सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारिका चरित ३६३
अर्थ—सभी लोगो से मेरा स्नेह है। हे सुवल, सुदामा ! सुनो जन्म-जन्म तक
इस प्रण के बेड़े (मर्यादा) का निर्वाह करता हूँ। (वे) ब्रह्मादि (तथा) इन्द्रादि (भी है),
मैं (उन) सभी का बल जानता हूँ। (वे) (मेरी) एक ही साँस या उच्छ्वास के भय से
अपने गांव को छोड़कर भाग जाते है, जो (मैने) दूर देश द्वारिका मे निवास किया
(तो) (इससे) क्या हुआ ? इस ब्रज के (हित के) लिए स्वयं ही (मैं) बार-बार इसका
फेरा करूँगा (अवतार लूँगा)। यहाँ वहां मैं साधुओ के हित (भलाई) के लिए फिरता
हूँ, (तथा) दुर्जनो का शिकार (नाश) करता हूँ। सूरदास कहते हैं (कृष्ण कहते हैं)
(कि) तुम्हारा अंग छूकर (तुम्हारी सौगन्ध खाकर) कहता हूँ (कि) (मेरे) हृदय से
गोकुल टलता नही (उसे मैं कभी नही भूलता) ॥५२॥
हम तौ इतनै ही सचु पायौ ।
सुंदर स्याम कमल दल-लोचन, बहुरौ दरस दिखायौ ।
कहा भयौ जो लोग कहत हैं, कान्ह द्वारिका छायौ ।
सुनिकै बिरह दसा गोकुल की, अति आतुर ह्वै धायौ ।
रजक धेनु गज कंस मारि कै, कीन्ही जन कौ भायौ ।
महाराज ह्वै मातु पिता मिलि, तऊ न ब्रज बिसरायौ ।
गोपि गोपऽरु नंद चले मिलि, प्रेम समुद्र बढ़ायौ ।
अपने बाल गुपाल निरखि मुख, नैननि नीर बहाद्यौ ।
जद्यपि हम सकुचे जिय अपनैं, हरि हित अधिक जनायौ ।
वैसेइ सूर बहुरि नँद-नंदन, घर-घर माखन खायौ ॥५३॥
अर्थ—हमने तो इतने (से) ही सुख पाया (कि) कमल-दल के समान नेत्र वाले
श्याम सुन्दर ने फिर से दर्शन दिये । (इससे) क्या हुआ जो लोग कहते हैं (कि) कृष्ण
द्वारिका चले गये । (लेकिन वे) गोकुल की विरह-दशा सुनकर अत्यधिक आतुर होकर
दौड पड़े (और) रजक, धेनु, हाथी तथा कंस को मारकर भक्तों को भाने वाले (काम)
किये । माता-पिता से मिलकर, महाराज होकर भी ब्रज को नही भुलाया । गोपी, गोप,
नन्द (जब) मिलकर चले (लौटे) (तब) प्रेम-समुद्र उमड़ आया । (उन्होंने) अपने बाल
गोपालो के मुख को देखकर आंखों से आंसू बहाये । यद्यपि हम (ब्रजवासियो) ने अपने
मन मे संकोच किया, लेकिन हरि ने अत्यधिक स्नेह दिखाया । वैसे ही (पहले के
समान) कृष्ण ने पुनः घर-घर मक्खन खाया ॥५३॥