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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मथुरा गमन २२६
प्रीति न केरी राम दसरथ की, प्रान तजे बिनु हेरैँ ।
सूर नंद सौं कहति जसोदा, प्रबल पाप सब मेरैं ॥४१॥
अर्थ- मेरे दोनो लड़के गोकुल के नायक हैं। सबके प्राणो को जिलाने वाले
(उन बालकों को) नन्द तुम क्यो छोड़कर चले आये। उनके जाते समय बहुत दुख
हुआ, इस गांव में कोलाहल मच गया था। गोकुल मे गाय और बछडे दसो दिशाओ मे
घूम रहे है, वे घेर रखने पर भी तृण नही चरते। दशरथ तथा राम की प्रीति तुमने
नही की, जिन्होंने (राम को) न देखकर प्राण ही त्याग दिया था। सूरदास कहते हैं
कि नन्द से यशोदा कहती हैं कि यह सब मेरे प्रबल पाप का (परिणाम) है ॥४१॥
नंद कहौ हो कहाँ छाँड़े हरि ।
लै जु गए जैसेँ तुम ह्वाँतैं, ल्याए किन वैसहिँ आगैं धरि ।
पालि पोषि मैं किए सयाने, जिन मारे गज मल्ल कंस अरि ।
अब भए तात देवकी वसुद्यौ, बाँह पकरि ल्याये न न्याव करि ।
देखौ दूध दही घृत माखन, मैँ राखे सब वैसैं ही धरि ।
अब को खाइ नंदनंदन बिनु, गोकुल मनि मथुरा जु गए हरि ।
श्रीमुख देखन कौ ब्रजवासी, रहे ते घर आँगन मेरैं भरि ।
सूरदास प्रभु के जु संदेसे, कहे महर आँसू गदगद करि ॥४२॥
अर्थ--नन्द, कहो ! (तुमने) कृष्ण को कहां छोडा। जैसे तुम यहाँ से ले गये
थे वैसे ही आगे करके क्यो नही लाये । पाल-पोसकर (मैंने) उन्हे बड़ा किया, जिन्होने
हाथी, मल्ल, तथा शत्रु कंस को मारा। अब उनके माता-पिता देवकी और वसुदेव
हो गये ! न्याय करके तुम हाथ पकड़कर (उन्हे) क्यो नही लाये। देखो मैंने दूध, दही,
घी तथा मक्खन सब वैसे ही रख छोड़ा है। अब कृष्ण के वियोग मे (उन्हे) कौन खाय
क्योंकि गोकुलमणि कृष्ण मथुरा चले गये। श्रीमुख को देखने के लिए ब्रज के निवासी
मेरे आंगन मे भरे हैं। सूरदास कहते हैं कि प्रभु (कृष्ण) के संदेश को नन्द ने आंसू
भरकर गद्गद स्वर मे कहा ॥४२॥
जसुदा कान्ह कान्ह कै बूझै।
फूटि न गईं तुम्हारी चारों, कैसेँ मारग सूझै ।
इक तौ जरी जात बिनु देखैं, अब तुम दीन्हौ फूँकि ।
यह छतिया मेरे कान्ह कुंवर बिनु, फटि न भई द्वै टूक ।
धिक तुम धिक ये चरन अहौ पति,अध वोलत उठि धाए।
सूर स्याम बिछुरन की हम पै, दैन बधाई आए ॥४३॥
अर्थ- यशोदा 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर पूछती हैं। तुम्हारी चारों आंखें (चर्मचक्षु
तथा ज्ञानचक्षु) फूट क्यो नही गईं, तुम्हे मार्ग कैसे दिखाई दिया। एक तो बिना देखे
जली जा रही हूँ, अब तुमने और भी संतप्त कर दिया। यह छाती मेरे कुंवर कृष्ण के
बिना फटकर दो टूक क्यों नही हो गयी। अहो पति ! तुम धिक् हो तथा तुम्हारे चरणों