सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 321

द्वारका चरित ३६१
अर्थ—हरि जी ने इतना समय कहाँ लगा दिया ! उस समय (जब कृष्ण मथुरा
गए थे कि) अवधि बताने पर मैं समझी नही; गिनते-गिनते (अब अवधि का हिसाब
लगा रही थी कि) अचानक (हरि) आ गये । अच्छा ही किया जो (हरि ने) इन नेत्रों
को (अपने) सुन्दर दर्शन दिये । (हमने आपकी) कृपा जान ली, राज-काज में (राज-
काज करते हुए) भी क्षण-मात्र के लिए (भी) हमे (आपने) नही भुलाया । विरहिणी
को विकल देखकर सूर के प्रभु (कृष्ण ने) दौडकर (उसे) हृदय से लगा लिया । कुछ
कहकर सारथी (रथ चलाने वाले) को भेज दिया (तथा) घोड़ों को छुडा दिया (पांव-
पैदल ही जाने का निश्चय किया) ॥४७॥
हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ ।
जदपि नैन निरखत वह मूरति, फिरि मन जात तहाँ ।
मुख मुरली सिर मोर पखौवा, गर घुँघचिनि कौ हार ।
आगैं धेनु रेनु तन मंडित, तिरछी चितवनि चार ।
राति दिवस सब सखा लिए सँग, हँसि मिलि खेलत खात ।
सूरदास प्रभु इत उत चितवत, कहि न सकत कछु बात ॥४८॥
अर्थ—(किसी ने कहा;) हे हरि जी वे सुख फिर कहाँ (नसीब होंगे) । यद्यपि
नयनो से (तुम्हारी) वही मूर्ति देखते है, (किन्तु) मन फिर वही चला जाता है (ब्रज
की लीलाओ की ओर खिंच जाता है) । (जब आपके) मुख में मुरली, सिर पर मोर
के पंख (मोर मुकुट), (तथा) गले घुंघुचियों का हार (हम देखा करते थे) । आगे
गाये (चलती थी) (पीछे) धूल से शोभित (आपका) शरीर (ओर) सुन्दर तिरछी
चितवन से आपका देखना रात-दिन (आप) सब मित्रों को साथ लिए हँस-मिलकर
खेला-खाया करते थे । सूरदास के प्रभु (इन बातों को टालने या भूल जाने के लिए)
इधर-उधर देखने लगे; कुछ बात कह नही पाते (कोई जवाब न दे पाये !) ॥४८॥
रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी ।
जैसैं बहुत दिननि की बिछुरी, एक बाप की बेटी ।
एक सुभाव एक वय दोऊ, दोऊ हरि कौं प्यारी ।
एक प्रान मन एक दुहुनि कौ, तन करि दीसति न्यारी ।
निज मंदिर लै गई रुकमिनी, पहुनाई बिधि ठानी ।
सूरदास प्रभु तहँ पग धारे, जहाँ दोऊ ठकुरानी ॥४६॥
अर्थ—रुक्मिणी तथा राधा इस प्रकार मिली (मानो) बहुत दिनों के बिछुड़ने
के बाद एक बाप की दो बेटियां (हों) । दोनों का एक ही स्वभाव, एक ही आयु तथा
दोनों कृष्ण को प्यारी हैं । दोनों एक ही प्राण (तथा) एक ही मन है; (केवल) शरीर
से (ही) भिन्न दिखाई देती हैं । रुक्मिणी (राधा को) अपने भवन ले गयी (तथा)
विधिपूर्वक (राधा का) आतिथ्य किया । सूरदास (कहते हैं कि) प्रभु (कृष्ण) वहाँ गए
जहाँ दोनो ठकुराइने (रानियाँ) थी ॥४६॥