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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 359 में से

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पृष्ठ 149

१४८ सूरसागर सार सटीक
महर कह्यौ खेलौ तुम दोऊ, दूरि कहूँ जिनि जैहौ ।
गनती करत ग्वाल गैयनि की, मोहिं नियरैं तुम रैहौ ।
सुनि बेटी बृषभानु महर की, कान्हहिं लेइ खिलाइ ।
सूर स्याम कौं देखे रहिहौ, मारै जनि कोउ गाइ ॥५॥
अर्थ-नन्द कृष्ण को लेकर पशुओ के बाड़े (गोशाला) में गये । वहां पर उन्होने
राधिका को खड़ी देखा, उसे पहचान कर (नन्द ने) बुला लिया । महर ने कहा तुम
दोनों खेलो, कही दूर मत जाना । ग्वाल और गायों की गिनती करते हुए मेरे ही
पास तुम रहना । महर वृषभानु की बेटी सुनो ! कृष्ण को खिला लो । सूरदास कहते हैं
(महर कहते हैं) कि कृष्ण को देखते रहना, कोई गाय मारने न पावे ॥५॥
नन्द बबा की बात सुनौ हरि ।
मोहिं छोड़ि जौ कहूँ जाहुगे, ल्याऊँगी तुमकौं धरि ।
भली भई तुम्हें सौंपि गए मोहिं, जान न दैहौं तुमकौं ।
बाँह तुम्हारी नैंकु न छाँड़ौं, महर खीझिहैं हमकौं ।
मेरी बाँह छोड़ि दै राधा, करत ऊपरफट बातें ।
सूर स्याम नागर, नागरि सौं, करत प्रेम की घातें ॥६॥
अर्थ- (राधा कहती है) कृष्ण, बाबा नन्द की बात सुनो । मुझको छोड़कर
यदि कही जाओगे तो मै तुमको पकड़ लाऊँगी । अच्छा हुआ तुम्हे वे मुझे सौप गये, मैं
तुमको जाने नही दूंगी । तुम्हारी बांह तनिक भी नही छोड़ेंगी, नही तो महर हमसे
नाराज होंगे । (कृष्ण कहते हैं) राधा मेरी बांह छोड़ दे, क्यों अनर्गल बाते करती है।
सूरदास कहते है कृष्ण चतुर राधा से प्रेम की चोटे करते है ॥६॥
खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, नंद-महरि कैं आई (हो) ।
सकुच सहित मधुरे करि बोली, घर हीं कुँवर कन्हाई (हो) ।
सुनत स्याम कोकिल सम बानी, निकसे अति अतुराई (हो) ।
माता सौं कछु करत कलह हे, रिस डारी बिसराई (हो) ।
मैया री तू इनकौं चीन्हति, बारम्बार बताई (हो) ।
जमुना-तीर काल्हि मैं भूल्यौ, बाँह पकरि लै आई (हो) ।
आवति इहाँ तोहिं सकुचति है, मैं दै सौंह बुलाई (हो) ।
सूर स्याम ऐसे गुन-आगर, नागरि बहुत रिझाई (हो) ॥७॥
अर्थ-खेलने के बहाने कुमारी राधा नन्द महर के (घर) आई । संकोच के
साथ मधुरता से बोलती है कि (हे) कुँवर कृष्ण घर हो ? कोयल के समान राधा की
बोली सुन कर (कृष्ण) अत्यधिक आकुलता से निकले । माता से कुछ तकरार कर रहे
थे, पर (उस) क्रोध को वे तुरन्त भूल गये । (कृष्ण कहते है) मैया तुम इसको पहचानती
हो । (फिर) बार-बार बताते है कि यमुना के किनारे कल मैं भटक गया था, (यह)
मेरी बांह पकड़ कर ले आयी । यहां आते हुए इसको तुमसे संकोच होता है । मैने इसे