सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 216

मथुरा गमन २१५
देखती हैं, कृष्ण ने (भी उनकी ओर) देखा। इतने मे ही सब को सुख प्रदान किया
और (लौटने की) अवधि बात दी। कृष्ण युवतियों के मन पर निष्ठुर जादू डालकर
थोड़ा हँसे। कृष्ण से ठगी हुई स्त्रियां बोलती नही, सभी खड़ी रह गयी। सूरदास
कहते हैं कि पृथ्वी के हितकारी (कृष्ण) ने मधुपुर की ओर कदम बढ़ाये ॥१०॥
रहीँ जहाँ सो तहाँ सब ठाढ़ीं ।
हरि के चलत देखियत ऐसी, मनहु चित्र लिखि काढ़ी ।
सूखे बदन, स्रवति नैननि तैँ, जल-धारा उर बाढ़ी ।
कंधनि बाँह धरे चितवतिं मनु, द्रुमनि बेलि दव दाढ़ी ।
नीरस करि छाँड़ी सुफलक सुत, जैसे दूध बिनु साड़ी ।
सूरदास अक्रूर कृपा तैँ, सहीँ बिपति तन गाढ़ी ॥११॥
अर्थ—जो जहाँ थी वे वही खड़ी रह गयी। कृष्ण के चलते समय ऐसी जान
पड़ती है मानो (वे) चित्र की तस्वीरे हो। सूखे मुख, नेत्रो के स्रवित होने से हृदय पर
जल की धारा बढ़ गयी। कन्धे पर बांह रखे हुए (वे) ऐसी जान पड़ती है मानों
दावाग्नि से दग्ध वृक्षो पर लता हो। सुफलक के सुत ने उन्हे रसहीन करके छोड़
दिया जैसे मलाई-रहित दूध हो । सूरदास कहते है कि अक्रूर की कृपा से उन्होने गहन
दुख सहन किया ॥११॥
बिछुरत श्री ब्रजराज आजु, इनि नैननि की परतीति गई ।
उड़ि न गए हरि संग तबहिँ तैँ, ह्वै न गए सखि स्याममई ।
रूप रसिक लालची कहावत, सो करनी कछुवै न भई ।
साँचे क्रूर कुटिल ये लोचन, वृथा मीन-छवि छीन लई ।
अब काहैँ जल-मोचत, सोचत, समौ गए तैँ सूल नई ।
सूरदास याही तैँ जड़ भए, पलकनिहूँ हठि दगा दई ॥१२॥
अर्थ—कृष्ण से बिछुड़ते ही इन नेत्रो का विश्वास नही रह गया। तब ये कृष्ण
के साथ उड़ नही गये ओर न श्याममय ही हो गये। ये रूप रस से लालची कहे जाते
थे, किन्तु उस (प्रकार की) करणी कुछ नही दिखाई पड़ी। सचमुच ये नेत्र क्रूर और
कुटिल हैं, व्यर्थ ही (इन नेत्रो ने) मछली की शोभा छीन ली है। अब (ये नेत्र) क्यो
जल छोड़ते हैं तथा चिन्तित होते हैं। (संयोग का) समय बीत जाने के कारण (इन्हे)
नई पीड़ा (हो रही है)। सूरदास कहते हैं कि इसी से ये जड़ हो गये हैं, पलको ने भी
हठ करके धोखा दे दिया (गिरना बन्द कर दिया) ॥१२॥
आजु रैनि नहिँ नीँद परी ।
जागत गिनत गगन के तारे, रसना रटत गोबिंद हरी ।
वह चितवनि, वह रथ की बैठनि, जब अक्रूर की बाँह गही ।
चितवति रही ठगी सी ठाढ़ी, कहि न सकति कछु काम दही ।