सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
२१४ सूरसागर सार सटीक
नंद नंदन तौ ऐसे लागैं, ज्यौं जल पुरइनि पात ।
सूर स्याम सँग तैं बिछुरत हैं, कब ऐहैं कुसलात ॥८॥
अर्थ—सुना है कि कृष्ण मधुपुरी जा रहे हैं। संकोचवश किसी से हृदय की गुप्त
बात कहती नही है। आधी रात को कोई आने वाली (अनागत) शंकायुक्त बात कह
गया। (फलस्वरूप) नींद आती, तथा रात घटती ही नही, प्रातः उठकर कब (कृष्ण को)
देखूंगी। कृष्ण तो ऐसे उदासीन लग रहे हैं जेसे पुरइन (कमल) के पत्ते पर जल की
बूंद। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) साथ से विछुड रहे हैं, कब सकुशल लौट आयेगे ॥८॥
मथुरा प्रयाण
अब नंद गाइ लेहु संभारि ।
जो तुम्हारैं आनि बिलमे, दिन चराई चारि ।
दूध दही खवाइ कीन्हे, बड़े अति प्रतिपारि ।
ये तुम्हारे गुन हृदय तैं, डारिहौं न बिसारि ।
मातु जसुदा द्वार ठाढ़ी, चलै आँसू ढारि ।
कह्यौ रहियौ सुचित सौं, यह ज्ञान गुर उर धारि ।
कौन सुत, को पिता-माता, देखि हृदै विचारि ।
सूर के प्रभु गवन कीन्हौ, कपट कागद फारि ॥६॥
अर्थ—नन्द अब गाय सम्हाल लो। जो तुम्हारे यहां आकर ठहरे, चार दिन
गाय चरा दिया। आपने दूध, दही खिलाकर अत्यधिक प्रेम से पालन किया। तुम्हारे
ये गुण हृदय से विस्मृत नही करूँगा। माता यशोदा द्वार पर खडी है, आंखो से आंसू
ढुलक रहे हैं (कृष्ण ने) कहा यह महान् ज्ञान हृदय मे धारण करके स्वस्थ चित्त से
रहना। कौन पुत्र है, कौन माता-पिता है इसे हृदय मे विचार कर देखना। सूरदास
कहते है कि कपट के कागज को फाड़कर कृष्ण ने प्रस्थान किया ॥६॥
जबहीं रथ अक्रूर चढ़े।
तब रसना हरि नाम भाषि कै, लोचन नीर बढे ।
महरि पुत्र कहि सोर लगायौ, तरु ज्यौं धरनि लुटाइ ।
देखतिं नारि चित्र सी ठाढ़ीं, चितये कुंवर कन्हाइ ।
इतनैहि मैं सुख दियौ सबनि कौं, दीन्ही अवधि बताइ ।
तनक हँसे, हरि मन जुवतिन कौं, निठुर ठगौरी लाइ ।
बोलतिं नहीं रहीं सब ठाढ़ी, स्याम-ठगीं ब्रज नारी ।
सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारी ॥१०॥
अर्थ—जैसे ही अक्रूर रथ पर चढ़े, (उन्होंने) वाणी से कृष्ण का नामोच्चारण
किया और (उनकी) आंखो मे आंसू बढ गये। महरि (यशोदा) ने 'पुत्र-पुत्र' कहकर
शोर मचाया, (वह) वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी। नारियां चित्रवत् खड़ी होकर
मथुरा गमन २१५
देखती हैं, कृष्ण ने (भी उनकी ओर) देखा। इतने मे ही सब को सुख प्रदान किया
और (लौटने की) अवधि बात दी। कृष्ण युवतियों के मन पर निष्ठुर जादू डालकर
थोड़ा हँसे। कृष्ण से ठगी हुई स्त्रियां बोलती नही, सभी खड़ी रह गयी। सूरदास
कहते हैं कि पृथ्वी के हितकारी (कृष्ण) ने मधुपुर की ओर कदम बढ़ाये ॥१०॥
रहीँ जहाँ सो तहाँ सब ठाढ़ीं ।
हरि के चलत देखियत ऐसी, मनहु चित्र लिखि काढ़ी ।
सूखे बदन, स्रवति नैननि तैँ, जल-धारा उर बाढ़ी ।
कंधनि बाँह धरे चितवतिं मनु, द्रुमनि बेलि दव दाढ़ी ।
नीरस करि छाँड़ी सुफलक सुत, जैसे दूध बिनु साड़ी ।
सूरदास अक्रूर कृपा तैँ, सहीँ बिपति तन गाढ़ी ॥११॥
अर्थ—जो जहाँ थी वे वही खड़ी रह गयी। कृष्ण के चलते समय ऐसी जान
पड़ती है मानो (वे) चित्र की तस्वीरे हो। सूखे मुख, नेत्रो के स्रवित होने से हृदय पर
जल की धारा बढ़ गयी। कन्धे पर बांह रखे हुए (वे) ऐसी जान पड़ती है मानों
दावाग्नि से दग्ध वृक्षो पर लता हो। सुफलक के सुत ने उन्हे रसहीन करके छोड़
दिया जैसे मलाई-रहित दूध हो । सूरदास कहते है कि अक्रूर की कृपा से उन्होने गहन
दुख सहन किया ॥११॥
बिछुरत श्री ब्रजराज आजु, इनि नैननि की परतीति गई ।
उड़ि न गए हरि संग तबहिँ तैँ, ह्वै न गए सखि स्याममई ।
रूप रसिक लालची कहावत, सो करनी कछुवै न भई ।
साँचे क्रूर कुटिल ये लोचन, वृथा मीन-छवि छीन लई ।
अब काहैँ जल-मोचत, सोचत, समौ गए तैँ सूल नई ।
सूरदास याही तैँ जड़ भए, पलकनिहूँ हठि दगा दई ॥१२॥
अर्थ—कृष्ण से बिछुड़ते ही इन नेत्रो का विश्वास नही रह गया। तब ये कृष्ण
के साथ उड़ नही गये ओर न श्याममय ही हो गये। ये रूप रस से लालची कहे जाते
थे, किन्तु उस (प्रकार की) करणी कुछ नही दिखाई पड़ी। सचमुच ये नेत्र क्रूर और
कुटिल हैं, व्यर्थ ही (इन नेत्रो ने) मछली की शोभा छीन ली है। अब (ये नेत्र) क्यो
जल छोड़ते हैं तथा चिन्तित होते हैं। (संयोग का) समय बीत जाने के कारण (इन्हे)
नई पीड़ा (हो रही है)। सूरदास कहते हैं कि इसी से ये जड़ हो गये हैं, पलको ने भी
हठ करके धोखा दे दिया (गिरना बन्द कर दिया) ॥१२॥
आजु रैनि नहिँ नीँद परी ।
जागत गिनत गगन के तारे, रसना रटत गोबिंद हरी ।
वह चितवनि, वह रथ की बैठनि, जब अक्रूर की बाँह गही ।
चितवति रही ठगी सी ठाढ़ी, कहि न सकति कछु काम दही ।
२१६ सूरसागर सार सटीक
इते मान व्याकुल भइ सजनी, आरज पंथहुँ तैं बिडरी।
सूरदास-प्रभु जहाँ सिधारे, कितिक दूर मथुरा नगरी ॥१३॥
अर्थ—आज रात में नीद नही आयी। जागती हुई आकाश के तारे गिनती
रही, जीभ गोविंद कृष्ण रटती रही। जब अक्रूर की बाँह (कृष्ण ने) पकड़ी, (उस समय
की) वह दृष्टि, वह रथ पर बैठना, (कितना निष्ठुर था)। (तब) हम ठगी सी खडी
रही, तथा काम से दग्ध कुछ कह न सकी। हे सखी ! इतना अधिक व्याकुल हो गयी
कि आर्यपथ से भी अलग हो गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण जहां गये वहां से मथुरा
नगरी कितनी दूर है ॥१३॥
री मोहिं भवन भयानक लागै, माई स्याम विना।
काहि जाइ देखीँ भरि लोचन, जसुमति कैं अँगना।
को सकट सहाइ करिवै कौं, मेटै विघ्न घना।
लै गयौ क्रूर अक्रूर साँवरौ, ब्रज कौ प्रानधना।
काहि उठाइ गोद करि लीजै, करि करि मन मगना।
सूरदास मोहन दरसन बिनु, सुख सम्पति सपना ॥१४॥
अर्थ--हे सखी ! कृष्ण के बिना मुझे घर भयानक लगता है। यशोदा के
आंगन जाकर किसे भर-निगाह (जी भर कर) देखूं। संकट (के समय) कौन सहायता
करे (तथा) घने विघ्नों को मिटा दे। निर्दयी अक्रूर ब्रज के प्राणधन को लेकर चला
गया। किसे उठाकर मन को प्रसन्न कर करके गोद मे ले ले। सूरदास कहते हैं कि
मोहन के दर्शन के बिना सुख-सम्पत्ति स्वप्न के समान (है) ॥१४॥
कहा हौँ ऐसे ही मरि जैहौँ।
इहिँ आँगन गोपाल लाल कौ, कबहुँ कि कनिया लैहौँ।
कब वह मुख बहुरौ देखौंगी, कह वैसो सचुपैहौँ।
कब मोपै माखन माँगैगे, कब रोटी धरि दैहौँ।
मिलन आस तन-प्रान रहत हैं, दिन दस मारग ज्वैहौँ।
जौ न सूर अइहैं इते पर, जाइ जमुन धँसि लैहौँ ॥१५॥
अर्थ—क्या मैं ऐसे ही मर जाऊँगी ? इस आँगन मे गोपाल लाल को कभी
गोद मे लूंगी ? वह मुख फिर कब देखूँगी, वह सुख कहाँ पाऊँगी ? कब मुझसे मक्खन
मागेगे, कब रोटी पर (मक्खन) रखकर दूँगी। मिलने की आशा से शरीर मे प्राण
रुके है। दस दिन तक रास्ता देखूँगी। सूरदास कहते है कि इस बीच यदि नही आयेगे
तो (हम गोपियां) जाकर यमुना मे धंस जायेगी ॥१५॥
मथुरा प्रवेश तथा कस-वध
बूझत हैं अक्रूरहिँ स्याम।
तरनि किरनि महलनि पर झईं, इहै मधुपरी नाम।
श्रवननि सुनत रहत है जाकौ, सो दरसन भए नैन ।
कंचन कोटि कँगूरनि की छबि, मानी बैठे मैन ।
उपवन बन्यौ चहूँधा पुर के, अतिहीँ मोकौँ भावत ।
सूर स्याम बलरामहिँ पुनि पुनि, कर पल्लवनि दिखावत ॥१६॥
अर्थ—अक्रूर से कृष्ण पूँछते हैं। (जहाँ) महलों पर सूर्य की किरणे छायी हैं
(क्या) इसी का नाम मधुपुरी है। कानो से जिसे सुनता रहा उसका नेत्रो से दर्शन हो
गया । सोने के महल के कंगूरो की शोभा ऐसी है मानों कामदेव बैठे हों । पुर के चारो
ओर बने उपवन मुझे अत्यधिक रुचिकर लगते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण कर-
पल्लवो से बलराम को बार-बार दिखाते हैं ॥१६॥
मथुरा हरषित आजु भई ।
ज्यौँ जुवती पति आवत सुनि कै, पुलकित अंग मई ।
नवसत साजि सिंगार सुदरी, आतुर पंथ निहारति ।
उड़ति धुजा तनु सुरति बिसारे, अंचल नहीँ संभारति ।
उरज प्रगट महवनि पर कलसा, लसति पास बन सारी ।
ऊँचे अटनि छाज की सोभा, सीस उचाइ निहारी ।
जालरंध्र इकटक मग जोवति, किंकिन कंचन दुर्ग ।
बेनी लसति कहाँ छबि ऐसी, महलनि चित्रे उर्ग ।
बाजत नगर बाजने जहँ तहँ, और बजत घरियार ।
सूर स्याम बनिता ज्यौँ चंचल, पग नूपुर झनकार ॥१७॥
अर्थ—मथुरा आज हर्षित हो गयी, जैसे पति को आता सुनकर युवती के अंग
पुलकित हो जाते हैं। सोलह श्रृंगार सजाकर सुन्दरी आतुर होकर पथ निहारती है।
उड़ती हुई ध्वजा (ऐसी ज्ञात होती है) जैसे विस्मृत होकर अपने अंचल को नही
सम्हालती । महलों पर रखे गये कलस (रूपी) स्तन प्रत्यक्ष हो गये तथा पास के वन
(रूपी) साडी शोभित है। ऊँची छतो छज्जे शोभित हैं, (जैसे छज्जे के रूप में मथुरा
रूपी नारी) सिर ऊँचा करके पथ निहार रही है। झरोखे की जालियो मे इकटक
रास्ता देखती हैं। कंचन के दुर्ग (नगर सुन्दरी) की किंकिणी हैं। महलो पर के चित्रित
सांप चोटी के समान शोभित हैं और जगह ऐसी छवि कहाँ है । नगर मे जहाँ-तहाँ
वाजे तथा घड़ियाल बजते है, सूरदास कहते है मानो यह कृष्ण की चंचल पत्नी है
जिसके पग के नूपुरों को झनकार हो रही है ॥१७॥
मथुरा पुर मैँ सोर पर्यौ ।
गरजत कंस बंस सब साजे, मुख कौ नीर हर्यौ ।
पीरौ भयौ, फेफरी अधरनि, हिरदय अतिहि डर्यौ ।
नंद महर के सुत दोउ सुनि कै, नारिनि हर्ष भर्यौ ।
२१८ सूरसागर सार सटीक
कोउ महलनि पर कोउ छज्जनि पर, कुल लज्जा न करयौ।
कोउ धाईँ पुर गलिन गलिन ह्वै, काम-धाम विसरयौ।
इंदु वदन नव जलद सुभग तनु, दोउ खग नयन करयौ।
सूर स्याम देखत पुर-नारी, उर-उर प्रेम भरयौ ॥१८॥
अर्थ—मथुरा नगर मे शोर मच गया। अपने वश सहित सुसज्जित कंस गरज
रहा है, किन्तु (उसका) मुख सूख गया है, (वह) (भय से) पीला पड गया, अधरों पर
पपड़ी पड गयी, (और) (वह) हृदय से अत्यधिक डरा (है)। (दूसरी ओर) नन्द महर
के दोनों पुत्रों के विषय मे सुनकर नारियो को हर्ष हुआ। कोई महलो पर, कोई छज्जो
पर (आकर देखने लगी), उन्होंने कुल की लज्जा नही की। कोई पुर की गली-गली से
होकर दोड पड़ी तथा धाम का काम सब कुछ भूल गया। नये वादल के समान सुन्दर
शरीर वाले कृष्ण के चन्द्र-मुख हेतु पुर की नारियो ने अपने दोनो नेत्रो को (चकोर)
पक्षी बना लिया। सूरदास कहते हैं कि अपने-अपने हृदय मे प्रेम भरकर पुर की नारियां
कृष्ण को देखती हैं ॥१८॥
ढोटा नंद कौ यह री।
नाहिं जानति बसत ब्रज मैँ, प्रगट गोकुल री।
धरयौ गिरिवर वाम कर जिहिँ, सोइ है यह री।
दैत्य सब इनहीँ सँहारे, आपु-भुज-बल री।
ब्रज-घरनि जो करत चोरी, खात माखन री।
नंद-घरनी जाहिँ बाँध्यौ, अजिर ऊखल री।
सुरभि-ठान लिये वन तैँ आवत, सबहिँ गुन इन री।
सूर-प्रभु ये सबहि लायक, कंस डरै जिन री ॥१९॥
अर्थ—यही नन्द के पुत्र हैं। जानती नही कि (यही) ब्रज में बसते हैं तथा
गोकुल मे प्रकट हुए हैं। वाये हाथ से जिन्होने गिरवर को धारण किया यह वही है।
अपनी भुजाओं के बल से इन्होने सारे दैत्यो का सहार किया। ब्रज के घरो मे जो
चोरी करते हैं तथा माखन खाते हैं। नन्द की स्त्री ने जिन्हे आंगन मे ऊखल से बांधा
था। गायो का समूह लेकर वन से आते है, इनमे सभी गुण हैं। सूरदास कहते हैं कि
ये सब (कुछ करने) योग्य हैं, और कंस जिनसे डरता है ॥१९॥
भए सखि नैन सनाथ हमारे।
मदनगोपाल देखतहिँ सजनी, सब दुख सोक विसारे।
पठये हे सुफलक-सुत गोकुल, लैन सो इहाँ सिधारे।
मल्ल जुद्ध प्रति कंस कुटिल मति, छल करि इहाँ हँकारे।
मुष्टिक अरु चानूर सैल सम, सुनियत हैं अति भारे।
कोमल कमल समान देखियत ये जसुमति के बारे।
मथुरा गमन २१५
होवे जीति विधाता इनकी, करहु सहाइ सवारे।
सूरदास चिर जियहु दुष्ट दलि, दोऊ नंद-दुलारे ॥२०॥
अर्थ- हे सखि ! हमारे नेत्र सफल हो गये । मदन गोपाल को देखते ही (हमने)
सारे दुख-शोक भुला दिये । इन्हे लेने के लिए अक्रूर को (कस ने) गोकुल भेजा था,
इसी से यहां आये हैं। कुटिल-बुद्धि कंस ने मल्ल युद्ध के लिए छल करके (इन्हे) यहाँ
बुलाया है। सुनती हूँ मुष्टिक और चानूर पर्वत के समान अत्यन्त भारी है। ये यशोदा
के बालक कोमल कमल के समान दिखाई देते हैं। हे विधाता ! शीघ्र सहायता करो
ताकि इनकी ही जीत हो । सूरदास कहते है कि दुष्टो का नाश करके नन्द के दोनो
पुत्र बहुत समय तक जिएँ ॥२०॥
धनुषसाला चले नंदलाला ।
सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत, देव नर कोउ न लखि सकत ख्याल ।
नृपति के रजक सों भेंट मग मेँ भई, कह्यौ दै बसन हम पहिरि जाही ।
वसन ये नृपति के जासु की प्रजा तुम, ये बचन कहत मन डरत नाहीँ ।
एक ही मुष्टिका प्रान ताके गए, लए सब वसन कछु सखनि दीन्हे ।
आइ दरजी गयौ बोलि ताकौँ लयौ, सुभग अँग साजि उन विनय कीन्हे ।
सुनि सुदामा कह्यौ गेह मम अति निकट, कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे ।
धोइ पद-कमल पुनि हार आगैँ धरे, भक्ति दै, तासु सब काज सारे ।
लिए चंदन बहुरि आनि कुबिजा मिली, स्याम अँग लेप कीन्हौ बनाई ।
रीझि तिहिँ रूप दियौ, अंग सुधौ कियौ, बचन सुभ भाषि निज गृह पठाई ।
पुनि गए तहाँ जहँ धनुष, बोले सुभट, हौंस जनि मन करौ वन-बिहारी ।
सूर प्रभु छुवत धनु टूटि धरनी पर्यो, सोर सुनि कंस भयौ भ्रमित भारी ॥२१॥
अर्थ-साथ मे मित्रो को लेकर अनेक क्रीडाएँ करते हुए कृष्ण धनुष-शाला को
चले, देवता या मनुष्य कोई (उनके इस) खेल को देख (समझ) नहीं सकता। रास्ते में
राजा (कंस के) धोबी से भेट हुई । (कृष्ण ने उससे) कहा कि हमे वस्त्र दो (जिन्हे)
पहनकर हम जाएं । (धोबो ने कहा) यह वस्त्र राजा के हैं जिनकी तुम प्रजा हो, यह
वचन कहते हुए (तुम) डरते नही हो ! एक ही मुष्टिका (मुक्के) मे उसके प्राण चले
गये तथा उससे सब वस्त्र ( कृष्ण ने ) ले लिये, कुछ मित्रों को दे दिये । दरजी आया
और (उसने) उनके सुन्दर अंग को सजाकर विनय की। फिर सुदामा ने कहा कि मेरा
घर अत्यन्त निकट है, कृपा करके कृष्ण वहां गए । (सुदामा ने) चरण-कमल धोये
(तथा) फिर हार (अहार) आगे रखा । (कृष्ण ने) अपनी भक्ति देकर उसके सब कार्य
सिद्ध कर दिये । फिर आगे चंदन लिए कुब्जा मिली, उसने भली प्रकार कृष्ण के अंगों
२२० सूरसागर सारः सटीक
पर लेप की। (कृष्ण ने) रीझ कर उसे रूप प्रदान किया तथा अंग सीधा कर दिया
और शुभ वचन कहकर घर भेजा। फिर वहां गये जहां धनुष था। सुभटों ने कहा कि
हे बनविहारी ! (धनुष तोड़ने) का हौंसला मत करो। सूरदास कहते हैं कि छूते ही
धनुष टूटकर पृथ्वी पर जा पड़ा, शोर सुनकर कंस बहुत भ्रमित हुआ ॥२१॥
सुनिहि महावत बात हमारी।
बार-बार संकर्षण भाषत, लेत नाहिं ह्याँ तैं गज टारी।
मेरौ कह्यौ मानि रे मूरख, गज समेत तोहिं डारौं मारी।
द्वारैं खरे रहे हैं कबके, जनि रे गर्व करहि जिय भारी।
न्यारौ करि गयंद तू अजहूँ, जान देहि कै आपु सँभारी।
सूरदास प्रभु दुष्ट निकंदन, धरनी भार उतारनकारी ॥२२॥
अर्थ—महावत हमारी बात सुनो ! बार-बार संकर्षण (बलराम) कहते हैं, यहाँ
से (हाथी को) हटा क्यों नहीं लेता। मूर्ख ! मेरा कहना मानो, नहीं तो हाथी सहित
तुम्हें मार डालूँगा। कब से (कृष्ण) द्वार पर खड़े हैं, (यह) जानकर भी तू मन में
अत्यधिक गर्व करता है। अभी तू हाथी को अलग कर, या तो जाने दे या प्राण देने
के लिए सँभल जा। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) दुष्टों के नाशक तथा पृथ्वी का भार
उतारने वाले हैं ॥२२॥
तब रिस कियौ महावत भारि।
जौ नहिं आज मारिहौं इनकौं, कंस डारिहै मारि।
आंकुस राखि कुम्भ पर कर्षयौ, हलधर उठे हँकारि।
धायौ पवनहुँ तैं अति आतुर, धरनी दंत खंभारि।
तब हरि पूँछ गह्यौ दच्छिन कर, कँबुक फेरि सिर वारि।
पटक्यौ भूमि, फेरि नहिं मटक्यौ, लीन्हौ दंत उपारि।
दुहुँ कर दुरद दसन इक इकछवि, सो निरखतिं पुरनारि।
सूरदास प्रभु सुर सुखदायक, मारयौ नाग पछारि ॥२३॥
अर्थ—तब महावत ने अत्यधिक क्रोध किया। जो इन्हे आज मार नहीं डालता
,तो कंस (मुझे) मार डालेगा। (उसने) अंकुश दोनो कुंभों पर रखकर खींचा (चुभोया)
(इस पर) बलराम ललकार उठे। (तब) दांतों से पृथ्वी को कंपित करके (वह हाथी)
पवन से भी अधिक तीव्रता से दौड़ा। तब कृष्ण ने दाहिने हाथ से पूंछ पकड़ी। हाथी
को सिर के चारों ओर फिराकर पृथ्वी पर पटक दिया, फिर वह हिला-डुला नहीं
तथा (तब) (कृष्ण ने) उसके दांत उखाड़ लिये। दोनों दांत एक-एक हाथ मे शोभित
हैं जिन्हे नगर की स्त्रियां देख रही है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु देवताओ को सुख देने
वाले है। उन्होंने हाथी को पछाड़कर मारा ॥२३॥
एई सुत नंद अहीर के।
मारयौ रजक बसन सब लूटे, संग सखा बल वीर के।
मथुरा गमन २२१
कांधि धरि दोऊ जन आए, दंत कुंबलयापीर के।
'पसुपति मंडल मध्य मनो, मनि क्षीरधि नीरधि नीर के।
उड़ि आए तजि हंस मात मनु, मानसरोवर तीर के।
सूरदास प्रभु ताप निवारन, हरन संत दुःख पीर के ॥२४॥
अर्थ—नन्द अहीर के पुत्र ये ही हैं। बलराम तथा मित्रों के साथ धोबी को
मारकर (इन्होने) सब वस्त्र लूट लिये। कुवलयापीड (हाथी) के दांतो को कन्धे पर
रखकर दोनो भाई आये । पशुपति मंडल के बीच मानों क्षीर सागर की मणि हो,
मानों मतवाले हंस होकर मानसरोवर के तीर को छोड़कर उड़ आये हों.। सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण ताप का निवारण करने वाले, (तथा) सन्तो के दुख और पीड़ा को
हरने वाले हैं ॥२४॥
सुनो हो बीर मुष्टिक चानूर सबै, हमहिं नृप पास नहिं जान दैहौ।
घरि राखे हमें, नहीं बूझे तुम्हें, जगत मैं कहा उपहास लैहौ।
सबै यहै कहै भली मत तुम पै है, नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे।
यहै जस लेहुगे, जान नहिं देहुगे, खोजही परे अब तुम हमारे।
हम नहीं कहैं तुम मनहिं जौ यह बसी, कहत हौ कहा तौ करौ तैसी।
सूर हम तन निरखि देखियै आपुकीं, बात तुम मनहिं यह बसी नैसी ॥२५॥
अर्थ—मुष्टिक, चानूर, सभी वीरों सुनो ! क्या मुझे राजा के पास नही जाने
दोगे ? मुझे घेरकर खड़े हो, (मैं) तुम्हे (कुछ) नही समझता, (तुम) जगत में हँसे
जाओगे। सभी, यही भली बात तुमसे कहेगे (कि) नन्द के पुत्रों ने दोनो मल्लो को
मार डाला । (तुम) यही यश लोगे और जाने नही दोगे, तुम मेरे पीछे ही पढ गये हो।
तुम्हारे मन में जो यही बसा है तो हम (कुछ) नही कहेंगे । (मल्लो ने कहा) क्या
कहते हो, जैसा करना हो करो। सूरदास कहते हैं (मल्ल कृष्ण से कहते हैं) कि हमारी
तरफ देखकर अपने को देखो ! तुम्हारे मन मे (हम से भिड़ने की) यह बुरी बात बस
गयी है ॥२५॥
गह्यौ कर स्याम भुज मल्ल अपने धाइ, झटकि लीन्हौ तुरत पटकि धरनी ।
भटकि अति सब्द भयौ, खटक नृप के हियैं, अटकि प्राननि पर्यौ चटक करनी।
लटकि निरखन लग्यौ, मटक सब भूलि गइ, हटक करि देउँ इहै लागी ।
झटकि कुंडल निरखि, अटक ह्वै कै गयौ, गटकि सिल सौं रही मीच जागी।
मल्ल जे जे रहे सबै मारे तुरत, असुर जोधा सबै तेउ सँहारे।
धाइ दूतनि कह्यौ, मल्ल कोउ न रह्यौ, सूर बलराम हरि सब पछारे ॥२६॥
अर्थ—मल्ल ने दोडकर अपनी भुजा से कृष्ण का हाथ पकड़ लिया। (कृष्ण ने)
तुरन्त झटककर (हाथ छुड़ा लिया), (और) (उसे) धरती पर पटक दिया। घोर शब्द
से (राजा) भ्रमित हुआ, राजा (कंस) के हृदय मे खटका पैदा हुआ, चटक कर प्राण
उलझ गये। लटक कर (झुककर) (वह मल्ल) देखने लगा, सारी गति भूल गई, यही
२२२ सूरसागर सार सटीक
लगा कि (इन्हें) रोक दूं। (कृष्ण के) कुंडल की झटक (हिलना) देखकर वह अटक
सा (स्तब्ध सा) रह गया, (मानों) शिला सी गटक गया हो, उसकी मृत्यु (मानो)
जग गई हो। (कृष्ण ने) जो-जो मल्ल थे सभी को तुरन्त मारा, सभी असुर, योद्धाओ
का संहार कर दिया। दौड़कर दूतों ने (कंस से) कहा, (कि) कोई शेष नही रहा,
शूरवीर बलराम, कृष्ण ने सभी को पछाड़ दिया ॥२६॥
नवल नंदनंदन रंगभूमि राजैं।
स्याम तन, पीत पट मनौ घन मैं तड़ित, मोर के पंख माथैं विराजैं।
स्रवन कुडल झलक मनौ चपला चमक, दृग अरुन कमल दल से विसाला।
भौंह सुंदर धनुप, बान सम सिर तिलक, केस कुंचित सोह भृंग माला।
हृदय वनमाल, नूपुर चरन लाल, चलत गज चाल, अति बुधि विराजै।
हंस मानौ मानसर अरुन अंबुज सुभर, निरखि आनंद करि हरषि गाजैं।
कुवलया मारि चानूर मुष्टिक पटकि, वीर दोउ कंध गज-दंत धारे।
जाइ पहुँचे तहाँ कंस बैठ्यौ जहाँ, गए अवसान प्रभु के निहारे।
ढाल तरवारि आगैं धरी रहि गई, महल कौ पंथ खोजत न पावत।
लात कैं लगत सिर तैं गयौ मुकुट गिरि, केस गहि लै चले हरि खसावत।
चारि भुजा धारि तेहिं चारु दरसन दियौ, चारि आयुध चहूँ हाथ लीन्हे।
असुर तजि प्रान निरवान पद कौं गयौ, विमल मति भई प्रभु रूप चीन्हे।
देखि यह पुहुप वर्षा करी सुरनि मिलि, सिद्ध गंधर्व जय धुनि सुनाई।
सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परति, सुरनि की गति तुरत असुर
पाई ॥२७॥
अर्थ-नवल कृष्ण रंग-भूमि मे सुशोभित हैं। श्याम शरीर पर पीताम्बर मानो
बादल मे बिजली हो, मोर के पंख मस्तक पर विराज रहे हैं। श्रवण के कुंडल मानो
बिजली की चमक हो। आंखे लाल कमलदल के समान विशाल हैं। भौंह सुन्दर धनुष
के समान हैं। सिर का तिलक बाण के समान है। कुंचित बाल भौरों की माला (पंक्ति)
के समान है। हृदय पर वनमाला, लाल चरणो मे नूपूर, गज के समान चाल तथा
अत्यधिक बुद्धि विराजित है (अत्यन्त बुद्धिमान हैं)। हंस मानों कमल से भरे मान-
सरोवर को देखकर आनन्द से हर्षित होकर बोल रहे हैं। कुवलय (हाथी) को मारकर,
मुष्टिक को पटककर दोनो वीर कंधे प...रण किये हुये हैं। वहां
जाकर पहुँचे जहां कंस बैठा था। देखा (कृष्ण ने) ये। ढाल-तलवार आगे
...रह गयी, महल का रास्ता चटक कर प्राण । घोर शब्द ही सिर से मुकुट खिसक
तथा (तब ... कड़कर कृष्ण धर्मति भूल गई, यही धारण करके, चारों हाथों
हैं जिन्हें नगर... ये उसे सुन्द तजकर निर्वाण पद को प्राप्त
वाले है। उन्हो... का रूप विमल हो गयी। यह देखकर .
मारच्यो... र गंधवों ने जय-जयकार की
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मधुरा गमन २२३
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ध्वनि सुनाई । सूरदास कहते हैं कृष्ण की अगम महिमा के विषय में कुछ नही कहा
जा सकता । देवताओं की स्थिति असुर पा गया ॥२७॥
उग्रसेन कौँ दियौ हरि राज ।
आनंद मगन सकल पुरबासी, चँवर डुलावत श्री ब्रजराज ।
जहाँ तहाँ तैँ जादव आए, कंस डरनि जे गए पराइ ।
मागध सूत करत सब अस्तुति, जै जै जै श्री जादवराइ ।
जुग-जुग विरद यहै चलि आयौ, भए वलि के द्वारैँ प्रतिहार ।
सूरदास प्रभु अज अविनासी, भक्तन हेत लेत अवतार ॥२८॥
अर्थ - कृष्ण ने उग्रसेन को राज्य दे दिया । समस्त पुरवासी आनन्द से मग्न
होकर कृष्ण के चामर डुलाते हैं। जो यादव कंस के डर से इधर-उधर भाग गये थे वे
आ गये। मागध, बन्दी सभी स्तुति करते हैं कि श्री यादवराय की जय हो, जय हो ।
युग-युग से यही यश चला आया कि कृष्ण बलि के द्वार पर प्रतिहारी बने थे । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण अजन्मा अविनासी हैं तथा भक्तो के लिए अवतार लेते है ॥२८॥
तब बसुदेव हरषित गात ।
स्याम रामहिँ कंठ लाए, हरषि देवै मात ।
अमर दिवि दुंदुभी दीन्हीँ, भयौ जै जैकार ।
दुष्ट दलि सुख दियौ संतनि, ये वसुदेव कुमार ।
दुख गयौ बहि हर्ष पूरन, नगर के नर-नारि ।
भयौ पूरब फल संपूरन, लह्यौ सुत दैत्यारि ।
तुरति बिप्रनि बोलि पठये, धेनु कोटि मँगाइ ।
सूर के प्रभु ब्रह्मपूरन, पाइ हरषै राइ ॥२९॥
अर्थ-तब वसुदेव ने हर्षित शरीर से कृष्ण और बलराम को गले से लगा
लिया । देवकी माता हर्षित हो गयी । देवताओ ने आकाश मे जय-जयकार करके
दुंदुभी बजायी । दुष्टों का नाश करके इन वसुदेव पुत्र (कृष्ण) ने सन्तो को सुख दिया ।
दुख बह गया, नगर के नर-नारी हर्ष से पूर्ण हो गये । (वसुदेव) के पूर्व जन्म का पुण्य
फलित हुआ, दैत्यो के शत्रु कृष्ण को प्राप्त किया । हजारों गाय मंगाकर ब्राह्मणो को
(देने के लिए) बुला भेजा । सूरदास कहते है कि पूर्ण ब्रह्म कृष्ण को पाकर (वसुदेव
आदि) हर्षित हो गये ॥२६॥
बसुद्यौ कुल-व्यौहार विचारि ।
हरि हलधर कौँ दियौ जनेऊ, करि षटरस ज्यौनारि ।
जाके स्वास-उसाँस लेत मैं, प्रगट भये श्रुति चार ।
तिन गायत्री सुनो गर्ग सौँ, प्रभु गति अगम अपार ।
विधि सौँ धेनु दई बहु विप्रनि, सहित सर्वडलंकार ।
जदकुल भयौ परम कौतूहल, जहँ तहँ गावतिं नार ।
२२४ सूरसागर सार सटीक
मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि।
सूरदास की यहै आसिषा, चिर जियौ नंदकुमार ॥३०॥
अर्थ—वसुदेव ने कुल के व्यवहार को विचार कर छह प्रकार के रसो से युक्त भोजन
कराके कृष्ण और हलधर को जनेऊ दिया। जिनके सांस तथा उच्छवास लेने से चारो
वेद प्रकट हुए उन्होने ही गर्ग से गायत्री (मंत्र) पढी। प्रभु की गति अगम तथा अपार
है। सभी आभूषणों के साथ विधि-पूर्वक ब्राह्मणो को बहुत सी गायें प्रदान की गयी।
यदुकुल अत्यधिक प्रसन्न हुआ, जहाँ-तहाँ स्त्रियाँ गाती हैं। माता देवकी अत्यधिक
प्रसन्न होकर उतार कर (धन को कृष्ण-बलराम सिर के चारो ओर घुमाकर) निछावर
देती हैं। सूरदास ने यही आशीष दी (कि) नद कुमार चिरकाल तक जीवित रहें ॥३०॥
कुबरी पूरव तप करि राख्यो ।
आए स्याम भवन ताही कैं, नृपति महल सब नाख्यौ ।
प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ ।
तिहिं अनुराग वस्य भए ताकैं, सी हित कह्यो न जाइ ।
देव काज हरि आवन कहि गए, दैन्हौ रूप अपार ।
कृपा दृष्टि चितवतहीँ श्री भइ, निगम न पावत पार ।
हम तैँ दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल ।
सूर सुरनि करि काज तुरतहीँ, आवत तहाँ गोपाल ॥३१॥
अर्थ—कुबरी ने पूर्व जन्म में तप कर रखा था। कृष्ण ने राजा के समस्त
महलो को नष्ट किया (और) उसी के भवन आये। प्रथम ही धनुष तोड़कर आते थे,
(हे) (यह) बीच मे ही दौडकर मिल गयी। उसी अनुराग के कारण उसके वश मे हो
गये, यह स्नेह कहते नही बनता। (कृष्ण जी) देव कार्य करके (उससे) आने के लिए
कह गये थे, (उन्होने) उसे अपार रूप दे दिया। कृपा की दृष्टि से देखते ही शोभा
छा गयी, निगम पार नही पाते। अहंकार से दूर तथा दीन के पीछे रहने वाले (कृष्ण)
ऐसे ही दीन दयालु हैं ! सूरदास कहते हैं कि देवताओं के कार्य को करके गोपाल वहां
तुरन्त ही आये ॥३१॥
कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं ।
पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतरचौ काकैं ।
दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं ।
भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं ।
दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कुब्जदासी ।
मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि,तप कोटि कासी ॥३२॥
अर्थ—देवताओ का कार्य करके उसके घर चले उसके (कृष्ण-ब्रह्म) लिए पुरुष
और स्त्री का भेद नही, कुलीन या अकुलीन किसके यहाँ अवतरित नही हुए हैं। दासी,
५. मथुरा गमन एवं विरह
मथुरा गमन २२५
या दास कौन है, या प्रभु तथा दास निप्रभु कौन है (कृष्ण-ब्रह्म के लिए यह सब भेद-
भाव कुछ महत्व नही रखता है)। जिसके एक रोम के बराबर अखिल ब्रह्माण्ड है। जहाँ
जिस हृदय में सच्चा भाव है कृष्ण जी वही है। जिसके मस्तक पर प्रभु की कृपा है वही
भाग्यशाली है। दास-दासी कृष्ण के भजन से जीवित रहते हैं। वह कृष्ण दासी अब
लक्ष्मी के समान हो गयी । सूरदास कहते हैं कि वह प्रेम रूपी चन्दन लगाकर सूर के
प्रभु से मिली (उसके प्रेम से) उसने कोटि जप तथा काशी में किये जाने वाले कोटि
तप को कर डाला (अर्थात् इतना फल प्राप्त कर लिया) ॥३२॥
मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै ।
तेज प्रताप राइ केसौं कैँ, तीनि लोक पर गाजै ।
पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्राति बिराजै ।
करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै ।
बिट्ठल विपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै ।
सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरिधर राजै ॥३३॥
अर्थ-मथुरा दिन प्रतिदिन अधिक शोभित हो रही है। राजा कृष्ण का तेज
(तथा) प्रताप तीनो लोको मे घोषित हो रहा है। पग-पग पर करोड़ो तीर्थ शोभित है,
(तथा) मध्य मे विश्राति विराज रही है। प्रातः यमुना का स्नान करने पर जन्म-मरण
का भय भाग जाता है । विट्ठल की अनेक विनोद की क्रीड़ास्थलियो मे रहना अच्छा
लगता है । सूरदास उन्ही के सेवक है, कृष्ण की कृपा (उन पर) राज कर रही है ॥३३॥
नन्द का ब्रज प्रत्यागमन
वेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ ।
हमहिं तुमहिं सुत तात कौ नातौ, ओर पर्यौ हैँ आइ ।
बहुत कियौ प्रतिपाल हमारौ, सो नहिं जी तैँ जाइ ।
जहाँ रहैं तहँ तहाँ तुम्हारे, डारचौ जनि बिसराइ ।
जननि जसोदा भेंटि सखा सब, मिलियौँ कण्ठ लगाइ ।
साधु समाज निगम जिनके गुन, मेरैं गनि न सिराइ ।
माया मोह मिलन अरु विछुरन, ऐसैं ही जग छाइ ।
सूर स्याम के निठुर वचन सुनि, रहे नैन जल छाइ ॥३४॥
अर्थ-नन्दराय ! शीघ्र ही ब्रज को वापस चले जाइये । हमारा तुम्हारा पुत्र
और पिता का सम्बन्ध अन्त को आ गया है। (तुमने) हमारा बहुत पोषण किया है, वह
मन से नही जाता । जहाँ जहाँ रहूँगा वहाँ-वहाँ तुम्हारा ही रहूँगा, (इसे) भुला मत
देना । माता यशोदा और सखाओं से भेंटकर कंठ लगाकर मिलना । जिनके गुणो की
साधु-समाज तथा वेदों ने (बताया है) वे मेरे द्वारा गिनने से समाप्त होने वाले नही हैं ।
१५
२२६ सूरसागर सार सटीक
माया, मोह, मिलन और वियोग इन्ही मे संसार नष्ट होता है। सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण के निष्ठुर वचन सुनकर (नन्द के) नेत्रो मे आंसू छा गये ॥३४॥
नद बिदा होइ घोष सिधारौ ।
बिछुरन मिलन रच्यौ विधि ऐसौ, यह सकोच निवारौ ।
कहियौ जाइ जसोदा आगेँ, नैंन नीर जनि ढारौ ।
सेवा करी जानि सुत अपनौ, कियौ प्रतिपाल हमारौ ।
हमैँ तुम्हें अन्तर कछु नाहीँ, तुम जिय ज्ञान बिचारौ ।
सूरदास प्रभु यह बिनती है, उर जनि प्रीति बिसारौ ॥३५॥
अर्थ-हे नन्द ! विदा होकर गाँव को प्रस्थान करो । वियोग और मिलन ब्रह्मा
ने इसी तरह रचा है, इस संकोच का निवारण करो (भूल जाओ) । यशोदा के आगे
जाकर कहना कि नेत्रों से जल न ढुलकाये । अपना पुत्र समझकर उन्होने हमारी सेवा
की तथा हमारा प्रतिपालन किया । हममे तुममे कुछ भी अन्तर नही है, तुम मन मे
ज्ञान का विचार करो । सूरदास के प्रभु की यह विनती है कि हृदय से प्रेम को भुला
न देना ॥३५॥
गोपालराइ हौं न चरन तजि जैहौँ ।
तुमहिँ छोड़ि मधुबन मेरे मोहन, कहा जाइ ब्रज लैहौँ ।
कैहौँ कहा जाइ जसुमति सौँ, जब सन्मुख उठि ऐहै ।
प्रात समय दधि मथत छोड़ि कै, काहि कलेऊ दैहै ।
बारह बरस दियौ हम ढीठौ, यह प्रताप बिनु जाने ।
अब तुम प्रगट भए बसुद्यौ-सुत, गर्ग बचन परमाने ।
रिपु हति काज सबै कत कीन्हौ, कत आपदा विनासी ।
डारि न दियौ कमल कर तैँ गिरि, दबि मरते ब्रजवासी ।
बासर सग सखा सब लीन्हे, टेरि न धेनु चरैहौ ।
क्यौं रहिहैँ मेरे प्रान दरस बिनु, जब संध्या नहिँ ऐहौ ।
ऊरध स्वाँस चरन गति थाकी, नैन नीर भरआइ ।
सूर नंद बिछुरत की वेदनि, मो पै कही न जाइ ॥३६॥
अर्थ-हे गोपाल राय ! मैं चरण तजकर नही जाऊँगा । मेरे मोहन तुम्हे मथुरा
मे छोड़कर ब्रज में जाकर क्या लूंगा । यशोदा जब सम्मुख उठकर आयेगी तो उनसे क्या
कहूँगा । प्रातःकाल दही के मन्थन को छोड़कर किसे कलेवा देंगी । बारह वर्ष तक हमने
(तुम्हारे) इस प्रताप को विना जाने तुमसे धृष्टता की । अब तुम वसुदेव के पुत्र के रूप
मे प्रकट हुए हो, गर्ग के वचनों को (तुमने) (अपने असाधारण कृत्यों द्वारा) प्रमाणित
कर दिया । शत्रुओ को मारकर सभी कार्यों को क्यों किया और आपदाएँ क्यों नष्ट की।
कमल-कर से पर्वत को डाल क्यों न दिया । (जिससे) सब ब्रजवासी दबकर मर जाते ।
(अब) दिन मे सभी सखाओ को लेकर पुकार-पुकार कर गाये नही चराओगे । जब
मथुरा गमन २२७
शाम को नही आओगे तो दर्शन के बिना मेरे प्राण कैसे रहेगे । (नन्द के) ऊर्ध्व
उच्छ्वास (आने लगे), चरण की गति थकित हो गयी तथा नेत्रों में आंसू भर आये ।
आंखो मे पानी आ जाने के कारण धूमिल दिखने लगा । सूरदास कहते है कि नन्द के
विछुड़ते समय की वेदना मुझसे कही नही जाती ॥३६॥
(मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौं ।
महरि दौरि आगे जब ऐहै, कहा ताहि मैं कहौँ ।
माखन मथि राख्यो ह्वै है, तुम हेत, चलो मेरे बारे ।
निठुर भए मधुपुरी आइ कै, काहँ असुरनि मारे ।
सुख पायौ वसुदेव देवकी, अरु सुख सुरनि दियौ ।
यहै कहत नंद गोप सखा सब, बिदरन चहत हियौँ ।
तब माया जड़ता उपजाई, निठुर भए जदुआइ ।
सूर नंद परमोधि पठाए, निठुर ठगौरी लाइ ॥३७॥
अर्थ-(मेरे) मोहन ! तुम्हारे बिना मैं नहीं जाऊंगा । यशोदा दौड़कर जब
आगे आयेगी तो उससे मैं क्या कहूँगा । माखन मथकर तुम्हारे लिए रखा होगा, मेरे
बालक ! (तुम) चलो । मधुपुरी आकर निष्ठुर हो गये हो; असुरो को (तुमने) क्यो
मारा । वसुदेव देवकी ने सुख प्राप्त किया और देवताओं को (तुमने) सुख दिया। सब
गोप सखा तथा नन्द यही कहते हैं कि अब हृदय फटना चाहता है। तब कृष्ण ने
माया की जड़ता उत्पन्न कर दी (तथा) (वे) स्वयं निष्ठुर हो गये । सूरदास कहते है
कि निष्ठुर जादू द्वारा नन्द को समझा कर भेज दिया ॥३७॥
उठे कहि माधौ इतनी बात ।
जिते मान सेवा तुम कीन्हौ, बदलौ दयौ न जात ।
पुत्र हेत प्रतिपार कियौ तुम, जैसँ जननी तात ।
गोकुल वसत हँसत खेलत मोहिं, द्योस न जान्यौ जात ।
होहु विदा घर जाहु गुसाईं, माने रहियौ नात ।
ठाढ़ौँ थक्यो उतर नहिं आवै, लोचन जल न समात ।
भए बल-हीन खोन तन कंपित, ज्यौँ बयारि बस पात ।
धकधकात हिय बहुत सूर उठि, चले नंद पछितात्त ॥३८॥
अर्थ-कृष्ण ये बाते कह उठे । "तुमने जितनी अधिक (मेरी) सेवा की उसका
बदला नही दिया जा सकता । पुत्र समझ कर तुमने माता-पिता की तरह पालन-पोषण
किया । गोकुल मे रहते, हँसते-खेलते मुझे दिन (बीतता) नही जान पड़ता था। हे
गोसाईं (पूज्य) विदा होकर घर जाइये, सम्बन्ध मानते रखियेगा।" खड़े-खडे (नन्द)
थकित हो गये, कुछ उत्तर नही आता तथा आँखों में जल (आंसू) नही समाते थे, (नन्द)
बलहीन तथा क्षीण हो गये । शरीर कांपने लगा जैसे हवा के वश मे पत्ता हो। सूरदास
कहते हैं कि नन्द का हृदय बहुत धधकता है तथा वह पछताते हुए चल पड़े ॥३८॥
७२८ सूरसागर सार सटीक
बार-बार मग जोवति माता । व्याकुल विनु मोहन वल-भ्राता ॥
आवत देखि गोप नँद साथा । विवि बालक विनु भई अनाथा ॥
धाई धेनु बच्छ ज्यों ऐसेँ । माखन बिना रहे धौं कैसें ॥
ब्रज-नारी हरषित सब धाईँ । महरि जहाँ-तहँ आतुर आईँ ॥
हरषित मातु रोहिनी आई । उर भरि हलधर लेउँ कन्हाई ॥
देखे नन्द गोप सब देखे । वल मोहन कौँ तहाँ न पेखे ॥
आतुर मिलन-काज ब्रज नारी । सूर मधुपुरी रहे मुरारी ॥३६॥
अर्थ—बार-बार माता रास्ता निहारती है और मोहन तथा उनके भाई
बलराम के विना व्याकुल होती है। गोपों को नन्द के साथ आते देखकर तथा (उनके
साथ) दोनो बालकों को न (देख) अनाथ (असहाय) हो गयी । गाय जैसे बछडे को
देखकर दोडती है, वैसे ही यशोदा दौड़ी और पूछा कि कृष्ण मक्खन के बिना कैसे रहते
है ? ब्रज की स्त्रियां हर्षित होकर दौड़ी जहां-तहां से ग्वालिने आतुर होकर आयी ।
माता रोहिणी हर्षित होकर आयी कि कृष्ण ओर बलराम को हृदय से लगा लूं ।
उन्होने नन्द को देखा, सब गोपो को देखा, लेकिन कृष्ण और बलराम को वहाँ नही
देखा । मिलने के लिये ब्रज की नारियां आतुर है, (किन्तु) सूरदास कहते है कि
कृष्ण तो मधुपुरी मे ही रुक गये ॥३६॥
उलटि पग कैसेँ दीन्हौ नंद ।
छाँड़े कहाँ उभै सुत मोहन, धिक जीवन मतिमंद ।
कै तुम धन-जोबन-मद माते, कै तुम छूटे वद ।
सुफलक-सुत वैरी भयौ हमकौँ, लै गयौ आनंदकंद ।
राम कृष्ण बिन कैसेँ जीजै, कठिन प्रीति कै फद ।
सूरदास मैं भई अभागिन, तुम बिनु गोकुलकंद ॥४०॥
अर्थ— (यशोदा कहती हैं) हे नंद ! तुमने उलट कर पग कैसे रखा (अर्थात् तुम
प्रत्यावर्तित कैसे हुए) ? दोनो मनमोहन-पुत्रो को कहां छोड़ दिया ? मन्द बुद्धि वाले !
तुम्हारा जीवन धिक्कार है ! क्या तुम धन-योवन के मद से मत्त हो अथवा क्या तुम
बन्दीगृह से छूटे हो । अक्रूर हमारे वैरी हो गये, जो आनन्दकंद कृष्ण को ले गये ।
बलराम और कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहे, प्रीति का फंडा बहुत मजबूत है । सूर-
दास कहते हैं कि गोकुलचंद तुम्हारे बिना मैं अभागिन हो गयो हूँ ॥४०॥
दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे ।
काहैँ नद छाँड़ि तुम आए, प्रान-जिवन सब केरे ।
तिनकें जात बहुत दुख पायौ, रोर परो इहिँ खेरे ।
गोसुत गाइ फिरत हैं दहँ दिसि, वै न चरैं तृन घेरे ।
मथुरा गमन २२६
प्रीति न केरी राम दसरथ की, प्रान तजे बिनु हेरैँ ।
सूर नंद सौं कहति जसोदा, प्रबल पाप सब मेरैं ॥४१॥
अर्थ- मेरे दोनो लड़के गोकुल के नायक हैं। सबके प्राणो को जिलाने वाले
(उन बालकों को) नन्द तुम क्यो छोड़कर चले आये। उनके जाते समय बहुत दुख
हुआ, इस गांव में कोलाहल मच गया था। गोकुल मे गाय और बछडे दसो दिशाओ मे
घूम रहे है, वे घेर रखने पर भी तृण नही चरते। दशरथ तथा राम की प्रीति तुमने
नही की, जिन्होंने (राम को) न देखकर प्राण ही त्याग दिया था। सूरदास कहते हैं
कि नन्द से यशोदा कहती हैं कि यह सब मेरे प्रबल पाप का (परिणाम) है ॥४१॥
नंद कहौ हो कहाँ छाँड़े हरि ।
लै जु गए जैसेँ तुम ह्वाँतैं, ल्याए किन वैसहिँ आगैं धरि ।
पालि पोषि मैं किए सयाने, जिन मारे गज मल्ल कंस अरि ।
अब भए तात देवकी वसुद्यौ, बाँह पकरि ल्याये न न्याव करि ।
देखौ दूध दही घृत माखन, मैँ राखे सब वैसैं ही धरि ।
अब को खाइ नंदनंदन बिनु, गोकुल मनि मथुरा जु गए हरि ।
श्रीमुख देखन कौ ब्रजवासी, रहे ते घर आँगन मेरैं भरि ।
सूरदास प्रभु के जु संदेसे, कहे महर आँसू गदगद करि ॥४२॥
अर्थ--नन्द, कहो ! (तुमने) कृष्ण को कहां छोडा। जैसे तुम यहाँ से ले गये
थे वैसे ही आगे करके क्यो नही लाये । पाल-पोसकर (मैंने) उन्हे बड़ा किया, जिन्होने
हाथी, मल्ल, तथा शत्रु कंस को मारा। अब उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव
हो गये ! न्याय करके तुम हाथ पकड़कर (उन्हे) क्यो नही लाये। देखो मैंने दूध, दही,
घी तथा मक्खन सब वैसे ही रख छोड़ा है। अब कृष्ण के वियोग मे (उन्हे) कौन खाय
क्योंकि गोकुलमणि कृष्ण मथुरा चले गये। श्रीमुख को देखने के लिए ब्रज के निवासी
मेरे आंगन मे भरे हैं। सूरदास कहते हैं कि प्रभु (कृष्ण) के संदेश को नन्द ने आंसू
भरकर गद्गद स्वर मे कहा ॥४२॥
जसुदा कान्ह कान्ह कै बूझै।
फूटि न गईं तुम्हारी चारों, कैसेँ मारग सूझै ।
इक तौ जरी जात बिनु देखैं, अब तुम दीन्हौ फूँकि ।
यह छतिया मेरे कान्ह कुंवर बिनु, फटि न भई द्वै टूक ।
धिक तुम धिक ये चरन अहौ पति,अध वोलत उठि धाए।
सूर स्याम बिछुरन की हम पै, दैन बधाई आए ॥४३॥
अर्थ- यशोदा 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर पूछती हैं। तुम्हारी चारों आंखें (चर्मचक्षु
तथा ज्ञानचक्षु) फूट क्यो नही गईं, तुम्हे मार्ग कैसे दिखाई दिया। एक तो बिना देखे
जली जा रही हूँ, अब तुमने और भी संतप्त कर दिया। यह छाती मेरे कुंवर कृष्ण के
बिना फटकर दो टूक क्यों नही हो गयी। अहो पति ! तुम धिक् हो तथा तुम्हारे चरणों
२३० सूरसागर सार सटीक
को धिक्कार है, जो आधा कहते ही उठकर दौड़ पड़े। (जल्दी वापस चल पड़े) । सूरदास
कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि कृष्ण के बिछुड़ने पर हमे बधाई देने चले आये ॥४३॥
नंद हरि तुमसौँ कहा कह्यौ ।
सुनि सुनि निठुर बचन मोहन के, कैसैँ हृदय रह्यौ ।
छाँड़ि सनेह चले मंदिर कत, दौरि न चरन गह्यौ ।
दरकि न गई बज्र की छाती, कत यह सूल सह्यौ ।
सुरति करत मोहन की वातैँ, नैननि नीर वह्यौ ।
सुधि न रही अति गलित गात भयौ, मन उसि गयौ अह्यौ ।
उन्हैँ छाँड़ि गोकुल कत आए, चाखन दूध दह्यौ ।
तजे न प्रान सूर दसरथ लौँ, हुतौ जन्म निवह्मो ॥४४॥
अर्थ— हे नन्द ! कृष्ण ने तुमसे क्या कहा। मोहन के निष्ठुर वचन सुनकर
(तुम्हारा) हृदय कैसे (सुरक्षित) रहा। स्नेह छोड़कर घर की ओर कैसे चल पड़े,
दौड़ कर (कृष्ण के) चरण क्यो नही पकड़े। तुम्हारी वज्र जैसी छाती दरक (फट)
नही गयी, इस शूल को कैसे सहन किया। मोहन की बाते स्मरण करने से (यशोदा)
के नेत्रो से आँसू बहने लगे । उन्हे कुछ स्मरण न रहा, शरीर अत्यधिक गलित (क्षीण)
हो गया, मानो साँप उस गया हो । (यशोदा कहती है) उन्हें छोड़कर गोकुल मे दूध,
दही चखने क्यो चले आये । दशरथ की तरह प्राण क्यों नही छोड़ दिये। अगर ऐसा
किया होता तो (तुम्हारे) जीवन का निर्वाह हो गया होता ॥४४॥
कहाँ रह्यौ मेरौ मनमोहन ।
वह मूरति जिय तैँ नहिं बिसरति, अंग अंग सब सोहन ।
कान्ह बिना गौवैँ सब ब्याकुल, को ल्यावै भरि दोहन ।
माखन खात खवावत ग्वालनि, सखा लिए सब गोहन ।
जब वै लीला सुरति करति हौँ, चित चाहत उठि जोहन ।
सूरदास-प्रभु के बिछुरे तैँ, मरियत है अति छोहन ॥४५॥
अर्थ-मेरा मनमोहन कहाँ रह गया। वह मूर्ति प्राण से विस्मृत नही होती,
उसके अंग-अंग सुशोभित थे । कृष्ण के बिना सभी गाये व्याकुल है, दोहनी भरकर
कौन ले आये । सब सखाओं को साथ लेकर मक्खन खाते और खिलाते थे। जब उन
लीलाओ को याद करती हूँ तो चित्त कहता है कि उठकर देखूं । सूरदास कहते हैं कि
यशोदा कहती हैं कि मैं तो कृष्ण के वियोग के उत्पन्न होने से उनके अत्यधिक स्नेह से
मरी जा रही हूँ ॥४५॥
गोपी बचन तथा ब्रजदशा
ग्वारनि कही ऐसी जाइ ।
भए हरि मधुपुरी राजा, बड़े बंस कहाइ ।
२३४ सूरसागर सार सटीक
कोमल चरन-कमल कंटक कुस, हम उन पै बन गाइ चराई।
रंचक दधि कै काज जसोदा, बाँधे कान्ह उलूषन लाई।
इंद्र-प्रकोप जानि ब्रज राखे, बरुन फाँस तैं मोहिं मुकराई।
अपने तन-धन-लोभ कंस-डर, आगेँ कै दीन्हे दोउ भाई।
निकट बसत कबहूँ न मिलि आये, इते मान मेरी निठुराई।
सूर अजहूँ नाती मानत हैं, प्रेम सहित करैं नंद-दुहाई ॥५४॥
अर्थ—कृष्ण की सेवा मे चूक हो गयी। इस अपराध का कहाँ तक वर्णन करूँ;
ऐसा कह कहकर महर नंद पछताते हैं। कोमल चरण-कमल (वाले कृष्ण) से हमने
कुश, कंटक से युक्त वन मे गाय चरवाया। तनिक से दही के कारण यशोदा ने उन्हे
ओखली से लाकर बांधा। इन्द्र के प्रकोप को जानकर (कृष्ण ने) ब्रज की रक्षा की,
वरुण के फन्दे से मुक्त किया। अपने तन-धन के लोभ से तथा कंस के डर से दोनो
भाइयों को (कंस के) आगे कर दिया। निकट ही तो थे, (किन्तु) इतनी बड़ी निष्ठुरता
हममे थी कि कभी मिल नही आया। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) अभी भी नाता
मानते है, प्रेम सहित नन्द की दुहाई देते (रहते) है ॥५४॥
लै आवहु गोकुल गोपालहिँ ।
पाईंनि परि क्यों हूँ बिनती करि, छल बल बाहु विसालहिँ ।
अब की बार नैँकु दिखरावहु, नंद आपने लालहिँ ।
गाइनि गनत ग्वार गोसुत सँग, सिखवत बैन रसालहिँ ।
जद्यपि महाराज सुख संपति, कौन गनै मनि लालहिँ ।
तदपि सूर वै छिन न तजत हैं, वा घुँघची की मालहिँ ॥५५॥
अर्थ—कृष्ण को गोकुल ले जाओ। पांव पड़कर, विनती करके, छल से (या)
बल-पूर्वक किसी प्रकार विशाल भुजाओं (वाले) (कृष्ण को) (ले जाओ)। अब की बार
हे नन्द ! तनिक अपने लाल को दिखा दो। ग्वाल-बछड़ों के साथ गाय की गिनती
करते थे तथा रस-युक्त वाणी (सबको) सिखाते थे। यद्यपि वे सुख सम्पत्ति के महाराज
है, (उनके यहाँ) मणि और लालों की गिनती कौन करे; फिर भी वे (कृष्ण) घुंघची
की माला कभी नही त्यागते ॥५५॥
हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं ।
दासी ह्वै बसुदेव राइ की, दरसन देखत रैहौं ।
राखि राखि एते दिवसनि मोहिँ, कहा कियो तुम नीकी ।
सोऊ तौ अक्रूर गए लै, तनक खिलौना जी कौ ।
मोहिँ देखि कै लोग हसैँगे, अरु किन कान्ह हँसै ।
सूर असीस जाई दैहौं, जनि न्हातहु बार खसै ॥५६॥
अर्थ— सखी ! मैं तो मथुरा ही जाऊँगी। वसुदेव राजा की दासी होकर (कृष्ण)
को देखती रहूँगी। इतने दिनो मुझे रख-रखकर मेरी कौन सी भलाई तुमने की। उन्हे
मधुरा गमनं २३५
तो अक्रूर लेकर गये, जो तनिक प्राणों के लिए खिलोने (बहलाने वाले) थे । मुझे
देखकर लोग हंसी करेंगे और कृष्ण (ही) क्यो न हंसें। सूरदास कहते है (गोपी कहती
है) कि जाकर कृष्ण को आशीर्वाद दूंगी कि नहाते समय भी उनका (कोई) बाल
बांका न हो ॥५६॥
पंथी इतनी कहियौ बात ।
तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात ।
बकी अघासुर टरत न टारे, बालक बनहिँ न जात ।
ब्रज पिंजरी रुधि मानी राखे, निकसन कौँ अकुलात ।
गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात ।
परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिँ अवलंबै तात ।
कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत ।
यह व्यवहार आजु लौँ है ब्रज, कपट नाट छल ठानत ।
दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट ।
आखिनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट ।
ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकही पेट ।
सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ॥५७॥
अर्थ-पथिक ! जाकर इतनी (बात) कहना कि हे श्रेष्ठ कुंवर ! तुम्हारे बिना
यहाँ बड़ा उत्पात होता है। बकासुर तथा अघासुर टाले नही टलते, (जिसके कारण)
बालक वन नही जाते। ब्रज रूपी पिंजडे मे मानो (वे) घेर कर रखे गये हैं तथा
निकलने के लिए अकुलाते है। गोपी-गाय सभी छोटे-बडे पीले वर्ण के (तथा) दुबले हो
गये है। तुम्हारे बिना सब परम अनाथ जान पड़ते हैं; हे तात ! (वे) किसका अवलंब
ग्रहण करे। तब तो कान्ह-कान्ह कहकर पुकारते थे, अब जी कैसे माने। यह व्यवहार
आज तक ब्रज में है, (शत्रु) कपट तथा छल का नाटक ठानते हैं। दशों दिशाओ से
दावाग्नि का समूह उदित होता है। सम्मुख होकर नाम रूपी कवच का ओट ग्रहण
करके, आंखे बन्द करके (सब) रह जाते है। एक ही पेट से ये सब दुष्ट उत्पन्न (हुए
थे) जिन्हे हरि ने नष्ट किया था। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) पुराने प्रेम
का स्मरण कर कृष्ण शीघ्र सहायता करो ॥५७॥
संदेसौ देवकी सौँ कहियौ ।
हौँ तौ धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ ।
जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन रोटी भावै ।
तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते ।
जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम क्रम करि कै न्हाते ।
२३६ सूरसागर सार सटीक
सूर पथिक सुनि मोहिँ रैनि दिन, बढ़यौ रहत उर सोच।
मेरौ अलक लड़ैतौ मांहन, ह्वैहै करत सँकोच ॥५८॥
अर्थ—देवकी से यह संदेश कहना। मैं तो तुम्हारे पुत्र की धाय ही हूँ, किन्तु
(तुम) प्रेम करते ही रहना। यद्यपि तुम उनकी जिद जानती हो तो भी मुझे कहना
ही पड़ रहा है कि प्रातः होते ही मेरे लाल को माखन-रोटी ही अच्छी लगती है।
तेल उबटन तथा गर्म जल देखकर भाग जाते थे। जो-जो माँगते थे वही-वही देती
थी, (तब कही) क्रम-क्रम (कठिनाई) से नहलाती थी। सूरदास कहते हैं (यशोदा
कहती हैं) कि पथिक, सुनो ! मेरे हृदय में दिन-रात (इस बात का) सोच बढ़ता
है कि मेरा दुलारा पुत्र सकोच करता होगा ॥५८॥
मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ, वैसेहिँ धर्यौ रहै।
को उठि प्रात होत लै माखन, को कर नेति गहै।
सूने भवन जसोदा सुत के, गुन गुनि सूल सहै।
दिन उठि घर घेरति ही ग्वारिनि, उरहन कोउ न कहै।
जो ब्रज मैंँ आनंद हुतौ, मुनि मनसा हू न गहै।
सूरदासी स्वामी बिनु गोकुल, कौड़ी हू न लहै ॥५६॥
अर्थ—मेरे कुँवर कृष्ण के बिना सब कुछ वैसे ही रखा रहता है। प्रातः उठकर
कौन माखन ले और हाथ में रई की रस्सी ग्रहण करे। पुत्र से शून्य घर में (पुत्र की)
याद करके यशोदा दुख सहती हैं। दिन में उठकर ग्वालिनियां घर घेरती थी, (किन्तु)
अब कोई शिकायत नहीं करता। ब्रज में जो आनन्द था उसे मुनि मन में भी नहीं
सोच पाते। सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि कृष्ण के बिना गोकुल कौड़ी के
बराबर आनन्द भी नहीं देता ॥५६॥
गोपी विरह
चलत गुपाल के सब चले।
यह प्रीतम सौँ प्रीति निरंतर, रहे न अर्ध पले।
धीरज पहिल करी चलिबँ की, जैसी करत भले।
धीर चलत मेरे नैननि देखे, तिहिँ छिनि आँसु हले।
आँसु चलत मेरी वलयनि देखे, भए अंग सिथिले।
मन चलि रह्यौ हुतौ पहिलैँ ही, चले सबै विमले।
एक न चलै प्रान सूरज प्रभु, अस लेहु साल सले ॥६०॥
अर्थ-कृष्ण के चलते समय सभी (अंग) चल पड़े। प्रीतम से निरंतर प्रीति के
कारण (कोई) आधे पल भी नहीं रुके । चलने के लिए धैर्य ने पहल की; जैसे भले आदमी
करते हैं नेत्रो ने धैर्य को जाते देखा तो उसी क्षण (नेत्रो से) आंसू बहने लगे । आँसुओ के
चलते ही मेरे बलयों (चूडियो) ने देखा, और (वे भी) अंग मे शिथिल हो गये (कलाइयो
के पतली पड़ जाने के कारण चूड़ियां भी हाथ से गिर गईं !)। मन तो पहले ही चल