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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

२३४ सूरसागर सार सटीक
कोमल चरन-कमल कंटक कुस, हम उन पै बन गाइ चराई।
रंचक दधि कै काज जसोदा, बाँधे कान्ह उलूषन लाई।
इंद्र-प्रकोप जानि ब्रज राखे, बरुन फाँस तैं मोहिं मुकराई।
अपने तन-धन-लोभ कंस-डर, आगेँ कै दीन्हे दोउ भाई।
निकट बसत कबहूँ न मिलि आये, इते मान मेरी निठुराई।
सूर अजहूँ नाती मानत हैं, प्रेम सहित करैं नंद-दुहाई ॥५४॥
अर्थ—कृष्ण की सेवा मे चूक हो गयी। इस अपराध का कहाँ तक वर्णन करूँ;
ऐसा कह कहकर महर नंद पछताते हैं। कोमल चरण-कमल (वाले कृष्ण) से हमने
कुश, कंटक से युक्त वन मे गाय चरवाया। तनिक से दही के कारण यशोदा ने उन्हे
ओखली से लाकर बांधा। इन्द्र के प्रकोप को जानकर (कृष्ण ने) ब्रज की रक्षा की,
वरुण के फन्दे से मुक्त किया। अपने तन-धन के लोभ से तथा कंस के डर से दोनो
भाइयों को (कंस के) आगे कर दिया। निकट ही तो थे, (किन्तु) इतनी बड़ी निष्ठुरता
हममे थी कि कभी मिल नही आया। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण) अभी भी नाता
मानते है, प्रेम सहित नन्द की दुहाई देते (रहते) है ॥५४॥
लै आवहु गोकुल गोपालहिँ ।
पाईंनि परि क्यों हूँ बिनती करि, छल बल बाहु विसालहिँ ।
अब की बार नैँकु दिखरावहु, नंद आपने लालहिँ ।
गाइनि गनत ग्वार गोसुत सँग, सिखवत बैन रसालहिँ ।
जद्यपि महाराज सुख संपति, कौन गनै मनि लालहिँ ।
तदपि सूर वै छिन न तजत हैं, वा घुँघची की मालहिँ ॥५५॥
अर्थ—कृष्ण को गोकुल ले जाओ। पांव पड़कर, विनती करके, छल से (या)
बल-पूर्वक किसी प्रकार विशाल भुजाओं (वाले) (कृष्ण को) (ले जाओ)। अब की बार
हे नन्द ! तनिक अपने लाल को दिखा दो। ग्वाल-बछड़ों के साथ गाय की गिनती
करते थे तथा रस-युक्त वाणी (सबको) सिखाते थे। यद्यपि वे सुख सम्पत्ति के महाराज
है, (उनके यहाँ) मणि और लालों की गिनती कौन करे; फिर भी वे (कृष्ण) घुंघची
की माला कभी नही त्यागते ॥५५॥
हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं ।
दासी ह्वै बसुदेव राइ की, दरसन देखत रैहौं ।
राखि राखि एते दिवसनि मोहिँ, कहा कियो तुम नीकी ।
सोऊ तौ अक्रूर गए लै, तनक खिलौना जी कौ ।
मोहिँ देखि कै लोग हसैँगे, अरु किन कान्ह हँसै ।
सूर असीस जाई दैहौं, जनि न्हातहु बार खसै ॥५६॥
अर्थ— सखी ! मैं तो मथुरा ही जाऊँगी। वसुदेव राजा की दासी होकर (कृष्ण)
को देखती रहूँगी। इतने दिनो मुझे रख-रखकर मेरी कौन सी भलाई तुमने की। उन्हे