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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 324

परिशिष्ट (क)
रामचरित
रघुकुल प्रगटे हैं रघुबीर ।
देस-देस तैं टीकौ आयी, रतन कनक-मनि-हीर ।
घर-घर मंगल होत बधाई, अति पुरवासिनि भीर ।
आनँद-मगन भए सब डोलत, कछू न सोध सरीर ।
मागध-बंदी-सूत लुटाए, गो-गयन्द-हय-चीर ।
देत असीस सूर चिरजीवौ, रामचन्द्र रनधीर ॥१॥
अर्थ — रघुकुल मे राम प्रकट हुए हैं । देश-देश से उपहार आये (जिनमे) रत्न,
सोना, मणि तथा हीरे (आदि थे) । घर-घर मे मागलिक वधाइयाँ हो रही (गाई जा
रही) है; पुरवासियो की अत्यधिक भीड (है) । सभी (लोग) आनन्द से मग्न होकर
घूमते है, (किसी को) (अपने) शरीर का (कुछ भी) ख्याल नही । मागध, वन्दी तथा
सूतो को गाये, हाथी, घोड़े (तथा) वस्त्र लुटाये (जा रहे हैं) । सूरदास आशीर्वाद देते
है कि रणधीर राम (तुम) चिरकाल तक जीवित रहो ॥१॥
करतल-सोभित बान धनुहियाँ ।
खेलत फिरत कनकमय आँगन, पहिरे लाल पनहियाँ ।
दसरथ-कौसिल्या के आगैं, लसत सुमन की छहियाँ ।
मानौ चारि हंस सरवर तैं, बैठे आइ सदेहियाँ ।
रघुकुल-कुमुद-चंद चिंतामनि, प्रगटे भूतल महियाँ ।
आए ओप देन रघुकुल कौं, आनँद-निधि सब कहियाँ ।
यह सुख तीनि लोक मैं नाहीं, जो पाए प्रभु पहियाँ ।
सूरदास हरि बोल भक्त कौ, निरबाहत गहि बहियाँ ॥२॥
अर्थ—(राम के) हाथ मे बाण तथा नन्हा सा धनुष शोभित है । (छोटे-छोटे)
लाल जूते पहने (हुए) स्वर्णमय आंगन मे (राम) खेलते फिरते है । दशरथ तथा
कौशल्या के आगे फूलो की छाया में (वे) शोभित हो रहे है । (चारो बालक ऐसे जान
पड़ते है) मानो सरोवर से सदेह चार हंस अभी-अभी आ बैठे (हों) । रघुकुल रूपी
कुमुदनी के चन्द्र (की तरह) (तथा) चिंतामणि (रूप मे) (राम) पृथ्वी पर प्रकट
हुए । वे रघुकुल को प्रकाश (तथा) सबको आनंद की निधि देने आये हैं । यह सुख