सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—(गोपी कहती है) मेरे बहने मे कोई नही है । क्या कहूँ, कुछ कहा नही
जाता, ये (इन्द्रियाँ) तनिक भी नही डरती । ये आंखे कृष्ण के दर्शन की लालची हैं,
कान रसयुक्त शब्दो के (लालची हैं) । मन पहले ही शरीर को छोड़कर चला गया तब
मैं बेहाल हो गयी । इन्द्रियो का राजा मन है (उसने) सब को बुला लिया । सूरदास
कहते है कि (गोपी कहती है) ये सब जाकर कृष्ण से मिल गये । मेरे लिये बला कर
गये ॥१३८॥
अब तौ प्रगट भई जग जानी।
वा मोहन सौं प्रीति निरन्तर, क्योंऽब रहैगी छानी ।
कहा करौं सुन्दर मूरति, इन नैननि माँझ समानी ।
निकसति नहीं बहुत पचि हारी, रोम-रोम अरुझानी ।
अब कैसे निरवारि जाति है, मिली दूध ज्यों पानी ।
सूरदास प्रभु अन्तरजामी, उर अन्तर की जानी ॥१३६॥
अर्थ—अब तो (प्रेम) प्रकट हो गया और ससार जान गया । उस कृष्ण से
निरन्तर प्रेम अब क्योकर छिपा रहेगा ? क्या करूं सुन्दर मूर्ति इन आंखो के बीच
समा गयी है। बहुत (प्रयास) करके हार गयी (यह) निकलती नही (बल्कि) रोम-रोम
मे उलझ गयी है। दूध और पानी के समान एक मे मिल जाने पर अलग कैसे किया
जाय ? सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्तरयामी है इसलिए हृदय के अन्दर की बात
जान गये ॥१३६॥
सखि मोहिं हरिदरस रस प्याइ ।
हौं रँगी अब स्याम-मूरति, लाख लोग रिसाइ ।
स्याम सुन्दर मदन मोहन, रंग रूप सुभाइ ।
सूर स्वामी-प्रीति-कारन, सीस रही कि जाइ ॥१४०॥
अर्थ-सखी मुझे कृष्ण के दर्शन रूपी रस को पिलाओ । मैं श्याम के रंग मे रग
गयी हूँ (चाहे) लाखो लोग नाराज हो जायें। श्यामसुन्दर का स्वाभाविक रूप और
रग कामदेव को भी मोहित करने वाला है। सूरदास कहते हैं कि गोपी कह रही है कि
स्वामी के प्रेम के कारण अब चाहे मेरा सिर रहे या (चला) जाय ॥१४०॥
नन्दलाल सौं मेरौ मन मान्यौ, कहा करैगौ कोउ ।
मैं तौ चरन-कमल लपटानी, जो भावै सो होउ ।
बाप रिसाइ, माइ घर मारै, हँसैं विराने लोग ।
अब तौ स्यामहिं सौं रति बाढ़ी, विधना रच्यौ सँजोग ।
जाति महति पति जाइ न मेरी, अरु परलोक नसाइ ।
गिरिधर वर मैं नैंकु न छाँड़ौं, मिली निसान बजाइ ।
बहुरि कवहिं यह तन धरि पैहौं, कहँ पुनि श्रीवनवारि ।
सूरदास स्वामी कें ऊपर, यह तन डारौं वारि ॥१४१॥