सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२८ सूरसागर सार सटीक
बार-बार मग जोवति माता । व्याकुल विनु मोहन वल-भ्राता ॥
आवत देखि गोप नँद साथा । विवि बालक विनु भई अनाथा ॥
धाई धेनु बच्छ ज्यों ऐसेँ । माखन बिना रहे धौं कैसें ॥
ब्रज-नारी हरषित सब धाईँ । महरि जहाँ-तहँ आतुर आईँ ॥
हरषित मातु रोहिनी आई । उर भरि हलधर लेउँ कन्हाई ॥
देखे नन्द गोप सब देखे । वल मोहन कौँ तहाँ न पेखे ॥
आतुर मिलन-काज ब्रज नारी । सूर मधुपुरी रहे मुरारी ॥३६॥
अर्थ—बार-बार माता रास्ता निहारती है और मोहन तथा उनके भाई
बलराम के विना व्याकुल होती है। गोपों को नन्द के साथ आते देखकर तथा (उनके
साथ) दोनो बालकों को न (देख) अनाथ (असहाय) हो गयी । गाय जैसे बछडे को
देखकर दोडती है, वैसे ही यशोदा दौड़ी और पूछा कि कृष्ण मक्खन के बिना कैसे रहते
है ? ब्रज की स्त्रियां हर्षित होकर दौड़ी जहां-तहां से ग्वालिने आतुर होकर आयी ।
माता रोहिणी हर्षित होकर आयी कि कृष्ण ओर बलराम को हृदय से लगा लूं ।
उन्होने नन्द को देखा, सब गोपो को देखा, लेकिन कृष्ण और बलराम को वहाँ नही
देखा । मिलने के लिये ब्रज की नारियां आतुर है, (किन्तु) सूरदास कहते है कि
कृष्ण तो मधुपुरी मे ही रुक गये ॥३६॥
उलटि पग कैसेँ दीन्हौ नंद ।
छाँड़े कहाँ उभै सुत मोहन, धिक जीवन मतिमंद ।
कै तुम धन-जोबन-मद माते, कै तुम छूटे वद ।
सुफलक-सुत वैरी भयौ हमकौँ, लै गयौ आनंदकंद ।
राम कृष्ण बिन कैसेँ जीजै, कठिन प्रीति कै फद ।
सूरदास मैं भई अभागिन, तुम बिनु गोकुलकंद ॥४०॥
अर्थ— (यशोदा कहती हैं) हे नंद ! तुमने उलट कर पग कैसे रखा (अर्थात् तुम
प्रत्यावर्तित कैसे हुए) ? दोनो मनमोहन-पुत्रो को कहां छोड़ दिया ? मन्द बुद्धि वाले !
तुम्हारा जीवन धिक्कार है ! क्या तुम धन-योवन के मद से मत्त हो अथवा क्या तुम
बन्दीगृह से छूटे हो । अक्रूर हमारे वैरी हो गये, जो आनन्दकंद कृष्ण को ले गये ।
बलराम और कृष्ण के बिना कैसे जीवित रहे, प्रीति का फंडा बहुत मजबूत है । सूर-
दास कहते हैं कि गोकुलचंद तुम्हारे बिना मैं अभागिन हो गयो हूँ ॥४०॥
दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे ।
काहैँ नद छाँड़ि तुम आए, प्रान-जिवन सब केरे ।
तिनकें जात बहुत दुख पायौ, रोर परो इहिँ खेरे ।
गोसुत गाइ फिरत हैं दहँ दिसि, वै न चरैं तृन घेरे ।