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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

२१४ सूरसागर सार सटीक
नंद नंदन तौ ऐसे लागैं, ज्यौं जल पुरइनि पात ।
सूर स्याम सँग तैं बिछुरत हैं, कब ऐहैं कुसलात ॥८॥
अर्थ—सुना है कि कृष्ण मधुपुरी जा रहे हैं। संकोचवश किसी से हृदय की गुप्त
बात कहती नही है। आधी रात को कोई आने वाली (अनागत) शंकायुक्त बात कह
गया। (फलस्वरूप) नींद आती, तथा रात घटती ही नही, प्रातः उठकर कब (कृष्ण को)
देखूंगी। कृष्ण तो ऐसे उदासीन लग रहे हैं जेसे पुरइन (कमल) के पत्ते पर जल की
बूंद। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) साथ से विछुड रहे हैं, कब सकुशल लौट आयेगे ॥८॥
मथुरा प्रयाण
अब नंद गाइ लेहु संभारि ।
जो तुम्हारैं आनि बिलमे, दिन चराई चारि ।
दूध दही खवाइ कीन्हे, बड़े अति प्रतिपारि ।
ये तुम्हारे गुन हृदय तैं, डारिहौं न बिसारि ।
मातु जसुदा द्वार ठाढ़ी, चलै आँसू ढारि ।
कह्यौ रहियौ सुचित सौं, यह ज्ञान गुर उर धारि ।
कौन सुत, को पिता-माता, देखि हृदै विचारि ।
सूर के प्रभु गवन कीन्हौ, कपट कागद फारि ॥६॥
अर्थ—नन्द अब गाय सम्हाल लो। जो तुम्हारे यहां आकर ठहरे, चार दिन
गाय चरा दिया। आपने दूध, दही खिलाकर अत्यधिक प्रेम से पालन किया। तुम्हारे
ये गुण हृदय से विस्मृत नही करूँगा। माता यशोदा द्वार पर खडी है, आंखो से आंसू
ढुलक रहे हैं (कृष्ण ने) कहा यह महान् ज्ञान हृदय मे धारण करके स्वस्थ चित्त से
रहना। कौन पुत्र है, कौन माता-पिता है इसे हृदय मे विचार कर देखना। सूरदास
कहते है कि कपट के कागज को फाड़कर कृष्ण ने प्रस्थान किया ॥६॥
जबहीं रथ अक्रूर चढ़े।
तब रसना हरि नाम भाषि कै, लोचन नीर बढे ।
महरि पुत्र कहि सोर लगायौ, तरु ज्यौं धरनि लुटाइ ।
देखतिं नारि चित्र सी ठाढ़ीं, चितये कुंवर कन्हाइ ।
इतनैहि मैं सुख दियौ सबनि कौं, दीन्ही अवधि बताइ ।
तनक हँसे, हरि मन जुवतिन कौं, निठुर ठगौरी लाइ ।
बोलतिं नहीं रहीं सब ठाढ़ी, स्याम-ठगीं ब्रज नारी ।
सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारी ॥१०॥
अर्थ—जैसे ही अक्रूर रथ पर चढ़े, (उन्होंने) वाणी से कृष्ण का नामोच्चारण
किया और (उनकी) आंखो मे आंसू बढ गये। महरि (यशोदा) ने 'पुत्र-पुत्र' कहकर
शोर मचाया, (वह) वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ी। नारियां चित्रवत् खड़ी होकर