॥६॥
सुनहु अनुज, इहिँ बन इतननि मिलि, जानकी प्रिया हरी।
कछु इक अंगनि की सहिदानी, मेरी दृष्टि परी।
कटि केहरि, कोकिल कल बानी, ससि मुख प्रभा-धरी।
मृग मूसी नैननि की सोभा, जाति न गुप्त करी।
चंपक-बरन, चरन-कर कमलनि, दाड़िम दसन लरी।
गति मराल अरु बिंब अधर-छबि, अहि अनूप कवरी।
अति करुना रघुनाथ गुसाईँ, जुग ज्यौँ जाति घरी।
सूरदास प्रभु प्रिया प्रेम-बस, निज महिमा बिसरी ॥७॥
अर्थ—हे अनुज (लक्ष्मण) ! सुनो इस वन में इतने लोगो ने मिलकर प्रिया
(सीता) का हरण किया (है)। (सीता के) कुछ अंगो की निशानी मेरी नजरों मे पडी
(है)। सिंह ने कमर, कोयल ने मधुर वाणी (तथा) चन्द्रमा ने मुख की कान्ति धारण
कर ली। मृग ने नेत्रो की शोभा चुरा ली, जिसे छिपाना (उससे) बन नही पा रहा
है। चंपा ने (शरीर का) रंग, कमल ने चरण (तथा) हाथ, (और) दांतो की लड़ियो
की दाड़िम (आकार) ने (हर लिया)। हंस ने (चरणो की) गति और बिम्बाफल
(कुंदरू) ने ओठो की छवि (लालिमा) तथा सांप ने अनुपम कवरी वेणी, चोटी (की
छवि) (चुरा ली)। अत्यधिक करुणा युक्त राम का (एक) घडी समय (एक) युग के
समान बीतता है। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (राम) प्रिया (सीता) के प्रेम के
कारण अपनी महिमा (भी) भूल गये ॥७॥
बिछुरी मनौ संग तैँ हिरनी।
चितवति रहत चकित चारोँ दिसि, उपजि बिरह तन जरनी।
तरुवर-मूल अकेली ठाढ़ी, दुखित राम की घरनी।
बसन कुचील, चिहुर लपटाने, बिपति जाति नहिँ बरनी।
लेति उसास नयन जल भरि- भरि, धुकि सो परै धरि धरनी।
सूर सोच जिय पोच निसाचर, राम नाम की सरनी ॥८॥
अर्थ-मानो साथ से हरिणी बिछुड गयी। चकित होकर (सीता) चारो
दिशाओ में देखती रहती है, (तथा) शरीर मे विरह की जलन उत्पन्न हो गयी। वृक्ष
के नीचे राम की दुखी पत्नी (सीता) अकेली खड़ी है। (उनके) वस्त्र मैले है, बाल
उलझे हैं, (उनकी) विपत्ति का वर्णन नही किया जाता। नेत्रो मे जल भर-भर कर
गहरी उसांसे लेती हैं, (कभी तो) पृथ्वी पर गिर पड़ती हैं। सूरदास (कहते हैं कि)
(उनके) मन मे नीच राक्षसो की चिन्ता है, (अब) केवल एक मात्र रामनाम की
शरण (ही उनके लिए) (बाकी) (है) ॥८॥
३६८ सूरसागर सार सटीक
सो दिन त्रिजटी, कहु कव ऐहै ?
जा दिन चरनकमल रघुपति के, हरषि जानकी हृदय लगैहै ।
कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा, माइ माइ कहि मोहिं सुनैहै ।
कबहुँक कृपावंत कौशिल्या, वधू-वधू कहि मोहिं बुलैहै ।
जा दिन कंचनपुर प्रभु ऐहैं, विमल ध्वजा रथ पर फहरैहै ।
ता दिन जनम सफल करि मानौं, मेरी हृदय-कालिमा जैहै ।
जा दिन राम रावनहिं मारैं, ईसहिं लै दससीस चढ़ैहैं ।
ता दिन सूर राम पै सीता, सरवस वारि बधाई दैहैं ॥६॥
अर्थ—हे त्रिजटी ! कहो वह दिन कब आयेगा ? जिस दिन राम के चरण-
कमलो को हर्षित होकर सीता हृदय से लगायेंगी। कभी लक्ष्मण सुमित्रा को पाकर
'माँ-माँ' कहकर मुझे सुनायेगे । कभी कृपालु कौशल्या "वधू-वधू" कहकर मुझे बुला-
येगी । जिस दिन प्रभु (राम) रथ पर विमल ध्वजा फहराते हुए कंचनपुरी (लंका)
आयेगे; उसी दिन (मैं सीता) जीवन को, सफल करके मानूंगी, (और) मेरी हृदय-
कालिमा (मेरा दुःख) चली जायेगी, (तथा) जिस दिन राम रावण को मारेगे, (ओर)
(उसके) दस सिर लेकर ईश पर चढ़ायेगे । सूरदास (कहते हैं) उसी दिन राम पर
सीता सर्वस्व निछावर कर बधाई देगी ॥६॥
जननी, हौं अनुचर रघुपति कौ।
मति माता करि कोप सरापैं, नहिं दानव ठग मति कौ ।
आज्ञा होइ देउँ कर मुँदरी, कहौँ संदेसौ पति कौ ।
मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ ।
कहौ तो लंक उखारि डारि देउँ, जहौँ पिता संपति कौ ।
कहौ तो मारि-सँहारि निसाचर, रावन करौं अगति कौ ।
सागर-तीर भीर बनचर की, देखि कटक रघुपति कौ ।
अबहिं मिलाउँ तुम्हैं सूर प्रभु, राम-रोष डर अति कौ ॥११०॥
अर्थ - हे माता ! मैं रघुपति का सेवक हूँ । माता, क्रोधित होकर (तुम) मुझे
शाप न दे देना; मैं ठग बुद्धि वाला राक्षस नही हूँ । आज्ञा हो, तो (राम के) हाथ की
मुंदरी (अंगूठी) दूँ, (और) पति का (राम का) संदेशा कहूँ । सीता ! हृदय मे दुख मत
करो, राम दैत्यो के कुल को मार डालेगे । कहो (आज्ञा हो) तो लंका को उखाड कर
(वहाँ) डाल (फेक) दूँ जहां (कैलाश पर्वत पर) संपत्ति के पिता (कुबेर) हैं । कहो तो
निशाचरो को मार सहार कर रावण की दुर्गति कर हूँ । सागर के किनारे बदरो की भीड़
(है), रघुपति की (बन्दरो की) सेना को देखो । सूरदास (हनुमान् जी) (कहते हैं कि)
तुमसे प्रभु (राम) को अभी मिला दूँ (मिलाने की सामर्थ्य रखता हूँ), (किन्तु) (मुझे)
राम के क्रोध का बडा डर (है) (राम की आज्ञा के बिना यदि) मैं तुम्हे राम से मिला
दूँ तो मुझे यह डर लगता है कि कही राम नाराज न हो जायें ॥११०॥
परिशिष्ट (क) ३६८
सुनु कपि, वै रघुनाथ नहींँ ?
जिन रघुनाथ पिनाक पिता-गृह तोरयौ निमिष महीँ ।
जिन रघुनाथ फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीँ ।
जिन रघुनाथ-हाथ खर-दूषन-प्रान हरे सरहीँ ।
कै रघुनाथ तज्यौ प्रन अपनौ, जोगिन दसा गहीँ ?
कै रघुनाथ दुखित कानन, कै नृप भए रघुकुलहीँ ।
कै रघुनाथ अतुल बल राच्छस दसकंधर डरहीँ ?
छाँड़ी नारि बिचारि पवन-सुत लंक बाग बसहीँ ।
कै हौँ कुटिल, कुचील, कुलच्छनि, तजी कंत तबहीँ ।
सूरदास स्वामी सौँ कहियौ अब बिरमाहिँ नहीं ॥११॥
अर्थ — सुनो कपि ! (क्या) वे रघुनाथ (अब) नहीं हैं ? जिन रघुनाथ ने (मेरे)
पिता (जनक) के घर मे क्षण भर मे (ही) धनुष तोड दिया था । जिन रघुनाथ ने भृगु-
पति की गति को वही काट कर (उन्हें) वापस भेज दिया । जिन रघुनाथ के हाथ के
बाणों ने खर-दूषण के प्राण हरे (थे) । या तो राम ने अपना प्रण (भक्तो की रक्षा)
छोड दिया, (या फिर) योगियों की दशा प्राप्त की (विरक्त हो गये) । या तो दुखी
होकर राम कही जंगल मे (घूम रहे हैं) (या फिर) (अयोध्या मे) रघुकुल के राजा हो
गये । या तो रघुनाथ राक्षस रावण के अतुल बल से डरते हैं तथा विचार करके
उन्होने अपनी स्त्री को त्याग दिया और कही लका के बगीचे मे रहते है । या तो मै
कुटिल, गंदी कुलक्षिणी हूँ, तभी कंत (राम) ने (मुझे) त्याग दिया । सूरदास के
स्वामी से कहना (कि) अब (कही) रुके नही (जल्द आ जायें) ॥११॥
मैं परदेसिन नारि अकेली ।
बिनु रघुनाथ और नहिँ कोऊ, मातु-पिता न सहेली ।
रावन भेष, धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली ।
अति अज्ञान मूढ़ि-मति मेरी, राम-रेख पग पेली ।
बिरह-ताप तन अधिक जरावत, जैसेँ दव द्रुम बेली ।
सूरदास प्रभु वेगि मिलावौ प्रान जात हैं खेली ॥१२॥
अर्थ - मैं परदेशी स्त्री अकेली हूँ । रघुनाथ के बिना (मेरी सहायता करने
वाला) और कोई नही (है); न माता-पिता, (ओर) न (कोई) सखियाँ (है) । रावण ने
तपस्वी का वेष धारणा किया; मैंने उसे भिक्षा क्यो दी ! (मैं) बहुत अज्ञानी (हूँ) मेरी
मति मंद (है), (तभी तो) राम की (बनाई हुई) रेखा (का) (मैंने) उल्लघन किया (मैं
उसके बाहर गयी) । विरह का ताप शरीर को अत्यधिक जलाता है; जैसे दावाग्नि पेडो
(और) लताओ को (जलाती है) । सूरदास (कहते हैं) (सीता कहती हैं) (कि) प्रभु से
जल्द मिलाओ, नही तो प्राण खेल-खेल (मे ही) (व्यर्थ ही) जा रहे हैं ॥१२॥
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