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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मधुरा गमन २२३
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ध्वनि सुनाई । सूरदास कहते हैं कृष्ण की अगम महिमा के विषय में कुछ नही कहा
जा सकता । देवताओं की स्थिति असुर पा गया ॥२७॥
उग्रसेन कौँ दियौ हरि राज ।
आनंद मगन सकल पुरबासी, चँवर डुलावत श्री ब्रजराज ।
जहाँ तहाँ तैँ जादव आए, कंस डरनि जे गए पराइ ।
मागध सूत करत सब अस्तुति, जै जै जै श्री जादवराइ ।
जुग-जुग विरद यहै चलि आयौ, भए वलि के द्वारैँ प्रतिहार ।
सूरदास प्रभु अज अविनासी, भक्तन हेत लेत अवतार ॥२८॥
अर्थ - कृष्ण ने उग्रसेन को राज्य दे दिया । समस्त पुरवासी आनन्द से मग्न
होकर कृष्ण के चामर डुलाते हैं। जो यादव कंस के डर से इधर-उधर भाग गये थे वे
आ गये। मागध, बन्दी सभी स्तुति करते हैं कि श्री यादवराय की जय हो, जय हो ।
युग-युग से यही यश चला आया कि कृष्ण बलि के द्वार पर प्रतिहारी बने थे । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण अजन्मा अविनासी हैं तथा भक्तो के लिए अवतार लेते है ॥२८॥
तब बसुदेव हरषित गात ।
स्याम रामहिँ कंठ लाए, हरषि देवै मात ।
अमर दिवि दुंदुभी दीन्हीँ, भयौ जै जैकार ।
दुष्ट दलि सुख दियौ संतनि, ये वसुदेव कुमार ।
दुख गयौ बहि हर्ष पूरन, नगर के नर-नारि ।
भयौ पूरब फल संपूरन, लह्यौ सुत दैत्यारि ।
तुरति बिप्रनि बोलि पठये, धेनु कोटि मँगाइ ।
सूर के प्रभु ब्रह्मपूरन, पाइ हरषै राइ ॥२९॥
अर्थ-तब वसुदेव ने हर्षित शरीर से कृष्ण और बलराम को गले से लगा
लिया । देवकी माता हर्षित हो गयी । देवताओ ने आकाश मे जय-जयकार करके
दुंदुभी बजायी । दुष्टों का नाश करके इन वसुदेव पुत्र (कृष्ण) ने सन्तो को सुख दिया ।
दुख बह गया, नगर के नर-नारी हर्ष से पूर्ण हो गये । (वसुदेव) के पूर्व जन्म का पुण्य
फलित हुआ, दैत्यो के शत्रु कृष्ण को प्राप्त किया । हजारों गाय मंगाकर ब्राह्मणो को
(देने के लिए) बुला भेजा । सूरदास कहते है कि पूर्ण ब्रह्म कृष्ण को पाकर (वसुदेव
आदि) हर्षित हो गये ॥२६॥
बसुद्यौ कुल-व्यौहार विचारि ।
हरि हलधर कौँ दियौ जनेऊ, करि षटरस ज्यौनारि ।
जाके स्वास-उसाँस लेत मैं, प्रगट भये श्रुति चार ।
तिन गायत्री सुनो गर्ग सौँ, प्रभु गति अगम अपार ।
विधि सौँ धेनु दई बहु विप्रनि, सहित सर्वडलंकार ।
जदकुल भयौ परम कौतूहल, जहँ तहँ गावतिं नार ।