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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

१३२ सूरसागर सार सटीक
जिनमें आपका रूप नहीं । सूरदास कहते है कि कृष्ण तुम्हारे बिना घर वैसे ही है जैसे
वन के भीतर कुँआ (निरर्थक) हो ॥१३२॥
रीती मटुकी सीस धरैं ।
वन की घर की सुरति न काहूँ, लेहु दही या कहति फिरैं ।
कवहूँक जाति कुंज भीतर कीँ, तहाँ स्याम की सुरति करैं ।
चौँकि परतिं, कछु तन सुधि आवति, जहाँ तहां मुख सुनति ररैं ।
तब यह कहतिं कहीं मैं इनसौँ, भ्रमि भ्रमि वन में वृथा मरैं ।
सूर स्याम कैं रस पुनि छाकतिं, वैसे हीं ढँग बहुरि ढरैं ॥१३३॥
अर्थ - (गोपियां) खाली मटुकी सिर पर घर लेती है । वन की ओर घर की
(उन्हे) याद नही, लो दही यह कहती फिरती हैं । कभी कुंज के भीतर जाती हैं
और वहाँ कृष्ण की याद करती हैं । कुछ शरीर की याद आने पर चौंक पड़ती हैं ओर
जहाँ तहां सखियो को सुनाते हुए वार-वार कहती हैं । तब यह कहती हैं कि मुझे
इनसे क्या करना है जो वन घूम-घूमकर व्यर्थ मरती हूँ । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के
रस से पुनः मस्त हो जाती हैं वैसा ही ढङ्ग फिर धर लेती हैं ॥१३३॥
तरुनी स्याम-रस मतवारि ।
प्रथम जोवन-रस चढ़ायौ, अतिहि भई खुमारि ।
दूध नहिं दधि नहीँ, माखन नहीं रीती माट ।
महा-रस अँग-अंग पूरन, कहाँ घर, कहँ वाट ।
मातु-पितु गुरुजन कहाँ के, कौन पति को नारि ।
सूर प्रभु कैं प्रेम पूरन, छकि रहीं ब्रजनारि ॥१३४॥
अर्थ - तरुणिंयां कृष्ण के रस मे मतवाली हो गई हैं । प्रथम यौवन के रस के
चढ़ जाने से वे अत्यधिक शिथिल हो गयी । दूध नही, दही नही, मक्खन नही, मटुकी
खाली है। अंग-अंग मे महारस भर गया है । कहां घर और कहां रास्ता, कहाँ के
माता-पिता, कौन पति और कौन स्त्री (उन्हे कुछ भी ज्ञात नही) । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण के प्रेम-रस से पूर्ण ब्रज नारियां मस्त हो गयी हैं ॥१३४॥
कोउ माई लैहै री गोपालहिं ।
दधि की नाम स्यामसुंदर-रस, विसरि गयौ ब्रज-वालहिँ ।
मटुकी सीस, फिरति ब्रज-वीथिनि, बोलति बचन रसालहिँ ।
उफनत तक्र चहूँ दिसि चितवत, चित लाग्यौ नँद-लालहिँ ।
हँसति, रिसाति, बुलावति, वरजति, देखहु इनकी चालहिँ ।
सूर स्याम बिनु और न भावै, या विरहिनि बेहालहिँ ॥१३५॥
अर्थ- सखी, कोई गोपाल को लेगा । श्यामसुन्दर के रस मे ब्रज की युवती
को दही का नाम ही भूल गया । मटुकी को सिर पर (धर के) ब्रज की गलियो मे रस
से भरी बाते कहती है । मट्ठा के उफनते समय चारों दिशाओ मे देखती है उसका मन

नन्दलाल में (ही) लगा है। (वह) हंसती है, नाराज होती है, बुलाती है और रोकती
हुई कहती है कि इनकी चाल देखो। सूरदास कहते हैं कि इस व्याकुल विरहिणी को
कृष्ण के बिना कुछ अच्छा नही लगता ॥१३५॥
गोपिका अनुराग
लोक-सकुच कुल-कानि तजो।
जैसेँ नदी सिंधु कौं धावै, वैसेहिं स्याम भजी।
मातु-पिता बहु त्रास दिखायौ, नैकुँ न डरी, लजी।
हारि मानि बैठे, नहिँ लागति, बहुतै बुद्धि संजी।
मानत नहीं लोक मरजादा, हरि कैँ रङ्ग मजी।
सूर स्याम कौं मिलि, चूनौ हरदी ज्यौँ रँजी ॥१३६॥
अर्थ-लोक के संकोच और कुल की मर्यादा को छोड़ दिया। जैसे नदी समुद्र
की ओर उमडती है वैसे ही (गोपियो ने) कृष्ण को भजा। माता-पिता ने बहुत डराया
(लेकिन वे) तनिक भी न डरी और न लजायी। (सब) हार मानकर बैठ गये, बहुत
बुद्धि लगायी। (लेकिन बुद्धि) लगती नही। (गोपियां) लोक की मर्यादा नही मानती
(वे) कृष्ण के रंग में रंग गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से मिलकर चूना और
हल्दी की तरह रंग रंगित हो गयी ॥१३६॥
कहा कहति तू मोहिँ, री माई।
नँद-नंदन मन हरि लियौ मेरौ, तब तैं मोकौँ कछु न सुहाई।
अब लौं नहिँ जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरैँ ढिग आई।
कहाँ गेह, कहँ मातु-पिता हैं, कहाँ सजन, गुरुजन कहूँ भाई।
कैसी लाज, कानि है कैसी, कहा कहति ह्वै ह्वै रिसहाई?
अब तौ सूर भजी नँद-लालहिँ, की लघुता की होइ बड़ाई ॥१३७॥
अर्थ - हे सखी, तुम मुझे क्या कहती हो ? कृष्ण ने (जब से) मेरा मन हर
लिया तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता। अब तक मैं नही जान पाई कि मैं कौन
थी, तू कब से मेरे पास आयी। कहां घर, कहां माता-पिता है, पति कहां और गुरुजन
तथा भाई कहां हैं। (मुझे कुछ भी नही मालूम) कैसी लज्जा, मर्यादा कैसी है, तुम लोग
नाराज होकर क्या कह रहे हो ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती हैं) अब तो
कृष्ण को भजा है चाहे छोटाई हो चाहे बड़ाई ॥१३७॥
मेरे कहे मैं कोउ नाहिं।
कहा कहौं, कछु कहि न आवै, नैकहुँ न डराहिँ।
नैन ये हरि-दरस-लोभी, श्रवन सब्द-रसाल।
प्रथमहीँ बन गयौ तन तजि, तब भई बेहाल।
इन्द्रियनि पर भूप मन है, सबनि लियौ बुलाइ।
सूर प्रभु कौँ मिले सब ये, मोहिँ करि गए बाइ ॥१३८॥

१३४ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—(गोपी कहती है) मेरे बहने मे कोई नही है । क्या कहूँ, कुछ कहा नही
जाता, ये (इन्द्रियाँ) तनिक भी नही डरती । ये आंखे कृष्ण के दर्शन की लालची हैं,
कान रसयुक्त शब्दो के (लालची हैं) । मन पहले ही शरीर को छोड़कर चला गया तब
मैं बेहाल हो गयी । इन्द्रियो का राजा मन है (उसने) सब को बुला लिया । सूरदास
कहते है कि (गोपी कहती है) ये सब जाकर कृष्ण से मिल गये । मेरे लिये बला कर
गये ॥१३८॥
अब तौ प्रगट भई जग जानी।
वा मोहन सौं प्रीति निरन्तर, क्योंऽब रहैगी छानी ।
कहा करौं सुन्दर मूरति, इन नैननि माँझ समानी ।
निकसति नहीं बहुत पचि हारी, रोम-रोम अरुझानी ।
अब कैसे निरवारि जाति है, मिली दूध ज्यों पानी ।
सूरदास प्रभु अन्तरजामी, उर अन्तर की जानी ॥१३६॥
अर्थ—अब तो (प्रेम) प्रकट हो गया और ससार जान गया । उस कृष्ण से
निरन्तर प्रेम अब क्योकर छिपा रहेगा ? क्या करूं सुन्दर मूर्ति इन आंखो के बीच
समा गयी है। बहुत (प्रयास) करके हार गयी (यह) निकलती नही (बल्कि) रोम-रोम
मे उलझ गयी है। दूध और पानी के समान एक मे मिल जाने पर अलग कैसे किया
जाय ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तरयामी है इसलिए हृदय के अन्दर की बात
जान गये ॥१३६॥
सखि मोहिं हरिदरस रस प्याइ ।
हौं रँगी अब स्याम-मूरति, लाख लोग रिसाइ ।
स्याम सुन्दर मदन मोहन, रंग रूप सुभाइ ।
सूर स्वामी-प्रीति-कारन, सीस रही कि जाइ ॥१४०॥
अर्थ-सखी मुझे कृष्ण के दर्शन रूपी रस को पिलाओ । मैं श्याम के रंग मे रग
गयी हूँ (चाहे) लाखो लोग नाराज हो जायें। श्यामसुन्दर का स्वाभाविक रूप और
रग कामदेव को भी मोहित करने वाला है। सूरदास कहते हैं कि गोपी कह रही है कि
स्वामी के प्रेम के कारण अब चाहे मेरा सिर रहे या (चला) जाय ॥१४०॥
नन्दलाल सौं मेरौ मन मान्यौ, कहा करैगौ कोउ ।
मैं तौ चरन-कमल लपटानी, जो भावै सो होउ ।
बाप रिसाइ, माइ घर मारै, हँसैं विराने लोग ।
अब तौ स्यामहिं सौं रति बाढ़ी, विधना रच्यौ सँजोग ।
जाति महति पति जाइ न मेरी, अरु परलोक नसाइ ।
गिरिधर वर मैं नैंकु न छाँड़ौं, मिली निसान बजाइ ।
बहुरि कवहिं यह तन धरि पैहौं, कहँ पुनि श्रीवनवारि ।
सूरदास स्वामी कें ऊपर, यह तन डारौं वारि ॥१४१॥

वृन्दावन लीला १३५
अर्थ—(गोपी कहती है) कृष्ण पर मेरा मन रीझ गया है (अब) कोई क्या
करेगा। मैं तो चरण रूपी कमल से लिपट गयी जो होना हो सो हो। (चाहे) पिता
नाराज हो जायें, घर में माता मारे, तथा पराये लोग हँसी करे। अब तो कृष्ण से प्रेम
बढ गया है। ब्रह्मा ने यह संयोग रचा है। मेरी जाति की प्रतिष्ठा तथा लाज (भले
ही) न रहे तथा मेरा परलोक नष्ट हो जाय (फिर भी) मैं (पति) कृष्ण को तनिक भी
छोड़ नहीं सकती। (मैं उनसे) नगाड़ा बजाकर (घोषित करके) मिली हूँ। फिर यह
तन कहाँ धर पाऊँगी ओर बनवारी कृष्ण फिर कहाँ मिलेंगे। सूरदास कहते हैं कि
(गोपी कहती है) कृष्ण के ऊपर (मैं) यह शरीर न्योछावर करती हूँ ॥१४१॥
करन दै लोगनि कौं उपहास ।
मन क्रम वचन नद-नंदन कौ, नैंकु न छाड़ौँ पास।
सब या ब्रज के लोग चिकनियां, मेरे भाएँ घास।
अब तौ यहै बसी री माई, नहिं मानौँ गुरु त्रास।
कैसेँ रह्यौ परै री सजनी, एक गाँव कै बास।
स्याम मिलन की प्रीति सखी री, जानत सूरजदास ॥१४२॥
अर्थ—(गोपी कहती है) लोगो को हँसी करने दो। मन, कर्म तथा वचन से
कृष्ण की निकटता तनिक भी नही छोड़ सकती। इस ब्रज के सब लोग छैला हैं !
(लेकिन) मेरी बुद्धि से (सब) घास है (नगण्य है)। अब तो यही (कृष्ण) मन में बस
गये हैं। (अब) गुरुजनो का भय नही मानती हूँ। एक ही गाँव का निवास (बिना
मिलन के) कैसे रहा जा सकता है। हे सखी, कृष्ण से मिलने की प्रीति को सूरदास
(जैसे भक्त ही) जानते हैं ॥१४२॥
एक गाउँ कै वास बसौ हौँ, कैसेँ धीर धरौँ ।
लोचन-मधुप अटक नहिं मानत, जद्यपि जतन करौँ।
वै इहिं मग नित प्रति आवत हैं, हौँ दधि लै निकरौँ।
पुलकित रोम-रोम, गदगद सुर, आनँद उमंग भरौँ।
पर अन्तर चलि जात, कलप बर, बिरहा अनल जरौँ।
सूर सकुच कुल-कानि कहाँ लगि, आरज-पथहिँ डरौँ ॥१४३॥
अर्थ—हे सखी एक ही गाँव का बास (होते हुए) मैं कैसे धीरज धरूँ। (मेरे)
आंख रूपी भौंरे प्रयत्न करने पर भी रोक नही मानते। वे इसी मार्ग से रोज आते हैं,
मैं दही लेकर निकलती हूँ। (देखकर मेरे) रोम-रोम पुलकित हो जाते है आवाज
गद्गद् हो जाती है तथा (मैं) आनन्द तथा उमग से भर जाती हूँ। (क्षण भर) ओट
मे चले जाने पर एक कल्प से भी अधिक (जान पडने वाले समय की कल्पना से)
विरह की अग्नि में जलती हूँ। सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) संकोच, कुल की
मर्यादा तथा श्रेष्ठ पथ से कहाँ तक डरूँ ॥१४३॥

१३६ सूरसागर सार सटीक
हौं संग साँवरे के जैहौँ ।
होनी होइ होइ सो अबहीँ, जस अपजस काहूँ न डरैहौँ ।
कहा रिसाइ करे कोउ मेरौ, कछु जो कहै प्रान तिहिँ दैहौँ ।
दैहौँ त्यागि राखिहौँ यह व्रत, हरि-रति बीज बहुरि कब वैहौँ ।
का यह ब्रज-बापी क्रीड़ा जल, भजि नंद-नंद सबै सुख लैहौँ ॥१४४॥
अर्थ—मैं कृष्ण के साथ जाऊँगी । जो होना हो अभी हो जाय । यश-अपयश
किसी को नही डरूँगी । कोई नाराज होकर मेरा क्या कर सकता है ? अगर कोई कुछ
कहता है तो उस पर प्राण दे दूँगी । शरीर को त्याग कर भी यह व्रत रखूँगी । कृष्ण
के प्रेम के बीज को फिर कब बोऊँगी ? सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) यह नश्वर
पृथ्वी (कृष्ण-सुख की तुलना मे) क्या है, (मैं तो उस सुख के लिए) शरीर को भी
त्याग कर प्रिय कृष्ण के भवन आकाश मे समा जाऊँगी । (उस सुख के बिना) ब्रज-
सरोवर की जल-क्रीड़ा का भी आनन्द नगण्य है। अतः नन्द नन्दन (कृष्ण) को
भजकर सब सुख पाऊँगी ॥१४४॥
रूप-वर्णन
देखौ माई सुन्दरता कौ सागर ।
बुधि-विवेक बल पार न पावत, मगन होत मन नागर ।
तनु अति स्याम अगाध अंबु-निधि, कटि पट पीत तरंग ।
चितवत चलत अधिक रुचि उपजत, भँवर परति सब अंग ।
नैन-मीन, मकराकृत कुडल, भुज सरि सुभग भुजंग ।
मुक्ता-माला मिलीँ मानौ द्वै, सुरसरि एकै संग ।
कनक खचित मनिमय आभूषण, मुख, श्रम-कन सुख देत ।
जनु जल-निधि मथि प्रकट कियौ ससि, श्री अरु सुधा समेत ।
देखि सरूप सकल गोपी जन, रहीं विचारि-विचारि ।
तदपि सूर तरि सकीँ न सोभा, रहीं प्रेम पचि हारि ॥१४५॥
अर्थ— (गोपी कहती है) सखी, सुन्दरता के सागर कृष्ण को देखो । बुद्धि तथा
विवेक के बल से चतुर मन पार न पाकर इसमे डूब जाता है । अत्यधिक साँवलापन
गहरा जलनिधि है, कमर का पीला वस्त्र तरङ्ग के समान है। देखते हुए जब चलते हैं
तो अधिक रुचि पैदा होती है और सब अङ्ग मे भँवर (निगाह) पड़ जाते हैं। नेत्र
मछली (के समान) है, मगर के आकार का कुडल (मगर) है । भुजाये सुन्दर सांप के
समान हैं । मुक्ता की माला इस प्रकार मिली है जैसे दो गङ्गा (एक साथ मिली हो) ।
सोने से जडे हुए मणिमय आभूषण हैं, मुख पर श्रम से उत्पन्न पसीना सुख देता है, मानो
समुद्र को मथकर चन्द्रमा को लक्ष्मी तथा अमृत के साथ निकाला हो । सुन्दर रूप को
देख कर सभी गोपियां सोच-सोच कर रह जाती हैं। सूरदास कहते है कि वे शोभा
(के सागर) को तर नही सकीं। प्रेम मे अधिक परिश्रम से हार कर रह गयी ॥१४५॥

वृन्दावन लीला १३७
स्याम भुजनि की सुन्दरताई ।
चन्दन खौरि अनूपम राजति, सो छवि कही न जाई ।
बड़े बिसाल जानु लौं परसत, इक उपमा मन आई ।
मनौ भुजंग गगन तैं उतरत, अधमुख रह्यौ झुलाई ।
रत्न-जटित पहुँची कर राजति, अँगुरी सुन्दर भारी ।
सूर मनौ फनि-सिर मनि सोभित, फन-फन की छबि न्यारी ॥१४६॥
अर्थ-कृष्ण की भुजाओ की सुन्दरता तथा मस्तक पर लगे हुए चन्दन के
तिलक की शोभा कही नही जा सकती । (भुजाएँ) बहुत विशाल हैं और घुटने तक
छूती हैं । एक उपमा मन मे आती है मानो आकाश से उतरता हुआ सर्प अधोमुख
झूल रहा हो । हाथ में रत्न जड़ित पहुँची शोभित है। अँगुलियां अत्यन्त सुन्दर हैं।
सूरदास कहते हैं कि यह (ऐसे शोभित है) मानो सर्प के सिर पर मणि शोभित हो
तथा प्रति फण की शोभा न्यारी हो ॥१४६॥
स्याम-अंग जुवती निरखि भुलानी ।
कोउ निरखति कुंडल की आभा, इतनेहिं माँझ बिकानी ।
ललित कपोल निरखि कोउ अटकी, सिथिल भई ज्यौं पानी ।
देह-गेह की सुधि नहिँ काहूँ, हरषत कोउ पछितानी ।
कोउ निरखति रही ललित नासिका, यह काहू नहिँ जानी ।
कोउ चक्रित भइ दसन-चमक पर, चकचौंधी अकुलानी ।
कोउ निरखति दुति चिबुक चारु की, सूर तरुनि बिततानी ॥१४७॥
अर्थ-कृष्ण के अंगों को देखकर युवतियां भूल गयीं । कोई कुंडल की कान्ति
देखती है, इसी बीच बिक गयी । सुन्दर कपोल को देखकर कोई उलझ गयी और पानी
की तरह शिथिल हो गयी । किसी को शरीर और घर की याद नही । कोई पछताती
हैं, कोई प्रसन्न होती हैं । कोई सुन्दर नाक को देखती रही, यह कोई (अन्य) न जान
पायी । कोई ओठों की शोभा देखती है और मुख से वाणी नही फूटती । कोई दाँतो
की चमक से चकित होकर चकाचौंध से आकुल हो गयी । कोई सुन्दर ठोढ़ी की कान्ति
देखती हैं । सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार तरुणियां व्याकुल हो गयी ॥१४७॥
मैं बलि जाउँ स्याम-मुख-छबि पर ।
बलि-बलि जाउँ कुटिल कच बिथुरे, बलि-बलि भुकुटी ललाट पर ।
बलि-बलि जाउँ चारु अवलोकनि, बलि-बलि कुडल-रबि को ।
बलि-बलि जाउँ नासिका सुललित, बलिहारी वा छबि की ।
बलि-बलि जाउँ अरुन अधरनि की, विद्रुम-बिंब लजावन ।
मैं बलि जाउँ दसन चमकनि की, वारौं तड़ितनि सावन ।

१३८ सूरसागर सार सटीक
मैँ बलि जाउँ ललित ठोड़ी पर, वलि मोतिन की माल ।
सूर निरखि तन-मन बलिहारौँ, बलि बलि जसुमति-लाल ॥१४८॥
अर्थ - मैं कृष्ण के मुख की शोभा पर वलि जाती हूँ। विखरे हुए कुटिल बालों
पर वलि जाती हूँ। भौह तथा मस्तक पर न्यौछावर होती हूँ। सुन्दर चितवन पर
बलि जाती हूँ। कुंडल के प्रकाश पर बलि जाती हूँ। सुन्दर नासिका पर न्यौछावर
होती हूँ। उसकी छवि की बलिहारी है। मूँगा और बिम्बाफल को लज्जित करने वाले
लाल अधरों पर बलि जाती हूँ। मैं कृष्ण के दाँतो की चमक पर बलिहारी हूँ। उस
पर सावन की बिजली को न्योछावर करती हूँ। मैं सुन्दर ठोढी तथा मोतियों की
माला पर बलि जाती हूँ। सूरदास कहते है कि मैं गोपी (कृष्ण) को देखकर तन मन
सब की बलि देती हूँ। हे यशोदा के लाल (तुम पर) निछावर हूँ ॥१४८॥
नटवर वेप धरे ब्रज आवत ।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, कुटिल अलक मुख पर छवि पावत ।
भृकुटी बिकट नैन अति चंचल, इहिँ छविपर उपमा इक धावत ।
धनुष देखि खंजन विधि डरपत, उड़ि न सकत उड़िबौ अकुलावत ।
अधर अनूप मुरलि-सुर पूरत, गौरी राग अलापि बजावत ।
सुरभी-वृन्द गोप-बालक-सँग, गावत अति आनन्द बढावत ।
कनक-मेखला कटि पीतांवर, निर्तत मन्द-मन्द सुर गावत ।
सूर-स्याम-प्रति-अंग-माधुरी, निरखत ब्रज-जन कैँ मन भावत ॥१४६॥
अर्थ—कृष्ण नटवर का वेष धर कर ब्रज आते हैं। (सिर पर) मोर का मुकुट,
(कान मे) मकर के आकार का कुंडल, घुंघराले बाल मुख पर शोभा पाते हैं। (उनकी)
भौह विकट (वक्र) तथा नेत्र चंचल हैं। इस पर एक उपमा (मन मे) आती है जैसे
धनुष को देखकर खंजन का एक जोडा डर कर उड़ना चाहता हो पर उड न पाने से
आकुल हो । ओठ अनुपम ओर मुरली के स्वर से पूर्ण है तथा गौरी राग को अलाप
कर बजाते हैं। गायो तथा गोप बालको के साथ गाते हुए वे अत्यधिक आनन्द बढाते
हैं। कमर मे सोने की करधनी ओर पीताम्बर शोभित है नाचते हुए मन्द-मन्द सुर से
गाते हैं। सूरदास कहते है कि कृष्ण के प्रत्येक अंग की मधुरता को देखकर ब्रज के
लोगों का मन भा जाता है ॥१४६॥
आवत मोहन धेनु चराए।
मोर मुकुट सिर, उर वनमाला, हाथ लकुट गोरज लपटाए ।
कटि काछनी किंकनि-धुनि बाजनि, चरन चलत नूपुर रव लाए ।
ग्वाल-मंडली मध्य स्यामघन, पीत बसन दामिनिहिँ लजाए।
गोप सखा आवत गुन गावत, मध्य स्याम हलधर छवि छाए।
सूरदास प्रभु असुर सँहारे, ब्रज आवत मन हरष बढ़ाए ॥१५०॥
अर्थ-मोहन गाय चराकर आ रहे है। सिर पर मोर का मुकुट, वक्ष स्थल

वृन्दावन लीला १३६
पर वन माला, हाथ में लाठी और गायों से उड़ायी गयी धूल शोभित है। कमर में
पहनी गयी कछनी और उस पर किंकिणि की ध्वनि बजती है। चलते समय चरणो से
नूपुर की ध्वनि होती है। ग्वालों की मंडली के बीच कृष्ण अपने पीताम्बर से बिजली
को लजाते है। गोप मिल कर गुण गाते हुए आते हैं। बीच में बलभद्र और कृष्ण की
शोभा छायी है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने असुरों का संहार किया और मन के
हर्ष को बढ़ाते हुए ब्रज आते हैं ॥१५१॥
उपमा हरि-तनु देखि लजानी ।
कोउ जल मैंँ, कोउ बननि रहीँ दुरि, कोउ कोउ गगन समानी ।
मुख निरखत ससि गयौ अम्बर कौँ, तड़ित दसन-छवि हेरि ।
मीन कमल कर-चरन नयन डर, जल मैंँ कियौ बसेरि ।
भुजा देखि अहिराज लजाने, बिबरन पैठे धाइ ।
कटि निरखत केहरि डर मान्यौ, बन-बन रहे दुराइ ।
गारी देहिँ कबिनि कैँ बरनत, श्री-अँग पटतर देत ।
सूरदास हमकौँ सरमावत, नाउँ हमारौ लेत ॥१५१॥
अर्थ-कृष्ण के शरीर को देखकर (सारी) उपमाये लजा गयीं । कोई जल में,
कोई वन में छिपी रही, कोई-कोई आकाश में समा गयी। मुख को देखकर चन्द्रमा
आकाश मे चला गया और दांतो को देखकर बिजली (आकाश मे चली गयी) । नेत्रो के
डर से मीन, हाथ तथा चरणो के डर से कमलो ने पानी मे जाकर बसेरा लिया।
भुजा को देखकर सर्पों के राजा (शेषनाग) लजाकर बिल मे जाकर बैठ गये । कमर
को देखकर सिंह ने डर माना और वन-वन छिपता रहा । अङ्ग शोभा की समता
करते समय कवियों को (उपमान) गाली देते है । और वे कहते है कि हमारी चर्चा
करके हमें (कविगण) लज्जित करते है । १५१॥
स्याम सुख-रासि, रस-रासि भारी ।
रूप की रासि, गुन-रासि, जोबन-रासि, थकित भईँ निरखि नव तरुन नारी ।
सील की रासि, जस-रासि, आनंद रासि, नील नव-जलद छवि वरनकारी ।
दया की रासि, विद्या-रासि, बल-रासि, निर्दयारति दनुकुल-प्रहारी ।
चतुराई-रासि, छल-रासि, कल-रासि, हरि भजैँ जिहिँ हेत तिहिँ देन हारी ।
सूर-प्रभु स्याम सुख-धाम पूरन काम, वसन-कटि-पीत मुख मुरलीधारी॥१५२॥
अर्थ-कृष्ण सुख की और रस की भारी राशि (हैं) । (कृष्ण के) रूप की
राशि, गुण की राशि, यौवन की राशि को देखकर तरुणी नारियां थकित हो गयीं ।
(कृष्ण) शील की राशि, यश की राशि, आनन्द की राशि हैं तथा नीले नये बादल के
समान शोभा वाले है । (वे) दया की राशि, विद्या की राशि, बल की राशि हैं, शत्रुओं
के लिए निर्दयी तथा राक्षसो का नाश करने वाले हैं। चतुरता की राशि, छल की
राशि, कला की राशि कृष्ण को जिस हेतु भेजा जाता है उसी को पूरा करते हैं ।

१४० सूरसागर सार सटीक
सूरदास कहते हैं कृष्ण सुख के धाम तथा इच्छा को पूरा करने वाले, कमर में पीतांबर
और मुँह में मुरली धारण करने वाले हैं ॥१५२॥
स्याम-कमल-पद-नख की सोभा ।
जे नख-चंद्र इन्द्र-सर परसे, सिव विरंचि मन लोभा ।
जे नख-चंद्र सनक मुनि ध्यावत, नहिं पावत भरमाहीं ।
ते नख-चंद्र प्रकट ब्रज-जुवती, निरखि निरखि हरषाहीं ।
जे नख-चंद्र फनिंद-हृदय तैं, एकौ निमिष न टारत ।
जे नख-चंद्र महामुनि नारद, पलक न कहूँ विसारत ।
जे नख-चंद्र-भजन खल नासत, रमा हृदय जे परसति ।
सूर स्याम-नख-चंद्र विमल छवि, गोपीजन मिलि दरसति ॥१५३॥
अर्थ- कृष्ण के कमल के समान चरणों के नखों की शोभा (अनुपम) है। जिन
नख रूपी चन्द्रों को इन्द्र ने सिर से स्पर्श किया, और जिन नख-रूपी चन्द्रों की सनक
मुनि ध्यान धरते हैं और (उन्हें) न पाकर भरमते हैं। वही नख रूपी चन्द्रमा प्रकट
(हुआ) देख-देखकर ब्रज की युवतियां हर्षित होती हैं। जिन नख-चन्द्रो को शेषनाग
अपने हृदय से एक भी क्षण नही हटाते । जिन नख चन्द्रों को महा मुनि नारद पल
भर भी नही बिसारते हैं। जो नख-चन्द्र भजन करने पर दुष्टो का नाश करते हैं,
और लक्ष्मी के हृदय का स्पर्श करते है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां मिलकर कृष्ण
के नख रूपी चन्द्र की शोभा को देखती हैं ॥१५३॥
स्याम-हृदय जल-सुत की माला, अतिहिं अनूपम छाजै (री) ।
मनहुँ बलाकपाँति नवधन पर, यह उपमा कछु भ्राजै (री) ।
पीत, हरित, सित, अरुन मालवन, राजति हृदय विसाल(री) ।
मानहुँ इन्द्रधनुष नभमंडल, प्रगट भयौ तिहिं काल (री) ।
भृगु पद-चिन्ह उरस्थल प्रगटे, कौस्तुभ मनि ढिग दरसत (री) ।
बैठे मानौ षट बिधु एक सँग, अर्द्ध निसा मिलि हरषत (री) ।
भुजा बिसाल स्याम सुन्दर की, चन्दन खौरि चढ़ाये (री) ।
सूर सुभग अँग-अँग की सोभा, ब्रज-ललना ललचाए (री) ॥१५४॥
अर्थ - कृष्ण के हृदय पर मोती की माला अत्यधिक अनुपम शोभा (देती) है।
मानो नये बादलों पर बगुलो की पंक्ति हो, यह उपमा कुछ उचित लगती है। पीली,
हरी, सफेद, लाल वनमाला विशाल हृदय पर शोभित है। मानो उस समय आकाश
मंडल मे इन्द्र धनुष उदित हो । भृगु के पैरो के (प्रहार) का चिह्न वक्ष स्थल पर स्पष्ट
है और उसके निकट ही कौस्तुभ मणि दिखाई पडती है। मानो आधी रात मे छह
चन्द्रमा (पांचो अंगुलियो से युक्त चरम चिह्न एवं कौस्तुभ-मणि) बैठे हुए मिलकर
प्रसन्न हो रहे है। कृष्ण की भुजा चन्दन का लेप किए विलसित है। सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण के अङ्ग-अङ्ग की शोभा ब्रज की स्त्रियो को ललचा देने वाली है ॥१५४॥

वृन्दावन लीला १४१
मुख पर चंद डारौँ वारि।
कुटिल कच पर भौँर वारौँ, भौंह पर धनु वारि।
भाल-केसरि-तिलक छवि पर, मदन-सर सत वारि।
मनु चली बहि सुधा-धारा, निरखि मन द्यौँ वारि।
नैन सुरसति-जमुन-गंगा, उपम डारौँ वारि।
मीन खंजन मृगज वारौँ, कमल के कुल वारि।
निरखि कुंडल तरनि वारौँ, कूप स्रवननि वारि।
झलक ललित कपोल-छवि पर, मुकुट सत-सत वारि।
नासिका पर कीर वारौँ, अधर बिद्रुम वारि।
दसन पर कन-बज्र वारौँ, बीज दाड़िम वारि।
चिबुक पर चित-बित्त धारौँ, प्रान डारौँ वारि।
सूर हरि की अंग-सोभा, को सकै निरवारि ॥१५५॥
अर्थ—कृष्ण के मुख पर चन्द्रमा को निछावर कर दूँ। कुटिल लटों पर भौंरे
को तथा भौंह पर धनुष निछावर (करती हूँ)। मस्तक पर केसर के तिलक की शोभा
पर मदन के सैकड़ो बाण निछावर हैं। (वह ऐसा प्रतीत होता है) मानो अमृत की
धारा बह चली हो और उसे देखकर मन को निछावर कर दूँ। नैनों पर सरस्वती,
यमुना और गङ्गा को उपमा निछावर कर दूँ। तब मछली, खंजन, मृग शावक तथा
कमल के समूह निछावर (है)। कुंडल को देखकर सूर्य को निछावर कर दूं और कानों
पर कुआं को निछावर देती हूँ। सुन्दर कपोल की शोभा की झलक पर सैकड़ों मुकुट
निछावर हैं। नासिका पर तोता तथा ओंठ पर मूँगे को वारती हूँ। दांतो पर हीरे के
दानो तथा अनार के बीज को निछावर करती हूँ। ठुड्डी पर चित्त की वृत्ति को धरती
हूँ और प्राणो को निछावर करती हूँ। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के अङ्ग की शोभा
का निर्णय कौन कर सकता है ॥१५५॥
नेत्र अनुराग
नैन न मेरे हाथ रहे।
देखत दरस स्याम सुन्दर कौ, जल की ढरनि बहे।
वह नीचे कौँ धावत आतुर, वैसेहि नैन भए।
वह तो जाइ समात उदधि मैं, ये प्रति अंग रए।
यह अगाध कहुँ वार पार नहिँ, येउ सोभा नहिँ पार।
लोचन मिले त्रिवेनी ह्वैकै, सूर समुद्र अपार ॥१५६॥
अर्थ-(गोपियां कहती हैं) आँखें मेरे वश मे नही रहती। सुन्दर कृष्ण का
दर्शन करते ही जल की तरह ढल कर बह जाती हैं। वह (जल) नीचे की ओर आतुर
होकर दौड़ता है वैसे ही नेत्र भी हो गये है। वह तो जाकर समुद्र में समा-
जाता है, किन्तु ये (नेत्र) कृष्ण के हर अङ्ग पर मोह गये हैं। यह (समुद्र) अगाध है

१४२ सूरसागर सार सटीक
इसका कोई वार-पार नहीं है । इन (कृष्ण) की शोभा की भी कोई सीमा नहीं है ।
सूरदास कहते हैं कि (गोपियों के) नेत्र त्रिवेणी होकर अपार समुद्र (रूपी कृष्ण) से
मिल गये ॥१५६॥
इन नैननि मोहिं बहुत सतायाँ ।
अब लौं कानि करी मैं सजनी, बहुते मूँढ़ चढ़ायाँ ।
निदरे रहत गहे रिस मोसों, मोहिं दोष लगायी ।
लूटत आपुन श्री-अँग-सोभा, ज्यों निधनी धन पायाँ ।
निसिहूँ दिन ये करत अचगरी, मनहिँ कहा धीँ आयी ।
सुनहु सूर इनकी प्रतिपालत, आलस नैंकु न लायी ॥१५७॥
अर्थ—इन नैनों ने मुझे बहुत सताया । अब तक हे सखी मैंने मर्यादा रखी,
(इन्हें) बहुत सिर पर चढ़ाया । (लेकिन अब) ये मुझसे क्रोध करके रूठे रहते हैं और
हम को ही दोष लगाते हैं । स्वयं सुन्दर अंगों की शोभा को लूटते हैं जैसे निर्धन को
धन मिल गया हो । रात-दिन ये शरारत करते हैं (न मालूम) इनके मन को क्या हो
गया है (क्या समा गया है) । (गोपी कहती है) सूरदास सुनो इनका पालन करते
हुए मैं तनिक भी आलस नहीं लायी ॥१५७॥
नैन करैं सुख, हम दुख पावैं ।
ऐसो को पर-वेद न जानै, जासों कहि जु सुनावैं ।
तातैं मौन भलौ सबही तें, कहि कै मान गँवावैं ।
लोचन, मन, इंद्री हरि कीं भजि, तजि हमकोँ सुख पावैं ।
ये तो गए आपने कर तैं, वृथा जीव भरमावैं ।
सूर स्याम हैं चतुर सिरोमनि, तिनसों भेद जनावैं ॥१५८॥
अर्थ—आंखें सुख करती हैं और हम दुःख पाते हैं । ऐसा कौन है जो दूसरे के
दुःख को समझे, जिससे (अपना दुख) कहकर सुनाऊँ । सबसे अच्छा है मौन रहना, कह
कर कौन आदर गँवाये । आंख, मन, इन्द्रियां कृष्ण के होकर हमको छोड़कर सुख पाते
हैं । ये तो अपने हाथ से निकल गये अब जीव को व्यर्थ ही भरमाते हैं । सूरदास कहते
हैं कि कृष्ण चतुर शिरोमणि हैं, उनसे (ये सब) (गोपियो का) भेद जानते हैं ॥१५८॥
ऐसे आपु स्वारथी नैन ।
अपनौइ पेट भरत हैं निसि-दिन, और न लैन न दैन ।
वस्तु अपार परी ओछैं कर, ये जानत घटि जैहैं ।
को इनसे समझाइ कहै यह, दीन्हें ही अधिकैहैं ।
सदा नहीं रैहैं अधिकारी, नाऊँ राखि जी लेते ।
सूर स्याम सुख लूटैं आपुन, औरनि हूँ कौं देते ॥१५९॥
अर्थ—ये नेत्र स्वयं कितने स्वार्थी हैं । रात-दिन अपना ही पेट भरते रहते हैं
और (से कुछ उनका) लेना-देना नहीं है । अपार वस्तु नीच के हाथ पड़ गई है, ये
समझते हैं कि घट जायेगी । कौन इनसे समझाकर कहे कि देने से अधिकाई ही होगी ।

सदा अधिकारी नहीं रहेंगे जो (चाहें तो) नाम रख लें। सूरदास कहते हैं कि औरो
को भी देते हुए स्वयं सुख लूटे ॥१५८॥
नैन भए बस मोहन तैं।
ज्यौँ कुरंग बस होत नाद के, टरत नहीं ता गोहन तैं।
ज्यौँ मधुकर बस कमल-कोस के, ज्यौँ बस चंद चकोर ।
तैसेहि ये बस भए स्याम के, गुड़ी-वस्य ज्यौँ डोर ।
ज्यौँ बस स्वाँति-बूँद कै चातक, ज्यौँ बस जल के मीन ।
सूरज-प्रभु के बस्य भए ये, छिनु-छिनु प्रीति नवीन ॥१६०॥
अर्थ—नैन मोहन के वश मे हो गये । जैसे मृग नाद के वश में होकर उसके
पास से नही टलता । जैसे भौंरा कमल की कली के वश में होता है और चकोर पक्षी
चन्द्रमा के (वश मे होता है) । वैसे ही ये कृष्ण के वश मे हो गये हैं, जैसे पतंग डोरी के
वश में रहती है। जैसे स्वाती नक्षत्र की बूंद के वश में पपीहा और जल के वश मे
मछली उसी तरह ये कृष्ण के वश मे हो गये और क्षण-क्षण नयी प्रीति (का अनुभव)
करते हैं ॥१६०॥
तब तैं नैन रहे इकटकहीं ।
जब तैं दृष्टि परे नँद-नंदन, नैंकु न अत मटकहीँ ।
मुरली घरे अरुन अधरनि पर, कुडल झलक कपोल ।
निरखत इकटक पलक भुलाने, मनौँ बिकाने मोल ।
हमकौँ वै काहैँ न बिसारैं, अपनी सुधि उन नाहिं ।
सूर स्याम- छवि-सिंधु सामने, वृथा तरुनि पछिताहिं ॥१६१॥
अर्थ—तब से नेत्र एकटक ही हैं, जब से कृष्ण पर नजर पडी (तब से) तनिक
भी अन्यत्र नही हिलते । लाल ओठो पर मुरली घरे हुए, कपोल पर झलकते कुण्डल
वाले (कृष्ण) को पलक भांजना भूलकर एकटक देख रहे हैं मानो कीमत पर बिक गये
है। हमको वे क्यो न भुला दे जबकि उन्हे अपनी ही सुध नही है। सूरदास कहते है कि
कृष्ण के शोभा-समुद्र मे (ये नेत्र) समा गये हैं, युवतियाँ व्यर्थ ही पछताती हैं ॥१६१॥
नैननि सौँ झगरौ करिहौँ री ।
कहा भयौ जौ स्याम-संग हैं, बाँह पकरि सम्मुख लरिहौँ री ।
जन्महिं तैं प्रतिपालि बड़े किये, दिन-दिन कौ लेखौ करिहौँ री ।
रूप-लूट कीन्ही तुम काहैँ, अपने बाँटे कौँ धरिहौँ री ।
एक मातु पितु भवन एक रहे, मैं काहैँ उनकौँ डरिहौँ री ।
सूर अंस जौ नहीँ देहिंगे, उनकेँ रँग मैं हूँ ढरिहौँ री ॥१६२॥
अर्थ—आंखों से झगड़ा करूंगी। क्या हुआ जो वे कृष्ण के साथ हैं। बांह
पकड़कर सामने लडूंगी । जन्म से पालकर वड़ा किया है, उनसे एक-एक दिन का
हिसाब करूंगी। (कृष्ण) के रूप को लूट कर तुमने अपना क्यो कर लिया (उनसे)

१४४ सूरसागर सार सटीक
अपना हिस्सा धरा लूंगी। एक ही माता पिता तथा एक ही भवन में निवास रहा
(इसलिए) मैं उन (नेत्रो) को क्यों डरूँगी। सूरदास कहते हैं कि मुझ (गोपी) को यदि
हिस्सा नही देगे तो उनके रंग में मैं ढल जाऊँगी ॥१६२॥
कपटी नैननि तैँ कोउ नाहीँ।
घर कौ भेद और के आगैँ, क्यों कहिवे कौँ जाहीँ।
आपु गए निधरक ह्वै हमतेँ, वरजि-वरजि पचिहारी।
मनकाँमना भई परिपूरन, ढरि रीझे गिरिधारी।
इनहिँ विना वे, उनहिँ विना ये, अंतर नाहीँ भावत।
सूरदास यह जुग की महिमा, कुटिल तुरत फल पावत ॥१६३॥
अर्थ- नैनों से (अधिक) छली कोई नही है। दूसरे के आगे घर का भेद कहने
क्यो जाते हैं। स्वयं बेधड़क होकर चले गये, रोक-रोककर हार गयी। इनकी मनो-
कामना पूरी हो गयी जो कि ढलकर कृष्ण इनसे रीझ गये। इनके बिना वे (कृष्ण)
और उनके बिना ये (नेत्र) दोनो को वियोग नही अच्छा लगता। सूरदास कहते हैं
कि यह युग की महिमा है कि कुटिल व्यक्ति, तुरन्त फल पाता है ॥१६३॥
नैना घूँघट मैँ न समात।
सुन्दर वदन नन्द-नन्दन को, निरखि-निरखि न अघात।
अति रस लुब्ध महा मधु लम्पट, जानत एक न वात।
कहा कहौं दरसन-मुख माते, ओट भएँ अकुलात।
वार-वार वरजत हाँ हारी, तऊ टेव नहिं जात।
सूर तनक गिरिधर विनु देखै, पलक कलप सम जात ॥१६४॥
अर्थ-नेत्र घूंघट मे नही समाते। कृष्ण के सुन्दर शरीर को देख-देखकर नही
अघाते हैं। (कृष्ण के रूप के) रस-माधुर्य के अत्यधिक लोभी ये लंपट एक भी वात
नही जानते। क्या कहूँ दर्शन के सुख से मतवाले (कृष्ण से) ओट होने पर आकुल हो
जाते हैं। वार-वार रोककर हार गयी तब भी आदत नही छूटती। सूरदास कहते हैं
कि पल भर बिना देखे उन्हे एक कल्प के समान बीतता है ॥१६४॥
ये नैना मेरे ढीठ भए री।
घूँघट-ओट रहत नहिँ रोकैँ, हरि-मुख देखत लोभि गए री।
जउ मैं कोटि जतन करि राखे, पलक-कपाटनि मूंदि लए री।
तउ ते उमँगि चले दोउ हठ करि, करौं कहा मैं जान दए री।
अतिहिँ चपल, वरज्यौ नहिँ मानत, देखि वदन तन फेरि नए री।
सूर स्यामसुंदर-रस अटके, मानहुँ लोभी उहँह छाए री ॥१६५॥
अर्थ-ये मेरे नेत्र धृष्ट हो गये हैं। घूंघट की ओट मे रोकने से नही रहते,
कृष्ण के रूप को देखते ही ललचा गये। यद्यपि मैंने सैकडो उपाय करके रखा और पलक
रूपी किवाड़ को वन्द कर लिया, तब भी वे दोनो हठ करके उमगकर चले, क्या करूँ,

वृन्दावन लीला १५५
मैंने जाने दिया। अत्यधिक चंचल हैं, रोक-टोक नहीं मानते, (कृष्ण के) शरीर
को देख कर उधर ही झुक पड़ते हैं। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) ये
कृष्ण के (रूप) रस में उलझ गये, मानो ये लोभी वहीं ही छा गये हैं ॥१६५॥
अँखियाँ हरि कैं हाथ बिकानीँ ।
मृदु मुसुकानि मोल इनि लीन्ही, यह सुनि सुनि पछितानीँ ।
कैसैँ रहति रहीँ मेरैँ बस, अब कछु औरै भाँति ।
अब वै लाज मरतिँ मोहिँ देखत, बैठीँ मिलि हरि-पाँति ।
सपने की सी मिलनि करति हैं, कब आवतिँ कब जातिँ ।
सूर मिलौँ ढरि नंद-नन्दन कौँ, अनत नहींँ पतियातिँ ॥१६६॥
अर्थ—आंखे कृष्ण के हाथ बिक गयी। मीठी हंसी ने इन्हे मोल ले लिया, यह
सुन-सुनकर पछताती हूँ। मेरे वश मे कैसे रहती थी, अब तो कुछ और ही तरह का
व्यवहार है। अब वे कृष्ण की पंक्ति में बैठी हुई मुझे देखकर लाज के मारे मरती हैं,
स्वप्न के समान मिलन करती हैं। (मालूम नही) कब आती और कब जाती हैं। सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण के साथ प्रेम करके अब ये अन्यत्र विश्वास नही करती ॥१६६॥
अँखियन तब तैँ बैर धरयौ ।
जब हम हटकी हरि-दरसन कौँ, सो रिस नहिँ बिसरयौ ।
तबहीँ तैँ उनि हमहिँ भुलायौ, गईँ उतहिँ कौँ धाइ ।
अब तौ तरकि तरकि ऐंठति हैं; लेनी लेतिँ बनाइ ।
भईँ जाइ वै स्याम-सुहागिनि, बड़भागिनि कहवावैँ ।
सूरदास वैसी प्रभुता तजि, हम पै कब वै आवैँ ॥१६७॥
अर्थ—आंखो ने तब से शत्रुता ठान ली है जब से कृष्ण के दर्शन से उन्हे रोका,
(और उस) क्रोध को (उन्होने) भुलाया नही। तब ही से उन्होने हमे भुला दिया,
और उन्ही की ओर दौड़कर चली गयी। तब ही से तड़क-तड़क कर ऐंठती है, और
लेनी (बदला) बना ले रही हैं। वे जाकर कृष्ण की सुहागिन होकर वडभागी कहलाती
हैं। सूरदास कहते हैं कि वैसी बड़ाई को छोड़कर हमारे पास वे क्यों आने
लगी ॥१६७॥
१०

राधा-कृष्ण
प्रथम मिलन
खेलत हरि निकसे ब्रज-खोरी ।
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा, चक, डोरी ।
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि वर, दसन-दमक दामिनि-छवि छोरी ।
गए स्याम रबि-तनया कैँ तट, अंग लसति चन्दन की खोरी ।
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दियेँ रोरी ।
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी ।
संग लरिकिनी चली इत आवति, दिन-थोरी, अति छवि तन-गोरी ।
सूर स्याम देखत हीँ रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥१॥
अर्थ—खेलते हुए कृष्ण ब्रज की सँकरी गली मे निकले, कमर में कछनी और
पीताम्बर बांधे हुए हैं और हाथ मे भौंरा (लट्टू) और लट्टू की डोरी लिए हुए हैं।
उनके (मस्तक पर) मोर का मुकुट है, कानो में श्रेष्ठ कुण्डल है और उनके दांतो की
चमक ने बिजली की छवि को छीन लिया है। कृष्ण यमुना के तट पर गये, उनके
अंग पर चंदन का लेप शोभित है। उन्होने अचानक ही वहां राधा को देखा, जिसके
नेत्र बड़े-बड़े थे तथा मस्तक पर तिलक लगा था, जिसने नीला वस्त्र तथा कमर में
घांघरी पहन रखी थी। जिसके पीठ पर झकझोरती हुई चोटी हिलती डुलती है। वह
लडकियों के साथ इधर ही चली आती है। वह थोडे दिन (कम उम्र) की (होते हुए
भी), अत्यधिक सुन्दर तथा गोरे शरीर की है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (उसे)
देखते ही रीझ गये। नेत्र से नेत्र मिलते ही जादू का सा असर हुआ ॥१॥
बूझत स्याम कौन तू गोरी ।
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी नहींँ कहूँ ब्रज खोरी ।
काहे कौँ हम ब्रज-तन आवतिँ, खेलति रहतिँ अपनी पौरी ।
सुनत रहतिँ स्रवननि नँद-ढोटा,करत फिरत माखन-दधि-चोरी ।
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैँ, खेलन चलौ संग मिलि जोरी ।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ॥२॥
अर्थ-कृष्ण (राधा) से पूछते है-गोरी तुम कौन हो। कहाँ रहती हो और
किसकी बेटी हो, (क्योकि) तुम्हें ब्रज की गलियो मे कभी नही देखता हूँ। (राधा उत्तर
देती है) मैं ब्रज में किसलिए आऊँ, (मैं) अपने द्वार पर खेलती रहती हूँ। माखन तथा

राधाकृष्ण १४७
दधी की चोरी करते फिरते हुए नन्द के पुत्र (कृष्ण) की कहानी सुनती रहती हूँ।
(कृष्ण कहते हैं) मैं तुम्हारा क्या चुरा लूंगा, साथ मिलकर खेलने चलें। सूरदास कहते
हैं कि रसिक शिरोमनि कृष्ण ने भोली राधा को बातो से ही फुसला लिया ॥२॥
प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यौ।
नैन नैन कीन्ही सब बातैँ, गुप्त प्रीति प्रगटान्योँ।
खेलन कबहुँ हमारैं आवहु, नंद-सदन, ब्रज गाउँ।
द्वारैं आइ टेरि मोहिँ लीजौ, कान्ह हमारौ नाउँ।
जौ कहियै घर दूरि तुम्हारौ, बोलत सुनियै टेरि।
तुमहिँ सौँह वृषभानु बबा की, प्रात-साँझ इक फेरि।
सूधो निपट देखियत तुमकौँ, तातैँ करियत साथ।
सूर स्याम नागर-उत नागरि, राधा दोउ मिलि गाथ ॥३॥
अर्थ--प्रथम प्रेम को दोनों ने मन से ही जान लिया। (दोनों ने) आंख ही
आंख से सब बाते कर ली और गुप्त प्रेम को प्रकट किया। (कृष्ण कहते हैं) कभी
हमारे ब्रज गांव के नन्द के घर खेलने आओ। द्वार पर आकर मुझे बुला लेना, कृष्ण
मेरा नाम है। जो कहो कि तुम्हारा घर दूर है, तुम्हारे (जोर से) पुकारने पर सुनाई
देगा। तुम्हे वृषभानु बाबा की सौगन्ध है, सुबह या शाम एक बार (अवश्य) आना।
तुम्हे बिलकुल सीधी-सरल देख कर मैं तुम्हारा साथ करना चाहता हूँ। सूरदास कहते
हैं कि श्याम कृष्ण नागर (सभ्य तथा चतुर पुरुष) तथा राधा नागरि (सभ्य तथा
चतुर नारी) है, दोनो मिल कर लीला करते है ॥३॥
गई वृषभानु-सुता अपने घर।
सग सखी सौँ कहति चली यह, को जैहैँ इनकैँ दर।
बड़ी बेर भई जमुना आए, खीझति ह्वैहै मैया।
वचन कहति मुख, हृदय-प्रेम-दुख, मन हरि लियौ कन्हैया।
माता कहति कहाँ री प्यारी, कहाँ अबेर लगाई।
सूरदास तब कहति राधिका, खरिक देखि हौँ आई ॥४॥
अर्थ-वृषभानु की पुत्री (राधा) अपने घर गयी। साथ की सखियों से यह
कहती हुई चली कि कौन इनके (कृष्ण) घर जायेगा। यमुना आए हुए बहुत देर हो
गयी। माता खीझती होंगी। मुंह से यह वचन कहती है, (किन्तु) हृदय मे प्रेम की
पीड़ा है, (क्योंकि) कृष्ण ने उसका मन हर लिया। माता कहती हैं-प्यारी तुम अब
तक कहाँ थी, कहाँ देर लगायी। सूरदास कहते है कि तब राधा ने अपनी मां को
उत्तर दिया-कि मैं पशुओं का वाड़ा देखकर आई हूँ ॥४॥
नंद गए खरिकहिँ हरि लीन्हे।
देखी तहाँ राधिका ठाढ़ी, बोलि लिए तिहिँ चीन्हे।

१४८ सूरसागर सार सटीक
महर कह्यौ खेलौ तुम दोऊ, दूरि कहूँ जिनि जैहौ ।
गनती करत ग्वाल गैयनि की, मोहिं नियरैं तुम रैहौ ।
सुनि बेटी बृषभानु महर की, कान्हहिं लेइ खिलाइ ।
सूर स्याम कौं देखे रहिहौ, मारै जनि कोउ गाइ ॥५॥
अर्थ-नन्द कृष्ण को लेकर पशुओ के बाड़े (गोशाला) में गये । वहां पर उन्होने
राधिका को खड़ी देखा, उसे पहचान कर (नन्द ने) बुला लिया । महर ने कहा तुम
दोनों खेलो, कही दूर मत जाना । ग्वाल और गायों की गिनती करते हुए मेरे ही
पास तुम रहना । महर वृषभानु की बेटी सुनो ! कृष्ण को खिला लो । सूरदास कहते हैं
(महर कहते हैं) कि कृष्ण को देखते रहना, कोई गाय मारने न पावे ॥५॥
नन्द बबा की बात सुनौ हरि ।
मोहिं छोड़ि जौ कहूँ जाहुगे, ल्याऊँगी तुमकौं धरि ।
भली भई तुम्हें सौंपि गए मोहिं, जान न दैहौं तुमकौं ।
बाँह तुम्हारी नैंकु न छाँड़ौं, महर खीझिहैं हमकौं ।
मेरी बाँह छोड़ि दै राधा, करत ऊपरफट बातें ।
सूर स्याम नागर, नागरि सौं, करत प्रेम की घातें ॥६॥
अर्थ- (राधा कहती है) कृष्ण, बाबा नन्द की बात सुनो । मुझको छोड़कर
यदि कही जाओगे तो मै तुमको पकड़ लाऊँगी । अच्छा हुआ तुम्हे वे मुझे सौप गये, मैं
तुमको जाने नही दूंगी । तुम्हारी बांह तनिक भी नही छोड़ेंगी, नही तो महर हमसे
नाराज होंगे । (कृष्ण कहते हैं) राधा मेरी बांह छोड़ दे, क्यों अनर्गल बाते करती है।
सूरदास कहते है कृष्ण चतुर राधा से प्रेम की चोटे करते है ॥६॥
खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, नंद-महरि कैं आई (हो) ।
सकुच सहित मधुरे करि बोली, घर हीं कुँवर कन्हाई (हो) ।
सुनत स्याम कोकिल सम बानी, निकसे अति अतुराई (हो) ।
माता सौं कछु करत कलह हे, रिस डारी बिसराई (हो) ।
मैया री तू इनकौं चीन्हति, बारम्बार बताई (हो) ।
जमुना-तीर काल्हि मैं भूल्यौ, बाँह पकरि लै आई (हो) ।
आवति इहाँ तोहिं सकुचति है, मैं दै सौंह बुलाई (हो) ।
सूर स्याम ऐसे गुन-आगर, नागरि बहुत रिझाई (हो) ॥७॥
अर्थ-खेलने के बहाने कुमारी राधा नन्द महर के (घर) आई । संकोच के
साथ मधुरता से बोलती है कि (हे) कुँवर कृष्ण घर हो ? कोयल के समान राधा की
बोली सुन कर (कृष्ण) अत्यधिक आकुलता से निकले । माता से कुछ तकरार कर रहे
थे, पर (उस) क्रोध को वे तुरन्त भूल गये । (कृष्ण कहते है) मैया तुम इसको पहचानती
हो । (फिर) बार-बार बताते है कि यमुना के किनारे कल मैं भटक गया था, (यह)
मेरी बांह पकड़ कर ले आयी । यहां आते हुए इसको तुमसे संकोच होता है । मैने इसे

राधाकृष्ण १४६
सौगंध देकर बुलाया है। सूरदास कहते हैं गुणो के भांडार कृष्ण ने नागरि राधा को
बहुत रिझाया ॥७॥
नाम कहा तेरौ री प्यारी।
बेटी कौन महर की है तू, को तेरी महतारी।
धन्य कोख जिहिँ तोकौँ राख्यो, धनि घरि जिहिँ अवतारी।
धन्य पिता माता तेरे, छवि निरखति हरि-महतारी।
मैं बेटी वृषभानु महर की, मैया तुमकौँ जानतिँ।
जमुना-तट बहु बार मिलन भयौ, तुम नाहिँन पहिचानतिँ ।
ऐसी कहि, वाकौँ मैं जानति, वह तो बड़ी छिनारि।
महर बड़ौ लंगर सब दिन कौ, हँसति देति मुख गारि ।
राधा बोलि उठी, बाबा कछु, तुमसौ ढीठौ कीन्हौ।
ऐसे समरथ कव मैं देखे, हँसि प्यारिहिँ उर लीन्हौ।
महरि कुँवरि सौँ यह कहि भाषति, आउ करौँ तेरी चोटी।
सूरदास हरषित नंदरानी, कहति महरि हम जोटी ॥८॥
अर्थ - प्यारी तेरा क्या नाम है। तू कौन महर की बेटी है और कौन तुम्हारी
माता है। वह कोख धन्य है जिसने तुझको रखा और वह (माता) धन्य है जिसने तुम्हें
जन्म दिया। तुम्हारे पिता, माता (दोनो) धन्य है। (इस प्रकार) कृष्ण की माता
(उसकी) छवि देखती हैं। (राधा उत्तर देती है) मैं वृषभानु महर की पुत्री हूँ, माता
तुमको जानती हूँ। यमुना के तट पर बहुत बार मिलन हुआ है, (क्या) तुम नही
पहचानती हो। ऐसा कहो, उसको मैं जानती हूँ, वह तो बहुत कुलटा है। महर (वृषभानु
भी) सब दिन के वडे धृष्ट हैं, इस प्रकार (यशोदा) हँसती और मुंह से गाली देती है।
राधा (इस पर) वोल उठी कि वावा ने क्या तुमसे कुछ धृष्टता की है। इस पर यशोदा
ने कहा ऐसे समर्थ उनको मैंने कब देखा ? फिर हँस कर प्यारी राधा को हृदय से लगा
लिया। यशोदा कुँवरि राधा से यह कहती है - आओ तुम्हारी चोटी करूँ । सूरदास
कहते हैं नन्दरानी प्रसन्न होती हैं और कहती है कि महरि और हम जोड़ी है ॥८॥
जसुमति राधा:कुँवरि सँवारति ।
बड़े वार सीमंत सीस के, प्रेम सहित निरुवारति ।
माँग पारि वेनी जु सँवारति, गूँथी सुन्दर भाँति ।
गोरैँ भाल बिंदु बदन, मनु इन्दु प्रात-रवि काँति ।
सारी चीरि नई फरिया लै, अपने हाथ बनाइ ।
अंचल सौँ मुख पोँछि अंग सब, आपुहि लै पहिराइ ।
तिल, चाँवरी, बतासे, मेवा, दियौ कुँवरि की गोद ।
सूर स्याम-राधा तनु चितवत, जसुमति मन-मन मोद ॥६॥

१५० सूरसागर सार सटीक
अर्थ—यशोदा कुमारी राधा को सँवारती हैं। फिर की मांग के बढ़े बालो को
प्रेम के साथ सुलझाती हैं। उन्होंने मांग काढ़कर, चोटी को सँवारकर, सुन्दर तरह से
गूंथा। गोरे मस्तक (और गोरे) मुख पर विन्दी ऐसी शोभित है मानो चन्द्रमा तथा
प्रातः कालीन सूर्य की कांति एक साथ शोभित हो रही हो। यशोदा ने साड़ी को चीर
कर अपने हाथ से नया लहँगा बनाया, फिर अपने आंचल से राधा के मुख तथा अन्य
सब अङ्गो को पोछ कर उन्होंने अपने हाथ से लहँगा पहना दिया। इसके उपरान्त
तिल, चावल, बतासा और मेवा से कुँवरि (राधा) की गोद भरी। सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण और राधा की ओर देखते हुए यशोदा मन-ही-मन आनन्दित हैं ॥६॥
बूझति जननि कहाँ हुती प्यारी ।
किन तेरे भाल तिलक रचि कीनौ, किहिँ कच गूँदि माँग सिर पारी ।
खेलत रही नंद कैँ आँगन, जसुमति कही कुँवरि ह्वाँ आ री ।
मेरौ नाउँ बूझि बाबा कौ, तेरौ बूझि दई हँसि गारी ।
तिल, चाँवरी गोद करि दीनी, फरिया दई फारि नव सारी ।
मो तन चितै, चितै ढोटा-तन, कछु सविता सौँ गोद पसारी ।
या सुनि कै वृषभानु मुदित चित, हँसि-हँसि बूझत बात दुलारी ।
सूर सुनत रस-सिन्धु बढ्यौ अति, दम्पति एकै बात विचारी ॥१०॥
अर्थ—माता पूछती हैं कि प्यारी तुम कहाँ थी। किसने तुम्हारे मस्तक पर
तिलक की रचना की है, किसने बालों को गूंथ (सुलझा) कर सिर की मांग निकाली
है। (राधा उत्तर देती है) जब मैं नंद के आंगन मे खेल रही थी, तब यशोदा ने कहा
कुँवरि यहाँ आओ। मेरा नाम पूछा और बाबा का नाम पूछा, फिर तुम्हारा नाम
पूछ कर हँसते हुए गाली दी। तिल और चावल से (मेरी) गोद भर दी तथा नयी
साड़ी फाड़कर लहँगा पहनाया। मेरी ओर देखकर और पुत्र की ओर देखकर उन्होने
सूर्य की ओर आंचल पसार कर कुछ प्रार्थना की। यह सुनकर वृषभानु प्रसन्न मन से
हँस-हँसकर प्यारी राधा से बात पूछते है। सूरदास कहते है कि (यह सब) सुनते ही
दंपति के हृदय मे रस. का सागर अत्यधिक उमड़ आया और दोनो के मन मे एक ही
विचार उठा ॥१०॥
गारुड़ी कृष्ण
सखियनि मिलि राधा घर लाईं ।
देखहु महरि सुता अपनी कौँ, कहुँ इहिँ कारैँ खाई ।
हम आगैँ आवति, यह पाछैँ, धरनि परी भहराई ।
सिर तैँ गई दोहनी ढरिकै, आपु रही मुरझाई ।
स्याम-भुअंग डस्यौ हम देखत, ल्यावहु गुनी बुलाई ।
रोवति जननि कंठ लपटानी, सूर स्याम गुन राई ॥११॥

राधाकृष्ण १५१
अर्थ—सखियाँ मिलकर राधा को घर ले आयी और कहने लगी, महरि अपनी
बेटी को देखो, कही इसे सांप ने काट लिया है। हम सब आगे-आगे आ रही थीं, पीछे
यह जमीन पर गिर पड़ी। सिर से दोहनी (दूध की हांड़ी) ढुलक गयी, स्वयं मुरझा
गयी। हमारे देखते इसे काले सांप ने डस लिया, किसी गुणी को बुला लाओ। रोती
हुई माता कंठ से लिपटकर कहती है कि कृष्ण ही गुणियो मे श्रेष्ठ हैं ॥१११॥
नंद-सुवन गारुड़ी बुलावहु।
कह्यौ हमारौ सुनत न कोऊ, तुरत जाहु, लै आवहु।
ऐसौ गुनी नहीं त्रिभुवन कहूँ, हम जानतिँ हैं नीकै।
आइ जाइ तौ तुरत जियावहिँ, नैँकु छुवत उठै जी कै।
देखौ धौँ यह बात हमारी, एकहि मन्त्र जिवावै।
नन्द महर कौ सुत सूरज जौ, कैसेहुँ ह्याँ लौ आवै ॥१२॥
अर्थ-गारुड़ी नंद के पुत्र (कृष्ण) को बुलाओ। हमारा कहना तो कोई सुनता
नही, तुरन्त जाकर ले आओ। ऐसा सांप के मंत्र को जानने वाला तीनो लोक मे कोई
नही है। हम उसे अच्छी तरह जानती हैं। आ जायँ तो तुरन्त जिला दे, तनिक छूते ही
जी कर उठ जाय। हमारी यह बात निश्चय करके देखो एक ही मंत्र मे वह जिला
देता है। नन्द महर के पुत्र को कैसे भी यहाँ पर ले आया जाय ॥१२॥
महरि, गारुड़ी कुँवर कन्हाई।
एक बिटिनियाँ कारैँ खाई, ताकौँ स्याम तुरतहीँ ज्याई।
बोलि लेहु अपने ढोटा कौँ, तुम कहि कै देउ नैँकु पठाई।
कुँवरि राधिका प्रात खरिक गई, तहाँ कहूँ-धौँ कारैँ खाई।
यह सुनि महरि मनहिँ मुसुक्यानी, अबहिँ रही मेरैँ गृह आई।
सूर स्याम राधहिँ कछु कारन, जसुमति समुझि रही अरगाई ॥१३॥
अर्थ-हे महरि (यशोदा) कुँवर कृष्ण सांप के विष को मंत्र से उतारने वाले है।
एक लड़की को सांप ने काट लिया, उसे कृष्ण ने तुरन्त जिला दिया। अपने पुत्र को
बुला लो और तुम (स्वयं) कहकर उसे भेज दो। कुमारी राधा प्रातः पशुओं के चरने के
स्थान पर गई थी वहाँ कही उसे काले सांप ने काट लिया। यह सुनकर महरि (यशोदा)
ने मन ही मन मुस्करा कर सोचा, अभी तो हमारे ही घर थी। सूरदास कहते हैं कि
यशोदा राधा की मूर्च्छा के मूल कारण को समझकर चुप हो गईं ॥१३॥
तब हरि कौँ टेरति नंदरानी।
भली भई सुत भयौ गारुड़ी, आजु सुनी यह बानी।
जननी-टेर सुनत हरि आए, कहा कहति री मैया ?।
कीरति महरि बुलावन आई, जाहु न कुँवर कन्हैया।
कहूँ राधिका कारैँ खाई, जाहु न आवौ झारि।
जंत्र-मंत्र कछु जानत हौ तुम, सूर स्याम बनवारि ॥१४॥